निबन्ध का अर्थ, प्रकार और विकास
निबंध का अर्थ - 'निबंध' शब्द 'नि +बंध' से बना है । जिसका अर्थ है - किसी विषय या वस्तु को अच्छी तरह से अर्थ और शब्दों में संगठित करके रखना ।
विभिन्न विद्वानों के अनुसार निबंध की परिभाषा-
डॉक्टर गुलाब राय के अनुसार- "निबंध उस गद्य रचना को कहते हैं, जिसमें एक सीमित आकार के भीतर किसी विषय का वर्णन या प्रतिपादन एक विशेष निजीपन, स्वच्छंदता, सजीव, आवश्यक संगीत और संबद्धता के साथ किया गया हो।"
आचार्य शुक्ल के अनुसार - "यदि पद्य कवि की कसौटी है, तो निबंध गद्य की।"
पंडित श्यामसुंदर दास के अनुसार - "निबंध वह लेख है जिसमें किसी ग्रहण विषय पर विस्तार पूर्वक और पांडित्यपूर्ण ढंग से विचार किया गया हो।"
विद्वानों के अनुसार निश्चित है कि - "निबंध की कोई एक खास सूत्र नहीं होती है इसमें विचारों की क्रमबद्धता ज्ञान, विचार और व्यक्तित्व का अद्भुत संगम होता है।"
निबंध के प्रकार - निबंध के निम्न प्रकार हैं
1. वर्णनात्मक निबंध
2. विवरणात्मक निबन्ध
3. भावात्मक निबंध
4. साहित्य या आलोचनात्मक निबंध
1. वर्णनात्मक निबंध- इस प्रकार के निबन्ध में विषय वस्तु प्रधान होता है । जैसे - तीर्थ, यात्रा, नगर, दृश्य, पर्व-त्यौहार, मेला, कोई दर्शनीय स्थल आदि । इन सभीको वस्तु या विषय कहा जाता है। यह विषय-वस्तु , दृश्य, घटनाओं तथा स्थलों आदि होते हैं। इस प्रकार की निबंध में निरूपण और व्याख्या की प्रधानता होती है।
2. विवरणात्मक निबन्ध- इस प्रकार की निबंध को कथात्मक अथवा आख्यात्म्क निबंध भी जाता है। इसमें कल्पना और अनुभव की प्रधानता होती है । विवरणात्मक निबंध की विषय वस्तु मुख्यतः जीवनी, कथाएं, घटनाएं, पुरातत्व, इतिहास, अन्वेषण, आखेट, युद्ध आदि विषयों पर आधारित होती है । ये निबंध व्यास शैली में लिखे जाते हैं ।
3, भावात्मक निबंध - इस प्रकार की निबंध में बुद्धि के अपेक्षा राग-वृत्ति की प्रधानता होती है । जिनका संबंध हृदय से होती है।अनुभूति मनोभावों की अतिशयोक्ति अभिव्यंजना इन निबंध में देखी जाती है । इस निबंध में निबंधकार सहृदयता, प्रेम, करुणा, दया आदि भावनाओं से युक्त अपने व्यवहार को प्रकट करते हैं।
4. साहित्य या आलोचनात्मक निबंध- किसी साहित्यकार या साहित्य रचना के प्रति लिखी जाने वाली निबंध साहित्य या आलोचनात्मक निबंध कहलाती है, जैसे- मुंशी प्रेमचंद, तुलसीदास, आधुनिक हिंदी कविता, छायावाद हिंदी साहित्य का स्वर्ण युग आदि हैं । इस प्रकार की निबंधों में ललित निबंध भी आते हैं । हिंदी निबंधों की भाषा काव्यात्मक और रसात्मक होती है । ऐसे निबंध शोध-पत्र के रूप में अधिक लिखे जाते हैं।
हिंदी निबंध का उद्भव और विकास-
आधुनिक हिंदी गद्य विधा में निबंध का महत्वपूर्ण स्थान है। इसका विकास सर्वप्रथम सदा सुख लाल और राजा शिवप्रसाद सितारे हिंद से माना जाता है, इसी परम्परा में इसकी निश्चित, व्यवस्थित, विकास को सूत्रपात करने का श्रेय भारतेंदु हरिश्चंद्र और उनके साहित्य मंडली निबंधकारों को जाता है।
हिंदी निबंध के विकास यात्रा को चार युग में बांट सकते हैं
1 भारतेन्दु युग, 2 द्विवेदी युग, 3. शुक्ल युग 4. शुक्लोत्तर युग
1. भारतेंदु युग - इस युग का विकास 1867 ईस्वी से 1900 ईसवी तक मानी जाती है । इस युग में गद्य की अन्य विधाओं के साथ भारतीय साहित्य में हिंदी निबंध का भी सूत्रपात और विकास होता है। इस युग के प्रमुख निबंध कारों में भारतेंदु हरिश्चंद्र, प्रताप नारायण मिश्र, बालकृष्ण भट्ट, बद्रीनारायण चौधरी प्रेमघन, श्रीनिवास दास आदि है । इनमें से भारतेंदु हरिश्चंद्र हिंदी गद्य विधा के जन्मदाता हैं, इन्हें समाज, राजनीति, धर्म, इतिहास, साहित्य आदि विषयों पर निबंध लिखा। इस के पश्चात बालकृष्ण भट्ट जी, भारतेंदु युग के सर्वश्रेष्ठ निबंधकार माने जाते हैं । भट्ट जी हिंदी पत्रिका "प्रदीप" का संपादन किया था। इनके निबंध विचारात्मक और भावात्मक दोनों प्रकार के होते हैं । बालकृष्ण भट्ट के पश्चात प्रताप नारायण मिश्र इस युग के प्रसिद्ध निबंधकार हुए । मिश्र जी के निबंधों में स्वच्छंद एवं मस्त जीवि होती थी। इनकी प्रसिद्ध पत्रिका का नाम "ब्राह्मण" था । इनके निबंध 'मिश्र ग्रंथावली' में संकलित हैं। उनके निबंधों में मनोरंजन तथा व्यंग मुख्य विशेषताएं हैं । समग्र रूप से कहा जा सकता है कि भारतेंदु युग के निबन्धों में हास्य-व्यंग, देश-प्रेम, समाज-सुधार और मनोरंजन जैसी विशेषताएं मिलती थी ।
2. द्विवेदी युग- यह युग 1900 से 1920 ईस्वी तक मानी जा सकती है । इस युग के प्रमुख निबंध कारों में से महावीर प्रसाद द्विवेदी हैं । और अन्य निबंधकारों में चंद्रधर शर्मा गुलेरी, पदम सिंह शर्मा, बालमुकुंद गुप्त, गोविंद नारायण मिश्र, श्यामसुंदर दास, सरदार पूर्ण सिंह आदि हैं । इस युग में भारतेंदु युग की अपेक्षा निबंधों का क्षेत्र काफी व्यापक रहा। यहां विचारात्मक, भावात्मक के साथ-साथ आलोचनात्मक निबंध मिलती है।
3. शुक्ल युग - यह युग 1921 ईस्वी से 1940 ईस्वी तक मानी जाती है । शुक्ल युग में निबंध का विकास भारतेंदु युग, द्विवेदी युग की अपेक्षा और ही व्यापक हुई । यहां पूर्व युगों की साहित्यिक विशेषताओं के साथ-साथ मनोवैज्ञानिक, साहित्यिक एवं आलोचनात्मक निबंध लिखे गए । इस युग के प्रमुख निबंध कारों में से रामचंद्र शुक्ल, बाबू गुलाब राय, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, शांति प्रिय द्विवेदी, महादेवी वर्मा, राहुल सांकृत्यायन, श्रीराम शर्मा, सियाराम शरण गुप्त, डॉ रघुवीर सिंह आदि प्रमुख निबंधकार हुए। एक प्रकार से यह युग निबंध साहित्य को लेकर हिंदी साहित्य का स्वर्ण युग माना जाता है।
4, शुक्लोत्तर युग- इस युग की अवधि 1940 से अब तक मानी जाती है । इस युग के प्रमुख निबंध कारों में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, वासुदेव शरण अग्रवाल, आचार्य नंददुलारे भाजपाई, डॉ नगेंद्र, भगत शरण उपाध्याय, जैनेंद्र, रामविलास शर्मा, प्रभाकर माचवे, इंद्रनाथ मदान, डॉ सत्येंद्र, डॉ विद्यानिवास मिश्र, धर्मवीर भारती, नामवर सिंह, शिवपसाद सिंह, श्रीलाल शुक्ल, कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर, हरिशंकर परसाई, कुबेरनाथ राय, विवेकी राय आदि है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी ने इस युग में सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना के निबंध लिखें। इनके अलावा विद्यानिवास मिश्र ने ललित निबंध की नई मार्ग प्रशस्त किया।
निष्कर्ष - इस प्रकार से हिंदी निबंध का विकास भारतेन्दु युग से शुरू होकर शुक्लोत्तर युग तक पहुंच गई है और इसकी विकास अनवरत आगे भी होती रहेगी । निबंध विधा हिंदी साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा है।
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