Saturday, December 19, 2020

हिन्दी साहित्य में साहित्येतिहास लेखन की परम्परा / hindi sahity men sahityetihas lekhn ki prmpra


               हिन्दी में साहित्येतिहास लेखन की परम्परा

  



                               हिन्दी –साहित्य के इतिहास लेखन की परम्परा के बीज “चौरासी वैष्णव की वार्ता “, दो सौ वैष्णव की वार्ता’ ‘भक्तमाल’ ‘कविमाला’ ‘कालिदास हजरा’ नामक रचनाओं में मिलते हैं | इन रचनाओं में हिन्दी कवियों, के जीवन-वृत्त एवं कृतित्व का परिचय तो मिलता है परन्तु समय-तिथि का उल्लेख न होने के कारण  इन्हें इतिहास ग्रन्थ नहीं माना जा सकता है | इसलिए हिन्दी–साहित्य के इतिहास–लेखन की वास्तविक परम्परा का आरम्भ एवं विकास निम्नलिखित इतिहासकारों से माना जाता है –




गार्सा-द-तासी -    हिन्दी-साहित्य के इतिहास लेखन का सर्वप्रथम श्रेय फ्रांसीसी विद्वान् गार्सा-द-तासी’ को माना जाता है इन्होंने ‘ईस्त्वार-द-ला-लितरेत्युर एन्दुई ऐन्दुस्तानी’ नाम का पहला हिन्दी साहित्य का इतिहास ग्रन्थ ’फ्रेंच’ भाषा में  लिखा है | इसमें हिन्दी और उर्दू के अनेक कवियों का विवरण वर्णक्रमानुसार है, इसके पहले भाग सन 1838 ई० में तथा दुसरे भाग सन 1847ई० में प्रकाशित हुआ | सन 1871 ई० में इसका दूसरा-संस्करण प्रकाशित हुआ, जिसमें इसे तीन खण्डों में बाँटकर पर्याप्त संशोधन और परिवर्तित किया गया | 

         इस प्रकार हिन्दी-साहित्य का इतिहास लेखन के प्रथम प्रयास में इनका महत्त्व है पर इनकी इतिहास ग्रन्थ में कुछ खामियाँ हैं जो इतिहास ग्रन्थ मानने में आलोचकों यानि इतिहासकारों को संदेह होता है इनके इतिहास ग्रन्थ की खामियाँ निम्नलिखित हैं-                                                                                                 

(1)   इतिहास ग्रन्थ में कवियों को कालक्रम के स्थान पर अंग्रेजी वर्णक्रम में प्रस्तुत करना |

(2)   काल-विभाजन एवं युगीन प्रवृतियों का अभाव तथा हिन्दी से इतर भाषा के कवियों का समावेश |

           इन सब दोष के कारण विद्वानों ने इसे इतिहास ग्रन्थ मानने से संकोच करते है, फिर भी, हिन्दी साहित्येतिहास-लेखन की परम्परा के प्रवर्तक के रूप में गार्सा-द-तासी का महत्त्व है |


शिवसिंह सेंगर -  शिवसिंह सेंगर ने ‘शिवसिंह सरोज’ 1883 ई० में इतिहास ग्रन्थ लिखा है | अपने इतिहास ग्रन्थ में लगभग एक हजार कवियों का संक्षिप्त जीवन परिचय व उनकी कविताएँ उदाहरण स्वरूप लिखी हुई है | “शिवसिह सरोज” में कवियों की जन्म-तिथि व रचना की तिथि दी गई है | इस ग्रन्थ का महत्त्व इस बात में है की यह एक समृद्ध कविवृत संग्रह है | इसमें कवि के कर्म को रचना-तिथि या जन्म-तिथि किसी के आधार पर नहीं लिखा गया है | सिर्फ कवियों एवं रचनाओं का संग्रह है |

जांज-ग्रियर्सन  जांज –ग्रियर्सन का इतिहास  ग्रन्थ ‘द माडर्न वर्नाकुलर लिट्रेचर आँफ हिन्दुस्तान’ है | यह ग्रन्थ सन 1888 ई० में एशियाटिक सोसाइटी आँफ बंगाल से विशेषांक के रूप में प्रकाशित हुआ | इसमें पहली बार कवि-लेखकों को कालक्रमानुसार वर्गीकरण तथा काव्य के प्रवृतियों का विवेचना, विभिन्नों कालों का नामकरण, कवियों को श्रेष्ठता अंक दिया गया है |

                               ग्रियर्सन ने ही पहली बार 16 वी०-17 वी० शताब्दी के युग को ‘स्वर्णकाल’ कहा है | इतिहास लेखन में तुलनात्मक पद्धति की शुरुआत करने का श्रेय है | ग्रियर्सन का ही इतिहास ग्रन्थ हिन्दी साहित्य के स्वरूप और विकास समृधि में भविष्य के लिये पथ-प्रदर्शक सिद्ध हुआ | ग्रियर्सन के इतिहास ग्रन्थ के अनुवादक डा० किशोरीलाल गुप्त का मानना है कि –“यह हिन्दी-साहित्य की नींव का वह पत्थर है जिस पर आचार्य शुक्ल ने अपने सुप्रसिद्ध इतिहास का भव्य भवन निर्मित किया |” 


मिश्रबंधु -    इनकी इतिहास ग्रन्थ का नाम ‘मिश्रबंधु विनोद’ है | यह ग्रन्थ चार भागों में विभक्त है | तीन भाग सन 1913 ई० तथा चौथा भाग 1934 ई० में प्रकाशित हुआ | इसमें पांच हजार कवियों का आठ खण्डों में परिचय दिया है | हिन्दी में किसी भारतीय इतिहासकार द्वारा निर्मित पहला साहित्येतिहास ग्रन्थ है, रामचन्द्र शुक्ल अपने इतिहास ग्रन्थ में कवियों के परिचयात्मक विवरण मिश्रबंधु से ही लिया है |

रामचन्द्र शुक्ल -  हिन्दी में व्यवस्थित इतिहास ग्रन्थ लिखने का श्रेय आचार्य शुक्ल को है | इनका ग्रन्थ ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ मुलत: नागरी प्रचारिणी सभा काशी द्वारा प्रकाशित ‘हिन्दी शब्द सागर’ की भूमिका के रूप में 1929 ई० को प्रकाशित हुआ था | इस इतिहास ग्रन्थ को शुक्ल जी ने साहित्यिक प्रवृति गत आधारों से निर्मित किये हैं | फिर भी इतनी व्यवस्थित तथा तर्कसम्मत मान्यता के बाद भी गुण-दोष विद्यमान है |

  गुण – 1. काव्य रचनाओं के मुल्यांकन में रसवादी सिद्धांत और लोकमंगल भावना को कसौटी बताया |

  2.  काव्यधारा और युगों की साहित्यिक प्रवृतियों का निर्धारण |

           3,  भक्तिकाल को शुद्ध दार्शनिक एवं धार्मिक आधार पर चार भागों में बाँटना |

           4. युगीन परिस्थितियों के सन्दर्भ में साहित्य के विकास क्रम की व्याख्या |

दोष – 1. अपभ्रंश काव्य की अपेच्छा |

          2. कवियों के मुल्यांकन में व्यक्तिगत रूचि का पूर्वाग्रह |

           3. साहित्य की पूर्व परम्परा और काव्य प्रवृतियों की अनदेखी |

         4. आलोचक व्यक्तित्व की प्रधानता |

                 इतना सब होते हुये भी रामचन्द्र शुक्ल का इतिहास ग्रन्थ डा० नामवर सिंह के अनुसार पंचाग के भांति प्राप्त हुआ है | 


 हजारी प्रसाद द्विवेदी – इनके साहित्येतिहास ग्रन्थ का नाम ‘हिन्दी साहित्य की भूमिका’ है | इसने युगीन प्रभाव के आधार पर साहित्य का मुल्यांकन किये | शुक्लजी के एकांकी दृष्टिकोण की अपेच्छा परम्परा को महत्व दिया है | इन्होंने भक्तिकाल के उदय को इस्लाम की प्रतिक्रिया स्वरूप हिन्दू जनता की निराशा का परिणाम नहीं माना बल्कि उसे भक्ति आन्दोलन की परम्परा से जोड़ दिया | इन्होंने सिद्ध-नाथ साहित्य को भक्तिकाव्य की परम्परा में जोड़ दिया जिससे रामचन्द्र शुक्ल ने नहीं जोड़ा था |

               साहित्य के विकास पर द्विवेदी का मत है – “प्रत्येक देश का साहित्य समाज ‘ संस्कृति और चिन्तन एक अविच्छिन विकास परम्परा की ओर उसमें होनेवाली क्रिया-प्रतिक्रियाओं का प्रतिबिम्ब हुआ करता है , जिसमें गति देने भौगोलिक, आर्थिक, मनोवैज्ञानिक, दार्शनिक और व्यक्ति कारण काफी हिस्सा लेते है, जब तक इन बातों पर ज्ञान नहीं होता तब तक साहित्य के इतिहास को पढ़ने का डिक्शनरी को याद करने की अपेक्षा अधिक मूल्य नहीं हो सकता |

                   निष्कर्षत: परम्परा के विस्तृत परिदृश्य में रखकर हिन्दी-साहित्य को देखने-समझने और परखने का पहला प्रयास द्विवेदी का ही है |

                                      अन्य साहित्येतिहास ग्रन्थ लिखने वाले में – डा० सूर्यकान्त शास्त्री रचित ‘हिन्दी-साहित्य का विवेचनात्मक इतिहास’,  पं० कृष्णशंकर शुक्ल कृत आधुनिक हिन्दी-साहित्य का इतिहास, डा० रामकुमार वर्मा रचित ‘हिन्दी-साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास’, आचार्य नलिन विलोचन शर्मा कृत ‘साहित्य का इतिहास दर्शन’ डा० धीरेन्द्र वर्मा कृत ‘हिन्दी-साहित्य’ आदि हैं | इधर, हाल के वर्षों में काशी-नागरी-प्रचारिणी सभा द्वारा ‘हिन्दी-साहित्य का वृहत इतिहास’ सोलह खण्डों में अलग-अलग विद्वानों के सहयोग से संपादन कार्य हो रहा है | यह शुक्ल जी के इतिहास के किंचित संशोधन करके अपनाया है |

                         निष्कर्षत:हिन्दी-साहित्य के इतिहास की परम्परा का अवलोकन करने पर पर प्रतीत होता है कि आचार्य शुक्ल के बाद हिन्दी साहित्य के इतिहास लेखन का प्रत्येक प्रयास शुक्ल जी के द्वारा प्रस्तावित आयोजन पर ही आधृत है |



















Thursday, November 19, 2020

प्रगतिवाद की प्रवृति या विशेषता /prgtivaad ki prvriti ya visheshta

                     प्रगतिवाद की प्रवृति या विशेषता

  


       हिन्दी साहित्य में प्रगतिवाद का प्रारभं छायावादी कवियों से सी होता है | 1936 ई० में मुंशी प्रेमचन्द्र की अध्यक्षता में भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना हुई | इस लेखक संघ की विचार धारा में नागार्जुन, दिनकर, रामविलास शर्मा, भवानीप्रसाद मिश्र, पंत, शिवमंगलसिंह, सुमन आदि जुड़े जिसमें इनकी प्रवृति और विशेषता निम्न प्रकार से है



(1)  सामाजिक यथार्थवाद प्रगतिवादी काव्य में निम्न वर्ग की प्रतिष्ठा हुई है, निम्नवर्गकी आर्थिक विषमता पर अभिव्यक्ति दी गई | कृषक, मजदूर और इनके घरों का चित्रण प्रर्याप्त मात्रा में हुई | जैसे

        यह तो मानव लोक नहीं रे, यह है नरक अपरिचित |

        यह भारत का ग्राम संस्कृति, सभ्यता से निर्वसित ||

(2) सामयिक समस्याओं का चित्रण इस धारा के कवियों द्वारा देश और विश्व की सामयिक समस्याओं चित्रण किया गया | जैसे, भारत पाक विभाजन, कश्मीर समस्या महँगाई आदि | महात्मा गाँधी के निधन पर नागार्जुन की कविता देखिए

          बापू मेरे -------------------

         अनाथ हो गई भारत माता ---------

           अब क्या होगा -----------------

(3)  बौद्धकता और व्यंग्य का प्रसार प्रगतिवादी कविताओं में बौद्धिकता का स्वरूप दिखाई पड़ता है | सामाजिक सुधारवाद की भावना से प्रेरित कवि व्यंग्य को अधिक महत्व दिये है नागार्जुन ने कागजी स्कीम की आजादी पर कटु व्यगंय किये है

                     कागज की आजादी मिलती

                     ले लो दो दो आने में |

(4)  रूढ़ि विरोध प्रगतिवादी कवि ईश्वर, आत्मा, परमात्मा सृष्टि एवं जन्मांतर में विश्वास नहीं करते | सामाजिक अंधविश्वासों, परम्पराओं एवं रूढ़ियों का विरोध करते है है| कवि लोग मानव को मानव रूप में ही देखना चाहते है

                    किसी को आर्य, अनार्थ

                    किसी को यवा,

                     किसी को हुण, यहूदी, द्रविड़

                    मनुज को मनुज न करना आह |

(5)  शोषितों का करुण गान प्रगतिवाद कवि आर्थिक विषमता मानव सभ्यता को शोषक (पूँजीवाद) एवं शोषित (श्रमिक) वर्ग में विभक्त किया है| शोषक द्वारा शोषित किये जानेवाले श्रमिकों, मजदूरों, एवं किसानों का कारुणिक चित्रण प्रगतिवादी कव्योकारों द्वारा प्रस्तुत किया गया है

            कब तक  पशुता के प्रतीक वे जुल्म करेगें, दुख देंगे |

           अपनी स्वार्थ साधना में मानव- समाज की बलि लेगे ||

(6) शोषकों के प्रति घृणा और रोष कवि द्वारा सामाजिक आर्थिक विषमता को नष्ट करने के लिए पूंजीपतियों के विरुद्ध घृणा और रोष व्यक्त की है

          श्वानों को मिलता वस्त्र दूध, भूखे बालक अकुलाते है,

          माँ की हडडी से चिपक ठिठुर जाड़े की रात बिताते है |

(7) क्रांति का भावना कवि प्राचीन रूढ़ियों एवं परम्पराओं का विरोध करते है तो सामंती व्यवस्था एवं पूँजीवादी व्यवस्था के प्रति क्रांति की भावना रखना है जैसे

          कवि कुछ ऐसी तान सुनाओं

          जिससे उथल पुथल मच जाए |

(8) मार्क्स एवं रुख का गुणगान प्रगतिवाद कवि ने साम्यवाद के प्रवर्तक मार्क्स एवं रुख का महत्व स्वीकार किया है, तथा इनकी प्रशसित में कविताओ का सहज भी है |

        धन्य मार्क्स, चिर तमाध्छ्न्न पृथ्वी के उदय किरण पर |

        तुम त्रिनेत्र के साचछु से प्रकट हुए प्रलय कर ||

(9) सांस्कृतिक समन्वय की भावना प्रगतिवादी कवि एक नवीन विश्व संस्कृति की परिकल्पना की है | जो समन्वयवाद पर आधारित है|

जैसेः क्षुद्र व्यकित को विकसित हो अब बनना है जन मानव |

     सामूहिक मानव को निर्मित करनी है तब संस्कृति ||

9.     )मानवता की महता प्रगतिवादी कवि मानवता की असीमित शक्ति में विश्वास रखता है अत ये मिखमंगो, किसनो, मजदूरों,वेश्याओ, विधवाओं आदि की उद्वार में लगा है

 

(10                       ) प्रगतिवाद का कलापक्ष प्रगतिवादी कवियों की भाषा सुबोध शौली के है | तथा लोकगीत शौली में नई धुनों की सर्जना की भर गई अलंकार के क्षेत्र में उपमानों का द्वारा कर नवीन रूपक विकसित है | प्रतिको का चयन किया गया है |

             तुम वहन कर सको, जन जन में मेरे विचार |

              वाणी मेरी चाहिए, तुम्हें क्या अलंकार ||

             निष्कर्षत प्रगतिवादी कवि उपेदित दलित वर्ग को काव्य का विषय बनाया और साहित्य को एक व्यापक यथार्थवादी आयाम मिला 










अमीर खुसरो के दोहे, मुकरियाँ और गीत /amir khsro ke dohe mukriyan or geet

                                         अमीर खुसरो के दोहे, मुकरियाँ और गीत   1.      एक नार किया -----------------------------------...