आदिकालीन काव्य प्रवृत्तियाँ
आदिकाल की
सम्पूर्ण साहित्य भारतीय जीवन के संक्रान्ति काल में निर्मित हुआ | जिन्हें स्थान
भेद के आधार पर दो भागों में विभाजित हुआ है | प्रथम, पशिचमी अंचल की साहित्य
दूसरा, पूर्वी अंचल की साहित्य | इन साहित्य की प्रवृति को निम्न प्रकार से प्रकट
किया जा सकता है –
1. राजस्तुति :- इस काल में राजस्तुति की रचनायें हुई, जो पशिचमी अंचल की साहित्य की मुख्य प्रवृति है | दरबारी कवि अपने आश्रयदाता राजाओं के पराक्रमपूर्ण चरितों या गाथाओं का वर्णन करते थे | हिन्दी के प्रबंध काव्य रासों के नाम से जानी जाती है | जैसे- प्रमुख रचनाएँ हैं – दलपति विजय कृत खुमाण रासों, नरपति नाल्ह कृत वीसलदेव रासों, शारंगधर कृत हम्मीर रासों, जागनिक कृत परमाल रासों, चंदबरदाई कृत पृथ्बीराज रासो आदि हैं | राजस्तुति से युक्त एक काव्य अंश देखिये :-
बारह बरस लौ कूकर जीवै, अरु
तेरह लौ जिये सयार|
बरस अठारह क्षत्रिय जीवै,
आगे जीवन कौ धिक्कार || (जागनिक कृत परमाल रासो से )
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साम्प्रदायिक धार्मिक साहित्य :- पूर्वी अंचल में बौद्ध धर्म के निरंतर परिवर्तन
का प्रभाव सिद्ध- साहित्य में मिलता है | सिद्धों या सिद्ध-साहित्य की प्रतिक्रिया
के परिणाम स्वरूप नाथों या नाथ-साहित्य साहित्य का प्रादुर्भाव हुआ | प्रमुख
रचनाओं में हैं – सरहपा कृत दोहाकोश, शबरपा कृत चर्यापद , डोम्भिपा कृत योगचर्या
आदि हैं | अन्य सिद्ध कवियों में – लुईपा, कणडपा, कुक्कुरिपा आदि हैं इनके रचनाओं
में पाखण्ड और आडम्बर का विरोध है, गुरु-सेवा का महत्त्व दिया है | ये सहज भोग
मार्ग से जीव को महासुख की ओर ले जाते हैं | इनकी भाषा सरल तथा गेय हैं, काव्यों
में भावों का सहज प्रवाह मिलता है | एक उदाहरण देखिये –
नाद न विन्दु न रवि न शशि मण्डल,
चिअराअ
सहाबे मूकुल,
अजुरे
उंजू छाडी मा लेहु रे बंक,
निअही
बोहिम जमु रे लांक |
हाथेरे कांकण मा लोउ
दामण,
अपने अपा
बुझतु निअन्मण |
3 अपभ्रंश
प्रभावित पुरानी हिन्दी का प्रयोग – हिन्दी साहित्य के समान्तर अपभ्रंश प्रभावित
साहित्य की रचनाएँ हो रही थी | ये धार्मिक काव्य रचनाएँ हैं इसमें महापुरुषों के
जीवन वृत्त तथा उनके उपदेश आदि की कथा उपलब्ध है | तथा मनुष्य के मोक्ष प्राप्त
करने के साधन उपलब्ध कराये गये हैं | प्रमुख रचनाएँ हैं – स्वयंभू कृत पउमचरिउ,
रिटठनेमि चरिउ,स्वयंभूछन्द | पुष्पदन्त कृत महापुराण, णयकुमारचरिउ, जसहर चरिउ आदि
|
4. रासक
काव्यधारा – हिन्दी में इसका विकास अपभ्रंश से हुआ | ये वीररसात्मक धर्म-प्रधान
तथा उपदेशमूलक भी है | प्रमुख काव्य कृतियों में – अब्दुलरहमान कृत संदेशरासक,
जिनदत्त सूरी कृत उपदेश-रसायन-रास आदि |
5. वीर एवं
श्रगार मूलक रचनाएँ – आदिकाल में वीर एवं श्रृंगार मूलक रचनाएँ रची गई | प्रमुख
रचनाओं में प्राकृत-पैगलम प्रमुख वीररसात्मक मुक्तकों का संकलन है जिसमें जज्जल,
बब्कर, विद्याधर, हरिभद्र की रचनाएँ संकलित हैं | इस प्रकार श्रृंगार मूलक रचनाओं
में हेमचंद्र कृत प्राकृत व्याकरण,मेरुतंग कृत प्रबंधचिंतामणि तथा पुरातन प्रबन्ध
आदि हैं |
6.
प्रेमाख्यानक काव्य प्रवृति – प्रेमाख्यानक काव्य प्रवृति भी पाई गई | प्रमुख
रचनाओं में – किलोल कृत ढोलामारू-रा-दूहा | माधवानल काम कंदला एवं राठौर पृथ्वीराज
री कही वेली किसन रुक्मणी री आदी |
7.
श्रृंगार मूलक भक्ति काव्य – इस युग में श्रृंगार भक्ति मूलक पदों की रचना की
परम्परा का विकास मिलता है | जैसे- जयदेव की गीत गोविन्द में मिलता है | इसी
प्रकार के पद विद्यापति के पदावली में भी पाई जाती है
8. प्रकृति
चित्रण – आदिकाल के साहित्य में वस्तु वर्णन के अन्तर्गत प्रकृति-चित्रण की दोनों
प्रणालियों का चित्रण है | आलम्बन तथा उदीपन आदि दो रूप हैं | इनके आलावा
कहीं-कहीं परिगणन पद्धति भी मिलती है |
9. राष्टीय
भावना का अभाव – इस युग की साहित्य राजाओं के वीर, श्रृंगार, प्रेम, आदि बिषय में
ही रचना लिखते पाये गये | साधारण जनमानस के सामाजिक, आर्थिक,दशाओं का चित्रण नहीं
मिलता है |
10. गद्य
रचनाओं का प्रदुभाव – इस काल में पद्य रूपों प्रयाप्त रचनाएँ मिलती हैं परन्तु
गद्य रूप में भी रचनाएँ मिलना शुरू हुआ है | जैसे – दामोदर शर्मा कृत उक्ति
व्यक्ति प्रकरण, रोड़ा कृत राउलवेल, ज्योतीश्वर कृत वर्णरत्नाकर आदि |
11. भाषा –
कविता की भाषा डिंगल तथा पिंगल रूपों में है | ब्रजभाषा मिश्रित कोमल श्रृंगारिक
रचनाएँ पिंगल में मिलती है | तथा वीरगाथा मूलक रचनाएँ डिंगल में मिलती है, साथ ही
संस्कृत, मैथली तथा देसिल भाषा की भी रचनाएँ मिलती हैं |
12. काव्य
शैली का विकास – आदिकालीन साहित्य में तीन प्रकार के काव्य शैली का विकास हुआ –
प्रबन्ध शैली, मुक्तक शैली तथा गीत शैली |
13. छन्दगत
प्रवृति – इस काल में छन्द की व्यापक परम्परा म्मिलती है | प्रबन्ध काव्यों में
दुवई, हेला, इछा, धत्ता. रासक, पद्धति आदि के आलावे रोलऊ, उल्लावउ, छप्पय आदि हैं
| मुक्तक में दोहा, पद, अदिल्ल आदि हैं |
इस प्रकार हिंदी साहित्य का आदिकाल उतरार्ध काव्य विषय का उदगम स्थल की उपज भूमि है |
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