Tuesday, May 31, 2022

घनानन्द का जीवन और कवि परिचय /ghnannd ka jivn kvi prichy

                                           * घनानन्द का जीवन और कवि परिचय *

                                                    


                   घनानन्द  रीतिकाल के रीतिमुक्त काव्य के प्रतिनिधि कवि है | ये आनंद घन के नाम से भी प्रसिद्ध है | आचार्य रामचंद शुक्ल ने घनानन्द का जन्म सं० 1746 माना है | इनकी जन्म तथा मृत्यु पर संदिग्धता है, आरंभिक जीवन दिल्ली तथा वृन्दावन में बीता | जाति से कायस्थ है |

                                                                                    घनानन्द शाहंशाह मुहम्मदशाह रँगीले के दरबारी में मीर मुंशी थे | ‘सुजाननामक नर्तकी पर आसक्त थे | ये निम्बार्क सम्प्रदाय से दीक्षित कृष्ण भक्त थे | इनकी रचना में सुजानहित, वियोग बेलि, इश्कलता, कृपाकंद निबन्ध प्रमुख है | घनानन्द की काव्य भाषा ब्रज है | विरोधाभास अलंकार घनानन्द की प्रिय अलंकार है | इनकी मृत्यु अहमदशाह अब्दाली के द्वितीय आक्रमण के समय हुआ |


               घनानंद के काव्य के विशेषता

हिंदी साहित्य की मध्कालीन युग में स्वछन्द प्रवाह के रीति मुक्त धारा के  प्रधान कवि घनानन्द हैं | रीतिसिद्ध धारा के अन्य कवि आलम, ठाकुर, बौधा, द्विजदेव आदि हैं | इन सभी कवियों के काव्यों के सम्पूर्ण आकलन से रीतिमुक्त काव्य धारा का स्वरूप निम्न प्रकार से स्थिर होता हैं –

१.    स्वछन्द काव्य धारा – रीतिमुक्त काव्य धारा में स्वछंदता के भावावेग प्रवाह हुई है | इसमें आत्मा विभोर हैं | आत्मा बौद्विकता का प्रयोग नही है | भाव के परतें, भेद-प्रभेद एक के बाद एक साथ उमड़ते आते हैं | यह भाव अपनी एक भंगिमा के साथ एक आकर्षक बिम्ब में उपस्थित होते हैं, जैसे-

    रावरे रूप की रीति अनुप, नयों-नयों लागत ज्यों-ज्यों निहारिये |

   त्यों इन आख्निन बानी अनोखी, अघानी कहूँ नहिं आन तिहारिये ||

२.   लौकिक प्रेम की अभिव्यक्ति – रीतिमुक्त काव्यधारा में नायक-नायिका, प्रेमी-प्रेमिका, की योजना पर आधारित लौकिक प्रेम की उदघाटित करती है | जिसमें काव्यलय व्यक्ति प्रधान है | व्यक्तिगत जीवन में प्रेमाहत को उपस्तित किया गया है | यहाँ फारसी की प्रेम अभिव्यंजना हुई है | यदि कर्ता उतम पुरुष में है |

३.   व्यथा भरी प्रेम कथा – रीतिमुक्त काव्य में प्रेमी-प्रेमिका, नायक-नायिका कविता के कर्ता हैं | परन्तु यहाँ दृष्टव्य है प्रेमी-प्रेनिका, नायक-नायिका संयोग के पल को कभी प्राप्त नहीं क्र पते हैं | अत सम्पूर्ण प्रेमाव्यजना एसा पीड़ा की अनुभूती लगातार बी हुई है –

यह कैसो संयोग न सुझी परे, जो वियोग न्हुँ क्यों विघुवतु है

४.   प्रेम का उदात स्वरूप – रितिमुत काव्य की अभिव्यंजना उदात्तता से युक्त है | यहाँ इन्द्रिय वासना नही है | प्रेमी-प्रेमिका वियोग की व्यथा सह-सहकर भी प्रिय की कुशल कामना करते हैं | यही नहीं अंतिम स्वांस तक उसी का स्मरण करते हैं | यदि प्रिय प्राप्त नहीं होते तो घर से बाहर ठौर-ठिकानों पर खोजने निकल जाते हैं |

    “यह प्रेम की पतवार महादरबारी की धार पे धावना है |”

५.   रहस्यात्मकता से युक्त – रीतिमुक्त काव्य स्थूल शारीरिकी है फिर भी उध्दर्गामी है | इसमें पीडक सकाम से आतुर संचित है | अत: ये सरे अभिव्यक्ति प्रेमी-प्रेमिका, नायक-नायिका के कर्म के रहस्य को उत्पन्न क्र देती है –

“अति दिन मृणाल के तारहू ते तेही ऊपर पाँव दे आवनों है |

सुई बेह तेद्वार स्किन वहाँ प्रतीति को तादौ लदावनौ है ||”

६.   परिष्कृत भाषा – घनानन्द ब्रज भाषा के निपुण कवि हैं भाषा में इन्होंने नूतन वाक्य योजना संगोठित किये हैं, जिसमें प्रेम की अभिव्यक्ति अत्यंत गंभीर, निर्मल, आवेगमय और व्याकुल क्र देने वाला उदात रूप व्यक्त हुआ है | इसलिए घनानंद को साक्षात रस मूर्ति भी खा गया है | इसकी भाषा की रूप देखिए –

“अति सुधौ स्नेह के मारन है, जहाँ नेक स्पानक बांक नहीं |”

७.   काव्य कला की श्रृजनात्मक प्रेणता – घनानंद की कविता में लाक्षणिकता, वक्रोक्ति आदि लक्षण साफ-साफ देखा जा सकता है | यह लक्षण प्रेम की अभिव्यक्ति, प्रिया की अत्याधिक चतुराई आदि भावनाओं देखी जा सकती है _

“नहि आवनि अवधी न रावरी आस, इते पैर एक ही बात हों |”

.   चित्रात्मकता - घनानंद भावाभिव्यक्ति में साहित्यिक कला के पूर्णत: प्रयोग किया है | जिसमें विषय और भाव चित्र के समान उपस्थित हो गये हैं | इन कवित्त में सावरी साड़ी ले सुसज्जित सुजान के शरीर का क्रांतिमान उपस्थित किया गया है –

“श्याम घटा लिपटी धीर विध की सोहे अमावस्या अंक कुंजियारी |”

९. छंद विधान की व्यापकता – घनानंद रीतिकाल के प्रतिनिधि कवि हैं | इन्होंने कवित्व, सवैया, दोहा, चोपाई आदि छन्दों में काव्य रचना की है |जो हिंदी साहित्य के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है | आधुनिक आलोचना घनानंद को हिंदी साहित्य में सवैया, छंद की बादशाह भी खा गया है | 


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Friday, May 27, 2022

आदिकालीन काव्य की प्रवृत्तियाँ / aadikal ki kavy prvritiyan

                                                    आदिकालीन काव्य प्रवृत्तियाँ    

                                                           


                              आदिकाल  की सम्पूर्ण साहित्य भारतीय जीवन के संक्रान्ति काल में निर्मित हुआ | जिन्हें स्थान भेद के आधार पर दो भागों में विभाजित हुआ है | प्रथम, पशिचमी अंचल की साहित्य दूसरा, पूर्वी अंचल की साहित्य | इन साहित्य की प्रवृति को निम्न प्रकार से प्रकट किया जा सकता है –

1.  राजस्तुति    :- इस काल में राजस्तुति की रचनायें हुई, जो पशिचमी अंचल की साहित्य की मुख्य प्रवृति है | दरबारी कवि अपने आश्रयदाता राजाओं के पराक्रमपूर्ण चरितों या गाथाओं का वर्णन करते थे | हिन्दी के प्रबंध काव्य रासों के नाम से जानी जाती है | जैसे- प्रमुख रचनाएँ हैं – दलपति विजय कृत खुमाण रासों, नरपति नाल्ह कृत वीसलदेव रासों, शारंगधर कृत हम्मीर रासों, जागनिक कृत परमाल रासों, चंदबरदाई कृत पृथ्बीराज रासो आदि हैं | राजस्तुति से युक्त एक काव्य अंश देखिये :-

                    बारह बरस लौ कूकर जीवै, अरु तेरह लौ जिये सयार|

                     बरस अठारह क्षत्रिय जीवै, आगे जीवन कौ धिक्कार || (जागनिक कृत परमाल रासो से )

2 साम्प्रदायिक धार्मिक साहित्य :- पूर्वी अंचल में बौद्ध धर्म के निरंतर परिवर्तन का प्रभाव सिद्ध- साहित्य में मिलता है | सिद्धों या सिद्ध-साहित्य की प्रतिक्रिया के परिणाम स्वरूप नाथों या नाथ-साहित्य साहित्य का प्रादुर्भाव हुआ | प्रमुख रचनाओं में हैं – सरहपा कृत दोहाकोश, शबरपा कृत चर्यापद , डोम्भिपा कृत योगचर्या आदि हैं | अन्य सिद्ध कवियों में – लुईपा, कणडपा, कुक्कुरिपा आदि हैं इनके रचनाओं में पाखण्ड और आडम्बर का विरोध है, गुरु-सेवा का महत्त्व दिया है | ये सहज भोग मार्ग से जीव को महासुख की ओर ले जाते हैं | इनकी भाषा सरल तथा गेय हैं, काव्यों में भावों का सहज प्रवाह मिलता है | एक उदाहरण देखिये –

                                         नाद न विन्दु न रवि न शशि मण्डल,

                                         चिअराअ सहाबे मूकुल,

                                         अजुरे उंजू छाडी मा लेहु रे बंक,

                                        निअही बोहिम जमु रे लांक |

                                        हाथेरे कांकण मा लोउ दामण,

                                       अपने अपा बुझतु निअन्मण |

3 अपभ्रंश प्रभावित पुरानी हिन्दी का प्रयोग – हिन्दी साहित्य के समान्तर अपभ्रंश प्रभावित साहित्य की रचनाएँ हो रही थी | ये धार्मिक काव्य रचनाएँ हैं इसमें महापुरुषों के जीवन वृत्त तथा उनके उपदेश आदि की कथा उपलब्ध है | तथा मनुष्य के मोक्ष प्राप्त करने के साधन उपलब्ध कराये गये हैं | प्रमुख रचनाएँ हैं – स्वयंभू कृत पउमचरिउ, रिटठनेमि चरिउ,स्वयंभूछन्द | पुष्पदन्त कृत महापुराण, णयकुमारचरिउ, जसहर चरिउ आदि |

4. रासक काव्यधारा – हिन्दी में इसका विकास अपभ्रंश से हुआ | ये वीररसात्मक धर्म-प्रधान तथा उपदेशमूलक भी है | प्रमुख काव्य कृतियों में – अब्दुलरहमान कृत संदेशरासक, जिनदत्त सूरी कृत उपदेश-रसायन-रास आदि |

5. वीर एवं श्रगार मूलक रचनाएँ – आदिकाल में वीर एवं श्रृंगार मूलक रचनाएँ रची गई | प्रमुख रचनाओं में प्राकृत-पैगलम प्रमुख वीररसात्मक मुक्तकों का संकलन है जिसमें जज्जल, बब्कर, विद्याधर, हरिभद्र की रचनाएँ संकलित हैं | इस प्रकार श्रृंगार मूलक रचनाओं में हेमचंद्र कृत प्राकृत व्याकरण,मेरुतंग कृत प्रबंधचिंतामणि तथा पुरातन प्रबन्ध आदि हैं |

6. प्रेमाख्यानक काव्य प्रवृति – प्रेमाख्यानक काव्य प्रवृति भी पाई गई | प्रमुख रचनाओं में – किलोल कृत ढोलामारू-रा-दूहा | माधवानल काम कंदला एवं राठौर पृथ्वीराज री कही वेली किसन रुक्मणी री आदी |

7. श्रृंगार मूलक भक्ति काव्य – इस युग में श्रृंगार भक्ति मूलक पदों की रचना की परम्परा का विकास मिलता है | जैसे- जयदेव की गीत गोविन्द में मिलता है | इसी प्रकार के पद विद्यापति के पदावली में भी पाई जाती है

8. प्रकृति चित्रण – आदिकाल के साहित्य में वस्तु वर्णन के अन्तर्गत प्रकृति-चित्रण की दोनों प्रणालियों का चित्रण है | आलम्बन तथा उदीपन आदि दो रूप हैं | इनके आलावा कहीं-कहीं परिगणन पद्धति भी मिलती है |

9. राष्टीय भावना का अभाव – इस युग की साहित्य राजाओं के वीर, श्रृंगार, प्रेम, आदि बिषय में ही रचना लिखते पाये गये | साधारण जनमानस के सामाजिक, आर्थिक,दशाओं का चित्रण नहीं मिलता है |

10. गद्य रचनाओं का प्रदुभाव – इस काल में पद्य रूपों प्रयाप्त रचनाएँ मिलती हैं परन्तु गद्य रूप में भी रचनाएँ मिलना शुरू हुआ है | जैसे – दामोदर शर्मा कृत उक्ति व्यक्ति प्रकरण, रोड़ा कृत राउलवेल, ज्योतीश्वर कृत वर्णरत्नाकर आदि |   

11. भाषा – कविता की भाषा डिंगल तथा पिंगल रूपों में है | ब्रजभाषा मिश्रित कोमल श्रृंगारिक रचनाएँ पिंगल में मिलती है | तथा वीरगाथा मूलक रचनाएँ डिंगल में मिलती है, साथ ही संस्कृत, मैथली तथा देसिल भाषा की भी रचनाएँ मिलती हैं |

12. काव्य शैली का विकास – आदिकालीन साहित्य में तीन प्रकार के काव्य शैली का विकास हुआ – प्रबन्ध शैली, मुक्तक शैली तथा गीत शैली |

13. छन्दगत प्रवृति – इस काल में छन्द की व्यापक परम्परा म्मिलती है | प्रबन्ध काव्यों में दुवई, हेला, इछा, धत्ता. रासक, पद्धति आदि के आलावे रोलऊ, उल्लावउ, छप्पय आदि हैं | मुक्तक में दोहा, पद, अदिल्ल आदि हैं |

  इस प्रकार हिंदी साहित्य का आदिकाल उतरार्ध काव्य विषय का उदगम स्थल की उपज भूमि है |

 

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Thursday, May 26, 2022

विद्यापति भक्त या श्रृंगारिक कवि /vidyapti bhkt ya shringarik kvi


 
                                                   विद्यापति भक्त या श्रृंगारिक कवि

 

        मैथिल कोकिल विद्यापति जी जयदेव के उत्तराधिकारी कवि माने जाते हैं | इनके काव्य में बिषय की वैविध्य है, क्योंकि इन्होंने एक तरफ राजभक्ति तो दूसरी तरफ देव भक्ति दिखाई है और इन दोनों तटों के बीच में श्रृंगार की सरस धारा को प्रवाहित किया है | इसलिए हमेशा विवाद बना रहता है कि विद्यापति श्रृंगारिक हैं या भक्त कवि |

                               काव्य की विषय व कला पछ की दृष्टिपात से विद्यापति को मुलत: भक्त एवं श्रृंगारिक दोनों कवि माना जा सकता है | क्योंकि महाकवि ने भक्ति के लिये यौवन के सौन्दर्य को उकरने में ही सर्वाधिक काव्य रचे हैं | 

                        विद्यापति बहुदेवोपासक भक्त कवि हैं | इन्होंने कृष्ण, राधा, शिव, दुर्गा और गंगा सहित ग्राम-देवी देवताओं के प्रति भक्ति आराधना करके लोक के लिये ग्राह्य बनाया है |

                      विद्यापति की भक्ति संध्याबेला यानि वृद्धावस्था की भक्ति है | हिन्दी के आलोचक रामचन्द्र भी स्वीकार करते हैं कि सूर की राधा की वियोग बैठे ठाले का वियोग है उसी प्रकार विद्यापति की राधा की वियोग थके हारे की भक्ति है | स्वयं विद्यापति भी स्वीकार किये हैं –

                         माधव हम परिणाम निरासा |

                          तुहूँ जगतारण दीन दयामय अतए तोहर विसवासा ||

                          आध जनम हम नींद गमाओल जरा-शिशु कत दिन गेला |

                         निघुवने रमणी रस-रंग मातल तोहे भजब कौन बेला ||

                                इस प्रकार सचमुच में कवि भक्ति के माध्यम से श्रृंगारिकता की स्थापना कर रहे थे | ‘निघुवने रमणी रस-रंग मातल’ से स्पष्ट होता है कि विद्यापति काव्यों में रस तत्त्व की प्रतिष्ठा कर रहे हैं |

                        इन्होंने बुढ़ापे में अनुभव किया –

          तातल सैकत  वारि-विन्दु-सम सुत-मित-रमनि समाजे |

          तोहे बिसरि मन ताहिं समर्पिलूं अब मझु होत कोन काजे ||

                                इन पंक्ति के आधार पर बहुत से आलोचकों ने इन्हें भक्त कवि के श्रृंखला में रखा है |

कहा जाता है कि इनकी भक्तिभावना से संतुष्ट होकर स्वयं भगवान शंकर भी इनके घर में ‘उगना’ के नाम से चाकरी किया करते थे | परन्तु रामचन्द्र शुक्ल इनके बारे कहते है कि – “ विद्यापति ने पदों की रचना श्रृंगारिक काव्य की दृष्टि से की है, भक्ति के रूप में नहीं |.............आध्यात्मिक रंग के चश्मे आजकल बहुत सस्ते हो गये हैं, उन्हें चढ़ाकर जैसे कुछ लोगों ने ‘गीत गोविन्द’ के पदों को आध्यात्मिक संकेत बतलाया है, वैसे ही विद्यापति के पदों को भी |”

                            आचार्य शुक्ल के कथन सत्य है क्योंकि पदावली में राधा व कृष्ण के यौवन सौन्दर्य को तन्मयता, रमणीयता के साथ समर्पित भाव से उन्मुक्तता पूर्वक गाये हैं |इन्होंने कभी भी कृष्ण और राधा को मर्यादित रूप में नहीं रखे | नख-शिख वर्णन में तो राधा को सामान्य नायिका बना दिया है | राधा के युवावस्था को अमरवेली कहा है | जिसके फल युगल ऊरोज और विद्यापति इन फल की प्राप्ति के लिये आँखों के जल से सींचकर आशा की लता को हमेशा बढ़ाये रखते हैं |

                                 आसक लता लगाओल सजनी

                                        नयनक नीर पटाय |

                               से फल अब तरुनत भेल सजनी

                                      आँचर तर न समाय ||

                      अब माना कि विद्यापति शैव भक्त कवि हैं, पर शिव के लिये कहीं भी मर्यादित रूप की स्थापना नहीं की है | शिवजी को नायिका के उरोजों को उपमान के रूप में स्थापित किये हैं | कहते हैं कि नायिका के ऊरोज यानी स्तन शिव के सामान हैं | गले की मोतियों की माला गंगाधार के सामान हैं, जो शिव को जल चढ़ाती हैं | इतना ही नहीं ऊरोज या स्तन के ऊपरी काले भाग को शिवजी के भस्म से उपमित किये हैं | -                  गिरिवर गरुअ पयोधर परमित

                              गीय गज मौलिक हारा |

                    काम कम्बु भरि कनक शम्भु परि

                             ढारत सुरसरि धारा ||

                      .......................................

                           चन्दन चरचु पयोधर रे

                           ग्रिम गज मुक्ताहार |

                        भष्म भरल जनु संकर रे

                            सुरसरि जलधार ||

                विद्यापति को गंगा भक्त कवि भी माना जाता है पर गंगा से भी मर्यादा का ख्याल नहीं रखा है | क्योंकि गंगा भक्ति के सामने भी काम-वासना ही सक्रिय हुआ है | जैसे की गंगा को नायिका के मुक्ता माला से उपमित किया गया है जो कामदेव के घोड़े रूपी लाल-लाल स्तनों पर जल चढ़ा रही है |

                 विद्यापति पार्वती भक्त भी हैं परन्तु पार्वती के मर्यादा का ख्याल नहीं रखे हैं, और इनके सामने ही नाचरियों की उल्लेख करते हैं |विद्यापति राजा शिवसिंह तथा रानी लखिमा देवी के दरबारी कवि हैं | इन्हें  दरबारों में सुखों से समय बिता रहे थे अत: राजदरबारी संस्कृति के अनुरूप काम, नाम, और आराम के सारे सुख प्राप्त थे | इसलिए राजा शिवसिंह और रानी लखिमा देवी के की संतुष्टि हेतु नायिका के वय:संधि के चित्रण में भी मर्यादा को भूल गये हैं और लिखे हैं –

                          निरजने उरज हेरई कत बेरि |

                         हंसइ से अपन पयोधर हेरि ||

                          पहिल बदरी सम पुन नवरंग |

                         दिन-दिन अनंग अगोरल अंग ||

                      वय:संधि के वर्णन में नायिका की चपलता और मुस्कान को हमेशा नव-उरोजों के सामने ही उपस्थित किये हैं तथा काम को भूल नहीं पाये हैं | -

                                                                 चउँकि चलए खने, खने चलु मन्द |

                                                                 मनमय  पाठ   पहिल  अनुबन्ध ||

                                                                 हिरदय- मुकुट हेरि – हेरि थोर |

                                                                 खने  आँचर  दए  खने भोर ||

                      महाकवि श्रृंगार वर्णन में यौवन के वसंत में हमेशा डेरा जमाये हुये हैं |इसलिये सद्यःस्नाता नायिका के अमर्यादित रूप की चित्र खींचे हैं | कहते हैं कि नायिका के ऊरोज चकवा पछी के समान हैं और नायिका इसी डर से अपने भुजपास में बांध रखे हैं कि कहीं उड़ न जाय |

                          कुचयुग चारू चकेवा |

                          निजकुल मिलत आनि कने देवा ||

                            ते शंकाए भुजपाशे |

                        बांधि धएल उड़ी जाएत अकासे ||

                                  इतना ही नहीं विद्यापति ने सुहागारात के अनुभवों को अपने काव्य में बिषय बनाया है | और कहते हैं – ‘तिल एक कठिन पहिल अपराधे |’

                इस प्रकार विद्यापति के भक्तिभावना में श्रृंगारिकता के भाव ही अत्याधिक प्रधान रूप में आ गये हैं | इनकी श्रृंगारिकता के सामने भक्तिभावना सहमी-सहमी सी दिखाई पड़ती है अत: विद्यापति बहुदेवपासक श्रंगारिक भक्त कवि हैं | 

Sunday, May 22, 2022

अमीर खुसरो के दोहे, मुकरियाँ और गीत की व्याख्या / amir khusro ke dohe, mukriyon or geet ki vyakhya

                                     अमीर खुसरो के दोहे, मुकरियाँ और गीत की व्याख्या 

 


1.     एक नार किया ----------------------------------------------- हो जाबे ||

 

परिचय – व्याख्येय पंक्तियाँ पाठ्य पुस्तक ‘काव्य कुंज’ से ली गई हैं | ये पंक्तियाँ हिन्दी साहित्येतिहास में आदिकाल के साहित्यकार अमीर खुसरो द्वारा रचित ‘पहेली ’ शीर्षक से गृहित है | इसमें कवि दर्पण से सम्बद्ध पहेली के माध्यम से प्रियतम के प्रति प्रियतमा के श्रृंगार भावना को चित्रण किया गया है |

प्रसंग/प्रकरण – कवि खुसरो प्रेमाश्रयी संत कवि निजामुद्दीन औलिया के शिष्य परम्परा में आते हैं | खुसरो और औलिया के बीच गुरु-शिष्य के साथ ही ईश्वर-भक्त का सम्बन्ध है | अत: भक्त कवि खुसरो प्रेमाश्रयी भक्ति धारा के आधार पर ईश्वर-भक्त के सम्बन्ध को दर्पण के माध्यम से उपस्थित किये हैं |

व्याख्या – कवि कहते हैं कि प्रियतम को प्रियतमा पसन्द करती है | क्योंकि पुरे शरीर में पानी है, पर वास्तविक सच्चाई है कि तन में प्रफुलता है किन्तु इसमें पानी नहीं है | सच्चाई तो यह की प्रियतमा अपने प्रियतम को ह्रदय में सहेजे रखती है और जब प्रियतम को अपना मुख दिखलाती है तब वह पूरी तरह पी मय यानि प्रियमय हो उठती है | तात्पर्यत: आईना प्रियतमा को प्रिय है जिससे अपने को देखती है, और खुद ही प्रियतम की ध्यान लगाकर प्रियमय हो जाती है |

काव्य बिशेष – 1. आईना के माध्यम से प्रियतमा द्वारा प्रियतम के प्रति होने वाले भावनाओं का चित्रण है |

                2, कविता की भाषा प्रारंभिक खड़ी बोली हिन्दी है

                3, अन्योक्ति, मानवीय और अनुप्रास अलंकार की छंटा है |

               4, माधुर्य – गुण, श्रृंगार व शांत रस, तथा व्यंजना शब्द शक्ति, प्रतीक योजना में वक्रता के साथ संगीतबद्ध है |


2.     चास मास ------------------------------------------------- कैसे ?

परिचय – ये पंक्तियाँ अमीर खुसरो के पहेलियों से गृहित हैं | इसमें कवि पिंजड़े के माध्यम से मानव शरीर के निर्माण की रहस्यात्मकता को उदघाटित किये हैं |

व्याख्या – कवि कहते हैं कि मानव शरीर में चर्म और मांस के आलावे असंख्य रंध्र होते हैं | पर यह आकृति कैसी है जिसमें हड्डियों के ढांचों के बीच-बीच में रंध्र तो हैं पर चर्म और मांस नहीं हैं | यह देखकर कवि को आश्चर्य होता है कि इस आकृति में जीव आखिर कैसे बसती है अर्थात् पछी जिस पिंजड़े में रहता है उसमें भी असंख्य रंध्र होता है और हाड़-मांस रूपी लोहे के पतले-पतले पत्तर होते हैं |

काव्य बिशेष – 1. पिजड़े की पछी के बहाने मानव शरीर में वास करने वाले जीव के प्रति कुतुहल की गई है |

                   2, कविता की भाषा प्रारम्भिक खड़ी बोली हिन्दी है, जिससे हिन्दुवी कहा जाता है |

                   3, रूपक, मानवीकरण और अनुप्रास अलंकार है |

                  4, माधुर्य काव्य गुण, श्रृंगार व शांत रस के साथ-साथ व्यंजना शब्द शक्ति और प्रतिक योजना में रहस्यात्मकता और संगीतात्मकता है |

                   5, पहेली पद छंद में है |  



3.                   गौरी सोवे ....................................................देस |

 

परिचय – प्रस्तुत व्याख्या पंक्तियाँ पाठ्य पुस्तक ‘काव्य कुंज’ से ली गई है | ये दोहे हिन्दी साहित्य के इतिहास से आदिकाल के खड़ी बोली भाषा के प्रवर्तक कवि  अमीर खुसरो के ‘दोहे’ से ली गई है | इसमें कवि प्रेममार्गी धारा को अपनाते हुये  नायिका रूप से अपने भक्ति भाव को गुरु के प्रति दिखाई है | अर्थात् सामान्य मनुष्य को भी नायिका रूप में तथा ईश्वर को पुरुष रूप में स्पष्ट किये हैं | यहाँ गुरु के मृत्यु होने और मृत्यु शय्या में रहने की स्थिति को नायिका रूपी गुरु को ईश्वर रूपी नायक के साथ मिलन की स्थिति को दिखाया है |

प्रकरण/प्रसंग – अमीर खुसरो के गुरु संत निजामुद्दीन औलिया प्रेममार्गी शाखा के साधक थे | एक दिन अमीर खुसरो गुरु से कहीं दूर चले गये थे, समाचार मिली की गुरुकी मृत्यु हो गई, सुनते ही अपने गुरु के पास आ गये | गुरु को मृत्यु शय्या में देखकर प्रेमभाव से ये दोहे मुख से उधृत हो जाते हैं |

व्याख्या -  कवि कहते हैं कि गुरु मृत्यु शय्या में है अर्थात् इन्हें ईश्वर रूपी पति से मिलन हो गया है | आगे कवि कहते कि अब गुरुदेव अपने स्वामी को पाकर चारों दिशाओं से भयरहित होकर सो सकते हैं | अर्थात् गुरु को अब सांसारिक दुःख तकलीफ नहीं होगी क्योंकी ईश्वर रूपी पति इन्हें मिल गया है | अर्थात् इनके पति ईश्वर इन्हें चारों ओर से सुरक्षा देगें |

काव्यगत विशेषता – 1.प्रेममार्गी भक्तिभावना के आधार पर संसारिकता से मुक्ति के भाव को अभिव्यंजित किया गयाहै 

                                 2, भाषा खड़ी बोली हिन्दी है जिसमें क्षेत्रीय भाषाएँ, ब्रज, अवधी, राजस्थानी आदि बोलियों का समिश्रण है |

                                  3, ‘मुख पर डारे केस’ में रूपक अलंकार तथा सम्पूर्ण कविता में अनुप्रास अलंकार की छंटा है |

                                 4. संसारिकता के अभिव्यक्ति को रहस्यात्मकता के साथ प्रतिक रूप से स्पष्ट किया है | यहाँ भक्ति

                                      काल के तथ्यों का भी उदभव है |

                              5. शब्द शक्ति व्यंजना, प्रसाद व माधुर्य काव्य गुण, शांत रस के साथ संगीतात्मकता भी है |

                              6. यह कविता दोहे छंद में लिखी गई है |

                 इस प्रकार भाव व कला पछ की दृष्टि से प्रेममार्गी भक्तिभावना के आधार से ईश्वर के प्रति मिलन की रहस्यात्मक तथ्यों को उजागर करने वाला आदिकाल की प्रमुख काव्यधारा है |

                                                

4.     सजन सकारे ---------------------------------------------------- होय ||

परिचय – व्याख्येय पंक्तियाँ अमीर खुसरो के दोहे से उद्धरित हैं | कवि इन पंक्तियों में भक्त के विरह भाव की अभिव्यक्ति दी है |

व्याख्या – कवि कहते हैं कि प्रियतम को एक दिन बुलाया ही जाएगा और उसके नयन रोते हुये मरेंगे | विधाता से प्रार्थना है कि रात को इतनी बड़ी कर दे की कभी भोर हो ही नहीं |

काव्य बिशेष – 1. कविता में शाश्वत सत्य की अभिव्यक्ति हुई है जो रहस्यात्मक रूप में उपस्थित है |

                    2, भाषा प्रारम्भिक हिन्दी है जिससे हिन्दुवी कहते हैं |

                     3, कविता में मानवीय, अनुप्रास अलंकार की उपस्थिति है |

                     4, कविता दोहे छंद में है |

                     5, माधुर्य गुण, व्यंजना शब्द शक्ति, शांत रस के साथ ही संगीतात्मकता विराजमान है |

 

5.     बाला था ---------------------------------------------------------------- गाँव ||

परिचय – व्याख्येय पंक्तियाँ खड़ी बोली हिन्दी भाषा के प्रवर्तक अमीर खुसरो द्वारा रचित हैं | ये पंक्तियाँ मुकरी में संकलित हैं | इसमें कवि यश की क्रामिक अभिवृद्धि से उत्पन्न सांसारिक सत्य की अभिवृद्धि की गयी है |

व्याख्या  - कवि कहते हैं कि जब यश मिलना आरम्भ हुआ तब सबको अच्छा लगा, सबने प्रशंसा की, पर यह यश जब ज्यादा मिल गया तब वह यश किसी को अच्छा नहीं लगा अर्थात् किसी के काम की नहीं हुई | खुसरो जब उस नाम को बुझाने के लिए कह दिया तब नहीं बुझने पर गाँव छोड़ने के लिये कहा गया |

काव्य बिशेष – 1. कविता में यश की क्रमिक अभिवृद्धि से उत्पन्न सांसारिक सत्य की अभिवृद्धि की गई है यहाँ ‘बाला’ शब्द यश रूपी प्रकाश के बढ़ने के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है तथा यश के अधिक बढ़ जाने पर किसी के कुछ काम नहीं आने की बात कही गई है |

                 2, भाषा प्रारम्भिक खड़ी बोली हिन्दी है जिससे यहाँ हिन्दुवी कहा जाता है |

                   3, अन्योक्ति एवं अनुप्रास अलंकार है |

                    4, माधुर्य गुण, श्रृंगार व शांत रस, व्यंजना शब्द शक्ति, पद छंद, तथा संगीतबद्धता है |

6.     मेरा जोबन नेवल ------------------------------------------------रूसा ही जाए ||

परिचय – व्याख्येय पंक्तियाँ खड़ी बोली भाषा के प्रवर्तक अमीर खुसरो द्वारा रचित हैं | ये पंक्तियाँ अमीर के रचित ‘गीत’ शीर्षक रचना से उद्धरित है | कवि द्वारा यहाँ भरे यौवन में सर्वोच्य सत्ता द्वारा कवि के वैभव को बख्ये जाने की बात लेकर कवि के आत्मव्यथा को अभिव्यक्ति की गई है |

व्याख्या –  कवि कहते हैं कि इसका यौवन नया और जीवनोत्साह से भरा पूरा है फिर भी सर्वोच्य सत्ता ने इसके यौवन-वैभव को बख्श दिया है | कवि पुन: कहते हैं कि कोई गुरु निजामुद्दीन औलिया को समझाये क्योंकि कवि स्वयं गुरु को जितना समझाते हैं गुरु उतने ही रुठते जाते हैं |

काव्य बिशेष – 1. इन पंक्तियों में खुसरो द्वारा गुरु के प्रति आत्माभिव्यक्ति हुई है |

                    2, कविता की भाषा हिन्दुवी है |

                       


7.     छापा तिलक ----------------------------------------------------------मिली के ||

 

परिचय – व्याख्येय पंक्तियाँ अमीर खुसरो रचित गीत है | ये हमारे पाठ्य पुस्तक ‘काव्य-कुंज’ से ली गई है | जो आदिकालीन खड़ी बोली भाषा के पवर्तक अमीर खुसरो के रचना ‘गीत’ में संकलित है | इसमें कवि अमीर के वैराग्य भावना को संकलित किया गया है |

प्रकरण/प्रसंग – कवि अमीर खुसरो भारतीय इतिहास के मध्यकाल के राज्याश्रित कवि रहे हैं | इन्होंने प्रसिद्ध सूफी संत निजामुद्दीन औलिया के अनन्य भक्त व शिष्य कवि का स्थान प्राप्त किया है | निजामुद्दीन तथा अमीर खुसरो के आश्रयदाता राजा के बीच पटती नहीं थी | इस द्वन्द्व के बावजूद भी इन पंक्तियों के द्वारा गुरु के प्रति वैराग्य और प्रेम को सूफी-भक्ति भावना के अनुसार व्यक्त किया है |

व्याख्या – कवि कहते हैं कि मैं जब से गुरु से संबंध जोड़ा है तब से छापा-तिलक का त्याग  किया है | अर्थात् सदा अभिन्न व सुहागिन रहने के लिये माथा में तिलक धारण नहीं किया है यानी मैं बादशाह गयासुद्दीन के बजाय निजामुद्दीन औलिया को पाकर धन्य  हो गया हूँ | अत; मैं सदा सुहागिन ही रहना चाहता हूँ |  

काव्यगत बिशेषता – 1.  खुसरो द्वारा अपने गुरु के प्रति कृतज्ञता का भाव प्रकट हुआ है |

                           2, भाषा खड़ी बोली हिन्दी का प्रारम्भिक रूप है, जिसमें राजस्थानी,हिन्दवी, ब्रज, अवधी, पंजाबी

                               आदि का समिश्रण है |

                           3, रहस्यात्मक व प्रतीकात्मक की भाव है |

                            4, रूपक,अनुप्रास और मानवीय अलंकार है |

                          5, मधुर व प्रसाद काव्य गुण, व्यंजना शब्द शक्ति, श्रृंगार व शांत रस, पद छंद में लिखित संगीतबद्ध है |

         



 

अमीर खुसरो के दोहे, मुकरियाँ और गीत /amir khsro ke dohe mukriyan or geet

                                         अमीर खुसरो के दोहे, मुकरियाँ और गीत   1.      एक नार किया -----------------------------------...