Wednesday, May 14, 2025

अर्थ परिवर्तन की विविध दिशाओं को विश्लेषित कीजिए / arth privrtn ki vividh dishaon

               अर्थ परिवर्तन की विविध दिशाओं को विश्लेषित कीजिए |

     अर्थ-परिवर्तन जिसे शब्दार्थ परिवर्तन भी कहा जाता है, भाषा के विकास और परिवर्तन का एक महत्त्वपूर्ण पहलू है | यह प्रक्रिया तब होती है जब समय के साथ शब्दों के अर्थ बदलते हैं, उनके संयोग में विविधता आती है या वे इन सन्दर्भों में प्रयुक्त होने लगते हैं | जैसे –

१.    अर्थ-विस्तार   – जब कोई शब्द पहले सीमित अर्थ में प्रचलित रहता है और बाद में उसका अर्थ उसी क्षेत्र में विस्तृत या व्यापक हो जाता है, तब इस प्रक्रिया को अर्थ-परिवर्तन कहते हैं | यथा- ‘तेल’ शब्द का आशय था तिल का द्रवित सार पदार्थ या तिल से निकाला हुआ तेल | अर्थ-विस्तार के कारण अन्य पदार्थ के द्रवित सार को भी तेल कहने लगे, यथा सरसों का तेल, मुंगफली का तेल, अलसी का तेल, चमेली का तेल, नारियल का तेल, नीम का तेल, मछली का तेल और अंत में मिटटी का तेल भी इसी में आ मिला | ‘प्रवीण’ शब्द को आगे देखें | इस शब्द का अर्थ पहले ‘प्रकिस्तोवीणायाम’ अर्थात् जो अच्छी तरह वीणा बजाने वाला हो हुआ करता था | आज हर काम में दक्ष चतुर को ‘प्रवीण’ कहा जाता है | भले वह चोरी में ही क्यों न हो | जैसे- बांसुरी बजाने में प्रवीण है | भोजन बनाने वाले और बांसुरी बजाने वाले ने भले ही कभी भी वीणा छुई भी न हो फिर भी इनके लिए ‘प्रवीण’ शब्द का प्रयोग किया जाता है | यही स्थिति ‘कुशल’ ‘गवेषणा’ ‘गवाक्ष’ ‘निपुण’ तथा ‘स्याही’ आदि शब्दों की है | ‘कुश’ को उखाड़ते समय सामान्यतया सावधानी बरतते हैं | एक तो तृणों से कुश की पहचान करना फिर बिना खरोंच अथवा चीर लगे ‘कुश’ को उखाड़ लेना बहुत निपुणता और विवेचना का काम होता था, वही कुशल माना जाता था | आज लगभग प्रत्येक काम में ‘कुशल’ लोगों की भीड़ लगी हुई है, कुश का अर्थ उसमें गायब हो गया है | इसी तरह ‘गवेषणा’ क्रिया का प्रयोग गायों को ढूढने में हुआ करता था | आज किसी तरह खोज भले ही वह वैज्ञानिक ही क्यों न हो ‘गवेषणा’ कही जाती है | ‘गवाक्ष’ पहले गाय की आँखों के अर्थ में प्रयोग हुआ करता था | लेकिन आज इस का अर्थ खिड़की अथवा झरोखा हो गया है | ‘निपुण’ का अर्थ पहले ‘पुण्य’ कमाने वाले के लिए हुआ करता था | लेकिन आज तो किसी भी गलत-सही वस्तु का चतुराई से उपार्जन ‘निपुण’के भीतर ही आता है | ‘स्याही’ शब्द का अर्थ ‘स्याह’ अर्थात् ‘काला’ हुआ करता था | लेकिन आज हर प्रकार की रोशनाई या मसि ‘स्याही’ खी जाती है |यथा – नीलीस्याही, काली-स्याही’ लालस्याही, गायों के रहने के स्थान को पहले गोशाला या गोष्ठ ही कहते हैं | इसी तरह ‘महाराज’ शब्द पहले केवल महाराज के लिए प्रयुक्त होता था, किन्तु बाद में इसका अर्थ-विस्तार हुआ कि किसी भद्र पुरुष को महाराज कह सकते हैं | ‘महाराज’ शब्द रसोइया के लिए भी चलता है |

२.    अर्थ-संकोच – प्राय: देखा जाता है कि पहले कोई शब्द विस्तृत अर्थ का वाचक था, किन्तु बाद में वह सिमित अर्थ में प्रयुक्त होने लगता है | व्युत्पति के आधार पर उसे विस्तृत अर्थ का वाचक होना चाहिए किन्तु उसका प्रयोग सिमित अर्थ में होता है | अर्थ परिवर्तन की इस दिशा को अर्थ स्न्कोज कहते हैं | ‘मृग’ शब्द पहले सभी जंगली जानवरों के लिए प्रयुक्त होता था किन्तु अब यह शब्द एक पशु विशेष के लिए रूद हो गया है | ‘पंकज’ का शाब्दिक अर्थ है कीचड़ में उत्पन्न होने वाला किन्तु अब यह शब्द ‘कमल’ के अर्थ में रुढ हो गया है | ‘वेदना’ शब्द का अर्थ सुख और दुःख दोनों के अनुभव के लिए था | अब केवल ‘दुःख’ अर्थ रह गया है | अर्थ संकोच के कारण है – समास, उपसर्ग, विशेषण, पारिभाषिकता, नामकरण और प्रत्यय जैसे- नीलाम्बर, पीताम्बर, दशानन, गजबदन, पुरारी शब्द बहुब्रीहि समास के कारण संकुचित अर्थ के वाचक हो गये हैं | इसी तरह उपसर्ग भी अर्थ को सिमित कर देते हैं, जैसे- ‘हार’ शब्द विभिन्न उपसर्गों के सहयोग से विभिन्न अर्थो वाचक हो जाता है, जैसे- विहार, प्रहार, उपहार, संहार आदि | इसी प्रकार के अन्य उदाहरण देखिए- ‘योग’ उपसर्ग से संयोग’ वियोग, उपयोग, आयोग, प्रयोग | ‘कार’ उपसर्ग से आकार, प्रकार, विकार, संस्कार, प्रतिकार | प्रत्यय लगाने से भी अर्थ संकोच होता है, जैसे- ‘कृ’ धातु से कार, कारक, करण, कृति, कर्तव्य, कर्म आदि शब्द बनते हैं | विभिन्न प्रत्ययों के प्रयोग के कारण एक ही कृ धातु विभिन्न अर्थों के वाचक बन गये हैं | अर्थ परिवर्तन का सबसे बडा साधन है – विशेषण, जैसे ‘जन’ का अर्थ है ‘लोग’ लेकिन इस ‘जन’ शब्द में जब ‘दुर’ या ‘सत’ विशेषण लग जाता है तो वः ‘दुर्जन’ व् ‘सज्जन’ शब्द का वाचक हो जाता है | इसी तरह से ‘कमल’ शब्द में ‘नीलकमल’ ‘श्वेतकमल’ ‘रक्तकमल’ आदि विशेषण लगकर अर्थ का संकोच कर देते हैं | इसी तरह उपसर्ग भी अर्थ को सिमित कर देते हैं, जैसे- ‘हार’ शब्द विभिन्न उपसर्गों के सहयोग से विभिन्न अर्थों वाचक हो जाता है, जैसे- विहार, प्रहार, उपहार, संहार आदि | इसी तरह के अन्य उदाहरण देखिए – ‘योग’ उपसर्ग से संयोग, वियोग, उपयोग, आयोग, प्रयोग | ‘कार’ उपसर्ग से ‘आकार’ ‘प्रकार’ ‘विकार’ ‘संस्कार’ ‘प्रतिकार’ प्रत्यय लगाने से भी अर्थ-संकोच होता है, जैसे- कृ धातु से कार, कारक, करण, कृति, कर्तव्य, कर्म आदि शब्द बनते हैं | विभिन्न प्रत्ययों के प्रयोग के कारण एक ही कृ धातु विभिन्न अर्थों के वाचक बन गये हैं |   

३.    अर्थादेश – आदेश का अर्थ होता है, अर्थादेश में अर्थ का विस्तार या संकोच नहीं होता बिलकुल बदल जाता है अर्थात् पहले वह शब्द किसी दुसरे अर्थ का वाचक था किन्तु बाद में दूसरी अर्थ का वाचक बन गया, जैसे- ‘असुर’ शब्द वेद में ‘देवता’ के अर्थ का वाचक था, किन्तु बाद में यह ‘राक्षस’ या ‘दैन्य’ का वाचक बन गया है | ‘आकाशवाणी’ का अर्थ पहले ‘देववाणी’ था, अब उसका प्रयोग ‘अखिल भारतीय रेडियो’ के लिए होता है | ‘साहस’ शब्द पहले डकैती आदि बुरे कामों का बोधक रहा लेकिन आज अच्छे अर्थ के बोधक हो गया | अर्थ-परिवर्तन के इन उदाहरणों विचार करने से दो बातें सामने आती हैं | पहला कुछ शब्दों का अर्थ पहले बुरा रहता है और बाद में अच्छा हो जाता है, दूसरा कुछ का अर्थ पहले अच्छा रहता है और बाद में बुरा हो जाता है, इन्हीं को क्रमशः अर्थोत्कर्ष और अर्थोपकर्ष कहते हैं |

४.    अर्थोत्कर्ष – जब शब्दों में अर्थ परिवर्तन से अर्थ में उत्कर्ष आता है तो उन्हें अर्थोत्कर्ष की श्रेणी में रखा जाता है | जिन शब्दों के अर्थ में उत्कर्ष हुआ है | उनके उदाहरण निम्नवत हैं –

       ‘मुग्ध’ शव्द पहले ‘मुर्ख’ अर्थ में था अब अच्छे अर्थ में ‘मोहित होना’ के अर्थ प्रयुक्त होता है |

      ‘साहस’ शव्द पहले डाका डालना, चोरी करना, अभिचार करना आदि अर्थ में था, किन्तु अब ‘उत्साहयुक्त कार्य के अर्थ में प्रयुक्त होता हैं |

        ‘कर्पट’ शब्द पहले फटे-चिपड़े के लिए प्रयुक्त होता था किन्तु अब कर्पट अर्थात् कपड़ा अच्छे वस्त्र के रूप में प्रयुक्त होता है |

  ‘गोष्ठ-गोष्ठी’ गोष्ठ शब्द गौशाला के लिए प्रयुक्त होता था किन्तु अब गोष्ठ शब्द से बना गोष्ठी शब्द सभ्य समाज की सभा के लिए प्रयुक्त होता है |

५.    अर्थोपकर्ष- अथ परिवर्तन से कुछ शब्दों के अर्थ में हीनता निकृष्टता या अपकर्ष हो जाता है | इसी को अर्थापकर्ष के उदाहरण इस प्रकार है जैसे- ‘भद्दा’ शव्द भद्र धातु से बना है, जिसका अर्थ भला होना चाहिये किन्तु अब यह बुरे के अर्थ में प्रयोग होता है | ‘शौच’ शव्द ‘शुचि’ धातु से बना है | अत: पवित्र कार्य के लिए प्रयुक्त होता था किन्तु अब ‘मल त्याग’ के अर्थ में प्रयुक्त होता है| 


         अन्य लेख -भाषा के विविध रूपों पर प्रकाश डालिए


    लेख में सुधार के लिए कमेन्ट करेंगे thanks 

            

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