अमीर खुसरो का जीवन परिचय
amir khusro ka jivn prichy
अमीर खुसरो हिन्दी साहित्य के
इतिहास में आदिकाल के कवि हैं | इन्होंने खड़ी बोली भाषा के प्रवर्तक के रूप में
ख्याति अर्जित की है | आचार्य नगेन्द्र ने इतिहास ग्रन्थ में इन्हें लौकिक
साहित्यकार के अंतर्गत रखा है |
अमीर खुसरो का
जन्म 1253 ई० में उत्तरप्रदेश के एटा जिले के पटियाली नामक कस्बे में गंगा किनारे
हुआ था | वे मध्य एशिया के लाछन जाती के तुर्क सैफुद्यीन के पुत्र थे | अमीर खुसरो
की माँ दौलत नाज हिन्दू राजपूत थी | ये दिल्ली के एक रईस अमीर इमादल्मुल्क की
पुत्री थी | अमीर इमादल्मुल्क बादशाह बलबन के युद्ध मंत्री थे | खुसरो के पिता के
तरफ से मुसलमान तथा माता के तरफ से हिन्दू संस्कृति में घुलने-मिलने की नसीब हुई |
राजनितिक दबाव के कारण माँ के तरफ का परिवार भी बाद में मुसलमान बन गया |
अमीर-खुसरो के परिवार चिश्ती तथा सूफी सम्प्रदाय के महान संत साधक संत हजरत
निजामुद्दीन औलिया उर्फ सुल्तानुल मशयख से दीक्षा ग्रहण की थी | अमीर खुसरो सात
वर्ष के थे तभी पिता का देहावसान हुआ था | फिर भी इनके जीवन में शिक्षा-दीक्षा को
लेकर बाधा नहीं पहुँची | इन्होंने अपने समय के दर्शन तथा विज्ञान से काफी प्रभावित
हुये और बचपनसे ही कविता लिखना प्रारम्भ किये | बीस वर्ष तक पहुँचते-पहुँचते कवि
बन गये |
खुसरों की प्रमुख रचनाओं में – खलिकबारी,
पहेलियाँ, मुकरियाँ, दो सूखने, गजल आदि प्रसिद्ध हैं | खुसरो को मुईजुद्दिन कैकबाद
के दरवार में राजकीय सम्मान प्राप्त हुआ | गुलाम वंश के पतन के बाद जलालुद्दीन
खिलजी दिल्ली का सुल्तान बना | इसने खुसरो को ‘अमीर’ की उपाधि दी | जलालुद्दीन के
हत्यारे इसके भतीजे अलाउद्दीन खिलजी ने सुल्तान होने पर ‘राजकवि’ की उपाधि से
सम्मानित किया है |
अमीर खुसरो
जन्मजात कवि के साथ-साथ कुशल व्यवहारिक बुद्धिवाले भी थे | इन्होंने इस जमाने के
राज परिवार में उँचे ओहदों में रहकर इसकी प्रमाण दीखा दिया है | इन्होंने अपने
जीवन का सम्पूर्ण पल ग्यारह सुल्तानों के उत्थान-पतन में बिताया | अमीर खुसरो सबसे
पहले 1270 ई० में गयासुद्दीन बलबन के भतीजे कड़ा (इलाहाबाद) के हाकिम अलाउद्दीन
मुहम्मद कुलिश खां का राज्याश्रय प्राप्त हुआ, बाद में खुसरो बलबन के जयेष्ट पुत्र
सुल्तान मुहम्मद का राज्याश्रय मिला | इन्होंने सुल्तान के साथ मुल्तान की यात्रा
की, इसी दरमियान मुगलों से युद्ध हुई, इस युद्ध में सुल्तान मुहम्मद की मृत्यु हो
गई और खुसरो बंदी बना लिया गया |
अमीर खुसरो महान
संगीतज्ञ भी थे | कहा जाता है की तबला हजारों साल पुराना वाद्द्य-यंत्र है किन्तु
नवीनत्तम ऐतिहासिक वर्णन में बताया जाता है की 13 वीं शताब्दी में भारतीय कवि एवं
संगीतज्ञ अमीर खुसरो ने पखवाज के दो टुकडें करके तबले का आविष्कार किया |
अमीर खुसरो अपने जीवन
में गुरु निजामुद्दीन औलिया से काफी प्रभावित थे | गुरु के प्रति लगाव को अन्दाजा
लगाया जा सकता है की आश्रयदाता वादशाह गयासुद्दीन तुगलक अक्सर निजामुद्दीन के
विरोध करते थे और शिष्य खुसरो गुरु के प्रति नतमस्तक चिंतातुर रहते थे | एक बार
बादशाह दिल्ली से दूर गये थे | आते वक्त इन्होंने खुसरो से कहलवायी की मेरे पहँचने
से पहले ही औलिया दिल्ली छोड़ दे | इन्होंने बादशाह की यह खबर गुरु औलिया को दिये
और पूछ बैठे- अब क्या होगा ? गुरु औलिया शिष्य अमीर के ह्रदय विदारक अवस्था को
देखकर उत्तर दिए – कुछ नहीं खुसरो | तुम घबराओं मत | हनुज दिल्ली दूर अस्त यानि
अभी दिल्ली दूर है | और सचमुच बादशाह के लिये दिल्ली बहुत दूर रहा इन्होंने कभी
दिल्ली आ नहीं पाये | रास्ते में एक पड़ाव में इनकी मृत्यु हो गई | तभी से यह कहावत
शायरी के रूप में सबसे पहले खुसरो के जुवानों से ही निकली |
अपने गुरु के प्रति खुसरो
के लगाव को इसे भी लगाया जा सकता है की एक बार अमीर खुसरो किसी कारण बस दिल्ली से
दूर गये थे | समाचार आयी की गुरु का निधन हो गया है | समाचार सुनते ही इन्होंने
सन्निपात की अवस्था में ही दिल्ली पहुँचे | धुल-धूसरित खानकाह के द्वार पर खड़े हो
गये और साहस न कर सके अपने पीर की मृत देह को देखने का | आखिरकार जब इन्होंने शाम
के ढलते समय पर उनको मृत देखा तो इनके पैरों पर शिर पटक- पटक कर मुर्छित हो गये और
उसे वेसुध हाल में इनके होंठ से निकला –
गोरी सेवे सेज पर मुख
पर डारे केश |
चल खुसरों घर अपने सांझ
भई चहू देस ||
इस प्रकार
अमीर खुसरो अपने प्रिय के वियोग में संसार के मोहजाल काट फेंके और धन-सम्पति दान कर, काले वस्त्र धारण कर अपने
पीर के समाधि पर जा बैठे | और कभी न उठने का दृढ़ निश्चय कर वहीं बैठकर प्राण
विसर्जन करने लगे |
इस प्रकार इनकी
मृत्यु1325 ई० में हुई | दिल्ली में औलिया के समाधि के बगल में इनकी भी समाधि बना
दी गयी है |