Friday, May 27, 2022

आदिकालीन काव्य की प्रवृत्तियाँ / aadikal ki kavy prvritiyan

                                                    आदिकालीन काव्य प्रवृत्तियाँ    

                                                           


                              आदिकाल  की सम्पूर्ण साहित्य भारतीय जीवन के संक्रान्ति काल में निर्मित हुआ | जिन्हें स्थान भेद के आधार पर दो भागों में विभाजित हुआ है | प्रथम, पशिचमी अंचल की साहित्य दूसरा, पूर्वी अंचल की साहित्य | इन साहित्य की प्रवृति को निम्न प्रकार से प्रकट किया जा सकता है –

1.  राजस्तुति    :- इस काल में राजस्तुति की रचनायें हुई, जो पशिचमी अंचल की साहित्य की मुख्य प्रवृति है | दरबारी कवि अपने आश्रयदाता राजाओं के पराक्रमपूर्ण चरितों या गाथाओं का वर्णन करते थे | हिन्दी के प्रबंध काव्य रासों के नाम से जानी जाती है | जैसे- प्रमुख रचनाएँ हैं – दलपति विजय कृत खुमाण रासों, नरपति नाल्ह कृत वीसलदेव रासों, शारंगधर कृत हम्मीर रासों, जागनिक कृत परमाल रासों, चंदबरदाई कृत पृथ्बीराज रासो आदि हैं | राजस्तुति से युक्त एक काव्य अंश देखिये :-

                    बारह बरस लौ कूकर जीवै, अरु तेरह लौ जिये सयार|

                     बरस अठारह क्षत्रिय जीवै, आगे जीवन कौ धिक्कार || (जागनिक कृत परमाल रासो से )

2 साम्प्रदायिक धार्मिक साहित्य :- पूर्वी अंचल में बौद्ध धर्म के निरंतर परिवर्तन का प्रभाव सिद्ध- साहित्य में मिलता है | सिद्धों या सिद्ध-साहित्य की प्रतिक्रिया के परिणाम स्वरूप नाथों या नाथ-साहित्य साहित्य का प्रादुर्भाव हुआ | प्रमुख रचनाओं में हैं – सरहपा कृत दोहाकोश, शबरपा कृत चर्यापद , डोम्भिपा कृत योगचर्या आदि हैं | अन्य सिद्ध कवियों में – लुईपा, कणडपा, कुक्कुरिपा आदि हैं इनके रचनाओं में पाखण्ड और आडम्बर का विरोध है, गुरु-सेवा का महत्त्व दिया है | ये सहज भोग मार्ग से जीव को महासुख की ओर ले जाते हैं | इनकी भाषा सरल तथा गेय हैं, काव्यों में भावों का सहज प्रवाह मिलता है | एक उदाहरण देखिये –

                                         नाद न विन्दु न रवि न शशि मण्डल,

                                         चिअराअ सहाबे मूकुल,

                                         अजुरे उंजू छाडी मा लेहु रे बंक,

                                        निअही बोहिम जमु रे लांक |

                                        हाथेरे कांकण मा लोउ दामण,

                                       अपने अपा बुझतु निअन्मण |

3 अपभ्रंश प्रभावित पुरानी हिन्दी का प्रयोग – हिन्दी साहित्य के समान्तर अपभ्रंश प्रभावित साहित्य की रचनाएँ हो रही थी | ये धार्मिक काव्य रचनाएँ हैं इसमें महापुरुषों के जीवन वृत्त तथा उनके उपदेश आदि की कथा उपलब्ध है | तथा मनुष्य के मोक्ष प्राप्त करने के साधन उपलब्ध कराये गये हैं | प्रमुख रचनाएँ हैं – स्वयंभू कृत पउमचरिउ, रिटठनेमि चरिउ,स्वयंभूछन्द | पुष्पदन्त कृत महापुराण, णयकुमारचरिउ, जसहर चरिउ आदि |

4. रासक काव्यधारा – हिन्दी में इसका विकास अपभ्रंश से हुआ | ये वीररसात्मक धर्म-प्रधान तथा उपदेशमूलक भी है | प्रमुख काव्य कृतियों में – अब्दुलरहमान कृत संदेशरासक, जिनदत्त सूरी कृत उपदेश-रसायन-रास आदि |

5. वीर एवं श्रगार मूलक रचनाएँ – आदिकाल में वीर एवं श्रृंगार मूलक रचनाएँ रची गई | प्रमुख रचनाओं में प्राकृत-पैगलम प्रमुख वीररसात्मक मुक्तकों का संकलन है जिसमें जज्जल, बब्कर, विद्याधर, हरिभद्र की रचनाएँ संकलित हैं | इस प्रकार श्रृंगार मूलक रचनाओं में हेमचंद्र कृत प्राकृत व्याकरण,मेरुतंग कृत प्रबंधचिंतामणि तथा पुरातन प्रबन्ध आदि हैं |

6. प्रेमाख्यानक काव्य प्रवृति – प्रेमाख्यानक काव्य प्रवृति भी पाई गई | प्रमुख रचनाओं में – किलोल कृत ढोलामारू-रा-दूहा | माधवानल काम कंदला एवं राठौर पृथ्वीराज री कही वेली किसन रुक्मणी री आदी |

7. श्रृंगार मूलक भक्ति काव्य – इस युग में श्रृंगार भक्ति मूलक पदों की रचना की परम्परा का विकास मिलता है | जैसे- जयदेव की गीत गोविन्द में मिलता है | इसी प्रकार के पद विद्यापति के पदावली में भी पाई जाती है

8. प्रकृति चित्रण – आदिकाल के साहित्य में वस्तु वर्णन के अन्तर्गत प्रकृति-चित्रण की दोनों प्रणालियों का चित्रण है | आलम्बन तथा उदीपन आदि दो रूप हैं | इनके आलावा कहीं-कहीं परिगणन पद्धति भी मिलती है |

9. राष्टीय भावना का अभाव – इस युग की साहित्य राजाओं के वीर, श्रृंगार, प्रेम, आदि बिषय में ही रचना लिखते पाये गये | साधारण जनमानस के सामाजिक, आर्थिक,दशाओं का चित्रण नहीं मिलता है |

10. गद्य रचनाओं का प्रदुभाव – इस काल में पद्य रूपों प्रयाप्त रचनाएँ मिलती हैं परन्तु गद्य रूप में भी रचनाएँ मिलना शुरू हुआ है | जैसे – दामोदर शर्मा कृत उक्ति व्यक्ति प्रकरण, रोड़ा कृत राउलवेल, ज्योतीश्वर कृत वर्णरत्नाकर आदि |   

11. भाषा – कविता की भाषा डिंगल तथा पिंगल रूपों में है | ब्रजभाषा मिश्रित कोमल श्रृंगारिक रचनाएँ पिंगल में मिलती है | तथा वीरगाथा मूलक रचनाएँ डिंगल में मिलती है, साथ ही संस्कृत, मैथली तथा देसिल भाषा की भी रचनाएँ मिलती हैं |

12. काव्य शैली का विकास – आदिकालीन साहित्य में तीन प्रकार के काव्य शैली का विकास हुआ – प्रबन्ध शैली, मुक्तक शैली तथा गीत शैली |

13. छन्दगत प्रवृति – इस काल में छन्द की व्यापक परम्परा म्मिलती है | प्रबन्ध काव्यों में दुवई, हेला, इछा, धत्ता. रासक, पद्धति आदि के आलावे रोलऊ, उल्लावउ, छप्पय आदि हैं | मुक्तक में दोहा, पद, अदिल्ल आदि हैं |

  इस प्रकार हिंदी साहित्य का आदिकाल उतरार्ध काव्य विषय का उदगम स्थल की उपज भूमि है |

 

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