) हिन्दी गद्य की विकास पर प्रकाश डाले |
उत्तर - हिन्दी गद्य का विकास आदिकाल से लेकर आधुनिककाल तक सतत व विकासशील रूप में मिलता है | भाषा शास्त्रीयों ने इस विकास यात्रा को दो
रूपों में बांटें हैं –
(1) भारतेन्दु पूर्व हिन्दी गद्य (2) आधुनिककाल के गद्य
(1) भारतेन्दु पूर्व हिन्दी गद्य – इससे तीन रूपों में बाँट सकते हैं –
(क) ब्रजभाषा के गद्य (ख) राजस्थानी गद्य (घ) खड़ी बोली गद्य
(क) ब्रजभाषा गद्य – यह वार्ता, जीवनी, आत्मचरित, टीका तथा अनुवाद के रूप में मिलता है | गोरखनाथ की रचनाओं के वाद ‘श्रृंगाररस
मण्डन’ (विठ्ठलनाथ), अष्टयाम (नाभादास),
चौरासी वैष्णव की वार्ता तथा दो सौ वैष्णव की वार्ता में ब्रजभाषा गद्य पुष्ठ रूप
में दिखाई पड़ता है | 19 वी० शताब्दी के पूर्वार्ध में ब्रजभाषा गद्य
में ‘राजनीति’ (लल्लूलाल) तथा ‘माधोविलास’ उल्लेखनीय कृतियाँ हैं |
ब्रजभाषा गद्य के विकास की
परम्परा का इसे आगे विकास न हो सकी, क्योंकि इसकी भाषा सुसंगठित और मंजी हुई नहीं
है | भाषा में शिथिलता तथा सिमित शब्दावली थे जो नवीन युग के परिस्थितियों
तथा आवश्यकता को वहन न कर सके |
(ख)राजस्थानी गद्य – राजस्थानी गद्य का आरम्भ 12 वी०
शताब्दी से माना गया है | ब्रजभाषा गद्य की अपेच्छा राजस्थानी गद्य
समृद्ध है | इसकी परम्परा व विषय भी व्यापक है | दान-पत्रों, पट्टे-परवाने, जैन-ग्रन्थों, वार्ता तथा राजनीति, इतिहास, काव्यशास्त्र, गणित, ज्योतिष, आदि
विविध विषय राजस्थानी गद्य के समृद्ध के कारण हैं | टीका और अनुवाद भी मिलते हैं | प्रारम्भिक
गद्य समासयुक्त, अपभ्रंश से प्रभावित है | बाद में यह खड़ी बोली के निकट है | इस गद्य की भी अपनी सीमाएँ थीं, अत: यह युगानुकुल उपयोगी सिद्ध न हो सकी |
(ग) खड़ी बोली गद्य – खड़ी बोली गद्य के विकास में प्रेस और पत्रकारिता, ईसाई मिशनरी, पोर्ट विलियम काँलेज तथा नवजागरण काल में
स्थापित सांस्कृतिक संस्थाओं का विशेष योगदान है | 19 वी० शताब्दी तक खड़ी बोली गद्य में ब्रजभाषा का प्रभाव स्पष्ट दिखाई
पड़ता है | इसका रूप मिश्रित है | खड़ी बोली गद्य का प्रारम्भिक रूप ‘सुरासुर निर्णय’ (सदासुखलाल), भाषा योग वशिष्ठ (राम प्रसाद निरंजनी) नासिकेतोपाख्यान (सदल मिश्र) प्रेम सागर (लल्लूलाल) रानी केतकी की कहानी (ईशा अल्ला खां) आदि रचनाओं में मिलता है | इन
रचनाओं में ब्रजभाषा के साथ फारसी का भी व्यापक प्रभाव पड़ा है |
अंग्रेजी शासन काल में खड़ी बोली धीरे-धीरे शिक्षा, प्रशासन और अदालत की भाषा बनी |
(2) आधुनिककाल में खड़ी बोली गद्य – आधुनिक काल में खड़ी बोली हिंदी के विकास का स्वर्णयुग है | इस युग के प्रारम्भिक लेखक भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी गद्य के
आधुनिक गद्य विधा का निर्माता कहा जाता है | इन्होंने
तथा इसके मंडल के लेखक ने सर्वप्रथम नाट्य गद्य का विकास किया, हिन्दी गद्य ने उपन्यास, आलोचना, पत्रकारिता, कहानी, एकांकी और इनके विविध लघुरूप के विधाओं में
विकास की किरण इन्हीं मंडल द्वारा प्रद्दत है | कविता जैसे विधा भी गद्य में आने के लिए उत्साहित है | आज भाषा आलोचक गद्य शैली को महाकाव्य के लिए अनुकूल शैली मानती है | आज खड़ी बोली गद्य कला पछ के विभिन्न रूपों में सँवरकर परिमार्जित रूप
में है | वर्तमान में हिन्दी खड़ी बोली गद्य साहित्य ‘हिन्दी भाषा’ की गद्य का रूप ले लिया है | इन्होंने भारतेन्दु युग, द्विवेदी युग, छायावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद से होते हुए स्वतंत्रत्योत्तर युग के विभिन्न पड़ाव को पार
करते हुए दुसरे उन्नत विदेशी भाषाओं को विकास के क्षेत्र में चुनौती दिये खड़ी है |
इस प्रकार हिंदी खड़ी बोली गद्य की विकास यात्रा प्राचीन है परन्तु प्रमाण की दृष्टि से आधुनिकता के विभिन्न साक्ष्यों में उपस्थिति देते हुए भविष्य में भी अनुकूलित प्रवाह के साथ विकास पथ पर अग्रसरित है |
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