Sunday, August 6, 2023

पत्रकारिता के प्रकार व कार्य /ptrkarita ke prkaar v kary - डॉ विद्याधर मेहता


             पत्रकारिता के प्रकार व कार्य

आज इसका क्षेत्र बहुत व्यापक हो चुका है और विविधता भी लिए हुए है। शायद ही कोई क्षेत्र बचा हो जिसमें पत्रकारिता की उपादेयता को सिद्ध न किया जा सके। इसलिए यह कहना अतिशयोक्ति न होगी कि आधुनिक युग में जितने भी क्षेत्र हैं सबके सब पत्रकारिता के भी क्षेत्र हैं, चाहे वह राजनीति हो या न्यायालय या कार्यालय, विज्ञान हो या प्रौद्योगिकी हो या शिक्षा, साहित्य हो या संस्कृति या खेल हो या अपराध, विकास हो या कृषि या गांव, महिला हो या बाल या समाज, पर्यावरण हो या अंतरिक्ष या खोज। इन सभी क्षेत्रों में पत्रकारिता की महत्ता एवं उपादेयता को सहज ही महसूस किया जा सकता है। 

दूसरी बात यह कि लोकतंत्र में इसे चौथा स्तंभ कहा जाता है। ऐसे में इसकी पहुंच हर क्षेत्र में हो जाता है। इस बहु आयामी पत्रकारिता के कितने प्रकार हैं उस पर विस्तृत रूप से चर्चा की जा रही है।

  1. खोजी पत्रकारिता
  2. वाचडाग पत्रकारिता
  3. एडवोकेसी पत्रकारिता
  4. पीत पत्रकारिता
  5. पेज थ्री पत्रकारिता
  6. खेल पत्रकारिता
  7. महिला पत्रकारिता
  8. आर्थिक पत्रकारिता
  9. ग्रामीण एवं कृषि पत्रकारिता
  10. रेडियो पत्रकारिता
  11. व्याख्यात्मक पत्रकारिता
  12. विकास पत्रकारिता
  13. संसदीय पत्रकारिता
  14. टेलीविजन पत्रकारिता
  15. विधि पत्रकारिता
  16. फोटो पत्रकारिता
  17. विज्ञान पत्रकारिता
  18. शैक्षिक पत्रकारिता
  19. सांस्कृतिक-साहित्यिक पत्रकारिता
  20. अपराध पत्रकारिता
  21. राजनैतिक पत्रकारित

1. खोजी पत्रकारिता

खोजी पत्रकारिता वह है जिसमें आमतौर पर सार्वजनिक महत्व के मामले जैसे भ्रष्टाचार, अनियमितताओं और गड़बड़ियों की गहराई से छानबीन कर सामने लाने की कोशिश की जाती है। स्टिंग ऑपरेशन खोजी पत्रकारिता का ही एक नया रूप है। खोजपरक पत्रकारिता भारत में अभी भी अपने शैशव काल में है। 

2. वाचडाग पत्रकारिता 

  इसका मुख्य कार्य सरकार के कामकाज पर निगाह रखना है और कहीं भी कोई गड़बड़ी हो तो उसका पर्दाफाश करना है। इसे परंपरागत रूप से वाचडाग पत्रकारिता कहा जा सकता है।

3. एडवोकेसी पत्रकारिता

एडवोकेसी यानि पैरवी करना। किसी खास मुद्दे या विचारधारा के पक्ष में जनमत बनाने के लिए लगातार अभियान चलानेवाली पत्रकारिता को एडवोकेसी पत्रकारिता कहा जाता है। मीडिया व्यवस्था का ही एक अंग है। और व्यवस्था के साथ तालमेल बिठाकर चलनेवाले मीडिया को मुख्यधारा मीडिया कहा जाता है।  दूसरी ओर कुछ ऐसे वैकल्पिक सोच रखनेवाला मीडिया होते हैं जो किसी विचारधारा या किसी खास उद्देश्य की पूर्ति के लिए निकाले जाते हैं। इस तरह की पत्रकारिता को एडवोकेसी (पैरवी) पत्रकारिता कहा जाता है। जैसे राष्ट्रीय विचारधारा, धार्मिक विचारधारा से जुड़े पत्र पत्रिकाएँ।

4. पीत पत्रकारिता 

पाठकों को लुभाने के लिए झूठी अफवाहों, आरोपों प्रत्यारोपों प्रेम संबंधों आदि से संबंधित सनसनीखेज समाचारों से संबंधित पत्रकारिता को पीत पत्रकारिता कहा जाता है। इसमें सही समाचारों की उपेक्षा करके सनीसनी फैलाने वाले समाचार या ध्यान खींचने वाला शीर्षकों का बहुतायत में प्रयोग किया जाता है। इसे समाचार पत्रों की बिक्री बढ़ाने, इलेक्ट्रिनिक मीडिया की टीआरपी बढ़ाने का घटिया तरीका माना जाता है। इसमें किसी समाचार खासकर ऐसे सार्वजनिक क्षेत्र से जुड़े व्यक्ति द्वारा किया गया कुछ आपत्तिजनक कार्य, घोटाले आदि को बढ़ाचढ़ाकर सनसनी बनाया जाता है। इसके अलावा पत्रकार द्वारा अव्यवसायिक तरीके अपनाए जाते हैं।

5. पेज थ्री पत्रकारिता 

पजे थ्री पत्रकारिता उसे कहते हैं जिसमें फैशन, अमीरों की पार्टियों महिलाओं और जानेमाने लोगों के निजी जीवन के बारे में बताया जाता है।

6. खेल पत्रकारिता 

खेल से जुड़ी पत्रकारिता को खेल पत्रकारिता कहा जाता है। खेल आधुनिक हों या प्राचीन खेलों में होनेवाले अद्भुत कारनामों को जग जाहिर करने तथा उसका व्यापक प्रचार-प्रसार करने में खेल पत्रकारिता का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। आज पूरी दुनिया में खेल यदि लोकप्रियता के शिखर पर है तो उसका काफी कुछ श्रेय खेल पत्रकारिता को भी जाता है।

7. महिला पत्रकारिता 

पत्रकारिता के क्षेत्र में महिलाओं की भागिदारी भी देखी जाने लगी है। दूसरी बात यह है कि शिक्षा ने महिलाओं को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक बनाया है। अब महिलाएं भी अपने करियर के प्रति सचेत हैं। महिला जागरण के साथ साथ महिलाओं के प्रति अत्याचार और अपराध के मामले भी बढ़े हैं। महिलाओं की सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बहुत सारे कानून बने हैं। महिलाओं को सामाजिक सुरक्षा दिलाने में महिला पत्रकारिता की अहम भूमिका रही है। आज महिला पत्रकारिता की अलग से जरूरत ही इसलिए है कि उसमें महिलाओं से जुड़े हर पहलू पर गौर किया जाए और महिलाओं के सवार्ंगीण विकास में यह महत्वपूर्ण भूमिका निभा सके।

8. आर्थिक पत्रकारिता 

आर्थिक पत्रकारिता में व्यक्तियों संस्थानों राज्यों या देशों के बीच होनेवाले आर्थिक या व्यापारिक संबंध के गुण-दोषों की समीक्षा और विवेचन की जाती है। 

9. ग्रामीण एवं कृषि पत्रकारिता 

भारत में आज भी लगभग 70 प्रतिशत आबादी गांवों में बसती है। देश के बजट प्रावधानों का बड़ा हिस्सा कृषि एवं ग्रामीण विकास पर खर्च होता है। ग्रामीण विकास के बिना देश का विकास अधूरा है। ऐसे में आर्थिक पत्रकारिता का एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है कि वह कृषि एवं कृषि आधारित योजनाओं तथा ग्रामीण भारत में चल रहे विकास कार्यक्रम का सटीक आकलन कर तस्वीर पेश करें।

10. रेडियो पत्रकारिता

मुद्रण के आविष्कार के बाद संदेशा और विचारों को शक्तिशाली आरै प्रभावी ढंग से अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचना मनुष्य का लक्ष्य बन गया। इसी से रेडियो का जन्म हुआ। रेडियो के आविष्कार के जरिए आवाज एक ही समय में असंख्य लोगों तक उनके घरों को पहुंचने लगा। इस प्रकार श्रव्य माध्यम के रूप में जनसंचार को रेडियो ने नये आयाम दिए। आगे चलकर रेडियो को सिनेमा और टेलीविजन और इंटरनेट से कडी चुनौतियां मिली लेकिन रेडियो अपनी विशिष्टता के कारण आगे बढ़ता गया और आज इसका स्थान सुरक्षित है। रेडियो की विशेषता यह है कि यह सार्वजनिक भी है और व्यक्तिगत भी। 

11. व्याख्यात्मक पत्रकारिता

पत्रकार से अपेक्षा की जाती है कि वह घटनाओं की तह तक जाकर उसका अर्थ स्पष्ट करे और आम पाठक को बताए कि उस समाचार का क्या महत्व है। पत्रकार इस महत्व को बताने के लिए विभिन्न प्रकार से उसकी व्याख्या करता है। इसके पीछे क्या कारण है। इसके पीछे कौन था और किसका हाथ है। इसका परिणाम क्या होगा। इसके प्रभाव से क्या होगा आदि की व्याख्या की जाती है। साप्ताहिक पत्रिकाओं संपादकीय लेखों में इस तरह किसी घटना की जांच पड़ताल कर व्याख्यात्मक समाचार पेश किए जाते हैं। टीवी चैनलों में तो आजकल यह ट्रेडं बन गया है कि किसी भी छोटी सी छोटी घटनाओं के लिए भी विशेषज्ञ पेनल बिठाकर उसकी सकारात्मक एवं नकारात्मक व्याख्या की जाने लगी है।

12. विकास पत्रकारिता 

सरकारी योजनाओं से देश का विकास हो रहा है या नहीं उसका आकलन करना ही विकास पत्रकारिता का कार्य है। विकास पत्रकारिता के जरिए ही इसमें यथा संभव सुधार लाने का मार्ग प्रशस्त होगा।

13. संसदीय पत्रकारिता 

लोकतंत्र में संसदीय व्यवस्था की प्रमुख भूमिका है। संसदीय व्यवस्था के तहत संसद में जनता द्वारा चुने हुए प्रतिनिधि पहुंचते हैं। बहुमत हासिल करने वाला शासन करता है ताे दूसरा विपक्ष में बैठता है। दानेों की अपनी अपनी अहम भूमिका होती है। इनके द्वारा किए जा रहे कार्य पर नजर रखना पत्रकारिता की अहम जिम्मेदारी है क्योंकि लोकतंत्र में यही एक कड़ी है जो जनता एवं नेता के बीच काम करता है। जनता किसी का चुनाव इसलिए करते हैं तो वह लोगों की सुख सुविधा तथा जीवनस्तर सुधारने में कार्य करे। लेकिन चुना हुआ प्रतिनिधि या सरकार अगर अपने मार्ग पर नहीं चलते हैं तो उसको चेताने का कार्य पत्रकारिता करती है। इनकी गतिविधि, इनके कार्य की निगरानी करने का कार्य पत्रकारिता करती है।

14. टेलीविजन पत्रकारिता 

मनोरंजन के क्षेत्र में फिल्मों से संबंधित कार्यक्रम, नाटक, धारावाहिक, नृत्य, संगीत तथा मनोरंजन के विविध कार्यक्रम शामिल हैं। इन कार्यक्रमों का प्रमुख उद्देश्य लोगों का मनोरंजन करना है। शिक्षा क्षेत्र में टेलीविजन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। 

15. विधि पत्रकारिता 

नए कानून, उनके अनुपालन और उसके प्रभाव से लोगों को परिचित कराना बहुत ही जरूरी है। कानून व्यवस्था बनाए रखना, अपराधी को सजा देना से लेकर शासन व्यवस्था में अपराध रोकने, लोगों को न्याय प्रदान करना इसका मुख्य कार्य है। इसके लिए निचली अदालत से लेकर उच्च न्यायालय, सर्वोच्च न्यायालय तक व्यवस्था है। इसमें रोजाना कुछ न कुछ महत्वपूर्ण फैसले सुनाए जाते हैं। कई बड़ी बड़ी घटनाओं के निर्णय, उसकी सुनवाई की प्रक्रिया चलती रहती है। इस बारे में लोग जानने की इच्छुक रहते हैं, क्योंकि कुछ मुकदमे ऐसे होते हैं जिनका प्रभाव समाज, संप्रदाय, प्रदेश एवं देश पर पड़ता है। दूसरी बात यह है कि दबाव के चलते कानून व्यवस्था अपराधी को छोड़कर निर्दोष को सजा तो नहीं दे रही है इसकी निगरानी भी विधि पत्रकारिता करती है।

16. फोटो पत्रकारिता 

फोटो पत्रकारिता ने छपाई तकनीक के विकास के साथ ही समाचार पत्रों में अहम स्थान बना लिया है। कहा जाता है कि जो बात हजार शब्दांे में लिखकर नहीं की जा सकती है वह एक तस्वीर कह देती है।

17. विज्ञान पत्रकारिता

वर्तमान में विज्ञान ने काफी तरक्की कर ली है। इसकी हर जगह पहुंच हो चली है। विज्ञान में हमारी जीवन शैली को बदलकर रख दिया है। वैज्ञानिकों द्वारा रोजाना नई नई खोज की जा रही है। इसमें कुछ तो जन कल्याणकारी हैं तो कुछ विध्वंसकारी भी है। जैसे परमाणु की खोज से कई बदलाव ला दिया है लेकिन इसका विध्वंसकारी पक्ष भी है। इसे परमाणु बम बनाकर उपयोग करने से विध्वंस हागेा। इस तरह विज्ञान पत्रकारिता दोनों पक्षों का विश्लेषण कर उसे पेश करने का कार्य करता है। जहां विज्ञान के उपयोग से कैसे जीवन शैली में सुधार आ सकता है तो उसका गलत उपयोग से संसार ध्वंस हो सकता है।

18. शैक्षिक पत्रकारिता 

पत्रकारिता सभी नई सूचना को लोगों तक पहुंचाकर ज्ञान में वृद्धि करती है। जब से शिक्षा को औपचारिक बनाया गया है तब से पत्रकारिता का महत्व और बढ़ गया है। जब तक हमें नई सूचना नहीं मिलेगी हमें तब तक अज्ञानता घेर कर रखी रहेगी। उस अज्ञानता को दूर करने का सबसे बड़ा माध्यम है पत्रकारिता। चाहे वह रेडियो हाे या टेलीविजन या समाचार पत्र या पत्रिकाएं सभी में नई सूचना हमें प्राप्त हातेी है जिससे हमें नई शिक्षा मिलती है। एक बात आरै कि शिक्षित व्यक्ति एक माध्यम में संतुष्ट नहीं होता है। वह अन्य माध्यम को भी देखना चाहता है। यह जिज्ञासा ही पत्रकारिता को बढ़ावा देता है तो पत्रकारिता उसकी जिज्ञासा के अनुरूप शिक्षा एवं ज्ञान प्रदान कर उसकी जिज्ञासा को शांत करने का प्रयास करता है। इसे पहुंचाना ही शैक्षिक पत्रकारिता का कार्य है।

19. सांस्कृतिक-साहित्यिक पत्रकारिता 

मनुष्य में छिपी प्रतिभा, कला चाहे वह किसी भी रूप में हो उसे देखने से मन को तृप्ति मिलती है। इसलिए मनुष्य हमेशा नई नई कला, प्रतिभा की खोज में लगा रहता है। इस कला प्रतिभा को उजागर करने का एक सशक्त माध्यम है पत्रकारिता। कला प्रतिभाओं के बारे में जानकारी रखना, उसके बारे में लोगों को पहुंचाने का काम पत्रकारिता करता है। इस सांस्कृतिक साहित्यिक पत्रकारिता के कारण आज कई विलुप्त प्राचीन कला जैसे लोकनृत्य, लोक संगीत, स्थापत्य कला को खोज निकाला गया है और फिर से जीवित हो उठे हैं। दूसरी ओर भारत जैसे विशाल और बहु सांस्कृतिक वाले देश में सांस्कृतिक साहित्यिक पत्रकारिता के कारण देश की एक अलग पहचान बन गई है। कुछ आंचलिक लोक नृत्य, लोक संगीत एक अंचल से निकलकर देश, दुनिया तक पहचान बना लिया है। समाचार पत्र एवं पत्रिकाएं प्रारंभ से ही नियमित रूप से सांस्कृतिक साहित्यिक कलम को जगह दी है। इसी तरह चैनलों पर भी सांस्कृतिक, साहित्यिक समाचारों का चलन बढ़ा है। 

20. अपराध पत्रकारिता

राजनीतिक समाचार के बाद अपराध समाचार ही महत्वपूर्ण होते हैं। बहुत से पाठकों व दर्शकों को अपराध समाचार जानने की भूख होती है। इसी भूख को शांत करने के लिए ही समाचारपत्रों व चैनलों में अपराध डायरी, सनसनी, वारदात, क्राइम फाइल जैसे समाचार कार्यक्रम प्रकाशित एवं प्रसारित किए जा रहे हैं। एक अनुमान के अनुसार किसी समाचार पत्र में लगभग पैंतीस प्रतिशत समाचार अपराध से जुड़े हातेे हैं। इसी से अपराध पत्रकारिता को बल मिला है। दूसरी बात यह कि अपराधिक घटनाओं का सीधा संबंध व्यक्ति, समाज, संप्रदाय, धर्म और देश से हातेा है। अपराधिक घटनाओं का प्रभाव व्यापक हातेा है। यही कारण है कि समाचार संगठन बड़े पाठक दर्शक वर्ग का ख्याल रखते हुए इस पर विशेष फोकस करते हैं।

21. राजनैतिक पत्रकारिता 

समाचार पत्रों में सबसे अधिक पढ़े जानेवाले आरै चैनलों पर सर्वाधिक देखे सुने जानेवाले समाचार राजनीति से जुड़े होते हैं। राजनीति की उठा पटक, लटके झटके, आरोप प्रत्यारोप, रोचक रोमांचक, झूठ-सच, आना जाना आदि से जुड़े समाचार सुर्खियों में होते हैं। राजनीति से जुड़े समाचारों का पूरा का पूरा बाजार विकसित हो चुका है। राजनीतिक समाचारों के बाजार में समाचार पत्र और समाचार चैनल अपने उपभेक्ताओं को रिझाने के लिए नित नये प्रयोग करते नजर आ रहे हैं। चुनाव के मौसम में तो प्रयोगों की झंडी लग जाती है और हर कोई एक दूसरे को पछाड़कर आगे निकल जाने की होड़ में शामिल हो जाता है। राजनीतिक समाचारों की प्रस्तुति में पहले से अधिक बेबाकी आयी है। लोकतंत्र की दुहाई के साथ जीवन के लगभग हर क्षेत्र में राजनीति की दखल बढ़ा है और इस कारण राजनीतिक समाचारों की भी संख्या बढ़ी है। ऐसे में इन समाचारों को नजरअंदाज कर जाना संभव नहीं है। 

                             पत्रकारिता के कार्य 

पत्रकारिता का कार्य समय के अनुसार बदल गया है। प्रारंभिक काल में इसका मुख्य कार्य था नए विचार का प्रचार करना। तकनीकी विकास, परिवहन व्यवस्था में विकास, उद्योग एवं वाणिज्य के प्रसार के कारण आज पत्रकारिता एक उद्योग बन चुका है। आज पत्रकारिता का मुख्य कार्य सूचना प्रदान करना, शिक्षा प्रदान करने, लोगों का मनोरंजन करना, जनमत को आकार देना, लोकतंत्र की रक्षा करना। मनुष्य जिज्ञासु है। उसका नई नई चीजो के बारे में, घटनाओं के बारे में ताजा जानकारी रखना सहज स्वभाव है। घटनाओं की सूचना प्रदान करते हुए पत्रकारिता इस जिज्ञासा को शांत करने का काम करता है। पुस्तक का ज्ञान सीमित होता है दूसरी आरे संसार में हर क्षेत्र मे नए बदलाव आते रहते हैं। मनुष्य शिक्षित होने के बाद उसके आगे की जानकारी हासिल करना चाहता है तथा अन्य क्षेत्र की भी जानकारी हासिल करना चाहता है। यह नए ज्ञान उसे पत्रकारिता के माध्यम से ही मिल पाता है। इस तरह पत्रकारिता न केवल सूचना प्रदान करता है बल्कि पाठक, दर्शक एवं श्रोता को सीधे एवं अनौपचारिक रूप से शिक्षा प्रदान करने का कार्य करती है। पत्रकारिता यानी मीडिया लोगों  के मध्य जागरूकता लाने का एक सशक्त माध्यम है। इस लोकतांत्रिक व्यवस्था मे इसका एक बड़ा कार्य है लोकतंत्र की रक्षा करना। चूिंक यह सत्ता एवं जनता के बीच एक कड़ी है तो लोकतंत्र की सुरक्षा एवं बचाव का यह सबसे बड़ा माध्यम है। एक बात और आज की स्थिति में मीडिया ही सरकार और जनता का एजेडं ा तय करने लगा है। मीडिया में जो मुद्दा बन गया है वह सरकार एवं जनता का मुद्दा बनता जा रहा है।

 निष्कर्ष - राजनीतिक समाचारों की आकर्षक प्रस्तुति लोकप्रिया हासिल करने का बहुत बड़ा साधन बन चुकी है। पत्रकारिता का इतिहास चाहे कितना पुराना हो या नया लेकिन 21वीं शताब्दी में यह एक ऐसा सशक्त विषय के रूप में उभरा है जिसकी पहुंच अकल्पनीय बन गई है। आज इसका क्षेत्र बहुत व्यापक हो चुका है और विविधता भी लिए हुए है। शायद ही कोई क्षेत्र बचा हो जिसमें पत्रकारिता की उपादेयता को सिद्ध न किया जा सके। इसलिए यह कहना अतिशयोक्ति न होगी कि आधुनिक युग में जितने भी क्षेत्र हैं सबके सब पत्रकारिता के भी क्षेत्र हैं, चाहे वह राजनीति हो या न्यायालय या कार्यालय, विज्ञान हो या प्रौद्योगिकी हो या शिक्षा, साहित्य हो या संस्कृति या खेल हो या अपराध, विकास हो या कृषि या गांव, महिला हो या बाल या समाज, पर्यावरण हो या अंतरिक्ष या खोज। इन सभी क्षेत्रों में पत्रकारिता की महत्ता एवं उपादेयता को सहज ही महसूस किया जा सकता है। दूसरी ओर लोकतंत्र में इसे चौथा स्तंभ का दर्जा मिलने के कारण तथा इसकी पहुंच हर क्षेत्र में होने के कारण यह बहु आयामी बन गई है।


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सुंदरकांड का प्रतिपाद्य\उदेश्य /sunderkand ka prtipadhy /udeshy - Dr. vidyadhar mehta

                                             सुंदरकांड का प्रतिपाद्य\उदेश्य


         तुलसीकृत 'रामचरितमानस' हिंदी साहित्य की सबसे श्रेष्ठ महाकाव्य है | इसमें सात कांड है|,  जिसे मानव जीवन के समस्त उद्धारक जीवन उपयोगी तत्वों को संग्रहित  किया गया है| रामचरितमानस में राम का चरित्र और गुणगान है पर इसी की सुंदरकांड  ऐसी भाग है जहां राम के भक्त हनुमान के चरित्र को उपस्थित की गयी  है | यहां तुलसी की भक्ति का दास्य भाव पूर्ण रूप से परिष्कृत हो उठी है|  सुंदरकांड की समापन हनुमान जी द्वारा लंका प्रस्थान से प्रारंभ होकर समुंद्र द्वारा श्री राम जी की गुणगान की महिमा तक है|

            तुलसीदास कृत रामचरितमानस के सुंदरकांड में- हनुमान जी का लंका प्रस्थान, सुरसा से भेंट, छाया पकड़ने वाली राक्षस का वध, लंका वर्णन, लंकिनी पर प्रभाव, लंका में प्रवेश, हनुमान विभीषण संवाद, हनुमान जी का अशोक वन में सीता को देखकर दुखी होना, रावण का सीता को भय दिखाना, सीता त्रिजटा संवाद, सीता हनुमान संवाद, हनुमान जी द्वारा अशोक वाटिका विध्वंस, अक्षय कुमार का वध और मेघनाथ का हनुमान जी को नागपाश में बांध कर सभा में ले जाना, हनुमान रावण संवाद, लंका दहन, लंका जलाने के पश्चात हनुमान जी का सीता जी से विदा मांगना और चूड़ामणि पाना, समुद्र के इस पार आना, सबका लौटना, मधुबन प्रवेश, सुग्रीव मिलन, श्री राम हनुमान संवाद श्री, राम जी का बनार सेना के साथ चलकर समुद्र तट पर पहुंचना, मंदोदरी रावण संवाद, रावण की विभीषण का समझाना और विभीषण का अपमान उनका भगवान श्री राम जी के शरण के लिए प्रस्थान और स्वयं समुद्र पार करने के लिए विचार, रावण दूत  सुख सारण और लक्ष्मण के पत्र को लेकर लौटना, दूत का रावण को समझाना और लक्ष्मण जी का पत्र देना, समुद्र पर राम जी का क्रोध और समुंद्र की विनती श्रीराम गुणगान की महिमा आदि प्रसंग है | इन प्रसंगों में मानवीय जीवन व समाज को निम्न प्रकार की दर्शन प्राप्त है -


१.    उदात मानवीय गुण का चित्रण –

                               इन प्रसंगों में मानव जीवन के अनगिनत ऐसे भाव हैं जिन्हें अपनाकर वर्तमान जीवन को उज्जवल और साकार किया जा सकता है मानव के उदात गुणों, गुणों का फल प्रतिफल यहां दिखाया गया है यहां रावण यानी राक्षस को और अवगुणों का प्रतीक बताया गया है जिसमें मानव के अमानवीय गुण क्रोध, मोह, माया, काम आदि पर सचेत रहने की सीख दी गई है इधर राम यानी वानर दलों में सद्गुण, त्याग, तप, दया, प्रेम का प्रतीक मानते हुए जीवन के उद्धारक प्रभाव को दिखाया गया है |


२.    उदात मानवीय सांस्कृतिक चेतना


               इस प्रसंग में मानवीय चेतना, संस्कृति, दूत, भाई बंधु, माता-पिता, मित्र, सखा, पत्नी, नारी, आदि के माध्यम से उदात जीवन और समाज की उपस्थिति दी है | हनुमानजी और सुरसा की भेंट आदि प्रसंग में वीर पुरुष के बुद्धि और बल की महिमा गान किया गया है | हनुमान विभीषण संवाद में संत व्यक्ति के मन वचन के रूप-स्वरूप की अभिव्यंजना की गई है | सीता हनुमान संवाद में माता पुत्र के मूल कर्तव्य को दृष्टिपात किया गया है | अक्षय कुमार मेघनाथ रावण आदि पात्रों के माध्यम से मानव के अहंकार, काम, क्रोध, मोह आदि अमानवीय गुणों के प्रभाव को दिखाया गया है | लंका दहन ऐसा पड़ाव है जहां कुबुद्धि से ग्रसित व्यक्ति दूसरों के विनाश को छोड़ अपना ही विनाश को प्राप्त करता है | मंदोदरी रावण संवाद प्रसंग में पत्नी के कर्तव्य को दिखाया है | रावण और विभीषण के प्रसंग में भाई-भाई के कर्तव्य पर विचार भाव दिखाया गया है | सुख, सारण और रावण के प्रसंग में दूत के कर्तव्य पर विचार-विमर्श किया गया है | इसी प्रकार राम और समंदर का प्रसंग में मानव को अपने कर्म पथ पर बाधा डालने वाले पर भी नीति से समझा-बुझाकर सफलता प्राप्त करने की ओर बढ़ने की शिक्षा है |


३.    उदात मानवीय जीवन प्रयोजन –


           इस प्रकार सुंदरकांड में मानवता के  समस्त उदात गुणों को विवश करता हुआ उपस्थित है जहां तुलसीदास के काव्य प्रयोजन उद्देश्य भी दृष्टिपात होता है जिसमें तुलसीदास खास हनुमान जी को प्रमुख नायक बनाकर मानव जीवन के उदात् गुणों को इस कारण उपस्थित किया है जो मानव जीवन के लिए जहाज हैं जिन्हें अपनाकर मानव भवसागर को सहज ही पार कर सकता है तभी तो हनुमान आदि अन्य वीर भी अपने कर्तव्य पथ के पक्ष को राम के समान ही अमूल्य रूप से जगत कल्याण के लिए अपने जीवन को समर्पित करते हैं

             इस सुंदरकांड में मानव जीवन के सहायक राजनीतितंत्र, मानव तंत्र और संस्कृति तंत्र पर भी सावधान रहने विधि की निधि के रूप में प्रस्तुत किया गया है जिसमें मंत्री, वैद्य और गुरु यह तीन यदि भय, आशा से प्रिय बोलते हैं तो राज्य, शरीर और धर्म इन तीनों को शीघ्र ही नाश होने की ओर से सावधान किया गया है

                 यहां विभीषण अपने बड़े भाई के लिए हितकर बातें करते हैं और कहते हैं

                              हे नाथ ! काम, क्रोध, मोह और लोभ यह सभी नरक के रास्ते हैं अर्थात कुविचार मार्ग के फलस्वरूप हैं इन्हें छोड़िए और राम के समान कार्य को करिए जहां त्याग, वैराग्य, प्रेम, सद्भाव, सेवा भाव, अनुशासन, गुण, भलाई के कार्य की जाती है उसे मार्ग को अपनाये | इस प्रकार सामाजिक जीवन में भाई बंधुओं के हितकारी वचन की पराकाष्ठा यहां दिखाई दे रही है |



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Sunday, July 30, 2023

भारतीय साहित्य की विशेषताएँ - डा० विद्याधर मेहता

  

                      भारतीय साहित्य की विशेषताएँ

   भारतीय साहित्य विश्व के अन्य साहित्य के लिए प्रेरक व् सम्मानीय है, क्योंकि यह साहित्य विस्तृत क्षेत्रफल, प्राचीन इतिहास व् परम्परा, बहुभाषिक भावना, मनिकंचन कलात्मक रूप व् स्वरूप, बहु विषयक भावना के साथ ही उदात मानवीय चेतना से प्रेरित है |

भारतीय साहित्य विपुल क्षेत्र में विस्तृत फैला है | यह परगना, राज्य, प्रान्त, देश के आलावे विदेशों में भी फैला है, यह देशिक से विदेशिक भाषा भी बन गई है | यह भारत के आलावे मलेशिया, इंडोनेशिया, फिजी, सूरीनाम, वियतनाम, चीन, जापान इंग्लैंड, थाईलैंड, मोरिसश आदि अनेकों देशों में फैला है | इन देशों में विश्व की एक-तिहाई जनसंख्या निवास करती है इसलिए विश्व की दूसरी सबसे अधिक लोगों के द्वारा बोली जाने वाली भाषा है | इन देशो में हिंदी साहित्य अनेकों सम्मेलन-संगोष्टी आयोजित करती है फलस्वरूप भारतीय साहित्य सम्पर्कभाषा, राजभाषा और राष्ट्रभाषा से संज्ञापित हुई है और ग्लोबलाइजेशन की भाषा बन गई है |

  भारतीय साहित्य की इतिहास और परम्परा बहुत ही प्राचीन है | भारतीय साहित्य अलिखित, लिखित तथा वेदों से शुरू होकर लौकिक ग्रन्थ रामायण, महाभारत, श्रीमदभागवतगीता, पुराण, उपनिषद् मेघदुतम, कुमारसंभवम, गीत-गोविन्द, हितोपदेश, पंचतन्त्र, बोद्ध और जैन विद्वान्नों के द्वारा रचित पाली, प्राकृत, अपभ्रंश भाषा के रचनाएँ, नाथ-सिद्ध साधकों की योग व् साधना की ग्रन्थों, रासों की वीराख्यांक काव्य धारा, सगुण-निर्गुण के धर्म व् ब्रह्म की सिद्धांत, रहीम व् वृन्द की नीतिपरक दोहे, आधुनिक काल के नव-जागरण युग की साहित्य साकेत, प्रियप्रवास, कामायनी, गोदान, जूठन, एक यात्रा यह भी, आदि जीवनोपयोगी साहित्य की परम्परा है |

भारतीय साहित्य बहुविषयक भावना से प्रेरित है | भारतीय साहित्य की बहुविषयक में विज्ञान, साहित्य, इतिहास, ज्योतिष, गणित, समाज, भुगोल, कामशास्त्र, राजनीति, दर्शन, तर्कशास्त्र, अर्थशास्त्र आदि भाव से विकास की निरंतर गति में अग्रसर है | ये सभी विषय विश्व साहित्य को मार्गदर्शन का कार्य करती है | भारतीय साहित्य के गणित की दशमलव पद्धति, दर्शन व् ज्योतिष, व्याकरण-कोश ग्रन्थ, कृषि की वैदिक पद्धति वर्तमान में विश्व को प्रगति की आईना दिखाने की कार्य करती है | इनके आलावे भारतीय साहित्य की संगीत, नृत्य, खेल, विश्व साहित्य के बीच विशिष्ठ पहचान रखती है |

भारतीय साहित्य का रूप-स्वरूप व् कलात्मकता की दृष्टि से अप्रतिम स्थान है | साहित्य गद्य-पद्य के आलावे प्रबंध, खंडकाव्य, लघुकथा, यात्रा-वृतांत, निबन्ध, कहानी, जीवनी, उपन्यास, पत्र-पत्रिकाएँ, नाटक आदि रूपों में पाई जाती है | इनके आलावे विशिष्ठ अलंकारिक, रसात्मकता की योजना, सग्राहय शब्द-शक्ति, प्रभावाव्यंजक संगीतात्मकता, व परम्परा से युक्त है | कोई विशाल कथात्मकता में प्रसिद्ध है तो कोइ लघुकथा में साथ ही कोई तो विश्व के महान महापुरुष के जीवनी से और कोई विज्ञानं की तर्क व सिद्धांत से |

भारतीय साहित्य बहुभाषिक भावना से बंधी हुई है | साहित्य की भाषा संस्कृत, पालि, प्राकृत, अपभ्रंश, हिंदी, उर्दू, फारसी, ब्रज, अवधी, मैथिल, बंगला, उड़िया, असमिया, तमिल, मराठी, गुजराती, पंजाबी, बिहारी, नागपुरी, खोरठा, कुरमाली आदि अनेकों ठेठ व् परिमार्जित भाषा और बोली के रूप में हैं | भारतीय भाषा संस्कृत को तो भाषाओँ की जननी से संज्ञापित की जाती है |

भारतीय साहित्य उदात्त मानवीय चेतना से गर्वित है | यह विश्व के दुसरे साहित्य को उदात्त मानवीय चेतना के लिए सीख देती है | भारतीय साहित्य के गर्भ में सत्य शिवम सुन्दरम्, अहिंसा परम धर्म:, कर्म ही सफलता की कुंजी है, नर सेवा नारायण सेवा, वसुधैव कुटुम्बकम आदि मानवीय चेतना के मूल मन्त्र विद्यमान हैं | ऐसी उदात्त भावना की चेतना विश्व साहित्य में विरले ही पाई जाती है, इसलिए तो भारत जैसे देश को “विश्व गुरु” के उपाधि से नवाजा गया है | 

यहाँ की साहित्य लोकतान्त्रिक चेतना को संवरण करती है, मानव में हमेशा भाई-चारा व् विश्वास की भावना से हमेशा प्रेरित करते रहती है | यह लोगों को सिखाती है कि “सत्यमेव जयते” अर्थात् सत्य के रास्ते चलकर ही विजय प्राप्त की जा सकती है | फिर, विश्व के शक्तिशाली राष्ट्रों को शांति के लिए “पंचशील सिद्धांत” से प्रेरित की |

 भारतीय साहित्य ने मानव समुदाय के बीच उदात्त सांस्कृतिक भावना से प्रेरित करने के लिए समाज में परस्परिक नाते-रिश्ते की भावना भरी है, समाज में हम किसी को चाचा, भतीजा, भाई, बहन, फुआ, दादा-दादी, नाना-नानी, मित्र जैसे रिश्ते का सूत्र दिखाई है |

 हमारी सभ्यता वैयतिक नहीं बल्कि समष्टि है, हम सेवा भावना से ही जीवन को संचारित करते है जिसको भारतीय साहित्य के विद्वानों ने एक सूत्र में “धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष” के रूप में पुरुषार्थ के रूप में पहचान दी है|

निष्कर्षत: भारतीय साहित्य को विश्व भर के अन्य देश के साहित्य के लिए गुरु के समान माना जाना चाहिए | इसकी उदात्त की भावना हमें लोकरक्षक, लोकप्रेरक, लोकनायक जैसे व्यापक उपाधि प्राप्त करने में कोइ कसर नहीं छोडती है, अंतत: हम कहेंगे की भारतीय साहित्य विश्व भर के साहित्य के लिए प्रेरक प्राप्ति करने की अमूल्य निधि है |  


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भारतीय साहित्य की अवधारणा - डा० विद्याधर मेहता

                 भारतीय साहित्य की अवधारणा

भारतीय साहित्य में दो शब्दों का युग्म है | इसमें पहला शब्द “भारतीय” और दूसरा शब्द “साहित्य” है | पहला शब्द “भारतीय” में भी दो शब्द युग्म है – पहला शब्द है “भा” और दूसरा शब्द है “रत” है, इसमें ‘भा’ का अर्थ– प्यारा, प्रिय, जो सभी को प्रिय लगे, और ‘रत’ का अर्थ है- हमेशा, अनवरत, हर-पल, यानी जो हमेशा प्रिय कार्य में लगा रहा हो | इस प्रकार भारतीय से अभिप्राय है- प्यार, महब्बत और बन्धुत्त्व की भावना से सदा अनवरत जीवन जीने वाले मानव व प्राकृतिक समूह से है |

ऐसी ही “साहित्य” में तीन शब्दों का युग्म है- पहला शब्द है ‘सा’ दूसरा है ‘हि’ और तोसरा है ‘त्य’ है | इसमें पहला शब्द ‘सा’ का अर्थ है- सारा संसार, पुरे जगत जीवों के लिए बोध है, तथा ‘हि’ का अर्थ है- भलाई, हितार्थ, लाभ के लिए, और ‘त्य’ का अर्थ होता है- के लिए | इस प्रकार साहित्य का अभिप्राय है- समस्त जीवों के लिए हितार्थ की संग्रह रचना से है |

भारतीय साहित्य विश्व के अन्य साहित्य के समक्ष बहुत ही व्यापकता के साथ उपस्थित होता है, क्योंकि इसके कलेवर में अगाध विषय, भाव व कला की भंडार है | भारतीय साहित्य बहुविषयक भावना से प्रेरित है | भारतीय साहित्य की बहुविषयक में विज्ञान, साहित्य, इतिहास, ज्योतिष, गणित, समाज, भुगोल, कामशास्त्र, राजनीति, दर्शन, तर्कशास्त्र, अर्थशास्त्र आदि भाव से विकास की निरंतर गति में अग्रसर है | ये सभी विषय विश्व साहित्य को मार्गदर्शन का कार्य करती है | भारतीय साहित्य के गणित की दशमलव पद्धति, दर्शन व् ज्योतिष, व्याकरण-कोश ग्रन्थ, कृषि की वैदिक पद्धति वर्तमान में विश्व को प्रगति की आईना दिखाने की कार्य करती है | इनके आलावे भारतीय साहित्य की संगीत, नृत्य, खेल, विश्व साहित्य के बीच विशिष्ठ पहचान रखती है | इसके सहह्रदय में अनेकता में एकता की भावना रहती है, सदा जीवन उच्च विचार मन में ध्याती रहती है, जिस कारण सान्निध में रहने वाले विदेश मूल के साहित्य बिचार करते हुए कहते हैं- अहा ! भारतीय साहित्य की समन्वयक भावना, यह तो हमारे लिए “गुरु” है | इतना ही नहीं, भारतीय साहित्य को लोकरक्षक, लोकसेवक, लोकनायक, लोकरंजक और लोकप्रेरक कहते हुए लगातर भविष्य में विकास की दौड़ में नेतृत्त्व करते रहने की कामना करते हैं | भारतीय साहित्य पर आचार्य महावीर प्रसाद दूवेदी कहते हैं- ^^Kku&jkf”k ds lafpr dks”k dk uke lkfgÙ; है ] 


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अभिशप्त कहानी / यशपाल - डा० विद्याधर मेहता

 

अभिशप्त कहानी


अभिशप्त कहानी


‘निरंजन सिंहा, तूं की कमाया, एवें जान खपायी, लोकां ने मक्सीकियां व्याइयां, गोरियां बसाइयां, पुतकुड़ियां जने-व्याहे। तूँ कलमकल्ला (अकेला) खाली-दा-खाली। भाई-भतीजे ही आरे लांदा रया। फिर आप-से-आप एक लंबी उसांस भर वह कुर्सी से उठ खिड़की के पास खड़ा हो जाता है, पर्दा हटा बाहर देखने लगता है, बाहर लॉन पर कोई पानी की नाली खुली छोड़ गया है और सारी सड़क पर पानी इकट्ठा होता जा रहा है। कोई और वक्त होता, तो आवाज दे देता। बस आज एकटक आसमान की ओर देखता रहता है, चिड़ियों का एक झुंड चांव-चांव करता आसमान से गुजर गया है। वह मन-ही-मन गुनगुनाता है, ‘पंछी चले रैन-बसेरे।‘ फिर जोर से गुनगुनाता--‘पंछी चले रैन बसेरे।‘ फिर एकाएक चुप हो जाता है। एक उसांस भर भरता है, और ‘निरंजना, तेरा रैन बसेरा बी हुण छेती आ जायेगा।‘


फ्रिज तक जाते हुए घुटने का दर्द और तेज हो जाता है। वह बीयर पीते हुए अखबार की सुखियां पढ़ना शुरू कर देता है। इधर नजर इतनी जाती रही है कि मोटी छपाई के अलावा कुछ पढ़ ही नहीं पाता। मास्टर भी तो कई दिनों से नहीं आया। उसके शहर के जान-पहचानवाले का दोहता है, जब से आया है, मास्टर की सारी जिम्मेदारी अपने पर ले ली ‘लोकीं (लोग) क्यों कलपते हैं, मास्टर दूजी व्या लाया। जट्टां के पुत्तर दूजी-तीजी नहीं व्याहेंगे तो क्या करेंगे। अमरीका हो या कनाडा, जट्ट का पुत्तर जट्ट ही रहेगा। खाए-पीए, मौज करेगा। औरत जात का क्या है, एक नहीं दो करो। जिनी देर खिला-पिला सको, जरूर करो। पहली को भी थोड़ (कमी) तो नहीं होने देगा।‘ वह क्या खिला-पिला नहीं सकता था ? क्यों नहीं गांव से कोई सुंदरसी जट्टी ले आया ? निरंजन, इधर तू कुछ ज्यादा ही सोचने लगा है। ऐसी बातें पहले तो कभी तेरे मन में नहीं आती थीं। पहले तो रिश्तेदार कहते भी रहे, वह टालता रहा। फिर लोगों के अपने ही परिवार हो गए, जितने बड़े परिवार, उतने बड़े मुंह, और ‘‘और वे कभी भर नहीं पाए।


किसी भी साथवाले को गांव से सुंदर बहू के साथ लौटते देख मन में कुछ उमड़ कर रह जाता। हौसला कुछ करने का होता, तो सामने घिर जाती रोती-बिलखती भाभी। पांच छोटे बच्चे और भाई की बिना गर्दन की लाश ! जो बातें निरंजन हमेशा भुलाए रखना चाहता है, आज वे ही बार-बार याद आ रही हैं। निरंजना तेरा वक्त करीब आ गया है, तभी तो बचपन, जवानी, अधेड़ उम्र सभी बार-बार सामने आ रही हैं। जैसे कुदरत का इशारा हो कि तेरा वक्त अब करीब है। अन्न-जल चकनेवाला है। अब भी देश लौट चल। अब भी देश लौट चल !‘


थोड़ी-सी तो जमीन थी दोनों भाइयों की। दूर के रिश्तेदार से झगड़ा हुआ, तो भाई ही तो लाठी चला बैठा था। और दूसरे दिन जब खेतों को पानी देने गया, तो लौटा ही नहीं। और फिर मिली थी, भाई की बिना गर्दन की लाश। उसे याद कर तो आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। होश आने पर वह एक ही बात दोहराता रहा था-‘भाभी, तूँ मन मत छोटा कर। तेरे बच्चे मेरे बच्चे, मैं सभी को पालुंगा अपनों से भी बेहतर।‘ अपने तो फिर हुए ही नहीं। रिश्तेदारों ने कहा भी-चादर डाल ले।‘ वही टाल गया। नहीं, ऐसा वह नहीं कर सकता। पर बरसों बाद तक जब भी कोई शादी का जिक्र करता, तो भाभी का ही चेहरा सामने आता। लाल घाघरे, नथ और चूड़ेवाला चेहरा, घूँघटवाला चेहरा, जो बच्चों के उकसाए जाने पर पंद्रह साल की उम्र में उसने उलट दिया था। लोग हंस-हंस कर लोटपोट हो गए थे और शर्म से दोहरी होती भाभी बस इतना ही कह पायी थी-‘न कर वे।‘


बीयर की बोतल जोर-से जमीन पर रखते हुए अपने को आश्वस्त करने के लिए ही वह कहता है-‘निरंजना, तू आदमी हौसले वाला है। आंखें बंद कर बस कुछ देर तक चुपचाप पड़ा रहना चाहता है। पर यह दिमाग है कि टिकता ही नहीं।


निरंजन सिंह वल्द अत्तर सिंह की जमीन की आज कुड़की है। कलयुग ‘कलयुग ! जट्टों के बच्चे मजदूरी कर रहे हैं। चादर नहीं डालेगा। रंगरलियां मनाएगा, रंगरलियां मनाएगा। रेल के लंबे सफर के बाद दिमाग में होती छुक-छुक की तरह सभी बातें बस गई हैं। छुक-छुक, कुड़की-कुड़कीकुड़की ! रेल में छिपता-छिपाता मद्रास, सिंगापुर, मैक्सिको और वहां से डिकीं में छिपाकर केलिफोनिया लाया गया था। हजार डॉलर दिए थे, उस जमाने में भी इस काम के।


साल भर पैसे भेजने के बाद भाभी का खत आया था। कैसा बौरा गया था उस दिन। बारी-बारी सभी को खत दिखाता रहा था।


निरंजन सिंह, का तो मैं पत्ता ही गलत लिखवाती रही। मैं कृतघ्न नहीं। मैं क्या जानती नहीं कि तू परदेश में कितनी मुश्किल से रोजी कमा घर पैसे भेज रहा है। अब तो बच्चे भी ठीक हैं। बड़े दोनों स्कूल जाने लगे हैं। छोटे भी हर वक्त चाचा-चाचा करते रहते हैं। उसने चिट्ठी दसों बार पढ़ी थी और बाद में तकिये के नीचे रख दी थी। और हर रोज सोने से पहले वही पढ़ता रहा था, जब तक दूसरी नहीं आ गई थी।


मास्टर नहीं आया आज भी। घर पर सभी ठीक हों ! मास्टर ही तो उस दिन कह रहा था कि लकड़ी के फर्श पर कितना गरदा इकट्ठा हो गया है और साफ दिखता भी तो रहता है। सोशल वर्कर ने ही कहा था-हफ्ते में एक दिन लड़की आएगी। सभी सफाई कर जाएगी। पहले तो वह माना ही नहीं। बाद में मान भी गया, पर लड़की का हर चीज उठाकर झाड़-पोंछ करना उसे नहीं सुहाया। खीज-खीजकर लड़ाई मोल लेता रहा। बस वह आप-से-आप अकेले रहने का आदी हो गया है। जब कोई आता है, तो उसे लगता है उसकी सीमा लांघ रहा है। कभी-कभी तो उसे मास्टर का आना भी अच्छा नहीं लगता। यह तो वह चिट्ठियां ला देता है। जब लोग आते हैं, तो उसे लगता है, उस पर तरस खा रहे हैं। जैसे कह रहे हों-यह है वो बुद्धू आदमी, जो अपने लिए कुछ भी नहीं कर सका। जब किसी के यहां बच्चा होता है, तो उसे बुजुर्ग समझकर आशीर्वाद दिलाने ले आते हैं। उसे जरा भी अच्छा नहीं लगता। जैसे उसकी हंसी उड़ा रहे हों। कह रहे हों-‘निरंजन सिंह औतरा है, औतंरा है‘‘‘औतंरा मरेगा।‘


साल बाद वाले खत में लिखा था-जीतां और सुरेंद्र अब काफी बड़ी हो गई हैं। इतनी बड़ी-बड़ी लड़कियां क्या घर बिठायी जाती हैं। बस तुम्हीं कुछ करो। जगजीत तो कुछ करने से रहा। कहता है, मेरा भाई तो पैसे कमा-कमाकर भेज रहा है। भरजाई तूने जादू कर दिया है। मुझे भी नहीं पूछता।।


तब सोचा था बार्न छोड़ देगा। किराये का मकान लेकर रहेगा, पर फिर मन मारकर बार्न पर ही टिका रहा था। बहनों की शादी के लिए पैसे भेजने के बाद खत आया था-इतने पैसों से कहीं दो-दो शादियां होती हैं ? जट्टों की शादी में तो खाने, शराब और बिस्तरों का खर्च ही मत पूछो। और थोड़े पैसे भेज सको, तो भेजो। बड़ी सस्ती जमीन मिल रही है। जगजीत भी किनारे लगा रहेगा। नहीं तो हर वक्त मेरी छाती पर मूंग दलता है। बड़ा गुस्सा आया था तब, बस सभी को पैसा चाहिए -पैसा-पैसा ! तब सोचा था, किसी के लिए कुछ नहीं करेगा। यह सभी कुछ सोच-सोचकर बेहद कडुवा गया है। पर वह तो बड़े दिलवाला था‘‘‘यह क्या हो गया है ? छोटी-छोटी बातें पहले कभी उसे परेशान नहीं करती थीं। और अब बरसों पुरानी बातें सोचने का फायदा ही क्या है ! कुछ करना था, तो हौसला कर पहले से करता। वह सोचता है, उसी के मन में गांठ थी, जो दूसरों के लिए इतना कुछ करने को मजबूर करती रही। बस वह थोड़ी वाह-वाही चाहता था और बाद में इसकी गिरफ्त में ऐसा आ गया कि निकल ही नहीं सका। कैसे बचपन में भाई से बंट्टे खेलते वक्त उसकी लड़ाई हो गई थी। भाई ने उसका सबसे सुंदर काला बंट्टा चुरा लिया था। गुस्से में आकर उसने सभी बंट्टे भाई को दे दिये थे और फिर तो बंट्टे खेले ही नहीं। अरे तेरी पुरानी आदत है, बलि का बकरा बनने की। कोई क्या करेगा।


कई बार सोचा था किसी को कुछ नहीं भेजेगा। बस यहीं कुछ जमीन-जायदाद खरीद टिक रहेगा। पर जब कभी भी पक्का इरादा करता, बस भाभी का रोता-बिलखता चेहरा सामने आ जाता। और कभी उस दर्दनाक चेहरे पर नथ-टीकेवाला चेहरा आ टिकता और वह एकदम बेबस-सा हो जाता। गोरे कैसी-कैसी गालियां भी दे देते थे। वह चुपचाप सभी कुछ सह लेता। सोचता था-निरंजन, जब चाकरी ही करनी है, तो इज्जत-मान कैसा ! उसका हाथ आप-से-आप खुरदरी बांहों पर चला जाता है, जो चालीस साल की मजदूरी के बाद पत्थर जैसी हो गई हैं। ‘पहली बार पीचे (खुर्मानी की एक किस्म) तोड़ते वक्त बांहें जगह-जगह कैसी छिल गई थीं। जगह-जगह खून निकल आया था। गोरा तब पैसे भी कितने कम देता था। और बात-बात में गाली, और निकाल देने की धमकी-तेरे पास कागज नहीं है। इमीग्रेशन-आफिस में रिपोर्ट करूंगा। पहली बार पीचों लदा पेड़ देख वह इतनी पीचे खा गया था कि हफ्तों पेचिश से पड़ा रहा था। फिर तो पीचों और खुर्मानियों की खुशबू उसकी नाक में ही बस गई थी। देखना तो चाहता ही नहीं, खाने की सोचते ही बस कै होने लगती है।


उन दिनों अपनी ही तरह के दो दोस्त और मिल गए थे। कमा-कमा कर पैसा भेजनेवाले। शाम को बार्न पर बैठ सूखी डबलरोटी और गोश्त चबाते वक्त ढेर सारे मनसूबे बांधा करते थे-घर लौटने के, हवेलियां बनाने के और सुंदर-सुंदर जट्टियों के। ऐसे में कभी कोई तान छेड़ देता -‘डोली चड़दियां हीर मारियां चीखा। देखते-देखते बाकी लोग कहींके-कहीं पहुंच गए। कितनों ने बड़े-बड़े बाग लगा लिये। कोठियां डाल लीं। एक वह, जो कुछ भी नहीं कर सका अपने लिए। अच्छी जगह रहा नहीं। बढ़िया खाना नहीं खाया, अच्छी शराब भी पी, तो गिनती की बार। एक साथी घर लौटने की ख्वाइश लिए ही मर गया। दूसरे के घरवाले आकर जबरदस्ती ले गए। बस निरंजन रह गया‘ अकेला-का-अकेला।


उस बार्न पर फूटे-फूटे बेड पर कंबल में सोते वक्त कितनी ही बार सुतली की चारपाई व रजाई की याद आयी थी। इतने काकरोच तो उसने गांव में भी कभी नहीं देखे थे। गांव का घर भी बार्न से कहीं साफ था। उस दिन एक काकरोच देखकर सोशल वर्कर कह रही थी-इन्हें मारनेवाले आ जाएंगे। उसने ही मना कर दिया था। यह समझती नहीं, निरंजन सिंह और काकरोच का पुराना साथ है। कोई कह रहा था-जब बाकी सभी कुछ नष्ट हो जायेगा, तब भी काकरोच का राज रहेगा। काकरोच निरंजन सिंह से पहले भी था और बाद में भी रहेगा। वह पागल-सा हो गया है। वह गांव में गर्मियों में छिड़काव के बाद उठती मिट्टी की सोंधी खुशबू के लिए अकुला उठता है। यहां की साली मिट्टी भी कैसी है-पानी डालो, तो चिपचिपा जायेगी, खुशबू नहीं देगी।


तब सोचा था- रहना बार्न पर है। चाकरी करनी है। दूसरों को पैसे भेजने हैं घर, तो मन में किसी बात की ख्वाइश ही कैसी! छोड़ मन, माया, मोह, निर्लेप हो।


सालों बाद वाला भाभी का खत उसे याद है-निरंजन, तुझे देखने को बड़ा मन करता है। अब की बैसाखी को काके की शादी है, जरूर आ। काका भी क्या सोचेगा, कैसा चाचा है आया ही नहीं। भाभी को, या बाकी सभी को देखने की इच्छा जाग उठी थी, तो वह टिकट कटा घर पहुंच गया था। गांव तो कैसा बदल गया था। कितनी हवेलियां बन गई थीं, उनके अपने घर की हालत कितनी सुधर गई थी। भाभी अलबत्ता काफी रुतबेवाली हो गई थी। और वो कभी चूड़े, नथवाली और कभी रोती-बिलखती भाभी को ढूंढने की कोशिश करता रहा था। और भाभी इन दोनों में से कुछ भी न होते हुए बेहद समझदार, रुतबेदाली और हर चीज की कर्ता-धर्ता बन चुकी थीं। भाभी उसके लौटने से बेहद खुश थी, पर किसी भी बात पर नोंक-झोंक समझ उसे तीखी नजरों से भी देख लेती थी। भाभी दूध-मलाई, मक्की की रोटी और साग खिलाने की जिद करती रही थी और सूखी डबलरोटी खाने वाला वह कुछ भी नहीं पचा पाया था। गुरु ग्रंथ साहेब के पाठ के वक्त वह घंटों जमीन पर नहीं बैठ पाया था। यहां वह चाहे मजदूरी करके ही पैसे कमाता रहा हो, पर कुर्सी पर बैठने की आदत डाल गया था। यह सब सोचते वक्त उसके हाथ आप-से-आप जुड़ जाते हैं। वह कह उठता है‘वाहे गुरु जी, बाबा जी बेअदबी माफ तेरा नां जमीं ते की लित्ता कुर्सी ते की लित्ता, इको गल है।‘ भतीजे उसे देख कुछ हद तक शर्मिंदा हुए थे। सोचा होगा, अमरीका में रहनेवाला चाचा पूरा अंग्रेज होगा, फटाफट अंग्रेजी बोलेगा, हंसी-मजाक करेगा। उसकी जगह पहुंचा था पैंतालीस साल का पके बालोंवाला सीधासाधा आदमी, जो पैट-कमीज पहनने और थोड़ी-बहुत अंग्रेजी बोलने के बावजूद उन्हें ज्यादा प्रभावित नहीं कर पाया था। भाभी को बार-बार याद दिलाना पड़ा था कि वह जो कुछ है, उसी की वजह से है। भतीजे नाराज हुए थे, जब उसने कहा था कि सफेद पैट-कमीज पहनकर बाबूगिरी होती है, अफसरी होती है, खेती-बाड़ी नहीं।


उसके हमउम्र जरूर उसकी कहानियां सुनकर प्रभावित हुए थे, कैसे पूछते रहे थे-‘निरंजन सिंहा, तेरी औत्थे हजारों एकड़ जमीन होयगी। किनी कोठियां ने ? गोरियां कैसी होंदी हैं ? तेरे आगे-पीछे फिरती होंगी? सुना है, काले उन्हें बड़े पसंद आते हैं, खासकर जट्ट‘ और वह चाहकर भी नहीं कह पाया था कि वह लोगों के बागों में काम करता है और उसके पास कहने को भी एक बीघा जमीन नहीं, और कि वह बार्न पर ही रहता है। यह तो गनीमत थी कि उसके गांव का कोई युवक सिटी में नहीं था। बाद में तो कुछ लोग आ भी गए थे। फिर तो वह गांव गया ही नहीं। बहनें ताने देती रही थीं-हमारे बच्चे क्या तेरे कुछ नहीं लगते, उनके लिए भी कुछ कर। पर लौटते वक्त वह सभी पैसे भाभी को ही दे आया कि सभी की जरूरत देख बांट देना। उसे लगा था, एक वही है, जो उसका दुख-दर्द जानती है। आते वक्त रोयी भी तो कितना थी ! कितना नाराज हुई थी अपने बच्चों पर। एक बार दबी जबान से यह भी कहा था-‘निरंजन, तू अब शादी करवा ले, सभी कहते हैं कि मैं अपने लालच से तेरी शादी नहीं होने देती। वह कह गया--अब इस बूढ़ी उम्र में क्या घोड़ी चढूंगा ? अब तो बच्चों की शादियां होंगी।‘


पैसों की मांग कभी कम नहीं हुई। कभी किसी की शादी के लिए, कभी ट्रैक्टर के लिए और कभी मुकदमे जमानत के लिए। वह क्या समझता नहीं ! भाभी अपनी आंखों के इलाज के लिए अलग पैसे मंगवाती है और उसी भाभी के इलाज के लिए भतीजे अलग पैसे मंगवाते हैं। वह सब समझता है और चुपचाप सभी को पैसे भेज देता है। उसका तो मन ही मर गया है। ‘वाहे गुरु जी, वाहे गुरु जी‘ कहते हुए वह गुटका उठा पाठ करने की कोशिश करता है। जब बंता और मलका थे, तो तीनों मिल कर पाठ किया करते थे। बंता बिचारा तो अपने बाग-खेत और मुल्क की ख्वाइश लिए ही मर गया। मलके को रिश्तेदार ले गए बड़ा मौजी आदमी था। कहता था-निरंजन को एक बीयर दो, तो मौज में आएगा, दो पीकर हो हल्ला करेगा, तीन पीकर तो उसे औरत चाहिए।


हां, पहले तो कभी-कभार वह ऐसी-वैसी जगह चला भी जाता था। भूख भी मिटा लेता था, पर जब से वीरे की मौत उस बीमारी से हुई और उसने वीरे के हाथों-बाहों पर हर जगह उस रोग की छाप देख ली, फिर वह वहां जा ही नहीं सका। लोगों ने समझाया भी-‘निरंजन, तू ऐसे ही फिकर करता है। शहर के अच्छे-अच्छे लोग भी उन्हीं के पास जाते हैं। वह रोग क्या अब बेइलाज रह गया है ! और अब तो कानून ही इतने सख्त हैं कि उन बिचारियों को भी बराबर डॉक्टरी जांच करानी पड़ती है।‘ पर वह फिर जा ही नहीं सका।


कई मक्सीकियां तो उस पर जान देती थीं। मरिया कैसी सुंदर थी ! सुंदर सुडौल टखने, काली आंखें, काले बाल ! पहली बार जब बार्न पर आई, एकदम घुलमिल गई। उसके साथ सब कुछ के बीच कभी-कभी भाभी याद आ जाती। कैसी अजीब बात है। ऐसी-वैसी औरतों के पास जाते वक्त कभी भाभी की याद नहीं आती थी। वह उसे लेकर न जाने क्या-क्या सोचने लगा था। मगर बाद में एक दिन मरिया बोली थी-‘मैं बार्न पर नहीं सो सकती। कितने काकरोच हैं यहां।‘ उसने सोचा था, मरिया से शादी का मतलब है, बस यहीं का हो जाना। फिर कभी देश न लौट पाना। और बाद में तो उसकी शादी अनटोनियों से हो गई थी।


निरंजन का मन आज बस भटक ही रहा है। कहीं-का-कहीं पहुंच रहा है। कभी बचपन की कोई बात याद आती है, तो कभी कोई जवानी की। पिछली बार कोई कह रहा था क्यों अपनी जात खराब कर रहा है। यहां ? तेरे भतीजे वहां अफीम-गांजा सभी कुछ करते हैं। तेरे पैसे पर ऐश करते हैं ऐश !‘ उसी ने कहा था-‘बच्चे मेरे होते ऐश नहीं करेंगे, तो कब करेंगे ?‘ न जाने क्या बात है, अपने पर वह कभी कुछ खर्च नहीं कर पाया। बहनों को भी कुछ नहीं भेजता, जैसे वाहे गुरु का शराप है कि उसकी इस उम्र की सारी कमाई भतीजों के नाम है। कभी कोई फिजूल खर्ची नहीं की। इस उम्र में भी टैक्सी नहीं लेता। बस में ही सफर करता है। यह तो मास्टर जबरदस्ती यहां उठा लाया। कहता था-चाचा, सारी उम्र तो गली-सड़ी जगह बिता दी। कम-से-कम मर तो साफ-सुथरी जगह। मरने का क्या है ! मिट्टी में मिट्टी मिल गई, मिट्टी का क्या मान !‘


शायद मास्टर नाराज हो गया है। उस दिन कहने लगा-चाचा, तू वसीयत लिखवा दे और पांच-छह सौ डॉलर जमा करवा दे। तेरा नजदीकी मैं ही हूं। नहीं तो सभी कुछ मुझे करना पड़ेगा।‘ निरंजन सिंह ने जीते जी अपने पर कुछ खर्च नहीं किया और उसके मरने पर उसकी लाश पर छह सौ डॉलर ! यह बात उसके दिमाग में नहीं बैठ रही थी। उसने सोचा था, पारसी लोग अच्छे हैं, जो लाश को चीलों-गिद्धों को डाल देते हैं। कुछ तो फायदा हुआ। कौन मरी जान के पीछे छह सौ लगाए। तब उसने सोचा था, मरने के लिए गांव ही क्यों न चला जाए ! फिर सोचा था, नहीं, वह किसी का मोहताज नहीं होगा। अपने वतन से तो उसका अन्न-पानी बहुत पहले का छूट गया है।


फिर उसने पता लगा लिया था कि जिनका कोई वली-वारिस नहीं होता, उन्हें जलाने का काम सरकार कर देती है। एक दर्द सा उठा था। उसका वली-वारिस नहीं ! फिर निर्लेप भाव से उसने अपने को समझाया था-देह का क्या, दोस्त रिश्तेदार न जलाएं, सरकार जला दे। मास्टर दुखी हुआ था। कहने लगा था-‘चाचा मैं ऐसा नहीं होने दूंगा। तू अपने लिए कुछ नहीं करता, तो न कर। मैं खर्च करूंगा।‘ यह सुनते ही वह आगबबूला हो उठा था। कह उठा था-‘मैंने जीते-जी किसी का अहसान नहीं लिया, मेरे मरने पर कोई मेरे लिए कुछ नहीं करेगा। मेरा कोई रिश्तेदार-दोस्त नहीं, सरकार चाहे मेरी लाश को जलाए, दफनाए या चीलों कौवों को डाल दे।‘


मास्टर दुखी हुआ था। कह रहा था-‘चाचा, तेरे दिल का भी कुछ पता नहीं। कुछ लोगों के लिए तू बादशाह और कुछ लोगों के लिए तू फकीर ! बहनों को तू फूटी कौड़ी नहीं भेजता, अपने पर तू दस डॉलर नहीं खर्च कर सकता। यहां किसी को तू एक बीयर पिला कर राजी नहीं। उस दिन मैंने कह दिया, तेरे पास काफी जगह है। मेरा एक दोस्त कनाडा से आ रहा है, क्या तेरे पास ठहर जाए ! तू एकदम मुकर गया। कहने लगा, यह अमरीका है। यहां कोई क्यों किसी के पास ठहरे। होटल-मोटेल किस लिए हैं !‘


उसके देखते-देखते सारा शहर बदल गया है। पंजाबियों का ही राज है। कितने बाग-कोठियों वाले हो गए हैं। गुरुद्वारा कितना अच्छा हो गया है। कितने अमरीकी सिख पंथी हो गए हैं। कितने पंजाबियों की गौरी और मैक्सिकी बीवियां हैं। बच्चे के से अंग्रेज हो गए हैं। कैसी साफ अंग्रेजी बोलते हैं। कितनों के तलाक होने लगे हैं ! वाहे गुरु जी, कलयुग है कलयुग, जट्टों की लड़कियाँं अमरीकियों के साथ रह रही हैं।


तभी मास्टर आ जाता है-‘चाचा, तेरी चिट्ठी आई हैः ‘‘और चाचा, ये मेरे बड़े अच्छे दोस्त हैं। बॉस्टन से आए हैं।‘ चाचा बड़ा खुश हो जाता है और हर रोज से ज्यादा दरियादिल होते हुए कहता है‘इन्हें बीयर पिलाओ, नशा-नुशा कराओ। फिर भाई काका, चिट्ठी तो सुना।‘


मास्टर कहता है-‘चाचा, तेरी बहू सुनाएगी।‘


चाचा देखता है कि पहले की सीधी-सादी बहू की जगह फैशनेबुल कटे बालों वाली चुस्त बहू बैठी है, जो रुक-रुक कर बड़े सलीके वाली पंजाबी में खत पढ़ रही है


त्वाडा खत मिल गया सी, पैसे वी चन्नो दा व्याह ती तारीख दा सी, पर ओदे सौरे दा भ्रा गुजर गया है।। हुण शादी अगले साल ते टल गई है। सब कुछ त्वाडी मरजी मुताबिक कीता जाएगा। अपनी सेहत दा खयाल रखना। फसलां ठीक ने, ट्रैक्टर खराब सी, हुण ठीक है।‘


मास्टर खीजता है। इसी शादी के लिए तीन बार पैसे मंगवाए जा चुके हैं और हर बार शादी टल गई है।


निरंजनसिंह बस इतना ही कहता हँू-‘सब रब दी माया है। उसकी लिखी किसने टाली। बस जी, अपने दोस्तों की खातिर करो। इनको सेक रोमेंटो दिखाओ, गोल्डन गेट दिखाओ, मैरिसविल दिखाओ।‘


मास्टर हंसते हुए कहता है-‘चाचा यहां की सबसे नायाब चीज तू है। तुझे देख लिया, तो समझो सभी कुछ देख लिया।


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