Thursday, May 15, 2025

भाषा के विविध रूपों पर प्रकाश डालिए / bhasha ke vividh rupon pr prkas dalie

         भाषा के विविध रूपों पर प्रकाश डालिए
                Bhasha ke vividh rupon pr prkash dalie


       भाषा के विभिन्न आधारों पर विविध रूप दिखाई देता है, जिन्हें भौगोलिक, ऐतिहासिक, प्रयोगात्मक, प्रयोजनात्मक आदि के रूप में जाना जाता है |

(क)          व्यक्तिबोली – व्यक्ति की भाषा पर सामाजिक, क्षेत्रीय और पर्यावर्णीय सन्दर्भों का प्रत्यक्ष एवं दूरगामी प्रभाव पड़ता है | इसी कारण हर व्यक्ति की अपनी व्यक्ति बोली होती है | होकेट के शब्दों में – “किसी निश्चित समय पर व्यक्ति-विशेष का समूचा वाक्-व्यवहार उसकी व्यक्ति बोली हैं | शाब्दिक और व्याकरणिक व्यक्ति परकता के कारण ही यह व्यक्ति बोली संभव होती है |”

(ख) स्थानीय बोली – एक स्थानीय बोली भुत ही व्यक्ति-बोलियों से मिलकर बनती है जिनमें ध्वनी, रूप, वाक्य एवं अर्थ के आधार पर पारस्परिक बोधगम्यता होती है, यह किसी छोटे स्तर पर बोली जाती है, जिनमें व्यक्ति-बोलियों का समाशिष्ट रूप होता है |

(ग) उपबोली – एक उपबोली एकाधिक स्थानीय बोलियों से मिलकर बनती है, जैसे- भोजपुरी की ध्वनियों, खखार, शह्वारी, गोरखपुरी, नागपुरी हैं |

(घ) बोली – एक बोली एकाधिक उपबोलियों से मिलकर बनती है, जिसे विभाषा भी कहा जाता है | हालाँकि कुछ विद्वानों ने कुछ बोलियों के उपवर्ग को उपभाषा कहा है, जैसे- बिहारी उपभाषा में भोजपुरी, मैथिली और मगही बोलियों का वर्ग है |

(ड) उपभाषा – कुछ बोलियों के उपवर्ग को कुछ विद्वानों ने उपभाषा कहा है, जैसे- बिहारी भाषा में बोजपुरी, मैथिली और मगही बोलियों का एक वर्ग है | लेकिन यह वर्गीकरण भ्रामक और गलत है | इसमें व्याकरणिक समानता और परस्पर बोधगम्यता तो काफी हद तक मिल सकती है किन्तु जातीय अस्मिता के कारण इनमें भिन्नता है | अत: हिंदी को बिहारी,राजस्थानी आदि उपभाषाओं से अलग रखना सही नहीं है |

   प्रयोग के आधार पर – प्रयोग के आधार पर भाषा के विभिन्न रूप मिलते हैं, जो निम्नानुसार हैं-

(क)          सामान्य बोलचाल की भाषा – यह किसी भी समाज में रोजमर्रा के रूप में प्रयुक्त होने वाली सामान्य भाषा होती है तथा प्राय: संपर्क भाषा का काम करती है | यह अपनी विभिन्न भाषिक इकाइयों, शब्दावली और व्याकरणिता के आधार पर अपनी पहचान बनाती है |

(ख)         साहित्यिक भाषा – प्रयोग साहित्य-रचना, शिक्षा आदि में होता है, इसका तथा यह भाषा का आदर्श रूप है| यह प्राय: परिनिष्ठित होती है किन्तु साहित्यिक भाषा कभी-कभी सामान्य भाषा के नियमों को तोडती है |विशिष्ठ चयन-संयोजन से यह विशिष्ठ भाषा बन जाता है | विश्व में हिंदी, अंग्रेजी, फ्रेंच,रुसी,जर्मनी आदि भाषाएँ साहित्यिक भाषा के रूप में प्रयुक्त होती है |

(ग)           व्यावसायिक भाषा – व्यवसाय व्यापार में प्रयुक्त होने के लिए यह भाषा विशेष रूप धारण करती है | यह प्राय: औपचारिक एवं अनौपचारिक और तकनीकी या अर्द्धतकनीकी होती है | यह लिखित और मौखिक दोनों रूपों में प्रयुक्त होती है | इसकी व्यवसाय या व्यापार संबंधी अपनी विशिष्ट शब्दावली और संरचना होती है |

(घ)           कार्यालयी भाषा – कार्यालयों, निकायों, कंपनियों, प्रशासन आदि में इस भषा का प्रयोग होता है | यह सामान्य भाषा पर आधारित तो होती है लेकिन शब्दावली तथा संरचना में अंतर मिल सकता है | यह तकनीकी या अर्द्धतकनीकी होती है, इसीलिए यह प्राय: औपचारिक शैली में लिखी जाती है | इसके मौखिक रूप के स्थान पर लिखित रूप का अधिक प्रयोग होता है |

(ङ)            राजभाषा – इसका प्रयोग सरकारी कामकाज को संपन्न करने के लिए किया जाता है | यह प्राय: परिनिष्ठित और मानक होती है | यह देश में अधिक बोले जाने वाली भाषा होती है | इसमें विषयानुसार शब्दावली और संरचना का प्रयोग होता है | इसका प्रयोग प्राय: सरकारी मंत्रालयों, कार्यलयों, कंपनियों,नियमों, निकायों,संसद आदि में होता है ताकि जनता के साथ संबंध बनाया जा सके | इसे सर्वजन-सर्वकार्य सुलभ बनाने के लिए इसकी शब्दावली में उपयुक्त चयन करने की भी सुविधा रहती है | देश में प्रयुक्त अन्य भाषा की अपेच्छा इसका प्राय: प्रमुख स्थान रहता है | भारत की राजभाषा हिंदी है |

३. निर्माण के आधार पर

(क) सहज भाषा – जिनका उद्भव प्राकृतिक और सहज रूप में हुआ है, ऐसी सामान्य बोलचाल की भाषाएँ जैसे- हिन्दी, अंग्रेजी, जर्मन |

(ख) कृत्रिम भाषा – अंतराष्ट्रीय संप्रेषण की दृष्टि से विभिन्न भाषाओँ के बीच सर्वभौमिक रूपों लेकर कृत्रिम भाषा के निर्माण कार्य का प्रयास हुआ, जैसे- एस्पेरैतों, इंडो | इसका उदेश्य विभिन्न भाषा-भाषी लोगों को परस्पर लाकर भाषिक आदान-प्रदान की सुविधा देना था | कृत्रिम भाषा के दो भेद उपभेद हैं-

(अ) सामान्य कृत्रिम भाषा – सामान्य बोलचाल में प्रयुक्त करने के लिए बनाई गई भाषा, जैसे- एस्पेरैतो भाषा |

(आ) गुप्त कृत्रिम भाषा – किसी विशिष्ट प्रयोजन के लिए बनाई गई भाषा,जैसे- सेना, दलालों, डाकुओं आदि की भाषा |

४. मानकता के आधार पर

 (क) मानक या परिनिष्ठित भाषा – जो व्याकरण सम्मत तथा प्रयोग सम्मत हो, ध्वनी, शब्द, वाक्य आदि में व्याकरण सम्मत होने के साथ-साथ एकरूपता और लोक स्वीकृति हो, जैसे- मुझे घर जाना है |

(ख) मानकेत्तर भाषा – जो प्रयोग सम्मत हो, जिसमें लोक स्वीकृति हो किन्तु जो व्याकनिक दृष्टि से शुद्ध न हो, जैसे- मैंने घर जाना है |

(ग) अमानक भाषा – जो व्याकरण सम्मत और एकरूपी न हो तथा तथा जिसे लोक स्वीकृति भी प्राप्त न हो, जैसे – मेरे को जाना हैं |

(घ) उपभाषा – यह भाषा प्राय: अशिक्षित या अर्द्धशिक्षित वर्ग के लोगों में चलती है | व्यवहार में अनौपचारिकता का अतिशयवादी रूप है | इसमें तत्वों के साथ-साथ अशिष्ट एवं अग्राह्य रूपों तथा स्थानीय बोलचाल के ठेठ और अश्लील शब्दों का भी प्रयोग धडल्ले से होता है | 

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