मानस का हंस उपन्यास की समीक्षा
'मानस का हंस' पंडित अमृतलाल नागर कृत ऐतिहासिक और जीवनी परक उपन्यास है। इसमें उपन्यासकार पंडित नागर जी द्वारा महाकवि तुलसीदास की और प्रामाणिक और विवादास्पद जीवनी को जीवंत शिल्प चेतना के जरिए विशेष ध्यान रखा है । पात्रों का चरित्र-चित्रण यहां मनोवैज्ञानिक के धरातल पर होने के कारण अत्यंत ही स्वाभाविक बन पड़ा है । इस दृष्टि से कुछ एक उदाहरण यहां देखिए
अहंभाव की अभिव्यक्ति
पीहर का कुत्ता भी प्यारा लगता है यह तो मेरा भाई है (रत्नावली का कथन)
"पति से अधिक उसे अपने पीहर का कुत्ता प्यारा लगता है । कैसी ठेस पहुंचाने वाली बात है। नहीं, इस बात पर मैं कदापि समझौता नहीं करूंगा, रत्नावली को यह समझना ही होगा कि विवाह के बाद स्त्री के लिए पति ही सर्वोपरि है । उसके कुंतकों और अन्य के प्रति भी उसे सदर सप्रेम सर झुकाना चाहिए, फिर मैं तो न्याय की बात कर रहा हूं। मेरे घर में बैठकर व्यर्थ से मेरा अपमान करके मेरी रोटी छीनने वाला व्यक्ति अब इस घर में कदापि नहीं आ पाएगा। रत्नावली मुझे भले ही प्राणों से अधिक प्यारी लगती हो पर उसके इस कृत्य को मैं कदापि पराश्रय नहीं दूंगा । (तुलसीदास का कथन)
कथावस्तु-
'मानस का हंस' ऐतिहासिक उपन्यास है । इसके मुख्य पात्र महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी हैं, इस उपन्यास में तुलसीदास जी के चरित्र के माध्यम से अतीत और वर्तमान को जोड़ते हुए सम-सामयिक जीवन पर विचार किया गया है। यहां उपन्यास लक्ष्य और मर्यादा में इतिहास और जीवनी से भी कहीं अधिक विस्तृत और व्यापक बन गया है। तुलसी के जीवन वृत्त के साथ ही तब युगीन राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक विसंगतियों का सफल चित्रण किया गया है । इसकी कथानक सुगठित, रोचक और विचार पूर्ण होने के साथ ही जीवन के अत्यंत निकट है।
पात्र एवं चरित्र चित्रण-
मानस का हंस उपन्यास में गोस्वामी तुलसीदास जी केंद्रीय पात्र हैं। संपूर्ण कथानक का ताना बाना तुलसी को ही केंद्र में रखकर बनाया गया है। इसके अन्य पात्रों में रत्नावली, गंगाराम, मेधा भगत, राजा भगत, टोडर, बटेश्वर मिश्र आदि हैं। इनमें से अधिकांश पात्रों का चरित्र चित्रण मनोवैज्ञानिक धरातल पर रचा गया है जिसके कारण पात्र सजीव सा अंकन हुए हैं।
संवाद योजना-
प्रस्तुत उपन्यास में संवाद पात्र अनुकूल, भावानुकूल, प्रभाव उत्पादक और व्यंजन हैं, जैसे-
रूदन कंपित स्वर में रत्नावली बोली -
'जा रही हूं ।'
'रो रही हो रत्न ?'
'संतोष के आंसू हैं।'
'अब न बहाओ देवी, नहीं तो मेरे मन का धैर्य और संतोष बढ़ जाएगा, सेवा का धर्म कठिन होता है।'
करते हुए गोसाई जी ने एक गहरी ठंडी सांस ली।"
यहां कहानी को यथार्थ परक और प्रामाणिक बनने के लिए तो यूगीन परिस्थितियों चित्रित हुई है।
निसंदेह मानस के हंस के पात्र के संवाद चरित्र प्रकाशक होने के साथ-साथ वातावरण को निर्मित करने में और कथा को विकास की गति देने में नित्य सहमत और सफल हैं। जितने सरल और सहज संवाद यहां प्रस्तुत हुए हैं, उतना अन्यत्र बहुत कम ही मिलते हैं।
देश काल और वातावरण-
मानस के हंस उपन्यास में वातावरण ऐतिहासिक हैं कथानांक गोस्वामी तुलसीदास के 16वीं शताब्दी की जुबिन घटनाओं पर आधारित है । और, इस समय के सामाजिक, धार्मिक परिस्थितियों का चित्रण किया है। उपन्यास की घटनाओं की परिस्थितियों के चित्रण में पात्रों की मनोस्थिति पूर्ण सहायक है। वातावरण के निर्माण में चित्रण की भूमिका को देखिए-
तुलसीदास आसान छोड़ कर उठे, द्वार खोला । सामने ही राजकुमारी की आंखों का प्यासा सागर लहरा रहा था। तुलसीदास उसे देखकर बोले - 'बैठने आई है? बैठिए, मैं यहां से जाता हूं ।' कह कर तुलसीदास कोटि का पूरा द्वार खोलकर बाहर निकलने लग।"
" राजा धीमे, करुण स्वर में कह रहे थे- भौजी तुमसे कुछ नहीं चाहती, बस एक बार तुमसे मिल लेना चाहती है। तुम्हारे दर्शन करके उन्हें सब कुछ मिल जाएगा।"
उद्देश्य-
उपन्यासकार मानस का हंस के रचना के उद्देश्य में पूर्ण सफल है । इन्हें सामाजिक जीवन के यथार्थ की परिप्रेक्ष्य को उजागर करने का प्रयास किया है ।रचनाकार ने गोस्वामी तुलसीदास के जीवन चरित्र के माध्यम से कल्पना और इतिहास के सहयोग से पूर्णता सामाजिक यथार्थ को समसामयिक युग में सफल चित्रण करने में सफलता प्राप्त की हैं। कथाकार ने तुलसीदास को संघर्षीय जीवन में ढाल कर मानव जीवन के आदर्श को आदर्शवादी बनाए हैं। जिससे घटनाओं की सृष्टि करने के क्रम में यथार्थ को गला घुटने से रचनाकार ने बचा लिया है। यहां कहानी कर स्त्री पुरुष के जीवन संघर्ष में एक दूसरे की सहभागिता को पूर्णता और महानता सिद्ध की है।
भाषा शैली
मानस का हंस उपन्यास की भाषा में पात्र अनुकूलता के साथ ही सरलता, प्रभावी, सजीवता, रोचकता, सहजता, संप्रेषणीय आदि सभी गुण से विद्यमान हैं ।मानस की भाषा उपन्यास की वातावरण और परिवेश निर्माण में पूर्ण रूप से सहायक है । तुलसीदास, रत्नावली, मेधा भगत की संवाद और भाषा में शुद्ध और तत्सम प्रधान शब्दावलियां हैं कहीं-कहीं भाषा में व्यंग्य का समावेश है। जैसे-
"लड़के आंगन में खड़े हो गए। एक ने कहा-
" अरे जा रे लवार। झूठ झूठ की न हाँक ।"
मैं गुरूजी के चरण कमल की सौगंध खाकर कहता हूं । मैं पीपल वाले को कई रूपों में देखा है।
गंगा बोल - राम जी समर्थ है। अपनी निंदा बड़ाई को वह आप संभाल सकते हैं, तुम भूत-प्रेतो से मत खेलो तुलसी, नहीं, अब तो बात दे चुका, मैं जाऊंगा।"
' तुलसी के चरित्र में निहित भक्ति भावना की अनन्यता के साथ ही स्वाभिमान की अभिव्यक्ति है।'
शैली-
उपन्यास में विवरणत्मकता, विश्लेषणत्मकता शैली के साथ-साथ अन्य शैली भी विद्यमान है। शैली का प्रयोग इतना घनिष्ठ है कि उपन्यास में आंचलिकता पूर्ण रूप से संजीव हो उठा है। रमणीक जगह के वर्णन में कथा पूर्ण रूप से काव्यात्मक हो गया है।
निष्कर्ष है कि मानस का हंस उपन्यास में रचनाकार आधुनिक यथार्थवादी सामाजिक जीवन को चित्रण करने में सफल हुए हैं। इसकी सफलता प्राप्त करने में उपन्यास की भाषा, पात्रों की संवाद योजना और शैली पूर्ण से समर्थ है ।
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