Saturday, July 6, 2024

दुनिया का अनमोल रतन” कहानी की समीक्षा -प्रेमचन्द / duniya ka anmol rtan ki smikhaa - premchnd/

            दुनिया का अनमोल रतन” कहानी की समीक्षा

 

       दुनिया का सबसे अनमोलरतन प्रेमचंद की पहली कहानी मानी जाति है। हिन्दी, अंग्रेजी, उर्दू, फारसी, बांग्ला, गुजराती, और मराठी के जानकार मुंशी दया नारायण निगम कानपूर से प्रकाशित होने वाली एक उर्दू पत्रिका ज़मानाके संपादक थे। इन्होने ही प्रेमचंद की कहानी दुनिया का सबसे बड़ा अनमोल रतनको 1907 में प्रकाशित किया था। उन्होंने ही नबावराय को प्रेमचंद नाम दिया था। ज़माना पत्रिका के बाद यह कहानी उर्दू कहानी-संग्रह सोजेवतनमें 1908 में प्रकाशित हुई थी।

कहानी का कथावस्तु -

यह कहानी सच्चे प्रेमी के प्रेम परीक्षा की कहानी है। इस कहानी में अनमोल रतन के रूप में देशभक्त का चित्रण है। इस कहानी में प्रेम के लिए संघर्ष का चित्रण है। कहानी का अंत सुखद है। यह कहानी तात्कालीन स्वतंत्रता आन्दोलन को एक नई दिशा देता है, यथा- दिलफ़िगार ने मेंहदी-रची हथेलियों को चूमते हुए खून का कतरा उस पर रख दिया और उसकी पूरी कैफियत पुरजोश लहजे में कह सुनायी। वह खामोश भी न होने पाया था कि यकायक यह सुनहरा परदा हट गया और दिलफ़िगार के सामने हुस्न का एक दरबार सजा हुआ नजर आया, जिसकी एक-एक नाजनीन जुलेखा से बढ़कर थी। दिलफ़रेब बड़ी शान के साथ सुनहरी मसनद पर सुशोभित हो रही थी। दिलफ़िगार हुस्न का यह तिलिस्म देखकर अचम्भे मे पड़ गया और चित्रलिखित-सा खड़ा रहा कि दिलफ़रेब मसनद से उठी और कई कदम आगे बढ़कर उससे लिपट गयी। गानेवालियों ने खुशी के गाने शुरू किये, दरबारियों ने दिलफ़िगार को नजरें भेंट कीं और चॉँद-सूरज को बड़ी इज्जत के साथ मसनद पर बैठा दिया। जब वह लुभावना गीत बंद हुआ तो दिलफ़रेब खड़ी हो गयी और हाथ जोड़कर दिलफ़िगार से बोली-ऐ जाँनिसार आशिक दिलफ़िगार! मेरी दुआएँ बर आयीं और खुदा ने मेरी सुन ली और तुझे कामयाब व सुर्खरू किया। आज से तू मेरा मालिक है और मैं तेरी लौंडी! यह कहकर उसने एक रत्नजटित मंजूषा मँगायी और उसमें से एक तख्ती निकाली जिस पर सुनहरे अक्षरों से लिखा हुआ था – ‘खून का वह आखिरी कतरा जो वतन की हिफाजत में गिरे दुनिया की सबसे अनमोल चीज है।

देशकाल व वातावरण –

        कहानी ने अंग्रजों के अधीनता के जमाने की नारी चेतना पर काम की है| नारी को तात्कालीन समय में घर की चहर दिवारी में रखने के लिए भारतीय लोग मजबूर थे| समाज जाति-धर्म में बंटे थे| देश में लोग हिंदूवादी और मुस्लिम संस्कृति के नाम पर एक-दुसरे के विरोधी थे| ऐसे समय में प्रेमचन्द ने मुस्लिम संस्कृति को देश भक्त के रूप में चित्रण करके समाज के बीच ऐकता की भावना संचार की| यथा - दिलफ़िगार ने समझा अब काम तमाम हो गया कि मरनेवाले ने धीमे से कहा-भारतमाता की जय! और उनके सीने से खून का आखिरी कतरा निकल पड़ा। एक सच्चे देशप्रेमी और देशभक्त ने देशभक्ति का हक अदा कर दिया। दिलफ़िगार पर इस दृश्य का बहुत गहरा असर पड़ा और उसके दिल ने कहा, बेशक दुनिया में खून के इस कतरे से ज्यादा अनमोल चीज कोई नहीं हो सकती। उसने फौरन खून की बूंद को, जिसके आगे यमन का लाल हेच भी है, हाथ में ले लिया और इस दिलेर राजपूत की बहादुरी पर हैरत करता हुआ अपने वतन की तरफ रवाना हुआ और सख्तियां झेलता हुआ आखिरकार बहुत दिनों के बाद रूप की रानी मलका दिलफ़रेब की ड्यौढ़ी पर जा पहुँचा और पैगाम दिया कि दिलफ़िगार सुर्खरू और कामयाब होकर लौटा है और दरबार में हाजिर होना चाहता है। दिलफ़रेब ने उसे फौरन हाजिर होने का हुक्म दिया। खुद हस्बे मालूम सुनहरे परदे की ओट में बैठी और बोली- दिलफ़िगार, अबकी तू बहुत दिनों के बाद वापस आया है। ला, दुनिया की सबसे बेशकीमत चीज कहाँ है?

कहानी के पात्र 

     कहानी के पात्र लोक प्रेमी, देशभक्त, राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत, हमेशा हौसला बढानें वाले पात्र हैं, यथा-

दिलफ़िगार – कहानी का मुख्य पात्र है जो कि दिलफरेब से बेपनाह प्रेम करता है। वह अपने प्रेम को सिद्ध करने के लिए कुछ भी करने के लिए तैयार है।

दिलफरेब- एक बेहद खूबसूरत स्त्री और कहानी की मुख्य नारी पात्र।

काला चोर- जो एक कैदी है। जुर्म करने के कारण उसे फांसी दी जा रही थी।

एक बुजुर्ग- जो दिफिगार की हौसला अफजाई करता है।

संवाद योजना –

      कहानी की संवाद योजना पात्रानुकूल है| परिवेश और कहानी की उदेश्य की पूर्ति में लेखक को पूरी तरह से सहयोग करते हैं| यथा -  दिलफ़रेब ने उससे कहा था कि अगर तू मेरा सच्चा प्रेमी है, तो जा और दुनिया की सबसे अनमोल चीज लेकर मेरे दरबार में आ। तब मैं तुझे अपनी गुलामी में कबूल करूँगी।

शैली -

यह कहानी वर्णात्मक, फ्लैशबैक शैली में लिखी गई उर्दू शब्दावली की बहुलता भी है, यथा -दिलफ़िगार इन्हीं खयालों में चक्कर खा रहा था और अक्ल कुछ काम नहीं करती थी। मुनीर शामी को हातिम-सा मददगार मिल गया। ऐ काश, कोई मेरा भी मददगार हो जाता! ऐ काश, मुझे भी उस चीज का, जो दुनिया की सबसे बेशकीमत चीज है, नाम बतला दिया जाता! बला से वह चीजें हाथ न आती मगर मुझे इतना तो मालूम हो जाता कि वह किस किस्म की चीज है। मैं घड़े बराबर मोती की खोज में जा सकता हूँ। मैं समुन्दर का गीत, पत्थर का दिल, मौत की आवाज़ और इनसे भी ज्यादा बेनिशान चीज़ों की तलाश में कमर कस सकता हूँ। मगर दुनिया की सबसे अनमोल चीज़! यह मेरी कल्पना की उड़ान से बहुत ऊपर है|

उदेश्य –

    कहानी ने अंग्रजों के अधीनता के जमाने की नारी चेतना पर काम की है| नारी को तात्कालीन समय में घर की चहर दिवारी में रखने के लिए भारतीय लोग मजबूर थे| समाज जाति-धर्म में बंटे थे| देश में लोग हिंदूवादी और मुस्लिम संस्कृति के नाम पर एक-दुसरे के विरोधी थे| ऐसे समय में प्रेमचन्द ने मुस्लिम संस्कृति को देश भक्त के रूप में चित्रण करके समाज के बीच ऐकता की भावना संचार की| 

    निष्कर्ष है कि "दुनिया की अनमोल रतन" प्रेमचन्द की लिखी गई प्रसिद्ध कहानी है | इसमें भारतीय लोगों के ह्रदय में देशभक्त, राष्ट्रीय-भावना को संचार करने के उदेश्य से लिखा गया है | इनके कहानी सम्बन्धी सभी तत्व कहानी को सफलता प्राप्त करने में सफल है | 

    अन्य लेख -  भाषा के विविध रूपों पर प्रकाश डालिए



Thursday, July 4, 2024

संस्कृति और सौन्दर्य की समीक्षा नवर सिंह सिंह

 संस्कृति और  सौंदर्य की समीक्षा

  'दूसरी परंपरा की खोज' नामवरसिंह जी की प्रसिद्ध पुस्तक है। इस पुस्तक में नामवरसिंह जी ने द्विवेदी जी को दूसरी परंपरा का जनक मानते हुए उनके समस्त सैद्धांतिक और व्यावहारिक आलोचना का सरगंभित विवेचन प्रस्तुत करते हैं। इसी क्रम में उन्होंने संस्कृति और सौंदर्य नामक निबंध में द्विवेदी जी के संस्कृति एवं सौंदर्य संबंधित दृष्टिकोण की व्यापकता और प्रासंगिकता का उद्घाटन किया है। इस लेख में डॉक्टर नामवर सिंह ने दो बातें- 'संस्कृति' और 'सौंदर्य' पर गंभीरता पूर्वक विचार किया है । संदर्भ उन्होंने तो द्विवेदी का ही दिया है, मगर उसी बहाने इन विषयों पर नामवर सिंह ने अपना विचार भी रखा है जो इन विषयों को समझने की दिशा में महत्वपूर्ण है। यह अनायास नहीं है कि प्रत्येक प्रगतिशील विचारकों के लिए 'सौंदर्य' और 'संस्कृति' का प्रश्न प्रमुखता रूप से विचारणीय रहा है, क्योंकि उन पर संस्कृत विरोधी  होने के साथ-साथ सौंदर्य विरोधी होने का भी आरोप लगाता रहा है। असल में ये न तो कभी संस्कृति विरोधी रहे और ना ही सौंदर्य विरोधी बल्कि यह इन दोनों में जो अभिजात्यापन का अतिरेक था या यूं कहे की संस्कृति और सौंदर्य को अभिजीत का हिस्सा मान लिया गया था उससे उनका विरोध था उनकी विवेचनाओं से संस्कृति और सौंदर्य का असली रूप सामने आया और पारंपरिक गलत व्याख्याओं और धारणाओं से मुक्ति मिली।

  संस्कृति को लेकर समय-समय पर तरह -तरह से विचार विमर्श होता रहा है। कुछ राजनीतिक प्रेरित तो कुछ स्वार्थ प्रेरित। इस विमर्श में द्विवेदी जी ने संस्कृति के जिन बुनियादी गुणों  की ओर इशारा किया था, उस पर पर्दा डालकर सभी विश्लेषक खुद को संस्कृति के नए विमर्श कार के रूप मे स्थापित करने लगे, एक राजनीति से प्रेरित होकर दिनकर जी ने 'संस्कृति के चार अध्याय' की रचना की और मिश्रा ,संस्कृति के स्वरूप' को स्थापित किया तो दूसरी राजनीति के तहत अज्ञेय ने संस्कार धर्मी संग्रह संस्कृति की वकालत की । नामवरजी लिखते हैं - "यदि दिनकर की "मिश्र संस्कृति" की एक राजनीति है तो अज्ञेय की संस्कार धर्मी संग्रहक संस्कृति भी किसी और राजनीति के अनुसंग से बच नहीं जाती ।" का इशारा साफ समझ जा सकता है।

     द्विवेदी जी ने भारतीय संस्कृति का सच उजागर करते हुए कहा था कि गंधर्व यक्ष किन्नर आदि आर्य के बाद के समाज के जातियों के विश्वासों और सौन्दर्य  कल्पना का सबसे अधिक ऋणी है। उनकी यह स्थापना किसी खास मकसद की उपज नहीं थी और ना ही किसी तरह की राजनीति से प्रेरित। वह तो उनके अतीत कालीन साहित्य के अध्ययन और चिंतन की स्वाभाविक अभिव्यक्ति थी। असल में संस्कृति को लेकर दक्षिणपंथी सोच हमेशा विशुद्धतावाद पर जोर देती रही है। इस विशुद्धता पर न केवल वह गर्व करती रही है बल्कि इस आर्य संस्कृति को वह सर्वश्रेष्ठ भी मानती रही है और इसके लिए वह तरह-तरह का तर्क भी गढ़ती  रही है इसका विरोध करते हुए द्विवेदी जी लिखते हैं- " देश और जाति की विशुद्ध संस्कृति केवल बात की बात है सब कुछ में मिलावट है, सब कुछ अविशुद्ध है। द्विवेदी जी यह भली भांति समझते थे कि भारतीय संस्कृति का स्वरूप आर्यत्तर जातियों की देन स्वीकार किए बिन निर्मित नहीं होता। मगर आर्य संस्कृति के विशुद्धतावादी पत्थर इसे कतई  स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। द्विवेदी जी इसी सोच पर हमला किया था। नामवर जी ने ठीक लिखा है-" और सच कहा जाए तो आर्य संस्कृति की शुद्धता के अहंकार पर चोट करने के लिए ही ' अशोक का फूल' लिखा गया है, प्रकृति वर्णन के लिए नहीं। यह निबंध द्विवेदी जी के शुद्ध पुष्प प्रेम का प्रमाण नहीं बल्कि संस्कृति दृष्टि का अनूठा दस्तावेज है।

  दिनकर जी के सांस्कृतिक चिंतन "संस्कृति के चार अध्याय" को अज्ञेय  जी ने "मिश्र संस्कृति" का आग्रह करार देते हुए उसे राजनीति प्रेम बताया था।

  अज्ञेय जी का स्पष्ट मानना था की संस्कृतियों प्रभाव ग्रहण करती हैं, अपने अनुभव को समृद्धतर बनती हैं। लेकिन यह प्रक्रिया मिश्रण की नहीं है।अज्ञेय जी  संस्कृति की संग्रह्ता पर जो देते हैं और उसके मूल रूप को शुद्ध मानते हैं। द्विवेदी जी का मत इन दोनों से भिन्न है। द्विवेदी जी संस्कृति के दोनों पक्ष "संग्रहकता" और "त्याग" दोनों पर जोर देते हैं.....  " हमारे सामने समाज का आज जो रूप है वह न जाने कितने ग्रहण और त्याग का रूप है।'' द्विवेदी जी के चिंतन को आगे बढ़ते हुए नामवर जी समकालीन संदर्भ में संस्कृति के प्रति आसक्ति या मोह को जड़ता बताते हैं। वह इस संदर्भ में द्विवेदी जी को कोट करके दरअसल संस्कृति के विषय में अपने प्रगतिशील पक्ष को ही वाणी देते हैं।

   ....." आज हमारे भीतर जो मोह है संस्कृति और कला के नाम पर जो आसक्ति है, धर्मके आचरण और सत्य निष्ठा के नाम पर जो जड़ीमा है (द्विवेदी जी) उसे किस प्रकार ध्वस्त किया जाए (नामवर जी)  द्विवेदी? जी ने संस्कृति के प्रति जिस  "मोह और जड़ता" को बाधक तत्व के रूप में विश्लेषित किया था। उन बाधक तत्वों को धंसत करने की चिंता दरअसल समय की प्रगतिशील चिंता थी जो तब और प्रासंगिक हो उठी थी, जब दो ध्रुवीय राजनीति से प्रेरित मिश्र  और शुद्ध संस्कृति को टकराहट आकार ग्रहण करने लगी थी। राजनीति की एक धारा से प्रेरित होकर दिनकर जी ने मिश्र संस्कृति का आग्रह प्रस्तुत किया तो दूसरी धारा से प्रेरित होकर अज्ञेय जी ने उसकी संग्राहकता पर जोर देते हुए कहीं ना कहीं उसके शुद्धता की वकालत की। शुद्धता वादी खेमे वालों का स्पष्ट मानना था कि अंतर भावों अनुभूतियां और आध्यात्मिक उपलब्धियां के स्तर पर संस्कृतियों का वास्तविक मिलन अत्यंत कठिन होता है।" उन लोगों का मानना था की संस्कृति की तथाकथित समासिकता वास्तव में सभ्यता के क्षेत्र में ही लागू होती है। संस्कृति के प्रति इस तरह के जड़ आग्रह से कोई भी प्रगतिशील खेमे का चिंतन सहमत नहीं हो सकता । नामवरजी  ने मिश्र संस्कृति और विशुद्ध संस्कृति के राजनीति पर प्रहार करते हुए लिखा- " यदि दिनकर की समसामयिक संस्कृति का संबंध राजनीतिक के एक पछ से है तो स्वयं आगे और गोविंद चंद्र पांडे को शुद्ध संस्कृति का संबंध भी राजनीति के दूसरे पद से जोड़ा जा सकता है।

स्कंदगुप्त का चरित्र चित्रण/SKNDGUPT KA CHRITR CHITRN - जयशंकर प्रसाद/ JAY SHANKAR PRASAD

                                                       स्कंद गुप्त का चरित्र चित्रण

      जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित 'स्कंद गुप्त' नाटक ऐतिहासिक है | इसका प्रकाशन वर्ष 1928 ई है । नाटक में पांच अंक हैं।  इसमें 'स्कंद गुप्त' ऐतिहासिक चरित्र है | ये ईसा पूर्व पांचवी शताब्दी के मगध नरेश है | इनके पिता का नाम 'कुमार गुप्त' है, और कुमार गुप्त के सबसे बड़े पुत्र हैं | स्कंद गुप्त ने शक और हूण आक्रमणकारियों से 'मालवा' राज की रक्षा की थी, जो 'कुमा का युद्ध' के नाम पर प्रसिद्ध है | युद्ध विजय के बाद 'विक्रमादित्य' की उपाधि धारण की थी | स्कंद गुप्त ने शत्रुओं  के लोमहर्षक आक्रमणों के साथ-साथ नाना आंतरिक और पारिवारिक षडयंत्रों का भी सामना करते हुए अपनी वीरता एवं राजनीतिक ज्ञान का परिचय दिया था | नाटक के अनुसार स्कंद गुप्त के चरित्र में वीर पुरुष, स्वाभिमानी, नारी रक्षक, के साथ-साथ देशभक्ति के गुण पाए जाते हैं।

वीर पुरुष -

  स्कंद गुप्त 'गुप्त वंश' के वीर और युवा राजकुमार हैं। इन्होंने शक और हूण आक्रमण  से मालवा राज्य की रक्षा की है  | मालवा में शक और हूण द्वारा हो रहे अत्याचार को सहन नहीं करता है | कष्ट सहकर भी आक्रमणकारियों से लोहा लेता है | प्रसाद जी नाटक में लिखते हैं - सिंहों के विहार स्थली (भारत) में श्रृंगाल वृन्द (आक्रमणकारी) सड़ा लोथ नोच रहे हैं | यह कथन स्कंदगुप्त गुप्त का है | इससे मालूम होता है कि स्कंदगुप्त वीर पुरुष हैं |

देशभक्त पुरुष  -

       स्कंद गुप्त देशभक्त राजकुमार हैं | इन्होंने मालवा राज की विदेशी आक्रमणकारियों से रक्षा की है | वह मालवा पर अधिकार नहीं चाहता और नहीं यश- प्रशंसा चाहता है, वह सिर्फ दुःख सहकर भी मालवा की रक्षा करना चाहता है | वह कहता है - "आर्य साम्राज्य का नाश इन्हीं आंखों को देखा है | हृदय काँप उठता है, देशाभिमान  गरजने लगता है | मेरा स्थायित्व न हो, मुझे अधिकार की आवश्यकता नहीं | यह नीति और सरदारों का महान आश्रय वृक्ष गुप्त साम्राज्य हरा भरा रहे और कोई भी इसका उपयुक्त रक्षक हो | देश रक्षा के लिए ही वह सन्नवद्ध होता है, अनेक अंतर-बाह्य, प्रपंच-संघर्ष नहीं करता है | वह यही कहता है कि -  भटार्क ! "यदि कोई साथी ना मिला तो साम्राज्य के लिए नहीं, जन्मभूमि के उद्धार के लिए मैं अकेला युद्ध करूंगा" तथा "देखना मेरे बाद जन्म भूमि की दुर्दशा न हो।"

संवेदित और मर्यादित प्रेमी पुरुष-

   स्कंद गुप्त संवेदित और प्रेमी पुरुष है। मालवा को आक्रमणकारियों की अधीनता को सह नहीं सके। स्कंद गुप्त चिंतन प्रवृत्ति का है। जब भी वह किसी पर अत्याचार दिखता है, सह नहीं सकता और संघर्ष के लिए तैयार रहता है। इन्हीं सब गुण से नाटक में देवसेना, विजय आदि नारी पात्र प्रभावित होते हैं और स्कंद गुप्त से प्रेम करने लगते हैं। स्कंद गुप्त ने विजया और देवसेना के प्रेमी भाव को समझते हुए अपने को भी ब्रह्मचर्य जीवन जीने की शपथ लेता है।

आत्मविश्वासी, निस्वार्थ और मंगलमय पुरुष-

     स्कन्दगुप्त आत्मविश्वासी, निस्वार्थ और मंगलमय पुरुष हैं। जिसके कारण इनका व्यक्तित्व बहुत सुंदर है। "जन्मभूमि सर्वदापी गरीयसी" का उपासक है, तथा "उसकी रक्षार्थ प्राणों की बाजी तक लगता रहता है बारंबार।"

साहसी, उत्साही और निर्भय पुरुष -

   स्कंदगुप्त साहसी, उत्साही और निर्भय पुरुष हैं। मालवा-नरेश, बंधु वर्मा की सहायता, याचना पर उसका तुरंत मालवा पहुंचना हो, अथवा फिर माता देवकी की रक्षार्थ मगध जा पहुंचना। 'खिन्गल' जैसे आतातायी आक्रमणकारियों का सामना करना हो या 'कुमा के युद्ध' में असफल रह जाने पर भी पुन: सैन्य शक्ति एकत्रित करना। जन सामान्य तक को प्रेरित  तथा जागृत करना उसके यह सभी कार्य उसकी वीरता का परिचायक है। स्कंद गुप्त का क्षत्रिय धर्म के प्रति कथन है- "शरणागत की रक्षा भी क्षत्रिय का धर्म है।"

स्कंदगुप्त के अन्य गुण चरित्र

     स्कंद गुप्त धीरोधात वर्ग के नायक है। जैसे - राज कुल उत्पन्न, भव्य व्यक्ति का धनी, वीर कर्तव्य निभानेवाला, दृढ़  प्रतिज्ञा करने वाला, धार्मिक प्रवृत्ति संपन्न, सतत्कर्मनिष्ठ तथा प्रभावशाली व्यक्ति हैं ।

       निष्कर्ष  है कि 'स्कंदगुप्त' नाटक में 'स्कंदगुप्त' कर्मवीर और उदात्त व्यक्तित्व वाला महापुरुष है। इन्हीं सब गुण से इसके प्रति लोग श्रद्धा और भक्ति से आकर्षित होते हैं। स्कंदगुप्त उत्तम चरित्र का सृजक और उत्तम चरित्र का व्यक्तित्व वाला, हिंदी साहित्य का अनुपम इतिहासिक महापात्र हैं।

   

          

 

Wednesday, July 3, 2024

मानस का हंस उपन्यास की समीक्षा - अमृतलाल नागर

                              मानस का हंस उपन्यास की समीक्षा


      'मानस का हंस' पंडित अमृतलाल नागर कृत  ऐतिहासिक और जीवनी परक उपन्यास है। इसमें उपन्यासकार पंडित नागर जी द्वारा महाकवि तुलसीदास की और प्रामाणिक और विवादास्पद जीवनी को जीवंत शिल्प चेतना के जरिए विशेष ध्यान रखा है । पात्रों का चरित्र-चित्रण यहां मनोवैज्ञानिक के धरातल पर होने के कारण अत्यंत ही स्वाभाविक बन पड़ा है । इस दृष्टि से कुछ एक उदाहरण यहां देखिए

           अहंभाव की अभिव्यक्ति

     पीहर का कुत्ता भी प्यारा लगता है यह तो मेरा भाई है (रत्नावली का कथन)

"पति से अधिक उसे अपने पीहर का कुत्ता प्यारा लगता है । कैसी ठेस पहुंचाने वाली बात है। नहीं, इस बात पर मैं कदापि समझौता नहीं करूंगा, रत्नावली को यह समझना ही होगा कि विवाह के बाद स्त्री के लिए पति ही सर्वोपरि है । उसके कुंतकों और अन्य के प्रति भी उसे सदर सप्रेम सर झुकाना चाहिए, फिर मैं तो न्याय की बात कर रहा हूं। मेरे घर में बैठकर व्यर्थ से मेरा अपमान करके मेरी रोटी छीनने वाला व्यक्ति अब इस घर में कदापि नहीं आ पाएगा। रत्नावली मुझे भले ही प्राणों से अधिक प्यारी लगती हो पर उसके इस कृत्य को मैं कदापि पराश्रय नहीं दूंगा । (तुलसीदास का कथन)

  कथावस्तु-

     'मानस का हंस' ऐतिहासिक उपन्यास है । इसके मुख्य पात्र महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी हैं, इस उपन्यास में तुलसीदास जी के चरित्र के माध्यम से अतीत और वर्तमान को जोड़ते हुए सम-सामयिक जीवन पर विचार किया गया है। यहां उपन्यास लक्ष्य और मर्यादा में इतिहास और जीवनी से भी कहीं अधिक विस्तृत और व्यापक बन गया है। तुलसी के जीवन वृत्त के साथ ही तब युगीन राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक विसंगतियों का सफल चित्रण किया गया है । इसकी कथानक सुगठित, रोचक और विचार पूर्ण होने के साथ ही जीवन के अत्यंत निकट है।

पात्र एवं चरित्र चित्रण-

       मानस का हंस उपन्यास में गोस्वामी तुलसीदास जी केंद्रीय पात्र हैं। संपूर्ण कथानक का ताना बाना तुलसी को ही केंद्र में रखकर बनाया गया है। इसके अन्य पात्रों में रत्नावली, गंगाराम, मेधा भगत, राजा भगत, टोडर, बटेश्वर मिश्र आदि हैं। इनमें से अधिकांश पात्रों का चरित्र चित्रण मनोवैज्ञानिक धरातल पर रचा गया है जिसके कारण पात्र सजीव सा अंकन हुए हैं।

संवाद योजना-

  प्रस्तुत उपन्यास में संवाद पात्र अनुकूल, भावानुकूल, प्रभाव उत्पादक और व्यंजन हैं, जैसे- 

रूदन कंपित स्वर में रत्नावली बोली -

    'जा रही हूं ।'

'रो रही हो रत्न ?'

'संतोष के आंसू हैं।'

'अब न बहाओ देवी, नहीं तो मेरे मन का धैर्य और संतोष बढ़ जाएगा, सेवा का धर्म कठिन होता है।'

करते हुए गोसाई जी ने एक गहरी ठंडी सांस ली।" 

     यहां कहानी को यथार्थ परक और प्रामाणिक बनने के लिए तो यूगीन परिस्थितियों चित्रित हुई है।


निसंदेह मानस के हंस के पात्र के संवाद चरित्र प्रकाशक होने के साथ-साथ वातावरण को निर्मित करने में और कथा को विकास की गति देने में नित्य सहमत और सफल हैं।  जितने सरल और सहज संवाद यहां प्रस्तुत हुए हैं, उतना अन्यत्र बहुत कम ही मिलते हैं।

देश काल और वातावरण-

    मानस के हंस उपन्यास में वातावरण ऐतिहासिक हैं कथानांक गोस्वामी तुलसीदास के 16वीं शताब्दी की जुबिन घटनाओं पर आधारित है । और, इस समय के सामाजिक, धार्मिक परिस्थितियों का चित्रण किया है। उपन्यास की घटनाओं की परिस्थितियों के चित्रण में पात्रों की मनोस्थिति पूर्ण सहायक है। वातावरण के निर्माण में चित्रण की भूमिका को देखिए-

  तुलसीदास आसान छोड़ कर उठे, द्वार खोला । सामने ही राजकुमारी की आंखों का प्यासा सागर लहरा रहा था। तुलसीदास उसे देखकर बोले - 'बैठने आई है? बैठिए, मैं यहां से जाता हूं ।' कह कर तुलसीदास कोटि का पूरा द्वार खोलकर बाहर निकलने लग।"

" राजा धीमे, करुण स्वर में कह रहे थे- भौजी तुमसे कुछ नहीं चाहती, बस एक बार तुमसे मिल लेना चाहती है। तुम्हारे दर्शन करके उन्हें सब कुछ मिल जाएगा।"

उद्देश्य-

    उपन्यासकार मानस का हंस के रचना के उद्देश्य में पूर्ण सफल है । इन्हें सामाजिक जीवन के यथार्थ की परिप्रेक्ष्य को उजागर करने का प्रयास किया है ।रचनाकार ने गोस्वामी तुलसीदास के जीवन चरित्र के माध्यम से कल्पना और इतिहास के सहयोग से पूर्णता सामाजिक यथार्थ को समसामयिक युग में सफल चित्रण करने में सफलता प्राप्त की हैं। कथाकार ने तुलसीदास को संघर्षीय जीवन में ढाल कर मानव जीवन के आदर्श को आदर्शवादी बनाए हैं। जिससे घटनाओं की सृष्टि करने के क्रम में यथार्थ को गला घुटने से रचनाकार ने बचा लिया है। यहां कहानी कर स्त्री पुरुष के जीवन संघर्ष में एक दूसरे की सहभागिता को पूर्णता और महानता सिद्ध की है।

भाषा शैली

    मानस का हंस उपन्यास की भाषा में पात्र अनुकूलता के साथ ही सरलता, प्रभावी, सजीवता, रोचकता, सहजता, संप्रेषणीय आदि सभी गुण से विद्यमान हैं ।मानस की भाषा उपन्यास की वातावरण और परिवेश निर्माण में पूर्ण रूप से सहायक है । तुलसीदास, रत्नावली, मेधा भगत की संवाद और भाषा में शुद्ध और तत्सम प्रधान शब्दावलियां हैं कहीं-कहीं भाषा में व्यंग्य का समावेश है। जैसे- 

  "लड़के आंगन में खड़े हो गए।  एक ने कहा-

" अरे जा रे लवार। झूठ झूठ की न हाँक ।"

  मैं गुरूजी के चरण कमल की सौगंध खाकर कहता हूं । मैं पीपल वाले को कई रूपों में देखा है।

गंगा बोल - राम जी समर्थ है। अपनी निंदा बड़ाई को वह आप संभाल सकते हैं, तुम भूत-प्रेतो से मत खेलो तुलसी, नहीं, अब तो बात दे चुका, मैं जाऊंगा।"

' तुलसी के चरित्र में निहित भक्ति भावना की अनन्यता के साथ ही स्वाभिमान की अभिव्यक्ति है।'


शैली- 

     उपन्यास में विवरणत्मकता, विश्लेषणत्मकता शैली के साथ-साथ अन्य शैली भी विद्यमान है। शैली का प्रयोग इतना घनिष्ठ है कि उपन्यास में आंचलिकता पूर्ण रूप से संजीव हो उठा है। रमणीक जगह के वर्णन में कथा पूर्ण रूप से काव्यात्मक हो गया है।

           निष्कर्ष है कि मानस का हंस उपन्यास में रचनाकार आधुनिक यथार्थवादी सामाजिक जीवन को चित्रण करने में सफल हुए हैं। इसकी सफलता प्राप्त करने में उपन्यास की भाषा, पात्रों की संवाद योजना और शैली पूर्ण से समर्थ है ।

'कोशी का घटवार' कहानी की समीक्षा (शरद जोशी)

 'कोशी का घटवार' कहानी की समीक्षा

कौशिकी घटवार कहानी नई कहानी युग के प्रतिनिधि कहानीकार शरद जोशी द्वारा लिखी गई है। यह यथार्थवादी कहानी है । इस कहानी में लेखक ने पहाड़ी जनजीवन को और परिवेश को चित्रित किया है। कहानी के मुख्य पात्र में गोसाई और लक्षमा हैं । इनकी अलावे और दस गौण पात्र हैं। कुल पात्रो को देखा जाए तो संख्या के आधार पर बारह हैं । विजय मोहन सिंह ने इस कहानी को पहाड़ी आंचलिकता की कहानी कहा है।

कहानी की कथावस्तु- 

        'कोशी की घटवार' कहानी में गोसाई और लक्षमा  के उद्धत प्रेम की कथा को प्रस्तुत किया गया है । गोसाई और लक्ष्मा दोनों एक दूसरे से प्रेम करते हैं। गोसाई अनाथ है और फौज में नौकरी करता है । लक्षमा का पिता यह सोचकर कि उसके आगे पीछे भाई-बहन नहीं, माई-बाप नहीं, परदेस में बंदूक की नोंक पर जान रखने वालों को छोकरी कैसे दे दें हम। वह लक्षमा की शादी अन्य लड़के के साथ कर देता है। एक बच्चा होने के बाद लक्ष्मण विधवा हो जाती है। और उससे मै के आकर रहना पड़ता है । पिता का निधन होने के बाद चाचा-भतीजे समझते हैं कि लक्षमा अपने पिता का हक मांगेगा लेकिन लक्ष्रमा कहती है कि मुझे पिताजी के हिस्से का कुछ नहीं चाहिए। उधर पंद्रह साल फौज में नौकरी करने के पश्चात गोसाई गांव में आकर अपने अकेलापन को दूर करने के लिए गेहूं पीसने का घट 'पनचक्की' लगता है। एक दिन चक्की पीसने आई हुई लक्षमा के साथ गोसाई की मुलाकात होती है दोनों में वार-तलाप होता है । गुसाई भी अविवाहित है, अकेलेपन से पीड़ित है। वह चाह कर भी विधवा लक्षमा के साथ विवाह नहीं कर पाता क्योंकि समाज की मान्यता उसे ऐसा करने नहीं देती । कहानी में दोनों के अकेलेपन की पीड़ा को व्यक्त किया गया है। कुल मिलाकर कहें तो यह स्वतंत्र उत्तर भारत की प्रतिनिधि कहानी है। इसमें भारतीय मध्यम वर्गीय और निम्न वर्गीय सामाजिक जनजीवन को चित्रित किया गया है।

देशकाल और वातावरण -
            शरद जोशी द्वारा लिखी गई कहानी 'कोशी  की घटवार' स्वतंत्रयोत्तर काल के नई कहानी युग की रचना है। कहानीकार ने इस कहानी के माध्यम से मध्यवर्गीय और निम्न वर्गीय सामाजिक जीवन के परिवेश और वातावरण को दिखाया है। इसके अंतर्गत इन्होंने एक पहाड़ी समाज और परिवेश के जीवन को लिया है, इनके माध्यम से जीवन में प्रेम की असफलता, अकेलेपन की पीड़ा, निश्छल प्रेम की  अभिव्यक्ति, मानसिक अन्तर्द्वन्द, गरीबी एवं दरिद्रता का चित्रण, विधवा विवाह की समस्या को चित्रित की है। कुल मिला कर शरद जोशी ने आजादी के बाद की सामाजिक मुलहीनता एवं वर्ग विषमता की परिवेश को इस कहानी के केंद्र में रखा है।

पात्र योजना- 
        इस कहानी में कुल 12 पात्र हैं किंतु मुख्य दो पात्र हैं इसमें लक्षमा और गोसाई । गौण पात्रों में नरसिंह (बूढ़ा प्रधान), धरम सिंह (हवलदार), रमुआ/राम सिंह (लक्षमा के पति), किशन सिंह (गोसाई के युनिट का सिपाही), लक्षमा का लड़का, लक्षमा के जेठ-जेठानी, लक्षमा के काका-काकी आदि हैं। पात्र भारत के पारंपरिक सामाजिक और नैतिक हैं जो पूरी नैतिकता के साथ समाज में जीवन जीते हैं। पात्र पूरी तौर से समाज में पारदर्शी जीवन जीते हैं। पात्र में सामाजिक रूढ़िवादी इतनी हावी है कि प्रेम हार जाता है।

संवाद योजना-
  कोसी के घटवार कहानी की संवाद योजना पात्र अनुकूल और कहानी के परिवेश के अनुकूल है। कहानी में ग्रामीण पहाड़ी जनजीवन है। पात्र भी पहाड़ी जनजीवन की गवार, ठेठ सामाजिक परिवेश के लोग हैं। उनकी संवाद योजना परिस्थिति के अनुकूल है। जैसे लक्षमा और गोसाई के संवाद में- गोसाई ने बच्चों की ओर देखा । वह दोनों हाथों में चाय का मग थामें हमें टकटकी लगाकर गुसाई को देखे जा रहा था । लक्षमा ने आग्रह के स्वर में कहा, "चाय के साथ खानी हो, तो खा लो । फिर ठंडी हो जाएगी।"
" मैं तो अपने टेम से ही खाऊंगा। यह तो बच्चे के लिए ... "   स्पष्ट कहने में उसे झिझक महसूस हो रही थी, जैसे बच्चों के संबंध में चिंतित होने की उसकी चेष्टा अनाधिकार हो।
 'बा - बा जी ! वह तो अपने घर से खाकर ही आ रहा है । मैं रोटियां बना कर रख आई थी ।" अत्यंत संकोच के साथ लक्षमा ने आपत्ति प्रकट कर दी। कहानी की संवाद योजना कहानीकार के लक्ष्य को पूरी तरह से संवहन किया है। इसके माध्यम से कहानीकार की विषय और पत्रों की मनोदशा पूर्ण रूप से स्पष्ट हो जा रही है।


शैली- 
       कहानी फ्लैशबैक शैली पर आधारित है। कहानी में पीछे के पुराने कथा को भी चित्रित किया गया है ।जिससे फ्लैशबैक शैली उपस्थित हो गई है, यथा- सामने पहाड़ी के बीच की पगडंडी से सर पर बोझ लिए एक नई आकृति इस और चली आ रही थी, गोसाई ने सोचा वही से आवाज देकर उसे लौटा दें। कोसी ने चिकने, काई लगे पत्थरों पर कठिनाई से चलकर उसे वहां तक जाकर केवल निराशा लौट जाने को क्यों वह बाध्य करें। यहां पर भूतकाल में बात हो रही है जो फ्लैशबैक शैली का स्पष्ट उदाहरण है।

कहानी की भाषा -
    कहानी की भाषा पूरी तरह से पात्रोनुकूल और विषय के अनुकूल है । पात्रों में सिर्फ संवाद ही नहीं है बल्कि इसकी अभिव्यक्ति में कहानी की उद्देश्य पूरी समर्थकता के साथ स्पष्ट हो जाती है। कहानी की भाषा में आम भारतीय जन जीवन की तरह सहज, सरल और बोधगम्य है। भाषा कोसी नदी की तरह सहज और सरल है। भाषा में किसी भी तरह का आडंबर नहीं है।

कहानी का उद्देश्य-
     कहानीकार इस कहानी के माध्यम से स्वतंत्रयोत्तर भारत के जनजीवन को उजागर करने का प्रयास किया है खासकर ग्रामीण मध्यम वर्गीय और निम्न वर्गीय के जीवन को। जिनके माध्यम से ग्रामीण जीवन की सामाजिक, आर्थिक दशा को दिखाया गया है। कहानी में चित्रित है कि सामाजिक रीति परंपरा की दुर्दशा के चलते ही पात्रों की जीवन लक्ष्य लाचारी और कठिनाई से भरी हुई है।

        निष्कर्ष है कि शरद जोशी द्वारा लिखी गई कहानी 'कोशी की घटवार' यथार्थवादी सामाजिक कहानी है ।इसके माध्यम से कहानीकार ने भारत की पारंपरिक रीति रिवाज से ग्रस्त मानव जीवन को कठिनाई की लाचारी भरी जीवन से जीने की व्यवस्था को दिखाया है।


       

अमीर खुसरो के दोहे, मुकरियाँ और गीत /amir khsro ke dohe mukriyan or geet

                                         अमीर खुसरो के दोहे, मुकरियाँ और गीत   1.      एक नार किया -----------------------------------...