भारतीय साहित्य की अवधारणा
भारतीय साहित्य में दो शब्दों का
युग्म है | इसमें पहला शब्द “भारतीय” और दूसरा शब्द “साहित्य” है | पहला शब्द
“भारतीय” में भी दो शब्द युग्म है – पहला शब्द है “भा” और दूसरा शब्द है “रत” है,
इसमें ‘भा’ का अर्थ– प्यारा, प्रिय, जो सभी को प्रिय लगे, और ‘रत’ का अर्थ है- हमेशा,
अनवरत, हर-पल, यानी जो हमेशा प्रिय कार्य में लगा रहा हो | इस प्रकार भारतीय से
अभिप्राय है- प्यार, महब्बत और बन्धुत्त्व की भावना से सदा अनवरत जीवन जीने वाले
मानव व प्राकृतिक समूह से है |
ऐसी ही
“साहित्य” में तीन शब्दों का युग्म है- पहला शब्द है ‘सा’ दूसरा है ‘हि’ और तोसरा
है ‘त्य’ है | इसमें पहला शब्द ‘सा’ का अर्थ है- सारा संसार, पुरे जगत जीवों के
लिए बोध है, तथा ‘हि’ का अर्थ है- भलाई, हितार्थ, लाभ के लिए, और ‘त्य’ का अर्थ
होता है- के लिए | इस प्रकार साहित्य का अभिप्राय है- समस्त जीवों के लिए हितार्थ
की संग्रह रचना से है |
भारतीय
साहित्य विश्व के अन्य साहित्य के समक्ष बहुत ही व्यापकता के साथ उपस्थित होता है,
क्योंकि इसके कलेवर में अगाध विषय, भाव व कला की भंडार है | भारतीय साहित्य
बहुविषयक भावना से प्रेरित है | भारतीय साहित्य की बहुविषयक में विज्ञान, साहित्य,
इतिहास, ज्योतिष, गणित, समाज, भुगोल, कामशास्त्र, राजनीति, दर्शन, तर्कशास्त्र,
अर्थशास्त्र आदि भाव से विकास की निरंतर गति में अग्रसर है | ये सभी विषय विश्व
साहित्य को मार्गदर्शन का कार्य करती है | भारतीय साहित्य के गणित की दशमलव
पद्धति, दर्शन व् ज्योतिष, व्याकरण-कोश ग्रन्थ, कृषि की वैदिक पद्धति वर्तमान में
विश्व को प्रगति की आईना दिखाने की कार्य करती है | इनके आलावे भारतीय साहित्य की
संगीत, नृत्य, खेल, विश्व साहित्य के बीच विशिष्ठ पहचान रखती है | इसके सहह्रदय
में अनेकता में एकता की भावना रहती है, सदा जीवन उच्च विचार मन में ध्याती रहती
है, जिस कारण सान्निध में रहने वाले विदेश मूल के साहित्य बिचार करते हुए कहते
हैं- अहा ! भारतीय साहित्य की समन्वयक भावना, यह तो हमारे लिए “गुरु” है | इतना ही
नहीं, भारतीय साहित्य को लोकरक्षक, लोकसेवक, लोकनायक, लोकरंजक और लोकप्रेरक कहते
हुए लगातर भविष्य में विकास की दौड़ में नेतृत्त्व करते रहने की कामना करते हैं |
भारतीय साहित्य पर आचार्य महावीर प्रसाद दूवेदी कहते हैं- ^^Kku&jkf”k ds lafpr dks”k
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