विद्यापति की काव्य कला
महाकवि विद्यापति अपने काव्यकला
के सौन्दर्य से ही अभिनय जयदेव, मैथिल-कोकिल, कंठहार कवि आदि के उपाधि से विभूषित
हुये हैं | इनकी काव्य बिषय को कला पछ
सरिता की भांति सरस प्रवाहित होने में सहायक है | भावों व कलाओं की मिठास व
रस से
ही महाकवि रसराज की उपाधि पाई थी | ऐसे उपाधि से सम्मानित कवि की कलात्मकता
को निम्न प्रकार से उपस्थित किया जा सकता है |
1.
काव्यरूप –
विद्यापति प्रबन्ध व मुक्तक दोनों तरह की काव्य रचना की है | कीर्तिलता और
कीर्तिपताका प्रबंधात्मक शौर्य गाथा है और पदावली गेय मुक्तक काव्य रचना है |
2.
गीतात्मकता –
विद्यापति के काव्य भारतीय गीत परम्परा की महत्वपूर्ण कड़ी है | पदावली तो गेयपदों
का समूह है | इनकी गीतों को तीन श्रेणियों में बाँटा जा सकता है, पहला शास्त्रीय
संगीत के पद दुसरे देवस्तुति में गाये जाने वाले भजन तीसरे में लोक-जीवन में गाये
जाने वाले गीत जिसमें कोहसार से लेकर जंनसार तक के गीत हैं | ये गेय पद मिथिला के लोककंठों में हैं |
3.
ध्वन्यात्मकता –
इनके पदों में ‘रे’ टेप की ध्वन्यात्मकता है | जैसे – ‘के पति आ लए जाए तरे’ या
‘सुतल छलहुँ हम घरवारे ‘ यहाँ “रे” ध्वन्यात्मकता को प्रकट कर रहा है | अत: इनके
काव्य में संगीतात्मकता के साथ ही ध्वन्यात्मकता की सौन्दर्य विराजमान है |
4.
बिम्ब योजना –
पदावली के पदों में नायक-नायिका के रूप सौन्दर्य वर्णन के समय रूपक या बिम्बों का
प्रयोग धड़ल्ले से किया गया है | इनकी बिम्ब-योजना इतनी सटीक है कि कवि जो चित्र
उपस्थित करना चाहता है वह उपस्थित हो जाता है | जैसे- कुच युग ऊपर चिकुर फुजी पसरल
ता अरुझाएल
हारा |
जनु सुमेरु
उपर मिलि ऊगल
चान्द
बिहुनि सबे तारा ||
यहाँ नायिका के ऊरोज के
ऊपर फैले हुये बाल जो हार के साथ उलझ गये
हैं का विम्ब द्रष्टव्य है |
5.
चित्रात्मकता –
विद्यापति के पदों में चित्रात्मकता मुख्य कला है | पदों में जिस बिषय की कथा कही जाती इसका स्वरूप उभरता जाता
है पाठक को लगता है कि वही दृश्य सामने प्रकट होकर घटित हो रहा है | जैसे –
नव वृन्दावन नव नव तरूगण
आएल ऋतुपति राज बसंत |
यहाँ बसंत ऋतु के समय की प्रकृति को चित्रित किया गया है |
6.
अलंकार योजना –
विद्यापति के कलापछ में अलंकार-योजना भी महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है |अलंकार की
छंटा ने विद्यापति को अलंकारवादी कवि के श्रेणी में ला खड़ा करता है | नायक-नायिका
के सौन्दर्य वर्णन में वय:संधि, सद्यःस्नाता, रूप-चित्रण, रूप-लिप्सा और नख-शिख
वर्णन के समय इन्होंने अनुप्रास, उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, रूपकातिश्योक्ति आदि
अलंकारों की झड़ी लगा दी है | जैसे -
पल्लवराज चरन युग
सोभित, गति गजराजक आगे |
कनक कदलि पर सिंह
समारल,तापर मेरु सभागे ||
मेरु उपर दुई कमल
फुलाएल,काल बिना रूचि पाई |
मनिमय हार धार बहु
सुरसरि, तओ नहिं कमल सुखाई ||
7.
काव्य भाषा –
पदावली की भाषा मैथली है | कीर्तिलता और कीर्तिपताका की भाषा अवहट्ट है |
भू-परिक्रमा, शैवसर्वस्वसार, पुरुषपरीक्षा, दानवाक्यावली आदि ग्रन्थों की भाषा
संस्कृत है |
इसप्रकार विद्यापति की काव्यकला निश्चय ही सरस, सहज और सुकोमल है | सच कहा जाय तो विद्यापति ही सर्वप्रथम हिन्दी साहित्य में भक्ति परम्परा के प्रथम गायक कवि हैं |
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