Monday, September 29, 2025

पाश्चात्य काव्यशास्त्र का वस्तुनिष्ट प्रश्नोत्तर/ pashchaaty kavyashaastr ka vstunisht prshonttor

    पाश्चात्य काव्यशास्त्र का वस्तुनिष्ट प्रश्नोत्तर



         

प्रमुख आलोचक और समयावधि

                 

प्लेटो = 427 इस्वी० पू० – 347 इस्वी०पू०  

 अरस्तू = 384इस्वी०प - 322इस्वी०पू० 

 लोंगिनुस = प्रथम या तृतीय शताब्दी ई०

 विलियम वर्ड्सवर्थ = 1770 -1850 ई० 

 सौमुअल टेलर कोलरेज = 1772 – 1834 ई० 

 बेनेदेत्तो क्रोचे = 1866-1952 ई०

 टामस स्टनर्स इलियट = 1888 – 1965 ई० 

 ईवर आर्मस्ट्रोग रिचर्ड्स = 1893 -1979 ई०

 

@ प्रमुख आलोचक एवं रचनाएँ -

            आलोचक                       - रचना

प्लेटो                               -  इओन, सिंपोसियोन, पोलितेइया, फएदरस, नोमोई, लाँज, रिपब्लिक, 

अरस्तू                              -  तेखनेस रितोरिकेस, (भाषाशास्त्र)

                                                  परिपोइतिकेस (काव्यशास्त्र)

            लोंगिनुस                        -  पेरिइप्सुस

वर्ड्सवर्थ                          - ‘लिरिकल बैलड्स’ की भूमिका

कोलरिज                          - बायोग्राफिया लिटरेरिया (1817) द फ्रैंड,एड्स टू      रिफ्लेक्शन,चर्च एण्ड   स्टेट, कंफेशंज आफ इनक्वायरिंग स्पिरिट

क्रोचे                               - एस्थेटिक (न्यू एसेज आन एस्थेटिक)

रिचर्ड्स                                    - दि  फाउंडेशन्स आँफ ईस्थेटिक्स (1922) दि मीनिग आँफ मीनिग (1923),   दि प्रिंसिपुल्स आँफ लिटररी क्रिटिसिज्म (1924)प्रैक्टिकल क्रिटिसिज्म

               (1929) साइंस एंड पोएट्री, दि फिलोसोफी आँफ रेटारिक (1936),

                                              कालरिज आँफ एमेजिनेशन,वियोड,एक्सपेरिमेंट्स इन मल्तिपिल

                                                डेफिनिशन, बेसिक रुल्ज ऑफ रीजन, इंटरप्रटेशन इन टीचिंग,

टी.एस.एलियट                        -   दि सेक्रेड वुड (1920), सिलेक्टेड एसेज, एसेज एन्शेंट एंड माँडन, होमेज

                                               टू जाँन डाइडन, एलिजाबेथन एसेज, द यूज आफ पोएट्री एंड द यूज आफ

                                               क्रिटिसिज्म !

प्रमुख सिद्धांत और प्रवर्तक -            

                        प्रमुख/सिध्दांत                                  -  प्रवर्तक

                        प्रत्ययवाद                                   -  प्लेटो

                        अनुकृति एवं विरेचन, त्रासदी       -   अरस्तू

                        उदात्त                                        - लोंगिनुस

                        संप्रेषण एवं मूल्य                         -  रिचर्ड्स       

                        वस्तुनिष्ट समीकरण                     -  इलियट

                             निवैयक्तिकता का सिध्दांत       -  इलियट

                            संवेदनशीलता का असाहचर्य     - इलियट   

                        परम्परा की परिकल्पना एवं

                             व्यैक्तिकता का सिध्दांत             -  इलियट

                             अभिव्यंजनावाद                        -  क्रोचे

                             कल्पना सिध्दांत                        -   कोलरिज

                               द्वन्द्ववाद                                   -   हीगेल

                                द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद              -  कार्लमार्क्स

                               महान यथार्थवाद                       -  जार्ज लूकाच

                             मिथकीय समीक्षा                         -   नार्थप फ्राई

                              स्वच्छंदतावाद                             -  बर्डसवर्थ

                              अन्तर्विरोध                                  -  क्लींच ब्रुक्स

                              विखंडन वाद                               -  जाक देरिदा

                             विडम्बना और विसंगति                 -  क्लींथ ब्रुक्स

                             विरोधाभास (आईरनी)                    -  रार्बट पेन वारेन

                             साहित्य का समाजशात्र                   -  ईपालित तेन

                                          अजनबीपन                       -   मार्क्स

         पाश्चात्य आलोचकों के अनुसार कविता की परिभाषा

·         ड्राइडन कविता रागात्मक और छन्दोबद्ध भाषा के माध्यम से प्रकृति का अनुकरण है।

·         ड्राइडन ’’स्पष्ट संगीत कविता है।’’

·         वर्ड्सवर्थ कविता हमारे प्रबल भावों का सहज उच्छलन है।

·         जान्सन ’’छन्दमयी वाणी कविता है।’’

·         मैथ्यू आरनोल्ड ’’सत्य तथा काव्य सौंदर्य के सिद्धान्तों द्वारा निर्धारित उपबंधों के अधीन जीवन की समीक्षा का नाम काव्य है।’’

·         जान मिल्टन ’’सरल, प्रत्यक्ष तथा रागात्मक अभिव्यक्ति काव्य है।’’

·         वर्डसवर्थ ’’शान्ति के क्षणों में स्मरण किये हुए प्रबल मनोवेगों का सहज उच्छलन कविता है।’’

·         पी.बी. शैली कविता सुखद और उत्कृष्ट मस्तिष्क द्वारा सुखद और उत्कृष्ट क्षणों का संग्रह है।

·         एडगरे एलन ’’काव्य सौन्दर्य की लयपूर्ण सृष्टि है।’’

·         मैथ्यू आर्नल्ड ’’कविता मूल रूप से जीवन की आलोचना है।’’

·         कालरिज ’’सर्वाेत्तम् व्यवस्था में सर्वोत्तम शब्द ही कविता है।’’

·         हडसन ’’कविता कल्पना और संवेग के द्वारा जीवन की व्याख्या है।

·         पी. बी. शैली हमारे सबसे मधुर गीत वही हैं जो हमारे सर्वाधिक विषादपूर्ण विचारों की अभिव्यक्ति है।


हमारी अन्य लेखभारतीय कव्यशात्र प्रश्नोत्तर


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Sunday, September 28, 2025

चयनित अलंकार / chynit alnkaar

  चयनित अलंकार –



                               1. अनुप्रास अलंकार 

       जब किसी काव्य को सुंदर बनाने के लिए किसी वर्ण की बार-बार आवृति हो तो वह अनुप्रास अलंकार कहलाता है। किसी विशेष वर्ण की आवृति से वाक्य सुनने में सुंदर लगता है।

                        जैसे : • चारु चन्द्र की चंचल किरणें खेल रही थी जल थल में ।

       ऊपर दिये गए उदाहरण में आप देख सकते हैं की ‘च’ वर्ण की आवृति हो रही है और आवृति हों से वाक्य का सौन्दर्य बढ़ रहा है। अतः यह अनुप्रास अलंकार का उदाहरण होगा।


                                               यमक अलंकार

             जिस प्रकार अनुप्रास अलंकार में किसी एक वर्ण की आवृति होती है उसी प्रकार यमक अलंकार में किसी काव्य का सौन्दर्य बढ़ाने के लिए एक शब्द की बार-बार आवृति होती है। दो बार प्रयोग किए गए शब्द का अर्थ अलग हो सकता है । 

              जैसे: • काली घटा का घमंड घटा। •

        यहाँ ‘घटा’ शब्द की आवृत्ति भिन्न-भिन्न अर्थ में हुई है। पहले ‘घटा’ शब्द ‘वर्षाकाल’ में उड़ने वाली ‘मेघमाला’ के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है और दूसरी बार ‘घटा’ का अर्थ है ‘कम हुआ’। अतः यहाँ यमक अलंकार है। •

               कनक कनक ते सौगुनी मादकता अधिकाय। या खाए बौरात नर या पा बौराय।।

           इस पद्य में ‘कनक’ शब्द का प्रयोग दो बार हुआ है। प्रथम कनक का अर्थ ‘सोना’ और दुसरे कनक का अर्थ ‘धतूरा’ है। अतः ‘कनक’ शब्द का दो बार प्रयोग और भिन्नार्थ के कारण उक्त पंक्तियों में यमक अलंकार की छटा दिखती है।


                               श्लेष अलंकार 

             श्लेष अलंकार ऊपर दिये गए दोनों अलंकारों से भिन्न है । श्लेष अलंकार में एक ही शब्द के विभिन्न अर्थ होते हैं। 

                जैसे: • रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून पानी गए न ऊबरे मोई मानस चून।

           इस दोहे में रहीम ने पानी को तीन अर्थों में प्रयोग किया है। पानी का पहला अर्थ मनुष्य के संदर्भ में है जब इसका मतलब विनम्रता से है। रहीम कह रहे हैं कि मनुष्य में हमेशा विनम्रता (पानी) होना चाहिए। पानी का दूसरा अर्थ आभा, तेज या चमक से है जिसके बिना मोती का कोई मूल्य नहीं पानी का तीसरा अर्थ जल से है जिसे आटे चून से जोड़कर दर्शाया गया है। रहीम का कहना है कि जिस तरह आटे का अस्तित्व पानी के बिना नम्र नहीं हो सकता और मोती का मूल्य उसकी आभा के बिना नहीं हो सकता है, उसी तरह मनुष्य को भी अपने व्यवहार में हमेशा पानी विनम्रता रखना चाहिए जिसके बिना उसका मू. उपमा अलंकार उप का अर्थ है समीप से और पा का अर्थ है तोलना या देखना । अतः जब दो भिन्न वस्तुओं में समानता दिखाई जाती है, तब वहाँ उपमा अलंकार होता है । जैसे: • कर कमल-सा कोमल है । यहाँ पैरों को कमल के समान कोमल बताया गया है । अतः यहाँ उपमा अलंकार होगा। ल्यह्रास होता है। अतः यह उदाहरण श्लेष के अंतर्गत आएगा। 


                                   रूपक अलंकार 

           - जब उपमान और उपमेय में अभिन्नता या अभेद दिखाया जाए तब यह रूपक अलंकार कहलाता है। 

                          जैसे: • “मैया मैं तो चन्द्र-खिलौना लैहों” 

            ऊपर दिए गए उदाहरण में चन्द्रमा एवं खिलोने में समानता न दिखाकर चाँद को ही खिलौना बोल दिया गया है। अतएव यह रूपक अलंकार होगा। 


                                     उत्प्रेक्षा अलंकार

            जहाँ उपमेय में उपमान के होने की संभावना का वर्णन हो तब वहां उत्प्रेक्षा अलंकार होता है। यदि पंक्ति में -मनु, जनु,मेरे जानते,मनहु,मानो, निश्चय, ईव आदि आता है बहां उत्प्रेक्षा अलंकार होता है।

                          जैसे: • मुख मानो चन्द्रमा है। 

                 ऊपर दिए गए उदाहरण में मुख के चन्द्रमा होने की संभावना का वर्णन हो रहा है। उक्त वाक्य में मानो भी प्रयोग किया गया है अतः यहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार है। 


                                             अतिशयोक्ति अलंकार 

              जब किसी बात का वर्णन बहुत बढ़ा-चढ़ाकर किया जाए तब वहां अतिशयोक्ति अलंकार होता है। 

               जैसे : आगे नदियाँ पड़ी अपार, घोडा कैसे उतरे पार। राणा ने सोचा इस पार , तब तक चेतक था उस पार। 

            ऊपर दिए गए उदाहरण में चेतक की शक्तियों व स्फूर्ति का बहुत बढ़ा-चढ़ाकर वर्णन किया गया- है। अतएव यहाँ पर अतिशयोक्ति अलंकार होगा।


हमारी अन्य लेख -    भारतीय काव्यशास्त्र वस्तुनिष्ट


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भारतीय काव्य शास्त्र वस्तुनिष्ट प्रश्न / bhartiy kavy shaastr vstunisht

                       भारतीय काव्य शास्त्र वस्तुनिष्ट



• भारतीय काव्य लक्षण और व्याख्याकार – 


शब्दार्थो सहित काव्यम – भामह 

 तद्दोशौ शब्दार्थो सगुणावनलंकृति पुनःकवापि – मम्मट 

वाक्यं रसात्मक काव्यं- विश्वनाथ 

रमणीयार्थ प्रतिपादक : शब्द : काव्यम –पंडितराज जगन्नाथ


 • भारतीय संस्कृत काव्य ग्रन्थ एवं लेखक समयावधि 

 ग्रन्थ -               लेखक                        - समयावधि 


 नाटयशास्त्र – भरत मुनि - 2 सदी से 2सदी के मध्य तक

 काव्यालंकार – भामह – 6 वी० शती का मध्यकाल 

 काव्यादर्श - डंडी – 7 वी ० शती का उत्तरार्द्ध6 वी० शती का मध्यकाल 

 व्यालंकार सूत्र वृति – वामन - 8 से 9 वी शती के बीच 

काव्यालंकार सार संग्रह- उद्भट - 9 वी०शती का पूर्वार्द्ध 

 काव्यालंकार- रुद्रट – 9 वी० शती का पूर्वार्द्ध 

 ध्वन्यालोक- आनन्दवर्धन – 9 वी० शती का मध्यकाल 

 श्रृंगार तिलक – रूद्र भट्ट – 10 वी० शती 

 ध्वन्यालोकलोचन- अभिनव गुप्त – 10 – 11वी० शती 

 वक्रोतिजिवितम- कुतंक – 10 -11 वी० शती 

 व्यक्तिविवेक- महिम भट्ट – 11 वी० का मध्यकाल 

 काव्यप्रकाश- मम्मट – 11 वी० शती का उत्तरार्द्ध 

 औचित्यविचार चर्चा – क्षेमेन्द्र – 11 वी० शती का उत्तरार्द्ध 

 काव्यानुशासन – हेमचन्द्र – 12 वी० शती का 

 चंद्रलोक - जयदेव – १३ वी० शती का मध्यभाग 

 साहित्य दर्पण – विश्वनाथ – 14 वी० शती 

 रसगंगाधर- जगन्नाथ – 17 वी० शती का मध्य काल 


 • आधुनिक हिंदी साहित्य के ध्वनि शास्त्रीय ग्रन्थ और ग्रन्थकार – 

ग्रन्थ              - लेखक 


 काव्यकल्पद्रुम – सेठ कन्हैयालाल पोद्दार (आगे चलकर यही ग्रन्थ ‘रसमंजरी’ और ‘अलंकारमंजरी’ के रूप में प्रकाशित हुई )

 काव्यलोक, काव्यदर्पण – प० रामदहिन मिश्र (1942 ई०) 

ध्वन्यालोक – आ० विश्वेवर (1950 ई०) 

नवरस – बावू गुलाब राय 

 रस – विमर्श – डॉ राममूर्ति त्रिपाठी 

 रस मीमांसा – आ० रामचन्द्र शुक्ल 

 रस सिद्धांत – डॉ नगेन्द्र 


 • ध्वनी के भेद और भेद्कार मान्य संख्या 

 सिद्धांतकार - भेद मान्य 

 आन्दबर्धन – 3 (ध्वनि, गुणी भुत, चित्र ) 

अभिनवगुप्त – 35 

भोजराज – 3 

मम्मट – 51


 • ध्वनी के भेद और भेद्कार मान्य संख्या

 सिद्धांतकार - भेद मान्य 

 भरत - 8 

 भोज - 12 


रस के आधुनिक हिन्दी आचार्य के भेद और भेद्कार मान्य संख्या 

 ग्रन्थ - लेखक 

 नवरस – बावू गुलाब राय 

 रस विमर्श – डॉ राममूर्ति त्रिपाठी 

 रस मीमांसा – आ० रामचन्द्र शुक्ल 

 रस सिद्धांत – डॉ नगेन्द्र 


 • काव्य रस – रंग – देवता 

 श्रृंगार – श्याम – विष्णु 

हास्य – श्वेत – प्रमथ 

 करुण – कपोत रंग – यम 

 रौद्र – रक्त – रूद्र 

 वीर – गौर – महेन्द्र 

भयानक – कृष्ण रंग – काल

 वीभत्स – नीला – महाकाल 

अद्भुत – पीत - ब्रह्मा 


 • भारतीय काव्य सिध्दांत एवं उनके प्रवर्तक 

 सिध्दांत - लेखक - समयावधि 

 रस सिध्दांत- भरत - 2 सदी से 2सदी के मध्य तक 

अलंकार सिध्दांत – भामह - 6 वी० शती का मध्यकाल 

रीति सिध्दांत- वामन - 6 वी० शती का मध्यकाल 

ध्वनिसिध्दांत- आनन्दवर्धन – 9 वी० शती का मध्यकाल 

वक्रोक्ति सिध्दांत- कुतंक -10 -11 वी० शती 

औचित्य सम्प्रदाय- क्षेमेन्द्र - 11 वी० शती का उत्तरार्द्ध



                               हमारी अन्य लेख - भक्तिकाव्य : हिंदी साहित्य का स्वर्ण

                                                         

                                                              भक्तिकाव्य : वस्तुनिष्ट काव्य शास्त्र


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Saturday, September 27, 2025

भक्तिकाव्य : वस्तुनिष्ट प्रश्न /bhktikavy : vstunisht prshn

 भक्तिकाव्य : हिन्दी साहित्य का स्बर्ण 

 वस्तुनिष्ट प्रश्नोत्तरी – •

.  - रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार भक्तिकाल का समयावधि 1375 से संवत् 1700 तक (1318 ई० से 1643 ई० तक)

 • अपने पौरुष से हताश जाति के लिए भगवान की भक्ति और करुणा की ओर ध्यान ले जाने के अतिरिक्त दूसरा मार्ग ही क्या है | कथन है – रामचन्द्र शुक्ल का |

 • भारतबर्ष में भक्ति का उदय ईसाई धर्म की गरिमा का अहंकार है – कथन है – यूरोपीय विद्वानों का 

| • भक्ति आंदोलन को ईसाई यत की देन माननेवाले – जाँज ग्रिर्यसन 

- दक्षिण भारत में भक्ति आन्दोलन में कितने आलवर संत कवि थे – 12

 - दक्षिण भारत के महिला भक्ति आन्दोलन के संत का नाम – आन्दल -

 निर्गुण धारा के प्रवर्तक भक्त आचार्य – नामदेव

 - हिन्दी में भक्ति साहित्य की परम्परा की शुरुआत – नामदेव से 

 - भक्ति का सर्बप्रथम उल्लेख किस ग्रन्थ में है – श्वेताश्वेतर उपनिषद 

 - ‘भक्ति’ शब्द की व्युत्पति ‘भज्’धातु से माना जाता है – मोनियर विलियम्स

 - भक्तिकाल का समय – 14 वी० शती के मध्य से 17 वी० शती के मध्य तक 

 - मराठी भाषा में अभंगों के रचनाकार – नामदेव 


अन्य लेख - भक्तिकाव्य हिन्दी साहित्य का स्वर्ण

 

भक्तिकाव्य हिंदी साहित्य का स्वर्ण / bhaktikavy hindi sahity ka svrn

 


                                     HkfDrdkO; fgUnh lkfgR; ds  Lo.kZ

     

भक्तिकाव्य आर्य जाति के लिए कंचन की अपरिमिति राशि से भी मूल्यवान सिद्ध हुआ है | क्योंकि भक्तिकाव्य में सूरसागर , रामचरितमानस , पद्यमावत, जैसे मणिरत्न ग्रन्थ हैं |  इसी  के प्रभाव के कारण भक्तिकाल को हिंदी साहित्य का स्वर्णकाल कहा जाता है जिनकी लक्षण निम्न प्रकार हैं –


(1)  काव्य सम्बन्धी दृष्टि कोण की उदात्तता  – भक्तिकालीन काव्य या साहित्यकार की काव्य संबंधी दृष्टि  कोण  उदात्तता  से परिपूर्ण हैं | ये भक्ति कवि  अपने काव्य  में न जन का गुणगान किया है न किसी आश्रयदाता राजा का बल्कि  काव्य आत्मप्रेरणा से उत्त्पन्न हुई हैं | के काव्य स्वान्त  सुखाय से सर्व जन  सुखाय की ओर बढ़ी हैं | इस साहित्य में निर्विकार भाव से सत्य, उत्साह, आह्लाद और आनन्द की प्राप्ति  होती है |


(2) भावपछ तथा कलापछ की मणिकांचन  योग -   भक्तिकाव्य में विषय, व अनुभूति तथा अभिव्यक्ति और कलापछ एक दुसरे से घुल –मिल गये हैं | कविता जन मानस के ह्रदय में ऐसा भाव पैदा करती है की कवि  ही नहीं रचना भी  पाठक के लिए आदर्श हो जाती है | इस साहित्य का परम्परा भी विशाल है जिसमें कवीर – जायसी, मीरा, रसखन, हितवंश, सुरदास, नन्ददास, नानक जैसे भिन्न सम्प्रदाय के कवि  हैं और सभी कला व विषय से मानव हित की  सहयोगी  हैं |


(3) भारतीय संस्कृति का सम्यक निरुपण – भक्तिकाव्य भारतीय संस्कृति का भंडार हैं |यहाँ धर्म दर्शन सभ्यता संस्कृति व्यवहार,आचार – विचार, सभी पूर्णतया से सुरक्षित हैं | काव्य –हिन्दू, मुस्लिम,  ईसाई, सिक्ख भिन्न सम्प्रदायों के मूल धर्म की संस्कृति को मानव जीवन के समक्ष उपस्थित करती हैं | काव्यों में नायक साधारण आम जन नहीं,  बल्कि अलौकिक  व्यक्ति के रूप में हैं | काव्य आधुनिक और आने वाले युग के अमूल्य, प्रेरक, उद्धरिक के रूप में है | सम्पूर्ण भक्ति साहित्य जगजीवन के लिए प्रात: कालीन स्मरणीय है |

4, संगीतात्मकता का सन्निवेश – काव्यों  में संगीतात्मकता के तत्व आत्माभिव्यंजना, तीव्रानुभूति, सहज स्फूर्ति, अन्त प्रेरणा आदि सन्निवेश हैं | इसमें भावों या विषयों का भाषा के साथ अभिव्यंजना योग है | भक्तिकाव्य का सृजन आदिकाल में हुआ परन्तु प्रादुर्भाव भक्तिकाल में हुआ | इसी युग में सुरदास, तुलसी, कबीर, मीरा, नन्ददास, नानक आदि रसिक कवि हुए |


5, काव्यों की विविधता  – काव्य के रूपों के दृष्टि से आधुनिककाल श्रेष्ठ हैं पर  भक्तिकाल की तुलना में न्यून ही है  | भक्तिकाल में ही प्रबंधकाव्य, मुक्तककाव्य,  सूक्तिकाव्य,गीतकाव्य, जीवनचरित, गद्यकाव्य, संगीतकाव्य,  उपदेशकाव्य प्रर्याप्त मात्रा में लिखे गये | अत: काव्य रूपों की दृष्टि से भक्तिकाव्य काफी समृद्ध हैं |


6, लोकमंगल व लोकरंजन का प्राधान्य – भक्तिकाव्य मानव जीवन का काव्य है | यह काव्य मानव लोकमंगल के साथ लोकरंजन को प्राप्त करवाती है | भक्तिकाव्य मन, ह्रदय और आस्था की भूख को एक साथ शांत करती हैं | क्योंकि इन काव्यों में  सौन्दर्यता, आत्मयित्ता के उपादान उच्चकोटि के हैं |


7,  भाषागत वैशिष्ट्य – भक्तिकाव्य में अवधि और ब्रजभाषा दोनों ही भाषा चरमसीमा में पहुँच गयी | भक्तिकाव्य में भाषा का मार्जित और कव्योपयोगी शब्द ही प्रयुक्त हुए हैं | रीतिकाल में ब्रजभाषा के प्रति काफी खिलवाड़ किया गया है | शब्द के प्रति काफी कलाबाजी की गयी है | कहने का मतलब है भक्तिकाल की भाषा रीतिकाल या अन्य काल की भाषा की तुलना में साधू रूप में है |


                 इस प्रकार के लक्षणों को देखते हुए भक्तिकाल को हिन्दी साहित्य का स्वर्णयुग कहा गया है | 




अन्य लेख -        चंदबरदाई







अमीर खुसरो के दोहे, मुकरियाँ और गीत /amir khsro ke dohe mukriyan or geet

                                         अमीर खुसरो के दोहे, मुकरियाँ और गीत   1.      एक नार किया -----------------------------------...