Tuesday, December 20, 2022

INSTITUTIONAL VISION AND LEADERSHIP :

   6.1   INSTITUTIONAL VISION AND LEADERSHIP :-

 

Q 6.1.1 – THE GOVERNENCE----------- THE INSTITUTION.

ANSWER -  … AS BELOW –

-        SEMINARS -: ducoments

-        QUIZ-: ducoments

-        DEBATES-: ducoments

-        INTER-COLLEGE COMPITIONS-: ducoments ducoments

-        WORKSHOP-: ducoments

-        ANNUAL COLLEGE DAY-: ducoments

-        ANNUAL COLLEGE SPORTS-: ducoments

-        CALTURAL PROGRAMES-: ducoments

-        E-LIBERIEY-: ducoments –

·      Science –

-         BOTANY

-        Physics

-        ZOOLOGY

-        CHMIESTRY

-        ZEOLOGY

-        COMPUTER

-        MATHEMATICS

·      ARTS –

-        ENGLISH

-        HINDI

-        SANSKRIT

-        ECONOMICS

-        PLITICAL SCIENCE

-        GEOGRAPHY

-        SOCILOGY

-        PSYCOLOGY

-        P. P. G.

-        KURMALI

-        MUNDARI

-        PHILOSOPHY

-        HISTORY

·      COMMERCE

 

 

Q 6.2.2 THE FUNCTIONING ----               ETC.

ANSWERS-  AS BELOW –

·      PRINCIPAL

 

·      BURSOR

 

 

·      DEPARTMENTAL HEADS-

       Science –

-        HEAD OF BOTANY

-        HEAD OF Physics

-        HEAD OF ZOOLOGY

-        HEAD OF CHMIESTRY

-        HEAD OF ZEOLOGY

-        HEAD OF COMPUTER

-        HEAD OF MATHEMATICS

    ARTS –

-        HEAD OF ENGLISH

-        HEAD OF HINDI

-        HEAD OF SANSKRIT

-        HEAD OF ECONOMICS

-        HEAD OF PLITICAL SCIENCE

-        HEAD OF GEOGRAPHY

-        HEAD OF SOCILOGY

-        HEAD OF PSYCOLOGY

-        HEAD OF TRL

-        HEAD OF PHILOSOPHY

-        HEAD OF HISTORY

   COMMERCE-

-        HEAD OF COMMERCE

 

·      TEACHING ASSOCIATION -:

·      NON-TEACHING ASSOCIATION -:

·      DEVELOPMENT COMMITTEE -:

·      PLANNING BOARD -:

·      ACADEMIC COUNCIL -:

·      STAFF COUNCIL -:

·      PURCHASE COMMITTEE -:

·      NSS ADVISORY BOARD -:

·      SPORTS COMMITTEE -:

·      EXAMINATION COMMITTEE -:

·      VIGILANCE CELL -:

·      ANTI RAGGIN CELL -:

·      WOMAN’S CELL -:

·      GRIEVACE REDRESSAL CELL :-

·      RTI

 

Q 6.2.3 IMPLEMENTATION --------------OPERATION

ANSWER -   AS BELOW -

1.   ADMINISTRATON -:

2.  FINANCE AND ACCOUNTS -:

3.  STUDENTS ADMISSION AND SUPPORT -:

4.  EXAMINATION -:

Tuesday, November 22, 2022

पथ के साथी' की समीक्षा - डा० विद्याधर मेहता

                                               'पथ की साथी' की भूमिका 

           पथ की साथी' महादेवी वर्मा द्वारा लिखित संस्मरण है | इसमें ग्यारह लेखक-लेखिकाओं के जीवन व् व्यक्तित्व पर लिखा गया है | ये सभी लेखक-लेखिका महादेवी वर्मा के सान्निध्य में रहे हैं, फलस्वरूप वर्माजी पर इन लेखकों-लेखिकाओं का प्रभाव पड़ा है |

                                        ' पथ के साथी' में कौन-कौन से साहित्यकारों का नाम है -

                             1. दद्दा (मैथिली शरण गुप्त)

                              2. निराला भाई

  •                         3. स्मरण प्रेमचंद
  •                         4.  प्रसाद
  •                         5. सुमित्रानंदन पंत
  •                         6. सुभद्रा (कुमारी चौहान)
  •                         7. प्रणाम (रवींद्रनाथ ठाकुर)
  •                         8. पुण्य स्मरण (महात्मा गांधी)
  •                         9. राजेन्द्रबाबू (बाबू राजेन्द्र प्रसाद)
  •                        10. जवाहर भाई (जवाहरलाल नेहरू)
  •                         11. संत राजर्षि (पुरुषोत्तमदास टंडन)

                    

                                               मैथलीशरण गुप्त से महादेवी वर्मा की प्रेरणा 

     वर्मा जी ने गुप्तजी के काव्य को पढ़कर प्राचीन नारी की त्याग, तपस्या और श्रद्धा की भावना को आत्मसात करते हैं | स्वयं वर्माजी लिखते हैं - ''गुप्त जी की रचनाओं से मेरा जितना दीर्घकालीन परिचय है उतना उनसे नहीं। उनका एक चित्र, जिसमें दाढ़ी और पगड़ी साथ उत्पन्न हुई-सी जान पड़ती है, मैंने तब देखा जब मैं काफी समझदार हो गई थी। पर तब भी उनकी दाढ़ी देखकर मुझे अपने मौलवी साहब का स्मरण हो आता था। यदि पहले मैंने वह चित्र देखा होता तो, खड़ी बोली की काव्य-रचना का अंत उर्दू की पढ़ाई के समान होता या नहीं, यह कहना कठिन है।

     गुप्त जी के बाह्य दर्शन में ऐसा कुछ नहीं है जो उन्हें असाधारण सिद्ध कर सके। साधारण मझोला कद, साधारण छरहरा गठन, साधारण गहरा गेहुआं या हल्का सांवला रंग, साधारण पगड़ी, अंगरखा, धोती, या उसकी आधुनिक सस्करण, गांधी टोपी, कुरता-धोती और इस व्यापक भारतीयता से सीमित सांप्रदायिकता का गठबंधन-सा करती हुई तुलसी कंठी।"


                                                     निराला से महादेवी की प्रेरणा 

      महादेवी जी ने निराला के जीवन और व्यक्तित्व से सरलता, सादगी, साहस, कष्ट निवारक, सहयोगिता, विश्वास, आत्मीयता, संघर्ष, कर्मठता की भावना को ग्रहण की है, लिखते हैं- "निराला जी अपने शरीर, जीवन, और साहित्य सभी में असाधारण हैं। उनमें विरोधी तत्वों की भी सामंजस्यपूर्ण संधि है। उनका विशाल डीलडौल देखने वाले के हृदय में जो आतंक उत्पन्न कर देता है उसे उनके मुख की सरल आत्मीयता दूर करती चलती है।
         उनकी दृष्टि में दर्प और विश्वास की धूपछाँही द्वाभा है। इस दर्प का संबंध किसी हल्की मनोवृत्ति से नहीं और न उसे अहं का सस्ता प्रदर्शन ही कहा जा सकता है। अविराम संघर्ष और निरंतर विरोध का सामना करने से उनमें जो एक आत्मनिष्ठा उत्पन्न हो गई है उसी का परिचय हम उनकी दृप्त दृष्टि में पाते हैं। कभी-कभी यह गर्व व्यक्ति की सीमा पार कर इतना सामान्य हो जाता है कि हम उसे अपना, प्रत्येक साहित्यकार का या साहित्य का मान सकते हैं, इसी से वह दुर्वह कभी नहीं होता। जिस बड़प्पन में हमारा भी कुछ भाग है वह हममें छोटेपन की अनुभूति नहीं उत्पन्न करता और परिणामत: उससे हमारा कभी विरोध नहीं होता।
        निराला जी की दृष्टि में संदेह का वह पैनापन नहीं जो दूसरे मनुष्य के व्यक्त परिचय का अविश्वास कर उसके मर्म को वेधना चाहता है। उनका दृष्टिपात उनके सहज विश्वास की वर्णमाला है। वे व्यक्ति के उसी परिचय को सत्य मान कर चलते हैं जिसे वह देना चाहता है और अंत में उस स्थिति तक पहुँच जाते हैं जहाँ वह सत्य के अतिरिक्त कुछ और नहीं देना चाहता।"


                                
                               



Sunday, November 20, 2022

हिंदी निबंध का अर्थ, प्रकार और विकास - डॉ विद्याधर मेहता

                                     निबन्ध का अर्थ, प्रकार और विकास 

   निबंध का अर्थ - 'निबंध' शब्द 'नि +बंध' से बना है । जिसका अर्थ है -  किसी विषय या वस्तु को अच्छी तरह से अर्थ और शब्दों में संगठित करके रखना ।          

विभिन्न विद्वानों के अनुसार निबंध की परिभाषा

डॉक्टर गुलाब राय के अनुसार-  "निबंध उस गद्य रचना को कहते हैं, जिसमें एक सीमित आकार के भीतर किसी विषय का वर्णन या प्रतिपादन एक विशेष निजीपन, स्वच्छंदता, सजीव, आवश्यक संगीत और संबद्धता के साथ किया गया हो।"

आचार्य शुक्ल के अनुसार - "यदि पद्य कवि की कसौटी है, तो निबंध गद्य की।"

पंडित श्यामसुंदर दास के अनुसार - "निबंध वह लेख है जिसमें किसी ग्रहण विषय पर विस्तार पूर्वक और  पांडित्यपूर्ण ढंग से विचार किया गया हो।"

विद्वानों के अनुसार निश्चित है कि - "निबंध की कोई एक खास सूत्र नहीं होती है इसमें विचारों की क्रमबद्धता  ज्ञान, विचार और व्यक्तित्व का अद्भुत संगम होता है।"


निबंध के प्रकार - निबंध के निम्न प्रकार हैं 

1. वर्णनात्मक निबंध

 2.  विवरणात्मक निबन्ध 

3. भावात्मक निबंध 

4. साहित्य या आलोचनात्मक निबंध

1. वर्णनात्मक निबंध-  इस प्रकार के निबन्ध में विषय वस्तु  प्रधान  होता  है । जैसे -  तीर्थ, यात्रा, नगर,  दृश्य, पर्व-त्यौहार, मेला, कोई दर्शनीय स्थल आदि । इन सभीको  वस्तु या विषय कहा जाता है। यह विषय-वस्तु , दृश्य, घटनाओं तथा स्थलों आदि होते हैं। इस प्रकार की निबंध में निरूपण और व्याख्या की प्रधानता होती है।

2. विवरणात्मक निबन्ध-  इस प्रकार की निबंध को कथात्मक  अथवा आख्यात्म्क निबंध भी जाता है। इसमें कल्पना और अनुभव की प्रधानता होती है । विवरणात्मक निबंध की विषय वस्तु मुख्यतः जीवनी, कथाएं, घटनाएं, पुरातत्व, इतिहास, अन्वेषण, आखेट, युद्ध आदि विषयों पर आधारित होती है । ये निबंध व्यास शैली में लिखे जाते हैं ।

3, भावात्मक निबंध - इस प्रकार की निबंध में बुद्धि के अपेक्षा  राग-वृत्ति की प्रधानता होती है । जिनका संबंध हृदय से होती है।अनुभूति मनोभावों की अतिशयोक्ति अभिव्यंजना  इन निबंध में देखी जाती है ।  इस निबंध में निबंधकार सहृदयता, प्रेम, करुणा, दया आदि भावनाओं से युक्त अपने व्यवहार को प्रकट करते हैं।

 4. साहित्य या आलोचनात्मक निबंध-  किसी साहित्यकार या साहित्य रचना के प्रति लिखी जाने वाली निबंध साहित्य या  आलोचनात्मक निबंध कहलाती है, जैसे- मुंशी प्रेमचंद, तुलसीदास, आधुनिक हिंदी कविता,  छायावाद हिंदी साहित्य का स्वर्ण युग आदि हैं । इस प्रकार की निबंधों में ललित निबंध भी आते हैं । हिंदी निबंधों की भाषा काव्यात्मक और रसात्मक होती है । ऐसे निबंध शोध-पत्र के रूप में अधिक लिखे जाते हैं।

हिंदी निबंध का उद्भव और विकास-

       आधुनिक हिंदी गद्य विधा में निबंध का महत्वपूर्ण स्थान है। इसका विकास सर्वप्रथम सदा सुख लाल और राजा शिवप्रसाद सितारे हिंद से माना जाता है, इसी परम्परा में  इसकी निश्चित, व्यवस्थित, विकास को सूत्रपात करने का श्रेय भारतेंदु हरिश्चंद्र और उनके साहित्य मंडली निबंधकारों को जाता है।

                हिंदी निबंध के विकास यात्रा को चार युग  में बांट सकते हैं 

1 भारतेन्दु युग,  2 द्विवेदी युग, 3. शुक्ल युग  4. शुक्लोत्तर युग

1. भारतेंदु युग -  इस युग का विकास 1867 ईस्वी से 1900 ईसवी तक मानी जाती है । इस युग में गद्य की अन्य विधाओं के साथ भारतीय साहित्य में  हिंदी निबंध का भी सूत्रपात और विकास होता है। इस युग के प्रमुख निबंध कारों में भारतेंदु हरिश्चंद्र, प्रताप नारायण मिश्र,  बालकृष्ण भट्ट,  बद्रीनारायण चौधरी प्रेमघन,  श्रीनिवास दास आदि है । इनमें से भारतेंदु हरिश्चंद्र हिंदी गद्य विधा के जन्मदाता हैं, इन्हें समाज, राजनीति, धर्म, इतिहास, साहित्य आदि विषयों पर निबंध लिखा। इस के पश्चात बालकृष्ण भट्ट जी, भारतेंदु युग के सर्वश्रेष्ठ निबंधकार माने जाते हैं । भट्ट जी  हिंदी पत्रिका "प्रदीप" का संपादन किया था। इनके निबंध विचारात्मक और भावात्मक दोनों प्रकार के होते हैं  । बालकृष्ण भट्ट के पश्चात प्रताप नारायण मिश्र इस युग के  प्रसिद्ध निबंधकार हुए । मिश्र जी के निबंधों में स्वच्छंद एवं मस्त जीवि होती थी। इनकी प्रसिद्ध पत्रिका का नाम "ब्राह्मण" था । इनके निबंध 'मिश्र  ग्रंथावली' में संकलित हैं। उनके निबंधों में मनोरंजन तथा व्यंग मुख्य विशेषताएं हैं । समग्र रूप से कहा जा सकता है कि भारतेंदु युग  के निबन्धों में हास्य-व्यंग, देश-प्रेम, समाज-सुधार और मनोरंजन जैसी विशेषताएं मिलती थी ।

2. द्विवेदी  युग-  यह युग 1900  से 1920 ईस्वी तक मानी जा सकती है । इस युग के प्रमुख निबंध कारों में से महावीर प्रसाद द्विवेदी हैं । और अन्य निबंधकारों में चंद्रधर शर्मा गुलेरी, पदम सिंह शर्मा, बालमुकुंद गुप्त, गोविंद नारायण मिश्र, श्यामसुंदर दास, सरदार पूर्ण सिंह आदि हैं । इस युग में भारतेंदु युग की अपेक्षा निबंधों का क्षेत्र काफी व्यापक रहा। यहां विचारात्मक, भावात्मक के साथ-साथ आलोचनात्मक निबंध मिलती है।

3. शुक्ल युग -  यह युग 1921 ईस्वी से 1940 ईस्वी तक मानी जाती है । शुक्ल युग में निबंध का विकास भारतेंदु युग,  द्विवेदी युग की अपेक्षा और ही व्यापक हुई । यहां पूर्व युगों की साहित्यिक विशेषताओं के साथ-साथ मनोवैज्ञानिक, साहित्यिक एवं आलोचनात्मक निबंध लिखे गए । इस युग के प्रमुख निबंध कारों में से रामचंद्र शुक्ल, बाबू गुलाब राय, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, शांति प्रिय द्विवेदी, महादेवी वर्मा,  राहुल सांकृत्यायन, श्रीराम शर्मा, सियाराम शरण गुप्त, डॉ रघुवीर सिंह आदि प्रमुख निबंधकार हुए। एक प्रकार से यह युग निबंध साहित्य को लेकर हिंदी साहित्य का स्वर्ण युग माना जाता है।

4, शुक्लोत्तर युग- इस युग की अवधि 1940 से अब तक मानी जाती है । इस युग के प्रमुख निबंध कारों में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, वासुदेव शरण अग्रवाल, आचार्य नंददुलारे भाजपाई, डॉ नगेंद्र, भगत शरण उपाध्याय, जैनेंद्र, रामविलास शर्मा, प्रभाकर माचवे,  इंद्रनाथ मदान, डॉ सत्येंद्र, डॉ विद्यानिवास मिश्र,  धर्मवीर भारती, नामवर सिंह, शिवपसाद सिंह, श्रीलाल शुक्ल, कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर, हरिशंकर परसाई, कुबेरनाथ राय,  विवेकी राय आदि है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी ने इस युग में सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना के निबंध लिखें। इनके अलावा विद्यानिवास मिश्र ने ललित निबंध की नई मार्ग प्रशस्त किया।

निष्कर्ष -  इस प्रकार से हिंदी निबंध का विकास भारतेन्दु युग से शुरू होकर शुक्लोत्तर युग तक पहुंच गई है और इसकी विकास अनवरत आगे भी होती रहेगी । निबंध विधा हिंदी साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा है।


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                        - विद्यापति का जीवन परिचय

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Friday, October 14, 2022

कवि और कविता निबन्ध की समीक्षा - डा० विद्याधर

                                                        ' कवि और कविता' निबन्ध की समीक्षा                            


                             निबंधकार -  आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी 
भूमिका - 

      'कवि और कविता ' निबन्ध हिंदी साहित्य के आधुनिक काल के द्विवेदीजी युगीन प्रतिनिधि निबन्धकार आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदीजी के द्वारा रचित है | इस निबन्ध में निबन्धकार ने 'कवि' और 'कविता' के परिचय , कार्य, गुण, प्रवृति व् विशेषताओं को स्पष्ट की है जिससे 'कवि' और 'कविता' की सार्थकता , उदेश्यता, महत्त्व की लक्ष्य प्राप्ति में सफलता आती है | निबन्ध 'कवि और कविता' सरस्वती पत्रिका में संकलित है | 


महावीर प्रसाद द्विवेदी का जीवन व् साहित्यिक परिचय - 

       'कवि और कविता' के निबन्धकार का जन्म उत्तरप्रदेश के रायबरेली जिला के दौलतपुर नामक गाँव  में 15 मई 1864 ई० और मृत्यु 21 दिसम्बर 1938 ई० को हुई | पिता श्री रामसहाय द्विवेदीजी हैं | रामसहाय जी सेना में नौकरी करते थे | महावीर प्रसाद द्विवेदीजी भी रेलवे में नौकरी करते थे | नौकरी छोड़कर महावीर प्रसाद द्विवेदीजी सरस्वतीं पत्रिका का सम्पादन 1903 ई० किया | महावीर प्रसाद द्विवेदीजी ही ऐसे साहित्यकार हैं जिन्हें सर्वप्रथम आधुनिक काल में 'आचार्य ' की उपाधि मिली है | महावीर प्रसाद द्विवेदी जी  को नागरी प्रचारिणी सभा, काशी ने ''आचार्य'' की उपाधि दी है | साहित्य इतिहास के आधुनिक काल में ''द्विवेदी युग'' की नामकरण इन्हीं के नामों से स्थापित हुआ है | हिंदी साहित्य में द्विवेदीजी ही भारतेंदु के बाद सबसे अधिक कुशल विद्वान् निबन्धकार, आलोचक आदि हैं | इनकी साहित्यिक सेवा की सफलता के कारण ही द्विवेदी युग को ''पुनर्जागरण'' काल कहा गया है | द्विवेदीजी को साहित्य की सेवा के लिए 'वाचस्पति' पुरस्कार मिला है |

प्रमुख कृतियाँ - 

       'कवि और कविता' के रचनाकार हिंदी के महान साहित्यकार, पत्रकार, और युग प्रवर्तक थे | इनकी प्रमुख कृतियों में- नैषध चरित्र चर्चा (1899 ई.) तरुणोपदेश (अप्रकाशित), हिन्दी शिक्षावली तृतीय भाग की समालोचना(1901ई.), वैज्ञानिककोश (1906ई.), नाट्यशास्त्र (1912ई.), विक्रमांकदेवचरितचर्चा (1907ई.), हिन्दी भाषा की उत्पत्ति (1907ई.), सम्पति शास्त्र (1907ई.), कौटिल्य कुठार (1907ई.), कालिदास की निरकुंशता (1912ई.), वनिता-विलाप (1918ई.), औद्यागिकी (1920ई.). रसज्ञ रंजन (1920ई.), कालिदास और उनकी कविता (1920ई.), सुकवि संकीर्तन (1924ई.), अतीत स्मृति (1924ई.), साहित्य सन्दर्भ (1928ई.), अदभुत आलाप (1924ई.),  महिलामोद (1925ई.), आध्यात्मिकी (1928ई.), वैचित्र्य चित्रण (1926ई.), साहित्यालाप (1926ई.), विज्ञ विनोद (1926ई.), कोविद कीर्तन (1928ई.), विदेशी विद्वान (1928ई.), प्राचीन चिह्न (1929ई.), चरित चर्या (1930ई.), पुरावृत्त (1933ई.), दृश्य दर्शन (1928ई.), आलोचनांजलि (1928ई.), चरित्र चित्रण (1929ई.), पुरातत्त्व प्रसंग (1929ई.), साहित्य सीकर (1930ई.),  विज्ञान वार्ता (1930ई.),  वाग्विलास (1930ई.), संकलन (1931ई.), विचार-विमर्श (1931ई.) आदि हैं |

   प्रमुख निबन्धों में- म्युनिशिपैलिटी के कारनामें, भाषा और व्याकरण, प्रभात, आत्म-निवेदन, उपन्यास रहस्य, नेपाल, आगरे की शाही इमारतें, कवि बनने के लिए सापेक्ष साधन, नाट्यशास्त्र सम्पत्तिशास्त्र आदि हैं |

निबन्ध 'कवि और कविता की समीक्षा -

     - कवि के सम्बन्ध में परिचय -

      आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदीजी ने 'कवि' के सम्बन्ध में परिचयात्मकता  के तौर पर स्पष्ट किया है कि- 'कवि' होना किसी मनुष्य का गुण है | यह गुण किसी मनुष्य में जन्मजात प्राप्त होती है | आचार्य  द्विवेदीजी का मानना है कि मनुष्य में कवि गुण प्रतिभा से होती है और प्रतिभा ईश्वर प्रदत है |

- कवि के कार्य व् मनोवृति -

     आचार्य महावीर जी ने कवि के कार्य व् मनोवृति को निर्धारित करते हुए स्पष्ट किया है कि- 'कवि' अपने मनोभाव को कविता में स्वाधीनता पूर्वक प्रकट करे | यदि कवि स्वाधीनता त्यागकर मनोभाव को कविता में प्रकट किया तो कविता का असर मनुष्य और समाज के बीच कम हो जाता है | इस सम्बन्ध में द्विवेदी जी "कवि और कविता' शीर्षक निबन्ध में लिखते हैं- 'कवि का काम है कि वह अपने मनोभावों को स्वाधीनता पूर्वक प्रकट करें। पर काफिया और वजन उसकी स्वाधीनता में विघ्न डालते हैं। वे उसे अपने भावों को स्वतंत्रता से नहीं प्रकट करने देते। काफिए और वजन को पहले ढूँढ़कर कवि को अपने मनोभाव तदनुकूल गढ़ने पड़ते हैं। इसका मतलब यह हुआ कि प्रधान बात अप्रधानता को प्राप्त हो जाती है। और एक बहुत ही गौण बात प्रधानता के आसन पर जा बैठती है। फल यह होता है कि कवि की कविता का असर कम हो जाता है। जो बात एक असाधारण और निराले ढंग से शब्दों के द्वारा इस तरह प्रकट की जाय, कि सुननेवालों पर उसका कुछ न कुछ असर जरूर पड़े, उसका नाम कविता है। आजकल हिंदी के पद्य-रचयिताओं में कुछ ऐसे भी हैं जो अपने पद्यों को कालिदास, होमर और बाइरन की कविता से भी बढ़कर समझते हैं। कोई संपादक के खिलाफ नाटक, प्रहसन और व्यंगपूर्ण लेख प्रकाशित करके अपने जी की जलन शांत करते हैं। कवि को ऐसी कार्य व् मनोवृति से सचेत रहना चाहिए |

- कवि के गुण नई-नई बातों को सुझाना -

कवि का सबसे बड़ा गुण नई नई बातों का सूझना है। उसके लिये इमैजिनेशन (imagination) की बड़ी जरूरत है। जिसमें जितनी ही अधिक यह शक्ति होगी वह उतनी ही अच्छी कविता कर सकेगा। कविता के लिये उपज चाहिए। नए नए भावों की उपज जिसके हृदय में नहीं होती वह कभी अच्छी कविता नहीं कर सकता। ये बातें प्रतिभा की बदौलत होती हैं, इसलिये संस्कृतवालों ने प्रतिभा को प्रधानता दी है। प्रतिभा ईश्वरदत्त होती है, अभ्यास से वह नहीं प्राप्त होती। इस शक्ति को कवि माँ के पेट से लेकर पैदा होता है। उसी की बदौलत वह भूत और भविष्यत् को हस्तामलकवत् देखता है।  वर्तमान की तो कोई बात ही नहीं। इसी की कृपा से वह सांसारिक बातों को एक अजीब निराले 
ढंग से बयान करता है, जिसे सुनकर सुननेवाले के हृदयोदधि में नाना प्रकार के सुख, दुःख, आश्चर्य आदि विकारों की लहरें उठने लगती हैं। कवि कभी कभी ऐसी अद्भुत बातें कह देते हैं कि जो कवि नहीं हैं उनकी पहुँच वहाँ तक कभी हो ही नहीं सकती।


-कवि की प्रतिभा व् मनोभाव -

निबन्धकार 'कवि' के प्रतिभा और मनोभाव के प्रति सचेत करते लिखते हैं - "यह बात सिद्ध समझी गई है कि कविता अभ्यास से नहीं आती। जिसमें कविता करने का स्वाभाविक माद्दा होता है वही कविता कर सकता है। देखा गया है कि जिस विषय पर बड़े बड़े विद्वान् अच्छी कविता नहीं कर सकते उसी पर अपढ़ और कम उम्र के लड़के कभी कभी अच्छी कविता लिख देते हैं। इससे स्पष्ट है कि किसी किसी में कविता लिखने की इस्तेदाद स्वाभाविक होती है, ईश्वरदत्त होती है। जो चीज ईश्वरदत्त है वह अवश्य लाभदायक होगी। वह निरर्थक नहीं हो सकती। उससे समाज को अवश्य कुछ न कुछ लाभ पहुँचता है।"


- कवि के लिए महत्त्व और विशेषता -

      महान समालोचक द्विवेदीजी कवि के महत्त्व, प्रवृति व् विशेषता पर कहते हैं कि -  ''अच्छे कवि के लिए प्रकृति परख, प्रकृति पर्यालोचक, मानव स्वभाव के समालोचक व् प्रभावोत्पादक, शब्द-संस्थापक होना चाहिए | इस सम्बन्ध में द्विवेदी जी "कवि और कविता' शीर्षक निबन्ध में लिखते हैं- कवि का काम है कि वह प्रकृति-विकास को खूब ध्यान से देखे। प्रकृति की लीला का कोई ओर छोर नहीं। वह अनंत है। प्रकृति अद्भुत अद्भुत खेल खेला करती है। एक छोटे से फूल में वह अजीब अजीब कौशल दिखलाती है। वे साधारण आदमियों के ध्यान में नहीं आते। वे उनको समझ नहीं सकते, पर कवि अपनी सूक्ष्म दृष्टि से प्रकृति के कौशल अच्छी तरह से देख लेता है; उनका वर्णन भी वह करता है, उनसे नाना प्रकार की शिक्षा भी ग्रहण करता है और अपनी कविता के द्वारा संसार को लाभ पहुँचाता है। जिस कवि में प्राकृतिक दृश्य और प्रकृति के कौशल देखने और समझने का जितना ही अधिक ज्ञान होता है वह उतना ही बड़ा कवि भी होता है। प्रकृति-पर्यालोचना के सिवा कवि को मानव-स्वभाव की आलोचना का भी अभ्यास करना चाहिए। मनुष्य अपने जीवन में अनेक प्रकार के सुख-दुःख आदि का अनुभव करता है। उसकी दशा कभी एक सी नहीं रहती। अनेक प्रकार के विकार-तरंग उसके मन में उठा ही करते हैं। इन विकारों की जाँच, ज्ञान और अनुभव करना सबका काम नहीं। केवल कवि ही इनके अनुभव कराने में समर्थ होता है। जिसे कभी पुत्र-शोक नहीं हुआ उसे उस शोक का यथार्थ ज्ञान होना संभव नहीं। यदि वह कवि है तो वह पुत्र शोकाकुल पिता या माता की आत्मा में प्रवेश सा करके उसका अनुभव कर लेता है। उस अनुभव का वह इस तरह वर्णन करता है कि सुननेवाला तन्मनस्क होकर उस दुःख से अभिभूत हो जाता है। उसे ऐसा मालूम होने लगाता है कि स्वयं उसी पर वह दुःख पड़ रहा है। जिस कवि को मनोविकारों और प्राकृतिक बातों का ययेष्ट ज्ञान नहीं होता वह कदापि अच्छा कवि नहीं हो सकता। 


- कविता को प्रभावोत्पादकता के लिए -

कविता को प्रभावोत्पादक बनाने के लिये उचित शब्द-स्थापना की भी बड़ी जरूरत है। किसी मनोविकार या दृश्य के वर्णन में ढूँढ़ ढूँढ़कर ऐसे शब्द रखने चाहिएँ जो सुननेवालों की आँखों के सामने वर्ण्य विषय का एक चित्र सा खींच दे। मनोभाव चाहे कैसा ही अच्छा क्यों न हो, यदि वह तदनुकूल शब्दों में न प्रकट किया गया, तो उसका असर यदि जाता नहीं रहता तो कम जरूर हो जाता है। इसी लिये कवि को चुन चुनकर ऐसे शब्द रखना चाहिए, और इस क्रम से रखना चाहिए, जिससे उसके मन का भाव पूरे तौर पर व्यक्त हो जाय। उसमें कसर न पड़े। मनोभाव शब्दों ही द्वारा व्यक्त होता है। अतएव सयुक्तिक शब्दस्थापना के बिना कवि की कविता तादृश हृदयहारिणी नहीं हो सकता जो कवि अच्छी शब्दस्थापना करना नहीं जानता, अथवा यों कहिए कि जिसके पास काफी शब्द-समूह नहीं है, उसे कविता करने का परिश्रम ही न करना चाहिए। जो सुकवि हैं उन्हें एक एक शब्द की योग्यता ज्ञात रहती है। वे खूब जानते हैं कि किस शब्द में क्या प्रभाव है। अतएव जिस शब्द में उनका भाव प्रकट करने की एक बाल भर भी कमी होती है उसका वे कभी प्रयोग नहीं करते।"


- कविता की परिचय - 

फिर निबन्धकार द्विवेदीजी ने 'कवि और कविता' शीर्षक निबन्ध में 'कविता' के परिचय, कार्य, गुण, प्रवृति व् विशेषताओं को स्पष्ट की है जिससे 'कवि' और 'कविता' की सार्थकता, उदेश्यता, की लक्ष्य प्राप्ति में सफलता आती है | 

निबन्धकार ने 'कविता' के परिचयात्मकता पर विचार करते लिखते हैं-'कविता' वास्तविक और अवास्तविक दोनों होती है, जो कविता वास्तविक होती है वह चिरकाल तक जीवित रहती है और जो अवास्तविक होती है वह कुछ दिनों के बाद ही समाज और लोगों के जुबान से लुप्त हो जाती है | निबंधकार ने कविता को वास्तविकता के लिए यथार्थ, देशकाल, परिवेश को चित्रण करते हुए से युक्त माना है | इस सम्बन्ध में निबंधकार लिखते हैं - अच्छी कविता की सबसे बड़ी परीक्षा यह है कि उसे सुनते ही लोग बोल उठे कि सच कहा है। वही कवि सच्चे कवि हैं जिनकी कविता सुनकर लोगों के मुँह से सहसा यह उक्ति निकलती है। ऐसे कवि धन्य हैं; और जिस देश में ऐसे कवि पैदा होते हैं वह देश भी धन्य है। ऐसे ही कवियों की कविता चिरकाल तक जीवित रहती है।


- कविता का महत्त्व - 

'कवि और कविता' में  'कविता' की महत्त्व, विशेषता निर्धारित किया है, कवि कहते है कि कविता के माध्यम से मनुष्य और समाज के बीच विभिन्न राग, रस पैदा की जा सकती है | निबन्धकार लिखते हैं -  ''अच्छी कविता सुनकर कविता-गत रस के अनुसार, दुःख, शोक, क्रोध, करुणा, जोश आदि भाव पैदा हुए बिना नहीं रहते। और जैसा भाव मन में पैदा होता है, कार्य के रूप में फल भी वैसा ही होता है। हम लोगों में, पुराने जमाने में भाट, चारण आदि अपनी कविता ही की बदौलत वीरों में वीरता का संचार कर देते थे। पुराणादि में कारुणिक प्रसंगों का वर्णन सुनने और उत्तररामचरित आदि दृश्य काव्यों का अभिनय देखने से जो अश्रुपात होने लगता है वह क्या है? वह अच्छी कविता ही का प्रभाव है।''


- कविता में असलियत होना चाहिए -

'कवि और कविता' में निबन्धकार कहते हैं कि- 'कविता' में  असंभव को संभव करने,  अमीरों की खुशामद करने,  अपरिमित भाव, सच्चाई और इतिहास, सादगी, असलियत और जोश, स्वाभाविकता आदि होती है | कविता में प्रमाणिक भाषा, कविता का प्रधान धर्म मनोरंजकता और प्रभावोत्पादकता,  कवियों के विचार-स्वातंत्र्य के भाव होनी चाहिए | निबन्धकार "कवि और कविता' शीर्षक निबन्ध में 'कवि' और 'कविता' के सम्बन्ध में लिखते हैं - ''सादगी, असलियत और जोश, यदि ये तीनों गुण कविता में हों तो कहना ही क्या है। परंतु बहुधा अच्छी कविता में भी इनमें से एक आध गुण की कमी पाई जाती है। कभी कभी देखा जाता है कि कविता में केवल जोश रहता है, सादगी और असलियत नहीं। परंतु बिना असलियत के जोश का होना बहुत कठिन है। अतएव कवि को असलियत का सबसे अधिक ध्यान रखना चाहिए।

अच्छी कविता की सबसे बड़ी परीक्षा यह है कि उसे सुनते ही लोग बोल उठे कि सच कहा है। वही कवि सच्चे कवि हैं जिनकी कविता सुनकर लोगों के मुँह से सहसा यह उक्ति निकलती है। ऐसे कवि धन्य हैं; और जिस देश में ऐसे कवि पैदा होते हैं वह देश भी धन्य है। ऐसे ही कवियों की कविता चिरकाल तक जीवित रहती है।''


- 'कवि और कविता' निबन्ध की कला योजना -

'कवि और कविता' में भाषा परिमार्जित, व्याकरण सम्मत है | शब्द शुद्ध हिंदी अभिधा, व्यंजना, लक्षणा शव्द शक्ति से युक्त है | वाक्य छोटे-छोटे और गुथे हुए हैं | विषय व् भाव एक के बाद दुसरे अनुकूलता पूर्वक आ गये है | विषय के सन्दर्भ के अनुसार रस प्रकट हुई है |


- निष्कर्ष - 

निष्कर्षत: ''कवि' और 'कविता' एक दुसरे के पूरक हैं, क्योंकि कवि महान होने के लिए अच्छी कविता लिखनी चाहिए और महान कविता भी कवि के अच्छे लक्ष्ण से ही बनती है |


हमारी और लेख - 

               -   प्रगतिवाद का उदभव और विकास

               -   आधुनिक काल का अवधारणा और पृष्ठभूमि

                -   सूफी काव्य परम्परा और रचना

                           





Thursday, October 13, 2022

प्रगतिवाद का उद्भव – विकास - डा० विद्याधर मेहता

                                               प्रगतिवाद का उद्भव – विकास 

भूमिका -  प्रगतिवाद साहित्य की विचारधारा है | यह राजनीति के मार्क्सवाद से प्रभावित है | भाषा साहित्य में इससे प्रगतिवाद के नाम समझी जाती है | इसमें शोषक और शोषित समाज की चर्चा की जाती है |

                                                            प्रगतिवाद का अर्थ                            

             प्रगतिवाद  दो शब्द से बना है - “प्रगति” और “वाद” | प्रगति का अर्थ है – आगे बढ़ना, उन्नति | वाद का अर्थ है – कहना, बोलना, वचन आदि | यानि प्रगतिवाद है समाज, साहित्य आदि की निरन्तर उन्नति पर जोर देने का सिद्धान्त है | 
         
                                            प्रगतिवाद शब्द कोश और अन्य विचार धारा के अनुसार 

         साहित्य में प्रगतिवाद – यह साहित्य नवींन सिद्धांत है जिसका लक्ष्य जनवादी सिद्धांत को संपादित कर मार्क्सवाद तथा भौतिक यथार्थवादी के व्येय में संपूर्ति करना | हिन्दी साहित्य कोश भाग -1 के अनुसार – प्रगतिवाद सामाजिक ययार्थवाद के नाम पर चलाया गया आन्दोलन है जिसमें वर्ग – सघर्ष की सम्यवादी विचारधारा ओर उस संदर्भ में नये मानव की कल्पना इस साहित्य का उद्देश्य है | जिसका मूल मार्क्सवाद से विकसित है | प्रगतिवाद के अर्थ और विशेषता को निम्न प्रकार से समझा जा सकता है जैसे - ठहरा हुआ पानी कुछ समय बाद दुर्गन्ध युक्त हो जाता है और प्रयोग करने योग्य नहीं रहता किन्तु नदी का बहता पानी जहाँ जहाँ से बहता है वहाँ की भौगोलिक स्थिति के अनुसार अपनी जगह बनता हुआ आसपास के लोगों को आनन्द देता हुआ आगे बहता जाता है बहते पानी में गंदगी दिखती नहीं अत उसका पानी प्रयोग में आने योग्य रहता है | ठीक वैसे ही जो समाज अपने समय की आवश्यकताओं को नहीं समझता और वर्षों पूर्व बनाये गये सिध्दांतो, नियमों, मान्यताओं और विश्वासों में जकड़ा रहता है वह भी कभी आगे नहीं बढ़ता और रुके हुए पानी की भांति बदबूदार पद्धतियों का विरोध करता है जो समाज की प्रगति में बाधक है, और उन नियमों – मान्यताओं को अपनाने पर बल देता है जो वर्तमान के अनुकूल है | दूसरी बात है सामाजिक यथार्थ और जीवन और यथार्थ के वस्तु सत्य की अभिव्यकित की | हम जिस प्रकार समाज में रहते है, उसकी अच्छाइयों और बुराइयों से प्रभावित होते है | गुण दोषों से भरपूर इस समाज में ही हमारे व्यकित्त्व का निर्माण होता है और अपने व्यकित्त्व इच्छाओं, आकांक्षाओं के सहारे इस समाज को भी हम बनाते –बिगड़ते हैं | फिर सामाजिक यथार्थ क्या है? क्या समाज में व्याप्त अच्छाइयां या बुराइयां ? सामाजिक यथार्थ की बात जब हम करते है तो उसके अंतर्गत अच्छाइयां और बुराइयां दोनों ही आते है | साहित्य में यदि केवल अच्छाइयों का ही चित्रण हो तो वह आदर्शवादी साहित्य कहलाता है |और यदि केवल बुराइयों का चित्रण हो तो नगन यथार्थवादी या प्रगतिवादी | प्रसिद्ध कथाकार प्रेमचन्द ने कहा था कि यथार्थ केवल प्रकाश या केवल अंधकार नहीं है बल्कि अंधकार के पीछे छिपा प्रकाश और प्रकाश के पीछे छिपा अंधकार है | 

                                                      प्रगतिवाद किसके लिए 

         प्रगतिवाद उन शब्दों को पहचाने पर बल देता है जिनके कारण हमारा समाज अंधकार ग्रस्त है | और उन शब्दों को पहचानने पर बल देता है | जिनके बलबूते इस अधंकार को हराया जा सकता है | तीसरी बात प्रगतिवाद का प्रेरक कारण मार्क्सवादी का सिद्धन्त है | यह सिद्धन्त शोधक शब्दों का विरोध करता है और शोषित समाज में चेतना जगाने उन्हें अपने अधिकारों और समवेत के प्रति भरोसा करने पर बल देता है | यह इस सामंतीवादी और पूँजीवादी मानसिकता और संस्कृति का विरोध करता है जो शब्द धन को कुछ मुट्टीभर लोगों के हाथों में कर देते है जिससे वे स्वार्थी और दंभी हो जाते है और अपने धन का शुरू प्रयोग कर उन लोगों का शोषण करते है जिनके परिश्रम के बल पर वे सुख भोगते है | प्रगतिवाद भी सामंतवाद और पूँजीवाद का विरोध करता है जो समाज में व्याप्त अंधकार का कारण है और उन गरीबों मजदूरों – किसानों को प्रकाश –पुंज मानता है जिसके बल पर यह अंधकार नष्ट हो सकेगा प्रगतिवाद की दृष्टि में यही श्रमशील मानव नया मानव और नया हीरो हैं | चौथी बात है छायावाद के पतनोन्मुख काल की विपतियों को नष्ट कर नये समाज के निर्माण की बात | हम जानते है की छायावादी कविता में इतिहास, कल्पना आदर्श, प्रेम विरह प्रगति की सुन्दरता और सुकुमारता पर विशोष बल था |प्रगतिवाद में इतिहास कों नकारा नहीं गया, इतिहास अतीत के मोह से मुक्त की बात की गयी है इसके लिए उन्नयन समाज के सभी वर्ग को समान रूप से उन्नति रूढ़ियों अन्धविश्वासों से मुक्ति आदि, वस्तु सत्य प्रधान है इसलिए इसपर रहस्य, प्रगति की सुन्दरता, वैयक्तिक प्रेम विरह के लिए यहाँ कोई स्थान नहीं | 

                                            प्रगतिवाद  किस सिद्धांत से प्रेरित                           
      
          प्रगतिवादी साहित्य मार्क्सवादी विचारधारा से अनुप्रमाणित है |इस विचारधारा के प्रवर्तक कार्लमार्क्स ( सन् 1818ई० – 1883ई०) के क्रांतिकारी विचार से है | इस विचार धारा के तीन प्रमुख सिद्धन्त है, पहला द्वात्मकता भौतिकवाद दूसरा मूल्यवृद्धि का सिद्धन्त तीसरा मानव –सभ्यता के विकास की नई व्याख्या |अर्थात् कार्लमार्क्स की विचारधारा कहती है कि संसार की उत्पति नहीं हुई वरन विकास हुआ है, और इस विकास का आधार द्वन्द्व या संघर्ष है | यानि जब दो विरोधी शक्तियों का संघर्ष होती है तब तीसरी वस्तु को जन्म या विकसित करती है | मार्क्स का दूसरा सिद्धन्त यह है कि आज पूँजीवादी युग में सारा लाभ मिल मालिक हड़प लेती है, और मजदुर को नाम – मात्र की मजदूरी मिलती है | इस तरह शोषक और शोषित दो वर्ग आज के समाज में विधमान है, इन वर्ग में समानता स्थापित करते है | मार्क्स ऐसी व्यवस्था लाना चाहते है | जिसमें श्रमिकों की प्रतिनिधि द्वारा सरकार के उत्पादन के सम्पूर्ण साधनों पर नियत्रंण हो, और प्रत्येक व्यकित को उसके परिश्रम का समुचित लाभ मिले | मार्क्स का उद्देश्य वर्ग – हीन समाज की स्थापना करना है | हिन्दी में प्रगतिवाद साहित्य को कार्लमार्क्स के विचार या सिद्धन्तों का प्रतिपादन और व्याख्या मात्रा नहीं समझना चाहिए |इसे अंग्रेज़ी के progressive साहित्य का उरान्तर की नहीं मानना चाहिए | बल्कि इसे मानवतावाद की प्रतिष्ठा माननी चाहिए | क्योंकि इसने पीड़ित मानव को काव्य का आलम्बन बनाया है | रामविलास शर्मा के शब्दों में – ‘’ यह युग की माँग को पूरा करनेवाला साहित्य है | इसकी शक्ति इस बात में है की वह समाज के वास्तविक जीवन के निकट हैं | ------जो साहित्य जनता का पक्ष लेगा, वह जरुर शक्तिशाली होगा और अजेय गति से आगे बढ़ता जायेगा |

                                                     हिन्दी साहित्य में प्रगतिवाद का उदय 
 
          हिन्दी में प्रगतिवाद चेतना सन् 1936 ई० के आसपास आई | 1935 ई० में लखनऊ में प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना हुई जिसका प्रथम अधिवेशन 1936 ई० में मुंशी प्रेमचन्द की अध्यक्षता में हुआ | दूसरा अधिवेशन 1938 ई० में कवीन्द्र रवीन्द्र की अध्यक्षता में हुआ | प्रगतिवादी चेतनाओं गति देने में रूपाम तथा हंस नामक मासिक पत्रिका का अभिन्न योगदान है | इस धारा के प्रमुख कवियों में पंत, निराला, नवीन, नरेन्द्र शर्मा, शिवमंगल सिंह समन, केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन रागेव राधव, त्रिलोचन, गिरजाकुमार माथुर मुक्तिबोध, भारतभूषण अग्रवाल और रामविलास शर्मा हैं | 

                                                                    निष्कर्ष 
       निष्कर्षत कहा जा सकता है की जिस प्रकार छायावाद स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह है, उसी प्रकार प्रगतिवाद सूक्ष्म के प्रति स्थूल का विद्रोह है | द्विवेदी युगीन इतिवृतात्मकता और स्थूलता के विरुद्ध छायावाद एक क्रांति के रूप में आया, और छायावादी सूक्ष्मता के विरुद्ध प्रगतिवाद का उद्भव हुआ | छायावादी कवि ने यथार्थ की कठोर धरती को छोडकर कल्पना के उन्मुक्तता व्योम में विचरण किया था, एतएव छायावाद का पतन हुआ और प्रगतिवाद काव्य की रचना प्रारभ हुई |


                   हमारी दूसरी लेख -  हिन्दी गद्य का विकास
                                              - आधुनिक काल की अवधारणा और पृष्ठभूमि
                                              - सूफी काव्य परम्परा  

अमीर खुसरो के दोहे, मुकरियाँ और गीत /amir khsro ke dohe mukriyan or geet

                                         अमीर खुसरो के दोहे, मुकरियाँ और गीत   1.      एक नार किया -----------------------------------...