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Sunday, November 20, 2022

हिंदी निबंध का अर्थ, प्रकार और विकास - डॉ विद्याधर मेहता

                                     निबन्ध का अर्थ, प्रकार और विकास 

   निबंध का अर्थ - 'निबंध' शब्द 'नि +बंध' से बना है । जिसका अर्थ है -  किसी विषय या वस्तु को अच्छी तरह से अर्थ और शब्दों में संगठित करके रखना ।          

विभिन्न विद्वानों के अनुसार निबंध की परिभाषा

डॉक्टर गुलाब राय के अनुसार-  "निबंध उस गद्य रचना को कहते हैं, जिसमें एक सीमित आकार के भीतर किसी विषय का वर्णन या प्रतिपादन एक विशेष निजीपन, स्वच्छंदता, सजीव, आवश्यक संगीत और संबद्धता के साथ किया गया हो।"

आचार्य शुक्ल के अनुसार - "यदि पद्य कवि की कसौटी है, तो निबंध गद्य की।"

पंडित श्यामसुंदर दास के अनुसार - "निबंध वह लेख है जिसमें किसी ग्रहण विषय पर विस्तार पूर्वक और  पांडित्यपूर्ण ढंग से विचार किया गया हो।"

विद्वानों के अनुसार निश्चित है कि - "निबंध की कोई एक खास सूत्र नहीं होती है इसमें विचारों की क्रमबद्धता  ज्ञान, विचार और व्यक्तित्व का अद्भुत संगम होता है।"


निबंध के प्रकार - निबंध के निम्न प्रकार हैं 

1. वर्णनात्मक निबंध

 2.  विवरणात्मक निबन्ध 

3. भावात्मक निबंध 

4. साहित्य या आलोचनात्मक निबंध

1. वर्णनात्मक निबंध-  इस प्रकार के निबन्ध में विषय वस्तु  प्रधान  होता  है । जैसे -  तीर्थ, यात्रा, नगर,  दृश्य, पर्व-त्यौहार, मेला, कोई दर्शनीय स्थल आदि । इन सभीको  वस्तु या विषय कहा जाता है। यह विषय-वस्तु , दृश्य, घटनाओं तथा स्थलों आदि होते हैं। इस प्रकार की निबंध में निरूपण और व्याख्या की प्रधानता होती है।

2. विवरणात्मक निबन्ध-  इस प्रकार की निबंध को कथात्मक  अथवा आख्यात्म्क निबंध भी जाता है। इसमें कल्पना और अनुभव की प्रधानता होती है । विवरणात्मक निबंध की विषय वस्तु मुख्यतः जीवनी, कथाएं, घटनाएं, पुरातत्व, इतिहास, अन्वेषण, आखेट, युद्ध आदि विषयों पर आधारित होती है । ये निबंध व्यास शैली में लिखे जाते हैं ।

3, भावात्मक निबंध - इस प्रकार की निबंध में बुद्धि के अपेक्षा  राग-वृत्ति की प्रधानता होती है । जिनका संबंध हृदय से होती है।अनुभूति मनोभावों की अतिशयोक्ति अभिव्यंजना  इन निबंध में देखी जाती है ।  इस निबंध में निबंधकार सहृदयता, प्रेम, करुणा, दया आदि भावनाओं से युक्त अपने व्यवहार को प्रकट करते हैं।

 4. साहित्य या आलोचनात्मक निबंध-  किसी साहित्यकार या साहित्य रचना के प्रति लिखी जाने वाली निबंध साहित्य या  आलोचनात्मक निबंध कहलाती है, जैसे- मुंशी प्रेमचंद, तुलसीदास, आधुनिक हिंदी कविता,  छायावाद हिंदी साहित्य का स्वर्ण युग आदि हैं । इस प्रकार की निबंधों में ललित निबंध भी आते हैं । हिंदी निबंधों की भाषा काव्यात्मक और रसात्मक होती है । ऐसे निबंध शोध-पत्र के रूप में अधिक लिखे जाते हैं।

हिंदी निबंध का उद्भव और विकास-

       आधुनिक हिंदी गद्य विधा में निबंध का महत्वपूर्ण स्थान है। इसका विकास सर्वप्रथम सदा सुख लाल और राजा शिवप्रसाद सितारे हिंद से माना जाता है, इसी परम्परा में  इसकी निश्चित, व्यवस्थित, विकास को सूत्रपात करने का श्रेय भारतेंदु हरिश्चंद्र और उनके साहित्य मंडली निबंधकारों को जाता है।

                हिंदी निबंध के विकास यात्रा को चार युग  में बांट सकते हैं 

1 भारतेन्दु युग,  2 द्विवेदी युग, 3. शुक्ल युग  4. शुक्लोत्तर युग

1. भारतेंदु युग -  इस युग का विकास 1867 ईस्वी से 1900 ईसवी तक मानी जाती है । इस युग में गद्य की अन्य विधाओं के साथ भारतीय साहित्य में  हिंदी निबंध का भी सूत्रपात और विकास होता है। इस युग के प्रमुख निबंध कारों में भारतेंदु हरिश्चंद्र, प्रताप नारायण मिश्र,  बालकृष्ण भट्ट,  बद्रीनारायण चौधरी प्रेमघन,  श्रीनिवास दास आदि है । इनमें से भारतेंदु हरिश्चंद्र हिंदी गद्य विधा के जन्मदाता हैं, इन्हें समाज, राजनीति, धर्म, इतिहास, साहित्य आदि विषयों पर निबंध लिखा। इस के पश्चात बालकृष्ण भट्ट जी, भारतेंदु युग के सर्वश्रेष्ठ निबंधकार माने जाते हैं । भट्ट जी  हिंदी पत्रिका "प्रदीप" का संपादन किया था। इनके निबंध विचारात्मक और भावात्मक दोनों प्रकार के होते हैं  । बालकृष्ण भट्ट के पश्चात प्रताप नारायण मिश्र इस युग के  प्रसिद्ध निबंधकार हुए । मिश्र जी के निबंधों में स्वच्छंद एवं मस्त जीवि होती थी। इनकी प्रसिद्ध पत्रिका का नाम "ब्राह्मण" था । इनके निबंध 'मिश्र  ग्रंथावली' में संकलित हैं। उनके निबंधों में मनोरंजन तथा व्यंग मुख्य विशेषताएं हैं । समग्र रूप से कहा जा सकता है कि भारतेंदु युग  के निबन्धों में हास्य-व्यंग, देश-प्रेम, समाज-सुधार और मनोरंजन जैसी विशेषताएं मिलती थी ।

2. द्विवेदी  युग-  यह युग 1900  से 1920 ईस्वी तक मानी जा सकती है । इस युग के प्रमुख निबंध कारों में से महावीर प्रसाद द्विवेदी हैं । और अन्य निबंधकारों में चंद्रधर शर्मा गुलेरी, पदम सिंह शर्मा, बालमुकुंद गुप्त, गोविंद नारायण मिश्र, श्यामसुंदर दास, सरदार पूर्ण सिंह आदि हैं । इस युग में भारतेंदु युग की अपेक्षा निबंधों का क्षेत्र काफी व्यापक रहा। यहां विचारात्मक, भावात्मक के साथ-साथ आलोचनात्मक निबंध मिलती है।

3. शुक्ल युग -  यह युग 1921 ईस्वी से 1940 ईस्वी तक मानी जाती है । शुक्ल युग में निबंध का विकास भारतेंदु युग,  द्विवेदी युग की अपेक्षा और ही व्यापक हुई । यहां पूर्व युगों की साहित्यिक विशेषताओं के साथ-साथ मनोवैज्ञानिक, साहित्यिक एवं आलोचनात्मक निबंध लिखे गए । इस युग के प्रमुख निबंध कारों में से रामचंद्र शुक्ल, बाबू गुलाब राय, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, शांति प्रिय द्विवेदी, महादेवी वर्मा,  राहुल सांकृत्यायन, श्रीराम शर्मा, सियाराम शरण गुप्त, डॉ रघुवीर सिंह आदि प्रमुख निबंधकार हुए। एक प्रकार से यह युग निबंध साहित्य को लेकर हिंदी साहित्य का स्वर्ण युग माना जाता है।

4, शुक्लोत्तर युग- इस युग की अवधि 1940 से अब तक मानी जाती है । इस युग के प्रमुख निबंध कारों में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, वासुदेव शरण अग्रवाल, आचार्य नंददुलारे भाजपाई, डॉ नगेंद्र, भगत शरण उपाध्याय, जैनेंद्र, रामविलास शर्मा, प्रभाकर माचवे,  इंद्रनाथ मदान, डॉ सत्येंद्र, डॉ विद्यानिवास मिश्र,  धर्मवीर भारती, नामवर सिंह, शिवपसाद सिंह, श्रीलाल शुक्ल, कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर, हरिशंकर परसाई, कुबेरनाथ राय,  विवेकी राय आदि है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी ने इस युग में सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना के निबंध लिखें। इनके अलावा विद्यानिवास मिश्र ने ललित निबंध की नई मार्ग प्रशस्त किया।

निष्कर्ष -  इस प्रकार से हिंदी निबंध का विकास भारतेन्दु युग से शुरू होकर शुक्लोत्तर युग तक पहुंच गई है और इसकी विकास अनवरत आगे भी होती रहेगी । निबंध विधा हिंदी साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा है।


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Tuesday, August 9, 2022

समसामयिक ज्ञान 08/08/2022 –

  समसामयिक ज्ञान 08/08/2022 –

-    वर्तमान राष्ट्रमंडल खेल कहाँ खेला जा रहा है ? – बर्मिघम में |

-    भारतीय  महिला हाँकी टीम ने कितने वर्ष बाद राष्ट्रमंडल खेल में कांस्य पदक जितने में सफल रहा – 16 वर्ष बाद |

-    भारतीय महिला हाँकी टीम ने 16 वर्ष बाद किस देश को जीतकर कांस्य पदक जीती है – न्यूजीलैंड को |

-    2022 में राष्ट्रमंडल खेल में भारतीय महिला हाँकी टीम को कितना स्थान प्राप्त रहा – तीसरा |

-    भारतीय महिला हाँकी टीम में झारखण्ड के खिलाड़ी कौन-कौन हैं – सलीमा टेटे, निक्की प्रधान और संगीता कुमारी |

-    दुनिया में भारतीय सैन्य शक्ति को कितना स्थान प्राप्त है – रूस, अमेरिका, चीन के बाद भारत यानी चौथा |

-    हाल में कौन सी यूट्यूब चैनल ने छात्रों को पांच लाख की स्कोलरशिप देने की घोषणा की – मोशन एजुकेशन |

-    हाल के दिनों में कौन सी दूरसंचार सेवा प्रदाता कम्पनी ने 5जी क्रांति की नेतृत्त्व करने के लिए तैयार की घोषणा की – भारतीय एयरटेल |

-    भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम, 2007 किससे सम्बन्धित है – माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों की अधिकारों से |

-    विश्व चैम्पियन बनने वाली दूसरी भारतीय – साई खोम मीराबाई चानू (भारोत्तोलोक में) |

 

Monday, May 16, 2022

काव्य दोष की परिभाषा व् भेद / kavy dosh ki pribhasha v bhed

                      काव्य दोष की परिभाषा व् भेद

  काव्य का अर्थ होता है – जिसकी सहायता से मनुष्य अपने मनोभाव को कलात्मकता के साथ अभिव्यक्ति देता है | इसे हिंदी भाषा साहित्य में पद्य विधा के रूप में पहचानते हैं |

      दोष का अर्थ होता है – भूल, त्रुटी, रोग तथा हानि है |

            इस प्रकार साफ दृष्टिगोचर होता है कि किसी कविता या काव्य की अभिव्यक्ति की कलात्मकता को छति, हानि, त्रुटि और दोष पहुँचाने वाले कारक काव्य दोष कहलाते हैं |

        विभिन्न आचार्यों के अनुसार काव्य दोष की परिभाषा

         आद्याचार्य भरतमुनि के अनुसार – काव्य में गुण के अभाव को काव्य दोष कहते हैं |

दण्डी और विश्वनाथ के अनुसार – काव्य के मुख्यार्थ पर बाधा पहुँचाने वाले कारक को काव्य दोष कहते हैं |

भामह के अनुसार – काव्य में औचित्य का अभाव होना ही काव्य दोष कहलाता है |

वामन के अनुसार – “ गुण विषयोयात्मनो दोष:” अर्थात्  काव्य में गुण का अभाव होना काव्य दोष है |

मम्मट के अनुसार – “मुख्यार्थ हतिदोष:” अर्थात् काव्य में मुख्यार्थ को नष्ट करने वाले कारक हैं |

        उपर्युक्त आचार्यों की परिभाषा से निष्कर्ष निकलता है कि – ‘काव्य में रस को हानि पहुंचाने वाले तत्त्व काव्य दोष हैं | काव्य दोष रस को तीन प्रकार से हानि या छति पहुंचाते हैं –

१.   रस की प्रतीति को विलम्ब करके

२.   रस की प्रतीति में अवरोध (बाधा) द्वारा    

३.   रस की प्रतीति में पूर्ण विघात द्वारा

 

काव्य दोष के भेद

काव्य के दोषों की संख्या को लेकर आचार्यों में काफी मतभेद रहा है | मम्मट ने ‘काव्य प्रकाश’ में काव्य दोष को लेकर पर्याप्त विवेचना किया है | इनके अनुसार काव्य दोष के तीन भेद हैं –

१.   शब्द दोष २. अर्थ दोष  ३. रस दोष

१.   शब्द दोष – काव्य में भाव और रस के प्रतिकूल कठोर या कर्णकटु शब्दों का प्रयोग, व्याकरण विरुद्ध प्रयोग, अप्रचलित शब्दों का प्रयोग, ग्रामीण, अश्लील, अमंगल सूचक, घृणास्पद, लोक व्यव्हार में अशिष्ट, शव्दों का प्रयोग काव्य दोष कहलाता है | जैसे –

·        व्याकरण विरुद्ध शब्द प्रयोग – वैसी काव्य जिसमें व्याकरण विरुद्ध शव्द का प्रयोग किया गया हो, जैसे – ‘फूलों की लावण्यता देती है आनन्द’ यहाँ ‘लावण्य’ शब्द भाव वाचक संज्ञा है |

·       अश्लील शब्द प्रयोग – वैसी काव्य जिसमें अश्लील शब्दों का प्रयोग हो, जैसे – ‘रावण के दरबार में स्थिर अंगद का पाद’ | यहाँ ‘पाद’ के लिए ‘पैर’ नहीं बल्कि अपानवायु यानि ‘पादना’ की और संकेत करती है |

२.   अर्थ दोष – जिस काव्य में शब्दार्थ बाधित होता है, उस काव्य में अर्थ दोष होता है | काल दोष, पुनरुक्त, प्रसिद्धि, निहितार्थ आदि दोषों में अर्थ दोष उत्पन्न होती है |    

·       काल दोष – जैसे –

        पांडव की प्रतिमा सम लेखी |

         अर्जुन भीम महामति देखी || यहाँ ‘राम’ के मुख से ‘पांडव’ की उल्लेख होना काल दोष है |

·       पुनर्युक्त दोष – जैसे –

     मृदु वाणी मीठी लगे, बात कवि की उक्ति || यहाँ ‘मृदु’ और ‘मीठी’ तथा ‘वाणी’ और ‘बात’ में पुनरुक्ति दोष है |

·       प्रसिद्धि दोष – जैसे –

     ‘हरि दौड़े रण में लिए कर में धन्यवाण’ कृष्ण द्वारा हाथ में धनुष वाण लेकर युद्ध मैदान में दौड़ जाना में काव्य प्रसिद्धि दोष है |

·       निहितार्थ दोष – जैसे –

  विषमय यह गोदावरी, अमृतानी के फल देति | यहाँ वैद्यकशास्त्र में ‘विष’ का अर्थ ‘पानी’ होता है यहाँ विष का प्रयोग दोष पूर्ण है |  

३.   रस दोष – काव्य में जब रस की प्रतीति में बाधा या बिलम्ब आए तब रस दोष होता है | काव्य में जब स्व शब्द वाच्य, विभावनुभाव अस्पष्टता, प्रतिकूल रस मिश्रण आदी दोषों में रस दोष होता है |

·       स्व शब्द वाच्य दोष – जैसे –

     उमगत है चहुँ ओर छवि, मानहु रस श्रंगार | यहाँ ‘रस’ और श्रृंगार’ स्व शव्द दोष है | क्योंकि ‘रस’ तो स्वत: उत्पन्न होता है| इसका स्पष्ट कथन करना दोष है |

·        विभावनुभाव अस्पष्टता – जैसे –

‘सेवन जोग बन्याबों नितम्ब गिरिस के है अथवा तरुनिक के’ यहाँ वक्ता योगी है या भोगी पता नहीं चल रहा है | अत: यहाँ वक्ता का आता-पता न होने के कारण  विभावनुभाव अस्पष्टता एस दोष है |

·       प्रतिकूल रस मिश्रण दोष – जैसे –

  विरह सरासनी भूजुं माँसु| गिरि गिरि परे रकत के आंसू || यहाँ वियोग श्रृंगार के चित्रण में करुणा और वीभत्स रस का चित्रण में प्रतिकूल रस मिश्रण दोष है |

 

Thursday, May 5, 2022

INTERODUCTION TO COMPUTER SYSTEM / कम्प्यूटर का परिचय

                                          INTERODUCTION   TO  COMPUTER  SYSTEM

                                                          COMPUTER   APPLICTION

                                                         BASIC  COMPUTER  CONCEPT

·         कंप्यूटर क्या है ?

-          एक इलेक्ट्रॉनिक उपकरण

-          निर्देशों के अनुसार कार्य करनेवाला

-          सूचनाओं को तेजी से संग्रहित करनेवाला

-          सूचनाओं को स्थानातंरित करनेवाला

-          तेजी से गणना करनेवाला

* प्रोग्रोम (program ) – कंप्यूटर चिह्नों को एक निशिचत आदेशों के समूह में परिवर्तित करता है|

* कंप्यूटर कार्य प्रणाली के आधार पर तीन भागों में विभाजित है

  (1) इनपुट  डिवाइस  ( INPUT DEVICES )

 (2) सेंट्रेल प्रोसेसिंग यूनिट ( C P U )

(3) आउटपुट  डिवाइस ( OUTPUT DEVICE )

* इनपुट डिवाइस ( INPUT DEVICES )  - ऐसा डिवाइस है, जो कंप्यूटर को डाटा उपलब्ध कराते हैं जैसे की बोर्ड, माउस,मानिटर, स्कैनर, जायस्टिक, बेव काँम आदि |

* आउटपुट डिवाइस (input devices) – ऐसा उपकरण जो कंप्यूटर में इस्तेमाल स्टोर डाटा को दिखाते है जैसे soft copy devices,  माँनिटर, प्रोजेक्टर, स्पीकर, हार्ड, डिक्स,प्रिंटर, डांटमैट्रिक्सइकजेट, लेजर प्रिंटर, प्लाटर  आदि |

                  * सेंट्रल प्रोसेसिंग डिवाइस *

सी० पीo यू०  को सेंट्रल प्रोसेसिंग यूनिट कहा जाता है |

- इसे कंप्यूटर का दिमाग भी कहा जाता हैं |

- यह सूचना को ग्रहण करता है, निर्देशों का पालन करता है, प्रोसेस करके आउटपुट देता है |

- यह कंप्यूटर का हार्डवेयर हैं |

                 सेंट्रल प्रोसेसिंग डिवाइस को तीन भागों में विभाजित कर सकते हैं -                                                   (1) अरिथमेटिक  एवं लाँजिक यूनिट

                 (2) मेमोरी यूनिट

                 (3) कंट्रोल यूनिट

(1) अरिथमेटिक एवं लाँजिक यूनिट

             - इन्हें ए० एल० यू० भी कहा जाता है

             - गणना और तर्कसंगत कार्य होता हैं

             - डाटा के परिणाम को मेमोरी यूनिट भेजता है |

(2) मेमोरी यूनिट

                - प्रोग्राम कार्यंन्वित होने से पहले संग्रहित होते हैं

                - परिणाम आउटपुट यूनिट में भेजे जाते हैं |

               - डाटा एवं प्रोग्राम निर्देशों की प्रक्रिया यहाँ पूर्ण होते हैं |

              - इसे मेन स्टोरेज या प्राइमरी मेमोरी भी कहा जाता है

              - यहाँ हर डाटा की इकाई का एड्रेस होता हैं |

(3) कंट्रोल यूनिट ( control unit )-

                      - यह सभी आतंरिक एवं बाहय प्राक्रियाओं पर नियंत्रण रखती है|

          - यह सीधे इनपुट लेती है, आवश्यकता पड़ने पर सीधे क्रियान्वित कर                                                डाटा को आउटपुट यूनिट में भेज देती हैं |

 * प्रिंटर निम्न प्रकार के होते हैं |

          (1)डॉट मैट्रिक्स प्रिंटर

          (2) इकजेट प्रिंटर

          (3)लेजर प्रिंटर सबसे तेज गति से प्रिंट होता हैं |

           (4) प्लाटर इसमें ग्राफ, पिक्चर, डायग्राम, आदि बनाने में

          (5) लाइन प्रिंटर इसमें विधाथियों का रिजल्ट तैयार होते हैं |

                         कंप्यूटर के प्रकार

                 मुख्यतः चार  प्रकार 

             (1) माइक्रो कंप्यूटर            (2) मिनी कंप्यूटर

              (3) मेनफ्रेम कंप्यूटर           (4) सुपर  कंप्यूटर

    माइक्रो कंप्यूटर जैसे   pc- at, 1bm-p c, - 1bm-pc clones

    मिनी कंप्यूटर जैसे एच पी वेक्टा सिस्टम, एच पी नेट, आर एम एप्लीकेशन सिस्टम 400

मेन फ्रेम कंप्यूटर जैसे 1bm -30, xx series, 1bm- 4u

सुपर कंप्यूटर जैसे cray models, extereme, supercomputer, sp models

कंप्यूटर के लाभ -

             - स्वचालित (automatic)

                             -गति (speed)

                          -परिशुद्धता (accuraly )

          - अविराम (non- stop )

                        -स्मरण शक्ति (memory power )

                    कंप्यूटर के विकास  (development of computer)

(1)        पहली पीढ़ी (1951 -57ई०)

   

-मेमोरी के लिए चुंबकीय ड्राम वैक्यूम टयूब का प्रयोग होता हैं |

- uniac और eniac पहली पीढ़ी के कंप्यूटर हैं |

- मशीनी भाषा कम स्तर की हैं |

     (2) दूसरी पीढ़ी (1957 – 63ई० )

             - मेमोरी के लिए ट्रांजिस्टर का प्रयोग हुआ |

            - आइ बी० एम 601,सी० डी सी 6600

            -मेमोरी 32kb, processingspeed,  200KIPS

                    (3) तीसरी पीढ़ी (1964 -71ई०)

                      - मेमोरी के लिए सिलिकॉन चिप्स का प्रयोग हुआ |

                      -एक आपेरटिंग सिस्टम आ गई

         (4) चौथी पीढ़ी ( 1971 ई० से वर्तमान )

                          -मेमोरी में  माइक्रो प्रोसेसर का प्रयोग हुआ

                           - जैसे, IBM – pC, Apple -11,TRS –

        (5) पांचवी पीढ़ी – (वर्तमान तथा भविष्य में )

             - यह कृत्रिम बुध्दि पर आधारित हैं |

             - ये कंप्यूटर निर्देशों या केवल आवाज पहचान कर कार्य करते हैं |

              - IBM Notebook, Pentium PCS, Sun Works tation

               param 1000 आदि हैं |

अमीर खुसरो के दोहे, मुकरियाँ और गीत /amir khsro ke dohe mukriyan or geet

                                         अमीर खुसरो के दोहे, मुकरियाँ और गीत   1.      एक नार किया -----------------------------------...