Monday, January 24, 2022

Prayojanmulak Hindi bhasha kya hai

 

           प्रयोजनमूलक  हिन्दी भाषा / pryojnmulk hindi bhashaa  

               हिन्दी भाषा में प्रयोजनमूलक शब्द दो शव्द के मेल से बना है - “प्रयोजन” और “मूलक” | प्रयोजन का अर्थ – ‘कामकाज की उदेश्य’ और मूलक का अर्थ – ‘सम्बन्धित’ है| यानि यहाँ प्रयोजनमूलक का अर्थ है – कामकाज की उदेश्य को सफलतापूर्वक सम्पन्न करने से सम्बन्धित शव्दावली है, इसे प्रयोजनमूलक  हिन्दी भाषा कहते हैं |

            हिन्दी भाषा के प्रयोजनमूलक रूप को “प्रयोजनमूलक हिन्दी” के नाम पर समझे जाते हैं, क्योंकि प्रयोजन का अर्थ उदेश्य में निहित है | इससे “व्यवहारी” और “कामकाजी” हिन्दी भी कहा जाता है, क्योंकि हमारी प्रयोजन यानि उदेश्य हमारे ‘व्यावहार’ और ‘कामकाज’ पर निर्भर है| हमारी व्यावहारिक और कामकाज के विभिन्न क्षेत्र हैं जो दैनिक जीबनोपयोगी है|

                         कुछ लोगों का अतीत में भ्रम था की प्रयोजनमूलक हिन्दी के लिए खास शब्द ध्वनि निकलती है और तर्क है कि निष्प्रयोजन हिन्दी के स्वरूप भी है, जो फंक्सनल या व्यावहारिक है, परन्तु ऐसी बात नही है, हिन्दी भाषा का वह शव्दावली जो हमारे दैनिक, व्यावहारिक रूप से अपने कार्य क्षेत्रों जैसे विभिन्न कार्यलयों (मनोरंजनिक, खेल-कूद, व्यावसायिक, प्रशासनिक आदि अनेक हमारे दैनिक जीवन-यापन के उपयोगी कार्यलयों) में कार्य को सफलतापूर्वक सम्पन्न करने के लिए जो शव्दावली प्रयोग की जाती है, उससे “प्रयोजनमूलक हिन्दी” कहा जाता है |

                            इस प्रकार प्रयोजनमूलक हिन्दी भाषा का रूप ‘व्यावहारिक’, ‘कामकाजी’ है| हमारे प्रयोजन या उदेश्य को सफलतापूर्वक सम्पन्न करने का भाषिक रूप है| 

 

महत्त्वपूर्ण प्रश्न /  abjective question - 

(1) 'प्रयोजनमूलक हिन्दी' का दूसरा नाम क्या है ?

      ans - व्यावहारिक हिन्दी, कामकाजी हिन्दी, फंक्सनल हिन्दी  और व्यावसायिक हिन्दी 

Saturday, January 22, 2022

सम्प्रेषण की अवधारणा / smpreshn ki avdharna / smpreshn ki महत्त्वपूर्ण abjective question

          सम्प्रेषण की अवधारणा / smpreshn ki avdharna


       मनुष्य सामाजिक प्राणी है | समाज में रहकर परिवेश का निर्माण करता है | परिवेश ही विश्व परिवेश बनती है और परिवेशीय विश्व के साथ लोगों की अन्योन्यक्रिया उन वस्तुपरक संबंधों के दायरे में विकसित होती है जो लोगों के बीच उनके सामाजिक जीवन में और मुख्यत: उनकी उत्पादन सक्रियता यानि जीवन-यापन के दौरान चलते हैं | उत्पादन सक्रियता में लोगों के किसी भी यथार्थ समूह में वस्तुपरक संबंधों, जैसे - निर्भरता, अधीनता, सहकार, परस्पर सहायता,आदि के संबंधों का पैदा होना अनिवार्य हो जाता है | अन्योन्यक्रिया से समाज के सदस्यों के अन्तवैयक्तिक संबंधों व सहकार होते हैं |अन्तवैयक्तिक संबंधों  के अध्ययन  का मुख्य उदेश्य  विभिन्न सामाजिक कारकों और दत्त समूहों के सदस्यों की अन्योन्यक्रिया का गहराई में विश्लेषण करना है | लोगों के वास्तविक इरादों और भावनाओं का अनुमान उनके अन्योन्यक्रिया और उन वस्तुपरकअन्तवैयक्तिक संबंधों के कार्यों से ही लगाया जा सकता है |

                                  किसी भी तरह के उत्पादन के लिये संयुक्त प्रयासों की आवश्यकता होती है | उत्पादन करने के लिये लोगों का एकजुट होना आवश्यक है | फिर भी कोई भी समुदाय तब तक सफल संयुक्त कार्य नहीं कर सकता जब तक इस कार्य में भाग लेनेवाले के बीच संपर्क न हो | जब तक उनके बीच पर्याप्त समझ न हो संयुक्त संक्रियता के लिए आपस में संप्रेषण के संबंध कायम करना आवश्यक है | संप्रेषण को यों परिभाषित किया जा सकता है | जैसे- संप्रेषण लोगों के बीच संपर्क स्थापित व विकसित करने की एक जटिल प्रक्रिया है | जिसकी जड़ें संयुक्त रूप से काम करने की आवश्यकता में होती है |

                     संप्रेषण में संयुक्त संक्रिया में भाग लेनेवाले के बीच जानकारी का आदान-प्रदान शामिल रहता है |अपने परस्पर संपर्क में लोग संप्रेषण के एक प्रमुख साधन के तौर पर भाषा का सहारा लेते हैं | सम्प्रेषण का दूसरा पहलू संयुक्त कार्य कलाप में भाग लेनेवालों को अन्योन्यक्रिया यानी शब्दों ही नहीं अपितु क्रियाओं का भी आदान-प्रदान है | जब आदमी कोई चीज खरीदता है तो वह (ग्राहक) और विक्रेता दोनों आपस में कोई शब्द कहें बिना भी संप्रेषण करते हैं | ग्राहक पैसा देता है और विक्रेता उसे माल थमाता है और यदि कुछ पैसे वापस करते हैं तो उन्हें वापस करता है |

                               संप्रेषण का तीसरा पहलू अन्तवैयत्तिक समझ है | उदाहरण के लिए बहुत कुछ इस प्रकार निर्भर करता है कि संप्रेषण में भाग लेने वाला कोई पछ दुसरे पछ को भरोसेमंद चतुर और जानकार व्यक्ति मानता है या उसके बारे में बुरी राय रखता है तथा उसे भोंदू व बेवकूफ समझता है, इस तरह संप्रेषण की एक ही प्राक्रिया में हम जैसाकि तीन पहलू पाते हैं – 1. संसूचनात्मक यानी जानकारी का विनिमय 2. अन्योन्यक्रियात्मक यानी प्राक्रिया में भाग लेने की संयुक्त संक्रियता और 3. प्रत्यक्षात्मक यानी एक-दुसरे के बारे में धारणा |

  निष्कर्षत: सम्प्रेषण मानव के परिवेशीय अन्योन्यक्रिया है | जो मानवीय समूहों में सम्बन्ध हैं जिसमें  निर्भरता, अधीनता, सहकार,परस्पर सहायता,आदि संक्रिया होती है |संक्रिया इरादे पर निर्भर है | लोगों के वास्तविक इरादों और भावनाओं का अनुमान उनके कार्यों से ही लगाया जा सकता है | उत्पादन संक्रिया पर निर्भर है यानि सम्प्रेषण अन्तवैतिक क्रिया है | यह संक्रिया एक – दुसरे के साथ प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष सम्पन्न होता है |


 महत्त्वपूर्ण abjective question –

(1)        सम्प्रेषण की क्रिया मानव के इन संक्रिया पर निर्भर है – अन्योन्यक्रिया / अन्तवैयतिक |

ans – दोनों

(2)        सम्प्रेषण की क्रिया किस मानवीय क्रिया पर निर्भर है ? – निर्भरता/ अधीनता/ सहकार/परस्पर सहायता  |

ans – सभी

(3)        आपस में कोई शब्द कहें बिना भी संप्रेषण सम्पन्न करते हैं – सही /गलत

ans – सही

(4)        सम्प्रेषण की  संक्रिया एक – दुसरे के साथ प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष सम्पन्न होता है | - सही /गलत

ans – सही

  

      हमारी लेख - सम्प्रेष्ण के भेद व प्रकार













 

संप्रेषण के प्रकार व भेद / smpreshn ke prkaar v bhed

                         संप्रेषण के प्रकार व भेद / smpreshn ke prkaar v bhed


 – संप्रेषण, मौखिक, लिखित, तथा गैर-शाब्दिक हो सकता है | इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नाकित है

(क) मौखिक संप्रेषण – जब कोई संदेश मौखिक अर्थात् मुख से बोलकर भेजा जाता है तो उसे मौखिक संप्रेषण कहते हैं | यह भाषण, मीटिंग, सामुहिक, परिचर्चा, सम्मेलन,टेलीफोन पर बातचीत, रेडियो द्वारा संदेश भेजना आदि हो सकते हैं |यह संप्रेषण का प्रभावी एवं सस्ता तरीका है | यह आंतरिक एवं बाहय दोनों प्रकार के संप्रेषण के लिये सामान्य रूप से प्रयोग किया जाता है | मौखिक संप्रेषण की सबसे बड़ी कमी है कि इसे प्रभावित नहीं किया किया जा सकता क्योंकी इसका कोई प्रभाव नहीं होता |

(ख) लिखित संप्रेषण – जब संदेश को लिखे गये शब्दों में भेजा जाता हैं | जैसे – पत्र, टेलीग्राम, मेमो, सर्कुलर, नोटिस, रिपोटर आदि तो इसे लिखित संप्रेषण कहते हैं | इसकी आवश्यकता पड़ने पर पुष्टि किया जा सकता है | सामान्यत: लिखित संदेश भेजते समय व्यक्ति संदेश के सम्बन्ध में सावधान रहता है | यह औपचारिक होता है | इसमें अपनापन नहीं होता है तथा गोपनीयता बनाये रखना भी कठिन होता है |

(ग)  गैर-शाब्दिक संप्रेषण – ऐसा संप्रेषण जिसमें शब्दों का प्रयोग नहीं होता है गैर-शाब्दिक संप्रेषण कहलाता है | जब आप कोई तस्वीर, ग्राफ, प्रतीक,आकृति आदि देखते हैं | आपको उनमें प्रदर्शित संदेश प्राप्त हो जाता है | यह सभी दृश्य संप्रेषण है | घंटी, सीटी, बज्र, बिगुल ऐसे ही उपकरण हैं जिनके माध्यम से हम अपना संदेश भेज सकते हैं | इस प्रकार की आवाजें ‘श्रुति’ कहलाती है \ इस प्रकार से शारीरिक मुद्राओं जिसमें शरीर के विभिन्न अंगों का उपयोग किया गया हो उनके द्वारा भी हम संप्रेषण कहते हैं | इन्हें हम संकेतों द्वारा संप्रेषण कहते हैं | हम अपने राष्ट्रीय ध्वज को सलाम करते हैं, हाथ मिलाना, सिर को हिलाना, चेहरे पर क्रोध का भाव आना, राष्ट्र गान के माध्यम की अवस्था में रहना आदि यह सभी संकेत के माध्यम से संप्रेषण के उदाहरण हैं | जब अध्यापक विद्यार्थी की पीठ पर थपकी देता है तो इसे उसकी सराहना माना जाता है तथा इसे विद्यार्थी और अच्छा कार्य करने के लिये प्रेरित होता है |

 

सम्प्रेषण के abjective question -

(1)  इनमें  सम्प्रेषण के भेद हो सकते हैं  -  संप्रेषण, मौखिक, लिखित, तथा गैर-शाब्दिक

ans – सभी

(2)  जब कोई संदेश मौखिक अर्थात् मुख से बोलकर भेजा जाता है तो उसे क्या मौखिक संप्रेषण कहते हैं |-

    ans - मौखिक संप्रेषण

(3) भाषण, मीटिंग, सामुहिक, परिचर्चा, सम्मेलन,टेलीफोन पर बातचीत, रेडियो द्वारा संदेश     भेजना आदि  किस भेद के उदाहरन हो सकते हैं?

 ans – मौखिक सम्प्रेषण

(4)  किस सम्प्रेषण के माध्यम से प्रभावित नहीं किया किया जा सकता क्योंकी इसका कोई प्रभाव नहीं होता |

ans - मौखिक संप्रेषण

5) क्या कहते हैं ? -जब संदेश को लिखे गये शब्दों में भेजा जाता हैं |

     ans -- लिखित संप्रेषण

(6)  पत्र, टेलीग्राम, मेमो, सर्कुलर, नोटिस, रिपोटर आदि किस संप्रेषण के उदाहरन हैं ?

ans - लिखित संप्रेषण

(7)  ऐसा संप्रेषण जिसमें शब्दों का प्रयोग नहीं होता है | क्या कहते हैं ?

      ans - गैर-शाब्दिक सम्प्रेषण

(8)  तस्वीर, ग्राफ, प्रतीक,आकृति आदि  किस सम्प्रेषण के उदाहरण हैं ?

   ans - गैर-शाब्दिक सम्प्रेषण

(9)  हम अपने राष्ट्रीय ध्वज को सलाम करते हैं, हाथ मिलाना, सिर को हिलाना, चेहरे पर क्रोध का भाव आना, राष्ट्र गान के माध्यम की अवस्था में रहना आदि सभी संकेत के माध्यम से संप्रेषण के किस भेद के उदाहरण हैं ?

ans - गैर-शाब्दिक सम्प्रेषण









Friday, January 21, 2022

संप्रेषण की परिभाषा / SMPRESHN ki pribhasha / महत्वपूर्ण ABJECTIVE QUESTION

                        संप्रेषण की परिभाषा / SMPRESHN ki  pribhasha 


                 संप्रेषण शब्द की उत्पति लैटिन शब्द के शब्द (cammunies) से हुआ है | संप्रेषण एक प्रोसेस है जिसके अन्तर्गत दो या दो से अधिक व्यक्तियों के बीच मौखिक, लिखित,सांकेतिक या प्रतीकात्मक माध्यम से विचार एवं सूचनाओं के प्रेषण की प्राक्रिया है | संप्रेषण हेतु संदेश का होना आवश्यक है | संप्रेषण में पहला पछ प्रेषक (सन्देस भेजने वाला) तथा दूसरा पछ प्रेषनी (संदेश प्राप्त करनेवाला) होता है | संप्रेषण उसी समय पूर्ण होता है जब संदेश मिल जाता है | और इसकी स्वीकृति या प्रत्युत्तर दिया जाता है |

                      बिभिन्न विद्वानों के अनुसार संप्रेषण की परिभाषा निम्न प्रकार से है –

               होलैंड के अनुसार – संप्रेषण वह शक्ति है जिसके द्वारा कोई व्यक्ति विशेष संप्रेषण, उद्दीपक को इस प्रकार प्रेषित करता है कि वह दुसरे व्यक्तियों के व्यवहार को परिमार्जित कर देता है |

            जिष्ट के अनुसार – जब किसी सामाजिक प्रक्रिया के अन्तर्गत प्रतीकों के माध्यम से किसी आशय को प्रेषित करने का प्रयास किया जाता है तो उसे संप्रेषण कहते हैं |

           हरवलैंड के अनुसार – सम्प्रेषण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा एक व्यक्ति विशेष संप्रेषण के व्यवहार को सामान्यत: शाब्दिक प्रतीकों द्वारा परिमार्जित करता है | 


                महत्वपूर्ण ABJECTIVE QUESTION - -

इस वीडियो से सुनिए --


(1)  संप्रेषण शब्द की उत्पत्ति किस भाषा (cammunies) से हुआ है

      - ANS-  लैटिन भाषा |

(2) संप्रेषण एक प्रोसेस है जिसके अन्तर्गत कितने व्यक्तियों के बीच मौखिक, लिखित,सांकेतिक या प्रतीकात्मक माध्यम से विचार एवं सूचनाओं के प्रेषण की प्राक्रिया है |

       – ans - दो या दो से अधिक व्यक्तियों के बीच

 (3) किस विद्वान के अनुसार जब किसी सामाजिक प्रक्रिया के अन्तर्गत प्रतीकों के माध्यम से किसी आशय को प्रेषित करने का प्रयास किया जाता है’ तो उसे संप्रेषण कहते हैं |

      - ans -  जिष्ट

(4) संप्रेषण शब्द की उत्पत्ति किस शब्द (cammunies) से हुआ है

     – ans -  cammunies

  (5) किस विद्वान् के अनुसार “संप्रेषण वह शक्ति है जिसके द्वारा कोई व्यक्ति विशेष संप्रेषण, उद्दीपक को इस प्रकार प्रेषित करता है कि वह दुसरे व्यक्तियों के व्यवहार को परिमार्जित कर देता है |”

          - ans -  होलैंड के अनुसार

     (6) किस विद्वान् के अनुसार – सम्प्रेषण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा एक व्यक्ति विशेष संप्रेषण के व्यवहार को सामान्यत: शाब्दिक प्रतीकों द्वारा परिमार्जित करता है |

           - ans - हरवलैंड के अनुसार

 






मतिराम का जीवन और कवित्व परिचय /matiram ka jivn or kvitv prichy

                                         मतिराम का जीवन और कवित्व परिचय  


त्रिपाठी बन्धुओं में आचार्यत्त्व की दृष्टि से मतिराम का नाम प्रमुख है | इनका जन्म 1615 ई० के आसपास उत्तरप्रदेश के तिकवंपुर में हुआ है | पिता रत्नाकर त्रिपाठी है | ये बुंदी नरेश राजा भावसिंह के दरबारी कवि थे | इनकी मृत्यु 1690 ई० के आसपास हुआ है |

मतिराम रस और अलंकारवादी आचार्य हैं | इनके प्रमुख रचनाओं में ललितललाम, रसराज, फूलमंजरी, छन्दसार-पिंगल, मतिराम सतसई, साहित्यसार, लक्षणश्रृंगार और अलंकारपंचाशिका है |

 

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चिंतामणि की जीवन और कवित्त्व परिचय / chintamni ki jivn or kvitv prichy

                                      चिंतामणि की जीवन और कवित्त्व परिचय   


                        चिंतामणि रीतिकाल के प्रतिनिधि कवियों में है आचार्य शुक्ल ने चिंतामणि को रीतिकाल का प्रवर्तक कवि माना है |

                                   आचार्य चिंतामणि का जन्म उतरप्रदेश के तिकवंपुर में 1600ई० के आसपास हुआ है | इनके पिता का नाम रत्नाकर त्रिपाठी है | भूषण, मतिराम, जयशंकर इनके ही भाई है | ये इतिहास मेंत्रिपाठी बंधु के नाम विख्यात है | इनकी मूत्यु 1680-85 ई० के आसपास हुई है | ये मोंसले, शाहजहाँ और दाराशिकोह के दरबारी कवि रहे है | चिंतामणि द्वारा नौ ग्रंथ लिखे गये है |

जैसे रसविलास, छदविचार, पींगल, श्रृंगार मंजरी, कविकुलकल्पतरु, कृष्णचरित, काव्यविवेक, काव्यप्रकाश, कवित्वविचार और रामायण आदि | कवि चिंतामणि रसवादी कवि है |

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                             * चिंतामणि के काव्य *

अवलोकन में पलके न लगे,पलकौ अवलोकि बिना ललके |

पति के परिपूरन प्रेम पगी और सुभाव लागौ न लकै||

तिय की विहंसौही बिलोकनि में मणि आनन्द आखिनय

रसवंत कवितन को रस अखरान  के ऊपर हवै छ्लकै||

     परिचय चिंतामणि रीतिकाल के रीतिबद्ध काव्य के प्रतिनिधि कवि है | इन्होने अपने काव्य में कवि कर्म के साथ ही आचार्यत्व का परिचय दिए है, इस कविता में कवि ने नारी के प्रेम और सौन्दर्य को उदात्त रूप में अभिव्यजित किये है |

प्रसंग रीतिकाल में  जन प्रतिनिधि और सामान्य जनता के बीच नारी को महत्वहीन बना दिया गया है | अत: नारी के सौन्दर्य चित्रण में अमानवीयता को समाप्त करते है | नारी के उदान्त रूप का चित्रण प्रस्तुत किये |

   व्याख्या-   कवि कहते है कि नायिका के पलके देखने की जगह देखने की चाह से भी नहीं देखते,पर नायिका को भा गई तो पलकों की इच्छा बिना भी देखने लगते है | नायिका पति के प्रेम परिपूर्ण,संतुष्ट है तो न भाने वाले परिस्थिति भाने लगती है | स्त्रियों की प्रेम की संतुष्ट उसके हँसी और आँखों में झलकते आनन्द में देखा जा सकता है | कवि कहते है नायिका को प्रेम उसी तरह अच्छी लगती है | जिस प्रकार कवि के कविता से निकलने वाली रस कवि के आँखों में झलकती है |

काव्यगत विशेषता – 1. नारी के प्रेम व सौन्दर्य को मानव के लिए उदात्तता के रूप में प्रस्तुत किया गया है |

2. कविता में कविकर्म और आचार्यकर्म दोनों झलकते हैं |

3/ काव्य की भाषा ब्रज है, व्यंजना शब्द शक्ति, प्रसाद व माधुर्य गुण विद्यमान है |

4. सम्पूर्ण काव्य में अनुप्रास, रूपक और वक्रोती अलंकार है 

रीतिबद्ध काव्य / ritibddh kavy

              रीतिकाल की रीतिबद्ध काव्य *

                                 हिन्दी के रीतिकालीन रीतिबद्ध काव्य संस्कृत के काव्यशात्र पर आधारित है | ये काव्य धारा लक्षण देते हुए लिखे गए है | कुछ ग्रन्थ संस्कृत रचनाओं के अनुवाद हैं और कुछ छायानुवाद के रूप में प्रस्तुत किये गए हैं | इन ग्रन्थों में मौलिक उद्धभावनाएँ नहीं के बराबर हैं |

                         रीतिबद्ध काव्यों में कवि कविशिक्षकके पद पर आसीन थे, काव्य की विशेषताओं को समझने और समझाने का प्रयत्न करते हैं | दुसरे रूप में ये शास्त्र कवि भी कहें जा सकते हैं |

                           रीतिबद्ध काव्यों में लक्षणों से अधिक उदाहरण को महत्ता प्राप्त हुई है | एक ओर तो इनके रचनाओं में विशुद्ध लक्षणों की रचना की, दूसरी ओर सरस उदाहरण एकत्र कर श्रंगारपूर्ण काव्य ग्रन्थ भी लिखे |

                               रीतिबद्ध आचार्य कवियों में आचार्यत्त्व एवं कवित्व दोनों पृथक-पृथक थे | कविकर्म और आचार्य कर्म दोनों में भिन्नता थी, परन्तु रीतिकाल में यह भेद समाप्त हो गया |

 

रीतिकाल की प्रवृति / ritikaal ki prvriti

                    *   रीतिकाल की प्रवृति  *

     रीतिकाल का साहित्य सामंती वातावरण और संस्कृति का उद्धभावना है | राजदरबारों में आश्रय पानेवाले कवियों द्वारा कविता का मुख्य प्रवृति धनोपार्जन है | कविता में रीति और अलंकार का खुलकर प्रयोग है | भाव सौन्दर्य में नारी के सौन्दर्य चित्रण में ही सारी शक्ति लगा दी है | कविता में प्रेम की पुकार’ ‘रसिकता की अभिव्यक्तिमुख्य उदेश्य है | फिर भी इस काल  की मुख्य प्रवृति निम्न प्रकार है |

(1)   श्रृंगारिकता श्रृंगार वर्णन रीतिकाल के काव्य का मुख्य उदेश्य है | कवियों ने श्रृंगार को रसराज के रूप में प्रतिष्टित कर दिये | वर्ण्य विषय नायिकाभेद, नखशिख, अलंकार आदि का लक्षण प्रस्तुत करना है | श्रृंगार वर्णन दो रूप में प्राप्त है

संयोग और वियोग | संयोग वर्णन में छोम, भाव, अनुभाव, सुरतवर्णन, विपरीत रति वर्णन  को महत्व दी है |                                     

यहाँ बिहारी की कविता देखिए

          बतरस लालय लाल की, मुरली धरी लुकाय |

                                    सौह  करै, मौहनि हैसे, देने कहै, नटी जाय ||

                                                            वियोग वर्णन में पूर्वराग, मान, प्रवास, और करुणा का वर्णन किया है |

                                                                                                                           ( 2 ) अलंकार का प्राधान्य इस काल में अलंकारिकता भी मुख्य काव्य प्रवृति है | काव्य-प्रदर्शण, चमत्कार और रसिकता को प्राधान्य दिया गया था | अतिचमत्कार द्वारा पाठक या श्रोताओं पर अपना प्रभाव डालना कवियों का मुख्य लक्ष्य था | श्रृंगार के संयोग व वियोग दशाओं में भी आलंकारिता की ही प्रयोग होती थी | केशवदास ने कहा है अलंकार के बिना इस युग में कविता करना मुश्किल है | अत: कहा है –  

            जदपि सुजाति सुलच्छनी सुबरन सरस सुवृन्त |

                    भूषण बिनु न विराजई कविता बनिता मित ||

(3 ) भक्ति और नीति- रीतिकाल में भक्ति और नीति के कविता करते देखे गये है | कवि यौवनवस्था में श्रृंगारिक काव्य लिखें पर वृद्धावस्था में राधाकृष्ण के नाम लेकर भक्ति की कोटि में काव्य लिखे हैं | इस संदर्भ में भिखारीदास लिखते है – 

                   रीझि है सुकवि जौ तो जानौ कविताई,   

                 न तु राधिकाकन्हाई  सुमिरन को बहानों है |

(4) नारी का प्रेमिका स्वरूप इस काल में कवियों ने नारी को प्रेमिका के रूप में  देखा और उसे उसका सामाजिक दायित्व सौपा ही नहीं | नारी केवल पुरुष के रति भाव के आलंबन मात्र बन कर रह गई | घनानंद ने सुजान को और बोधा ने सुभानको सामाजिक रूप न देकर प्रेमिका का स्वरूप दिया | कवियों ने नारी के व्यापक दृष्टिकोण नहीं दी नारी के अंगप्रत्यंग की शोभा उनके बाहय चटक-मटक, हावभाव, विलास की चेष्टाओं को काव्य का विषय बनाया |

(5)वीररस की कविताएँ यह युग शाहजहाँ जैसे शांति और समृध्द् तथा औरगजेब जैसे कट्टर शासक का शासनावधि था | औरंगजेब ने धार्मिक नीति में कट्टरता का बीज बोया था इस एवज में शिवाजी, छत्रशाल, राजसिंह, गुरुगोविन्द सिंह इनके शत्रु हो गये थे | इन्होंने स्वदेश और धर्म की रक्षा को जीवन प्रर्यत औरंगजेब से लोहा लिया है | कवि लाल, सुदन, पधाकर ने वीररसात्मक काव्य लिखकर राष्ट्रीयता से ओत-प्रोत की कविता लिखी |

(6) लक्षण ग्रन्थों का प्राधान्य रीतिकाल में कवियों ने कविकर्म और आचार्य कर्म दोनों को एक साथ लेकर अवतरित हुए | रीतिकालीन कवियों ने लक्षण और उदाहरण दोनों प्रस्तुत किये पर रीतिसिद्ध कवियों ने केवल उदाहरण जुटाए | हमें मानना चाहिए कि इस समय के कवि सर्वप्रथम भावुक ह्रदय रखते हैं, अत: कविकर्म के निर्वाह करने के लिये आचार्य कर्म भी करते हैं, पर इन्हें आचार्य कर्म के निर्वाह के लिये उचित पांडित्य नहीं थी | अत: यही कारण है कि लक्षण ग्रन्थ में मौलिकता नहीं है | यह संस्कृत के काव्यशास्त्रीय लक्षण ग्रन्थों का अनुकरण मात्र है |

(7) जीवन दर्शन रीतिकाल में यथार्थ जीवन के मार्मिक चित्र का वर्णनं है | खासकर जीवन के यौवनावस्था का | ये कवि नैराश्य जीवन पर काव्य नहीं रचते, वैभव और विलासपूर्ण जीवन पर ही काव्य रचना करते थे |

 (8) उद्दीपन रूप में प्रकृति चित्रण काव्य में प्रकृति-चित्रण दो रूपों में होता है, आलम्बन और उद्दीपन रूप में | प्रकृति के बिंबग्रही स्वरूप के चित्रण में आलंबन रूप का चित्रण मिलता है | जैसा कि वाल्मीकि और कालिदास के काव्य में, प्रकृति का चित्रण जहाँ नायक और नायिका की मनोदशा के अनुकूल किया जाता है वहाँ  उद्दीपन रूप का चित्रण हुआ है |

(9) अभिव्यंजनापध्दति कवि जो अनुभव करता है उसे मूल रूप देने के लिए शब्दों, मुहावरों, विशेषनों और लोकोक्तियाँ का चयन अपनी रूचि के अनुसार करता है | इस काल में कवियों ने कन्हैया, साँवलिया और लला जैसे शब्दों का प्रयोग किया है | जनजीवन, कन्हैया,साँवलिया के रूप में उपस्थित हुई | नेत्र के नए विशेषण अनियारे नयन, उरोजनी, निपट कठोर उरोजनि आदि प्रयुक्त हुए | आँख, मन, चित, आदि पर महावरे रचे जाने लगे |

(10 ) विविधमुखी साहित्य का निर्माण   इस युग में ज्योतिष, सामुद्रिक शास्त्र, काव्यशास्त्र, राजनीति शास्त्र, संगीतशास्त्र आदि विषयों पर विविध पुस्तक लिखी गई | बिहारी सतसई  तो इस युग की पुरा ज्ञान का भंडार है |

(11) मुक्तकशैली  – इस काल में कवियों का मुख्य उदेश्य अपने आश्रयदाता को संतुष्ट करना का है | अत: कवियों ने मुक्तक छन्दों में काव्य रचना की | इस परम्परा के प्रवर्तक में हाल की गाहासतसई, अमरुक का अमरुकशतक, गोवर्दनाचार्य का आर्यसप्तशती प्रमुख है | अधिकांश रचनाओं में कवित, सवैया, दोहा जैसे छंद का प्रयोग किया जाने लगा |

(12) ब्रज भाषा का प्रयोग रीतिकाल ब्रज भाषा का स्वर्णकाल है | इस युग में बिहारी सतसई, ललितललाम, कविकुलकल्पतरु, आदि ग्रन्थ लिखे गए |

(13) कवियों की पराश्रय की भावना कवियों का मुख्य उदेश्य धनोपार्जन था | इन्हें इस उदेश्य से राजदरबार से उपयुक्त स्थान और कहीं नहीं था अत: कवि लोग राजाओं के पराश्रय में रहना ही अच्छा समझते थे |  


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