Saturday, February 26, 2022

अमीर खुसरो का जीवन परिचय क्या है? / amir khusro ka jivn prichy kya hai?

                                                             अमीर खुसरो का जीवन परिचय 

                                             amir khusro ka jivn prichy

                                                    

                           इस विडियो में अमीर खुसरो से सम्बन्धित वस्तुनिष्ट प्रश्नोत्तर है 

              अमीर खुसरो हिन्दी साहित्य के इतिहास में आदिकाल के कवि हैं | इन्होंने खड़ी बोली भाषा के प्रवर्तक के रूप में ख्याति अर्जित की है | आचार्य नगेन्द्र ने इतिहास ग्रन्थ में इन्हें लौकिक साहित्यकार के अंतर्गत रखा है |

                               अमीर खुसरो का जन्म 1253 ई० में उत्तरप्रदेश के एटा जिले के पटियाली नामक कस्बे में गंगा किनारे हुआ था | वे मध्य एशिया के लाछन जाती के तुर्क सैफुद्यीन के पुत्र थे | अमीर खुसरो की माँ दौलत नाज हिन्दू राजपूत थी | ये दिल्ली के एक रईस अमीर इमादल्मुल्क की पुत्री थी | अमीर इमादल्मुल्क बादशाह बलबन के युद्ध मंत्री थे | खुसरो के पिता के तरफ से मुसलमान तथा माता के तरफ से हिन्दू संस्कृति में घुलने-मिलने की नसीब हुई | राजनितिक दबाव के कारण माँ के तरफ का परिवार भी बाद में मुसलमान बन गया | अमीर-खुसरो के परिवार चिश्ती तथा सूफी सम्प्रदाय के महान संत साधक संत हजरत निजामुद्दीन औलिया उर्फ सुल्तानुल मशयख से दीक्षा ग्रहण की थी | अमीर खुसरो सात वर्ष के थे तभी पिता का देहावसान हुआ था | फिर भी इनके जीवन में शिक्षा-दीक्षा को लेकर बाधा नहीं पहुँची | इन्होंने अपने समय के दर्शन तथा विज्ञान से काफी प्रभावित हुये और बचपनसे ही कविता लिखना प्रारम्भ किये | बीस वर्ष तक पहुँचते-पहुँचते कवि बन गये |

                                                

                           खुसरों की प्रमुख रचनाओं में – खलिकबारी, पहेलियाँ, मुकरियाँ, दो सूखने, गजल आदि प्रसिद्ध हैं | खुसरो को मुईजुद्दिन कैकबाद के दरवार में राजकीय सम्मान प्राप्त हुआ | गुलाम वंश के पतन के बाद जलालुद्दीन खिलजी दिल्ली का सुल्तान बना | इसने खुसरो को ‘अमीर’ की उपाधि दी | जलालुद्दीन के हत्यारे इसके भतीजे अलाउद्दीन खिलजी ने सुल्तान होने पर ‘राजकवि’ की उपाधि से सम्मानित किया है |

                                          

                                इस विडियो में अमीर खुसरो से सम्बन्धित वस्तुनिष्ट प्रश्नोत्तर है 

                                अमीर खुसरो जन्मजात कवि के साथ-साथ कुशल व्यवहारिक बुद्धिवाले भी थे | इन्होंने इस जमाने के राज परिवार में उँचे ओहदों में रहकर इसकी प्रमाण दीखा दिया है | इन्होंने अपने जीवन का सम्पूर्ण पल ग्यारह सुल्तानों के उत्थान-पतन में बिताया | अमीर खुसरो सबसे पहले 1270 ई० में गयासुद्दीन बलबन के भतीजे कड़ा (इलाहाबाद) के हाकिम अलाउद्दीन मुहम्मद                                                                    कुलिश खां का राज्याश्रय प्राप्त हुआ, बाद में खुसरो बलबन के जयेष्ट पुत्र सुल्तान मुहम्मद का राज्याश्रय मिला | इन्होंने सुल्तान के साथ मुल्तान की यात्रा की, इसी दरमियान मुगलों से युद्ध हुई, इस युद्ध में सुल्तान मुहम्मद की मृत्यु हो गई और खुसरो बंदी बना लिया गया |

                              अमीर खुसरो महान संगीतज्ञ भी थे | कहा जाता है की तबला हजारों साल पुराना वाद्द्य-यंत्र है किन्तु नवीनत्तम ऐतिहासिक वर्णन में बताया जाता है की 13 वीं शताब्दी में भारतीय कवि एवं संगीतज्ञ अमीर खुसरो ने पखवाज के दो टुकडें करके तबले का आविष्कार किया |

                                                 


                         अमीर खुसरो अपने जीवन में गुरु निजामुद्दीन औलिया से काफी प्रभावित थे | गुरु के प्रति लगाव को अन्दाजा लगाया जा सकता है की आश्रयदाता वादशाह गयासुद्दीन तुगलक अक्सर निजामुद्दीन के विरोध करते थे और शिष्य खुसरो गुरु के प्रति नतमस्तक चिंतातुर रहते थे | एक बार बादशाह दिल्ली से दूर गये थे | आते वक्त इन्होंने खुसरो से कहलवायी की मेरे पहँचने से पहले ही औलिया दिल्ली छोड़ दे | इन्होंने बादशाह की यह खबर गुरु औलिया को दिये और पूछ बैठे- अब क्या होगा ? गुरु औलिया शिष्य अमीर के ह्रदय विदारक अवस्था को देखकर उत्तर दिए – कुछ नहीं खुसरो | तुम घबराओं मत | हनुज दिल्ली दूर अस्त यानि अभी दिल्ली दूर है | और सचमुच बादशाह के लिये दिल्ली बहुत दूर रहा इन्होंने कभी दिल्ली आ नहीं पाये | रास्ते में एक पड़ाव में इनकी मृत्यु हो गई | तभी से यह कहावत शायरी के रूप में सबसे पहले खुसरो के जुवानों से ही निकली |

                                             


                     अपने गुरु के प्रति खुसरो के लगाव को इसे भी लगाया जा सकता है की एक बार अमीर खुसरो किसी कारण बस दिल्ली से दूर गये थे | समाचार आयी की गुरु का निधन हो गया है | समाचार सुनते ही इन्होंने सन्निपात की अवस्था में ही दिल्ली पहुँचे | धुल-धूसरित खानकाह के द्वार पर खड़े हो गये और साहस न कर सके अपने पीर की मृत देह को देखने का | आखिरकार जब इन्होंने शाम के ढलते समय पर उनको मृत देखा तो इनके पैरों पर शिर पटक- पटक कर मुर्छित हो गये और उसे वेसुध हाल में इनके होंठ से निकला –

                           गोरी सेवे सेज पर मुख पर डारे केश |

                         चल खुसरों घर अपने सांझ भई चहू देस ||

                                   इस प्रकार अमीर खुसरो अपने प्रिय के वियोग में संसार के मोहजाल काट फेंके  और धन-सम्पति दान कर, काले वस्त्र धारण कर अपने पीर के समाधि पर जा बैठे | और कभी न उठने का दृढ़ निश्चय कर वहीं बैठकर प्राण विसर्जन करने लगे |

                               इस प्रकार इनकी मृत्यु1325 ई० में हुई | दिल्ली में औलिया के समाधि के बगल में इनकी भी समाधि बना दी गयी है |

 

आदिकालीन काव्य प्रवृत्तियाँ की लेख / adikalin kavy prvritiyan

                                                   आदिकालीन काव्य प्रवृत्तियाँ    

                                                     

                              आदिकाल की सम्पूर्ण साहित्य भारतीय जीवन के संक्रान्ति काल में निर्मित हुआ | जिन्हें स्थान भेद के आधार पर दो भागों में विभाजित हुआ है | प्रथम, पशिचमी अंचल की साहित्य दूसरा, पूर्वी अंचल की साहित्य | इन साहित्य की प्रवृति को निम्न प्रकार से प्रकट किया जा सकता है –


1.     राजस्तुति :- इस काल में राजस्तुति की रचनायें हुई, जो पशिचमी अंचल की साहित्य की मुख्य प्रवृति है | दरबारी कवि अपने आश्रयदाता राजाओं के पराक्रमपूर्ण चरितों या गाथाओं का वर्णन करते थे | हिन्दी के प्रबंध काव्य रासों के नाम से जानी जाती है | जैसे- प्रमुख रचनाएँ हैं – दलपति विजय कृत खुमाण रासों, नरपति नाल्ह कृत वीसलदेव रासों, शारंगधर कृत हम्मीर रासों, जागनिक कृत परमाल रासों, चंदबरदाई कृत पृथ्बीराज रासो आदि हैं | राजस्तुति से युक्त एक काव्य अंश देखिये :-

                    बारह बरस लौ कूकर जीवै, अरु तेरह लौ जिये सयार|

                     बरस अठारह क्षत्रिय जीवै, आगे जीवन कौ धिक्कार || (जागनिक कृत परमाल रासो से )


2 साम्प्रदायिक धार्मिक साहित्य :- पूर्वी अंचल में बौद्ध धर्म के निरंतर परिवर्तन का प्रभाव सिद्ध- साहित्य में मिलता है | सिद्धों या सिद्ध-साहित्य की प्रतिक्रिया के परिणाम स्वरूप नाथों या नाथ-साहित्य साहित्य का प्रादुर्भाव हुआ | प्रमुख रचनाओं में हैं – सरहपा कृत दोहाकोश, शबरपा कृत चर्यापद , डोम्भिपा कृत योगचर्या आदि हैं | अन्य सिद्ध कवियों में – लुईपा, कणडपा, कुक्कुरिपा आदि हैं इनके रचनाओं में पाखण्ड और आडम्बर का विरोध है, गुरु-सेवा का महत्त्व दिया है | ये सहज भोग मार्ग से जीव को महासुख की ओर ले जाते हैं | इनकी भाषा सरल तथा गेय हैं, काव्यों में भावों का सहज प्रवाह मिलता है | एक उदाहरण देखिये –

                                         नाद न विन्दु न रवि न शशि मण्डल,

                                         चिअराअ सहाबे मूकुल,

                                         अजुरे उंजू छाडी मा लेहु रे बंक,

                                        निअही बोहिम जमु रे लांक |

                                        हाथेरे कांकण मा लोउ दामण,

                                       अपने अपा बुझतु निअन्मण |


3 अपभ्रंश प्रभावित पुरानी हिन्दी का प्रयोग – हिन्दी साहित्य के समान्तर अपभ्रंश प्रभावित साहित्य की रचनाएँ हो रही थी | ये धार्मिक काव्य रचनाएँ हैं इसमें महापुरुषों के जीवन वृत्त तथा उनके उपदेश आदि की कथा उपलब्ध है | तथा मनुष्य के मोक्ष प्राप्त करने के साधन उपलब्ध कराये गये हैं | प्रमुख रचनाएँ हैं – स्वयंभू कृत पउमचरिउ, रिटठनेमि चरिउ,स्वयंभूछन्द | पुष्पदन्त कृत महापुराण, णयकुमारचरिउ, जसहर चरिउ आदि |


4. रासक काव्यधारा – हिन्दी में इसका विकास अपभ्रंश से हुआ | ये वीररसात्मक धर्म-प्रधान तथा उपदेशमूलक भी है | प्रमुख काव्य कृतियों में – अब्दुलरहमान कृत संदेशरासक, जिनदत्त सूरी कृत उपदेश-रसायन-रास आदि |


5. वीर एवं श्रगार मूलक रचनाएँ – आदिकाल में वीर एवं श्रृंगार मूलक रचनाएँ रची गई | प्रमुख रचनाओं में प्राकृत-पैगलम प्रमुख वीररसात्मक मुक्तकों का संकलन है जिसमें जज्जल, बब्कर, विद्याधर, हरिभद्र की रचनाएँ संकलित हैं | इस प्रकार श्रृंगार मूलक रचनाओं में हेमचंद्र कृत प्राकृत व्याकरण,मेरुतंग कृत प्रबंधचिंतामणि तथा पुरातन प्रबन्ध आदि हैं |


6. प्रेमाख्यानक काव्य प्रवृति – प्रेमाख्यानक काव्य प्रवृति भी पाई गई | प्रमुख रचनाओं में – किलोल कृत ढोलामारू-रा-दूहा | माधवानल काम कंदला एवं राठौर पृथ्वीराज री कही वेली किसन रुक्मणी री आदी |


7. श्रृंगार मूलक भक्ति काव्य – इस युग में श्रृंगार भक्ति मूलक पदों की रचना की परम्परा का विकास मिलता है | जैसे- जयदेव की गीत गोविन्द में मिलता है | इसी प्रकार के पद विद्यापति के पदावली में भी पाई जाती है


8. प्रकृति चित्रण – आदिकाल के साहित्य में वस्तु वर्णन के अन्तर्गत प्रकृति-चित्रण की दोनों प्रणालियों का चित्रण है | आलम्बन तथा उदीपन आदि दो रूप हैं | इनके आलावा कहीं-कहीं परिगणन पद्धति भी मिलती है |


9. राष्टीय भावना का अभाव – इस युग की साहित्य राजाओं के वीर, श्रृंगार, प्रेम, आदि बिषय में ही रचना लिखते पाये गये | साधारण जनमानस के सामाजिक, आर्थिक,दशाओं का चित्रण नहीं मिलता है |


10. गद्य रचनाओं का प्रदुभाव – इस काल में पद्य रूपों प्रयाप्त रचनाएँ मिलती हैं परन्तु गद्य रूप में भी रचनाएँ मिलना शुरू हुआ है | जैसे – दामोदर शर्मा कृत उक्ति व्यक्ति प्रकरण, रोड़ा कृत राउलवेल, ज्योतीश्वर कृत वर्णरत्नाकर आदि |  

 

11. भाषा – कविता की भाषा डिंगल तथा पिंगल रूपों में है | ब्रजभाषा मिश्रित कोमल श्रृंगारिक रचनाएँ पिंगल में मिलती है | तथा वीरगाथा मूलक रचनाएँ डिंगल में मिलती है, साथ ही संस्कृत, मैथली तथा देसिल भाषा की भी रचनाएँ मिलती हैं |


12. काव्य शैली का विकास – आदिकालीन साहित्य में तीन प्रकार के काव्य शैली का विकास हुआ – प्रबन्ध शैली, मुक्तक शैली तथा गीत शैली |


13. छन्दगत प्रवृति – इस काल में छन्द की व्यापक परम्परा म्मिलती है | प्रबन्ध काव्यों में दुवई, हेला, इछा, धत्ता. रासक, पद्धति आदि के आलावे रोलऊ, उल्लावउ, छप्पय आदि हैं | मुक्तक में दोहा, पद, अदिल्ल आदि हैं |

 








अमीर खुसरो के दोहे, मुकरियाँ और गीत /amir khsro ke dohe mukriyan or geet

                                         अमीर खुसरो के दोहे, मुकरियाँ और गीत   1.      एक नार किया -----------------------------------...