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Thursday, October 13, 2022
प्रगतिवाद का उद्भव – विकास - डा० विद्याधर मेहता
Thursday, November 19, 2020
प्रगतिवाद की प्रवृति या विशेषता /prgtivaad ki prvriti ya visheshta
प्रगतिवाद की प्रवृति या विशेषता
हिन्दी साहित्य में प्रगतिवाद का प्रारभं
छायावादी कवियों से सी होता है | 1936 ई० में मुंशी प्रेमचन्द्र की अध्यक्षता में भारतीय प्रगतिशील लेखक
संघ की स्थापना हुई | इस
लेखक संघ की विचार धारा में नागार्जुन, दिनकर, रामविलास
शर्मा, भवानीप्रसाद मिश्र, पंत, शिवमंगलसिंह, सुमन आदि जुड़े जिसमें इनकी प्रवृति और विशेषता निम्न प्रकार से है –
(1) सामाजिक यथार्थवाद – प्रगतिवादी काव्य में निम्न वर्ग की प्रतिष्ठा
हुई है, निम्नवर्गकी आर्थिक विषमता पर अभिव्यक्ति दी गई
| कृषक, मजदूर और इनके घरों का चित्रण प्रर्याप्त मात्रा में हुई | जैसे –
यह तो मानव लोक नहीं रे, यह है नरक अपरिचित |
यह भारत का ग्राम संस्कृति, सभ्यता से निर्वसित ||
(2) सामयिक समस्याओं का चित्रण – इस धारा के कवियों द्वारा देश और विश्व की
सामयिक समस्याओं चित्रण किया गया | जैसे, भारत
पाक विभाजन, कश्मीर
समस्या महँगाई आदि | महात्मा
गाँधी के निधन पर नागार्जुन की कविता देखिए –
बापू मेरे -------------------
अनाथ हो गई भारत माता ---------
अब
क्या होगा -----------------
(3) बौद्धकता और व्यंग्य का प्रसार - प्रगतिवादी कविताओं में बौद्धिकता का स्वरूप दिखाई पड़ता है | सामाजिक सुधारवाद की भावना से प्रेरित कवि
व्यंग्य को अधिक महत्व दिये है –नागार्जुन ने कागजी स्कीम की आजादी पर कटु व्यगंय किये है –
कागज की आजादी मिलती
ले लो दो –दो आने में |
(4) रूढ़ि – विरोध – प्रगतिवादी कवि ईश्वर, आत्मा, परमात्मा
सृष्टि एवं जन्मांतर में विश्वास नहीं करते | सामाजिक अंधविश्वासों, परम्पराओं एवं रूढ़ियों का विरोध करते है है| कवि लोग मानव को मानव रूप में ही देखना चाहते
है –
किसी को आर्य, अनार्थ
किसी को यवा,
किसी को हुण, यहूदी, द्रविड़
मनुज को मनुज न करना आह |
(5) शोषितों का करुण गान - प्रगतिवाद कवि आर्थिक विषमता मानव सभ्यता को शोषक (पूँजीवाद) एवं शोषित (श्रमिक) वर्ग में विभक्त किया है| शोषक द्वारा शोषित किये जानेवाले श्रमिकों, मजदूरों, एवं किसानों का कारुणिक चित्रण प्रगतिवादी कव्योकारों द्वारा
प्रस्तुत किया गया है –
कब तक पशुता के प्रतीक वे जुल्म
करेगें, दुख देंगे |
अपनी स्वार्थ साधना में मानव- समाज की बलि लेगे ||
(6) शोषकों के प्रति घृणा और रोष – कवि द्वारा सामाजिक आर्थिक विषमता को नष्ट करने
के लिए पूंजीपतियों के विरुद्ध घृणा और रोष व्यक्त की है
श्वानों को मिलता वस्त्र दूध, भूखे बालक अकुलाते है,
माँ की हडडी से चिपक ठिठुर जाड़े की रात बिताते है |
(7) क्रांति का भावना – कवि प्राचीन रूढ़ियों एवं परम्पराओं का विरोध
करते है तो सामंती व्यवस्था एवं पूँजीवादी व्यवस्था के प्रति क्रांति की भावना
रखना है –जैसे
–
कवि कुछ ऐसी तान सुनाओं
जिससे उथल –पुथल मच जाए |
(8) मार्क्स एवं रुख का गुणगान – प्रगतिवाद कवि ने साम्यवाद के प्रवर्तक मार्क्स एवं रुख का महत्व
स्वीकार किया है, तथा
इनकी प्रशसित में कविताओ का सहज भी है |
धन्य मार्क्स, चिर
तमाध्छ्न्न पृथ्वी के उदय किरण पर |
तुम त्रिनेत्र के साचछु – से प्रकट हुए प्रलय कर ||
(9) सांस्कृतिक समन्वय की भावना – प्रगतिवादी कवि एक नवीन विश्व संस्कृति की
परिकल्पना की है | जो
समन्वयवाद पर आधारित है|
जैसेः – क्षुद्र व्यकित को विकसित हो अब बनना है जन –मानव |
सामूहिक मानव को निर्मित करनी है तब संस्कृति ||
9. )मानवता की महता – प्रगतिवादी कवि मानवता की असीमित शक्ति में
विश्वास रखता है अत ये मिखमंगो, किसनो, मजदूरों,वेश्याओ, विधवाओं आदि की उद्वार में लगा है –
(10
) प्रगतिवाद का कलापक्ष – प्रगतिवादी कवियों की भाषा सुबोध शौली के है | तथा लोकगीत शौली में नई धुनों की सर्जना की भर
गई अलंकार के क्षेत्र में उपमानों का द्वारा कर नवीन रूपक विकसित है | प्रतिको का चयन किया गया है |
तुम वहन कर सको, जन –जन में मेरे विचार |
वाणी मेरी चाहिए, तुम्हें
क्या अलंकार ||
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