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Thursday, October 13, 2022

प्रगतिवाद का उद्भव – विकास - डा० विद्याधर मेहता

                                               प्रगतिवाद का उद्भव – विकास 

भूमिका -  प्रगतिवाद साहित्य की विचारधारा है | यह राजनीति के मार्क्सवाद से प्रभावित है | भाषा साहित्य में इससे प्रगतिवाद के नाम समझी जाती है | इसमें शोषक और शोषित समाज की चर्चा की जाती है |

                                                            प्रगतिवाद का अर्थ                            

             प्रगतिवाद  दो शब्द से बना है - “प्रगति” और “वाद” | प्रगति का अर्थ है – आगे बढ़ना, उन्नति | वाद का अर्थ है – कहना, बोलना, वचन आदि | यानि प्रगतिवाद है समाज, साहित्य आदि की निरन्तर उन्नति पर जोर देने का सिद्धान्त है | 
         
                                            प्रगतिवाद शब्द कोश और अन्य विचार धारा के अनुसार 

         साहित्य में प्रगतिवाद – यह साहित्य नवींन सिद्धांत है जिसका लक्ष्य जनवादी सिद्धांत को संपादित कर मार्क्सवाद तथा भौतिक यथार्थवादी के व्येय में संपूर्ति करना | हिन्दी साहित्य कोश भाग -1 के अनुसार – प्रगतिवाद सामाजिक ययार्थवाद के नाम पर चलाया गया आन्दोलन है जिसमें वर्ग – सघर्ष की सम्यवादी विचारधारा ओर उस संदर्भ में नये मानव की कल्पना इस साहित्य का उद्देश्य है | जिसका मूल मार्क्सवाद से विकसित है | प्रगतिवाद के अर्थ और विशेषता को निम्न प्रकार से समझा जा सकता है जैसे - ठहरा हुआ पानी कुछ समय बाद दुर्गन्ध युक्त हो जाता है और प्रयोग करने योग्य नहीं रहता किन्तु नदी का बहता पानी जहाँ जहाँ से बहता है वहाँ की भौगोलिक स्थिति के अनुसार अपनी जगह बनता हुआ आसपास के लोगों को आनन्द देता हुआ आगे बहता जाता है बहते पानी में गंदगी दिखती नहीं अत उसका पानी प्रयोग में आने योग्य रहता है | ठीक वैसे ही जो समाज अपने समय की आवश्यकताओं को नहीं समझता और वर्षों पूर्व बनाये गये सिध्दांतो, नियमों, मान्यताओं और विश्वासों में जकड़ा रहता है वह भी कभी आगे नहीं बढ़ता और रुके हुए पानी की भांति बदबूदार पद्धतियों का विरोध करता है जो समाज की प्रगति में बाधक है, और उन नियमों – मान्यताओं को अपनाने पर बल देता है जो वर्तमान के अनुकूल है | दूसरी बात है सामाजिक यथार्थ और जीवन और यथार्थ के वस्तु सत्य की अभिव्यकित की | हम जिस प्रकार समाज में रहते है, उसकी अच्छाइयों और बुराइयों से प्रभावित होते है | गुण दोषों से भरपूर इस समाज में ही हमारे व्यकित्त्व का निर्माण होता है और अपने व्यकित्त्व इच्छाओं, आकांक्षाओं के सहारे इस समाज को भी हम बनाते –बिगड़ते हैं | फिर सामाजिक यथार्थ क्या है? क्या समाज में व्याप्त अच्छाइयां या बुराइयां ? सामाजिक यथार्थ की बात जब हम करते है तो उसके अंतर्गत अच्छाइयां और बुराइयां दोनों ही आते है | साहित्य में यदि केवल अच्छाइयों का ही चित्रण हो तो वह आदर्शवादी साहित्य कहलाता है |और यदि केवल बुराइयों का चित्रण हो तो नगन यथार्थवादी या प्रगतिवादी | प्रसिद्ध कथाकार प्रेमचन्द ने कहा था कि यथार्थ केवल प्रकाश या केवल अंधकार नहीं है बल्कि अंधकार के पीछे छिपा प्रकाश और प्रकाश के पीछे छिपा अंधकार है | 

                                                      प्रगतिवाद किसके लिए 

         प्रगतिवाद उन शब्दों को पहचाने पर बल देता है जिनके कारण हमारा समाज अंधकार ग्रस्त है | और उन शब्दों को पहचानने पर बल देता है | जिनके बलबूते इस अधंकार को हराया जा सकता है | तीसरी बात प्रगतिवाद का प्रेरक कारण मार्क्सवादी का सिद्धन्त है | यह सिद्धन्त शोधक शब्दों का विरोध करता है और शोषित समाज में चेतना जगाने उन्हें अपने अधिकारों और समवेत के प्रति भरोसा करने पर बल देता है | यह इस सामंतीवादी और पूँजीवादी मानसिकता और संस्कृति का विरोध करता है जो शब्द धन को कुछ मुट्टीभर लोगों के हाथों में कर देते है जिससे वे स्वार्थी और दंभी हो जाते है और अपने धन का शुरू प्रयोग कर उन लोगों का शोषण करते है जिनके परिश्रम के बल पर वे सुख भोगते है | प्रगतिवाद भी सामंतवाद और पूँजीवाद का विरोध करता है जो समाज में व्याप्त अंधकार का कारण है और उन गरीबों मजदूरों – किसानों को प्रकाश –पुंज मानता है जिसके बल पर यह अंधकार नष्ट हो सकेगा प्रगतिवाद की दृष्टि में यही श्रमशील मानव नया मानव और नया हीरो हैं | चौथी बात है छायावाद के पतनोन्मुख काल की विपतियों को नष्ट कर नये समाज के निर्माण की बात | हम जानते है की छायावादी कविता में इतिहास, कल्पना आदर्श, प्रेम विरह प्रगति की सुन्दरता और सुकुमारता पर विशोष बल था |प्रगतिवाद में इतिहास कों नकारा नहीं गया, इतिहास अतीत के मोह से मुक्त की बात की गयी है इसके लिए उन्नयन समाज के सभी वर्ग को समान रूप से उन्नति रूढ़ियों अन्धविश्वासों से मुक्ति आदि, वस्तु सत्य प्रधान है इसलिए इसपर रहस्य, प्रगति की सुन्दरता, वैयक्तिक प्रेम विरह के लिए यहाँ कोई स्थान नहीं | 

                                            प्रगतिवाद  किस सिद्धांत से प्रेरित                           
      
          प्रगतिवादी साहित्य मार्क्सवादी विचारधारा से अनुप्रमाणित है |इस विचारधारा के प्रवर्तक कार्लमार्क्स ( सन् 1818ई० – 1883ई०) के क्रांतिकारी विचार से है | इस विचार धारा के तीन प्रमुख सिद्धन्त है, पहला द्वात्मकता भौतिकवाद दूसरा मूल्यवृद्धि का सिद्धन्त तीसरा मानव –सभ्यता के विकास की नई व्याख्या |अर्थात् कार्लमार्क्स की विचारधारा कहती है कि संसार की उत्पति नहीं हुई वरन विकास हुआ है, और इस विकास का आधार द्वन्द्व या संघर्ष है | यानि जब दो विरोधी शक्तियों का संघर्ष होती है तब तीसरी वस्तु को जन्म या विकसित करती है | मार्क्स का दूसरा सिद्धन्त यह है कि आज पूँजीवादी युग में सारा लाभ मिल मालिक हड़प लेती है, और मजदुर को नाम – मात्र की मजदूरी मिलती है | इस तरह शोषक और शोषित दो वर्ग आज के समाज में विधमान है, इन वर्ग में समानता स्थापित करते है | मार्क्स ऐसी व्यवस्था लाना चाहते है | जिसमें श्रमिकों की प्रतिनिधि द्वारा सरकार के उत्पादन के सम्पूर्ण साधनों पर नियत्रंण हो, और प्रत्येक व्यकित को उसके परिश्रम का समुचित लाभ मिले | मार्क्स का उद्देश्य वर्ग – हीन समाज की स्थापना करना है | हिन्दी में प्रगतिवाद साहित्य को कार्लमार्क्स के विचार या सिद्धन्तों का प्रतिपादन और व्याख्या मात्रा नहीं समझना चाहिए |इसे अंग्रेज़ी के progressive साहित्य का उरान्तर की नहीं मानना चाहिए | बल्कि इसे मानवतावाद की प्रतिष्ठा माननी चाहिए | क्योंकि इसने पीड़ित मानव को काव्य का आलम्बन बनाया है | रामविलास शर्मा के शब्दों में – ‘’ यह युग की माँग को पूरा करनेवाला साहित्य है | इसकी शक्ति इस बात में है की वह समाज के वास्तविक जीवन के निकट हैं | ------जो साहित्य जनता का पक्ष लेगा, वह जरुर शक्तिशाली होगा और अजेय गति से आगे बढ़ता जायेगा |

                                                     हिन्दी साहित्य में प्रगतिवाद का उदय 
 
          हिन्दी में प्रगतिवाद चेतना सन् 1936 ई० के आसपास आई | 1935 ई० में लखनऊ में प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना हुई जिसका प्रथम अधिवेशन 1936 ई० में मुंशी प्रेमचन्द की अध्यक्षता में हुआ | दूसरा अधिवेशन 1938 ई० में कवीन्द्र रवीन्द्र की अध्यक्षता में हुआ | प्रगतिवादी चेतनाओं गति देने में रूपाम तथा हंस नामक मासिक पत्रिका का अभिन्न योगदान है | इस धारा के प्रमुख कवियों में पंत, निराला, नवीन, नरेन्द्र शर्मा, शिवमंगल सिंह समन, केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन रागेव राधव, त्रिलोचन, गिरजाकुमार माथुर मुक्तिबोध, भारतभूषण अग्रवाल और रामविलास शर्मा हैं | 

                                                                    निष्कर्ष 
       निष्कर्षत कहा जा सकता है की जिस प्रकार छायावाद स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह है, उसी प्रकार प्रगतिवाद सूक्ष्म के प्रति स्थूल का विद्रोह है | द्विवेदी युगीन इतिवृतात्मकता और स्थूलता के विरुद्ध छायावाद एक क्रांति के रूप में आया, और छायावादी सूक्ष्मता के विरुद्ध प्रगतिवाद का उद्भव हुआ | छायावादी कवि ने यथार्थ की कठोर धरती को छोडकर कल्पना के उन्मुक्तता व्योम में विचरण किया था, एतएव छायावाद का पतन हुआ और प्रगतिवाद काव्य की रचना प्रारभ हुई |


                   हमारी दूसरी लेख -  हिन्दी गद्य का विकास
                                              - आधुनिक काल की अवधारणा और पृष्ठभूमि
                                              - सूफी काव्य परम्परा  

Thursday, November 19, 2020

प्रगतिवाद की प्रवृति या विशेषता /prgtivaad ki prvriti ya visheshta

                     प्रगतिवाद की प्रवृति या विशेषता

  


       हिन्दी साहित्य में प्रगतिवाद का प्रारभं छायावादी कवियों से सी होता है | 1936 ई० में मुंशी प्रेमचन्द्र की अध्यक्षता में भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना हुई | इस लेखक संघ की विचार धारा में नागार्जुन, दिनकर, रामविलास शर्मा, भवानीप्रसाद मिश्र, पंत, शिवमंगलसिंह, सुमन आदि जुड़े जिसमें इनकी प्रवृति और विशेषता निम्न प्रकार से है



(1)  सामाजिक यथार्थवाद प्रगतिवादी काव्य में निम्न वर्ग की प्रतिष्ठा हुई है, निम्नवर्गकी आर्थिक विषमता पर अभिव्यक्ति दी गई | कृषक, मजदूर और इनके घरों का चित्रण प्रर्याप्त मात्रा में हुई | जैसे

        यह तो मानव लोक नहीं रे, यह है नरक अपरिचित |

        यह भारत का ग्राम संस्कृति, सभ्यता से निर्वसित ||

(2) सामयिक समस्याओं का चित्रण इस धारा के कवियों द्वारा देश और विश्व की सामयिक समस्याओं चित्रण किया गया | जैसे, भारत पाक विभाजन, कश्मीर समस्या महँगाई आदि | महात्मा गाँधी के निधन पर नागार्जुन की कविता देखिए

          बापू मेरे -------------------

         अनाथ हो गई भारत माता ---------

           अब क्या होगा -----------------

(3)  बौद्धकता और व्यंग्य का प्रसार प्रगतिवादी कविताओं में बौद्धिकता का स्वरूप दिखाई पड़ता है | सामाजिक सुधारवाद की भावना से प्रेरित कवि व्यंग्य को अधिक महत्व दिये है नागार्जुन ने कागजी स्कीम की आजादी पर कटु व्यगंय किये है

                     कागज की आजादी मिलती

                     ले लो दो दो आने में |

(4)  रूढ़ि विरोध प्रगतिवादी कवि ईश्वर, आत्मा, परमात्मा सृष्टि एवं जन्मांतर में विश्वास नहीं करते | सामाजिक अंधविश्वासों, परम्पराओं एवं रूढ़ियों का विरोध करते है है| कवि लोग मानव को मानव रूप में ही देखना चाहते है

                    किसी को आर्य, अनार्थ

                    किसी को यवा,

                     किसी को हुण, यहूदी, द्रविड़

                    मनुज को मनुज न करना आह |

(5)  शोषितों का करुण गान प्रगतिवाद कवि आर्थिक विषमता मानव सभ्यता को शोषक (पूँजीवाद) एवं शोषित (श्रमिक) वर्ग में विभक्त किया है| शोषक द्वारा शोषित किये जानेवाले श्रमिकों, मजदूरों, एवं किसानों का कारुणिक चित्रण प्रगतिवादी कव्योकारों द्वारा प्रस्तुत किया गया है

            कब तक  पशुता के प्रतीक वे जुल्म करेगें, दुख देंगे |

           अपनी स्वार्थ साधना में मानव- समाज की बलि लेगे ||

(6) शोषकों के प्रति घृणा और रोष कवि द्वारा सामाजिक आर्थिक विषमता को नष्ट करने के लिए पूंजीपतियों के विरुद्ध घृणा और रोष व्यक्त की है

          श्वानों को मिलता वस्त्र दूध, भूखे बालक अकुलाते है,

          माँ की हडडी से चिपक ठिठुर जाड़े की रात बिताते है |

(7) क्रांति का भावना कवि प्राचीन रूढ़ियों एवं परम्पराओं का विरोध करते है तो सामंती व्यवस्था एवं पूँजीवादी व्यवस्था के प्रति क्रांति की भावना रखना है जैसे

          कवि कुछ ऐसी तान सुनाओं

          जिससे उथल पुथल मच जाए |

(8) मार्क्स एवं रुख का गुणगान प्रगतिवाद कवि ने साम्यवाद के प्रवर्तक मार्क्स एवं रुख का महत्व स्वीकार किया है, तथा इनकी प्रशसित में कविताओ का सहज भी है |

        धन्य मार्क्स, चिर तमाध्छ्न्न पृथ्वी के उदय किरण पर |

        तुम त्रिनेत्र के साचछु से प्रकट हुए प्रलय कर ||

(9) सांस्कृतिक समन्वय की भावना प्रगतिवादी कवि एक नवीन विश्व संस्कृति की परिकल्पना की है | जो समन्वयवाद पर आधारित है|

जैसेः क्षुद्र व्यकित को विकसित हो अब बनना है जन मानव |

     सामूहिक मानव को निर्मित करनी है तब संस्कृति ||

9.     )मानवता की महता प्रगतिवादी कवि मानवता की असीमित शक्ति में विश्वास रखता है अत ये मिखमंगो, किसनो, मजदूरों,वेश्याओ, विधवाओं आदि की उद्वार में लगा है

 

(10                       ) प्रगतिवाद का कलापक्ष प्रगतिवादी कवियों की भाषा सुबोध शौली के है | तथा लोकगीत शौली में नई धुनों की सर्जना की भर गई अलंकार के क्षेत्र में उपमानों का द्वारा कर नवीन रूपक विकसित है | प्रतिको का चयन किया गया है |

             तुम वहन कर सको, जन जन में मेरे विचार |

              वाणी मेरी चाहिए, तुम्हें क्या अलंकार ||

             निष्कर्षत प्रगतिवादी कवि उपेदित दलित वर्ग को काव्य का विषय बनाया और साहित्य को एक व्यापक यथार्थवादी आयाम मिला 










अमीर खुसरो के दोहे, मुकरियाँ और गीत /amir khsro ke dohe mukriyan or geet

                                         अमीर खुसरो के दोहे, मुकरियाँ और गीत   1.      एक नार किया -----------------------------------...