Saturday, September 27, 2025

भक्तिकाव्य हिंदी साहित्य का स्वर्ण / bhaktikavy hindi sahity ka svrn

 


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भक्तिकाव्य आर्य जाति के लिए कंचन की अपरिमिति राशि से भी मूल्यवान सिद्ध हुआ है | क्योंकि भक्तिकाव्य में सूरसागर , रामचरितमानस , पद्यमावत, जैसे मणिरत्न ग्रन्थ हैं |  इसी  के प्रभाव के कारण भक्तिकाल को हिंदी साहित्य का स्वर्णकाल कहा जाता है जिनकी लक्षण निम्न प्रकार हैं –


(1)  काव्य सम्बन्धी दृष्टि कोण की उदात्तता  – भक्तिकालीन काव्य या साहित्यकार की काव्य संबंधी दृष्टि  कोण  उदात्तता  से परिपूर्ण हैं | ये भक्ति कवि  अपने काव्य  में न जन का गुणगान किया है न किसी आश्रयदाता राजा का बल्कि  काव्य आत्मप्रेरणा से उत्त्पन्न हुई हैं | के काव्य स्वान्त  सुखाय से सर्व जन  सुखाय की ओर बढ़ी हैं | इस साहित्य में निर्विकार भाव से सत्य, उत्साह, आह्लाद और आनन्द की प्राप्ति  होती है |


(2) भावपछ तथा कलापछ की मणिकांचन  योग -   भक्तिकाव्य में विषय, व अनुभूति तथा अभिव्यक्ति और कलापछ एक दुसरे से घुल –मिल गये हैं | कविता जन मानस के ह्रदय में ऐसा भाव पैदा करती है की कवि  ही नहीं रचना भी  पाठक के लिए आदर्श हो जाती है | इस साहित्य का परम्परा भी विशाल है जिसमें कवीर – जायसी, मीरा, रसखन, हितवंश, सुरदास, नन्ददास, नानक जैसे भिन्न सम्प्रदाय के कवि  हैं और सभी कला व विषय से मानव हित की  सहयोगी  हैं |


(3) भारतीय संस्कृति का सम्यक निरुपण – भक्तिकाव्य भारतीय संस्कृति का भंडार हैं |यहाँ धर्म दर्शन सभ्यता संस्कृति व्यवहार,आचार – विचार, सभी पूर्णतया से सुरक्षित हैं | काव्य –हिन्दू, मुस्लिम,  ईसाई, सिक्ख भिन्न सम्प्रदायों के मूल धर्म की संस्कृति को मानव जीवन के समक्ष उपस्थित करती हैं | काव्यों में नायक साधारण आम जन नहीं,  बल्कि अलौकिक  व्यक्ति के रूप में हैं | काव्य आधुनिक और आने वाले युग के अमूल्य, प्रेरक, उद्धरिक के रूप में है | सम्पूर्ण भक्ति साहित्य जगजीवन के लिए प्रात: कालीन स्मरणीय है |

4, संगीतात्मकता का सन्निवेश – काव्यों  में संगीतात्मकता के तत्व आत्माभिव्यंजना, तीव्रानुभूति, सहज स्फूर्ति, अन्त प्रेरणा आदि सन्निवेश हैं | इसमें भावों या विषयों का भाषा के साथ अभिव्यंजना योग है | भक्तिकाव्य का सृजन आदिकाल में हुआ परन्तु प्रादुर्भाव भक्तिकाल में हुआ | इसी युग में सुरदास, तुलसी, कबीर, मीरा, नन्ददास, नानक आदि रसिक कवि हुए |


5, काव्यों की विविधता  – काव्य के रूपों के दृष्टि से आधुनिककाल श्रेष्ठ हैं पर  भक्तिकाल की तुलना में न्यून ही है  | भक्तिकाल में ही प्रबंधकाव्य, मुक्तककाव्य,  सूक्तिकाव्य,गीतकाव्य, जीवनचरित, गद्यकाव्य, संगीतकाव्य,  उपदेशकाव्य प्रर्याप्त मात्रा में लिखे गये | अत: काव्य रूपों की दृष्टि से भक्तिकाव्य काफी समृद्ध हैं |


6, लोकमंगल व लोकरंजन का प्राधान्य – भक्तिकाव्य मानव जीवन का काव्य है | यह काव्य मानव लोकमंगल के साथ लोकरंजन को प्राप्त करवाती है | भक्तिकाव्य मन, ह्रदय और आस्था की भूख को एक साथ शांत करती हैं | क्योंकि इन काव्यों में  सौन्दर्यता, आत्मयित्ता के उपादान उच्चकोटि के हैं |


7,  भाषागत वैशिष्ट्य – भक्तिकाव्य में अवधि और ब्रजभाषा दोनों ही भाषा चरमसीमा में पहुँच गयी | भक्तिकाव्य में भाषा का मार्जित और कव्योपयोगी शब्द ही प्रयुक्त हुए हैं | रीतिकाल में ब्रजभाषा के प्रति काफी खिलवाड़ किया गया है | शब्द के प्रति काफी कलाबाजी की गयी है | कहने का मतलब है भक्तिकाल की भाषा रीतिकाल या अन्य काल की भाषा की तुलना में साधू रूप में है |


                 इस प्रकार के लक्षणों को देखते हुए भक्तिकाल को हिन्दी साहित्य का स्वर्णयुग कहा गया है | 




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