Saturday, May 24, 2025

चंदबरदाई / chandbardaai



चंदबरदाई हिन्दी साहित्य के इतिहास में आदिकाल के प्रतिनिधि कवि हैं | आचार्य शुक्ल इन्हें हिन्दी का पहला महाकाव्य लिखने वाले महाकवि के रूप में स्वीकार किये हैं | इनकी रचना पृथ्वीराजरासो हिन्दी की पहला महा काव्य माना जाता है | इस महा काव्य में पृथ्वीराज चौहान के जीवन गाथा का मनोहारी बर्णन किया गया है | कवि चंदबरदाई पृथ्वीराज चौहान के समकालीन कवि थे | कहा जाता है कि दोनों का जन्म एक ही दिन हुआ और एक ही दिन मृत्यु को प्राप्त किये | चन्दवरदाई की कथा राजपूतों के बीच प्रचलित है कि भारतबर्ष के अंतिम हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान के राजकोषीय मंत्री,मित्र और सामन्त थे | ये राजा के साथ हमेशा रहते चाहे राजदरबार, युद्ध भूमि, शिकार आदि मनोरंजनात्मक खेल ही क्यों न हो | चंदबरदाई का जन्म लाहौर में हुआ था कहा जाता है की पृथ्वीराज का जन्म संवत् 1205 में और मृत्यु 1249 में हुई थी, अत: महाकवि चंदबरदाई का जन्म और मृत्यु भी यही होगा | इनके पिता का नाम ‘राववेन’ और विद्या गुरु का नाम ‘गुरु प्रसाद’ था | ये ‘भट्ट’ जाती के ‘जगात’ गोत्र के थे | चाँद ने दो विवाह किये थे, पहली पत्नी का नाम ‘कमला’, उपनाम ‘नेवा’ तथा दूसरी पत्नी का नाम ‘गौरी’ उपनाम ‘राजीरा’ था | इनके ग्यारह संतानें हुई, दस लड़के और एक लड़की | पृथ्वीराज और चंदबरदाई के बिषय में किवदंती है कि मुसलमान बादशाह मोहम्मद गौरी राजा पृथ्वीराज चौहान को बंदी बना कर गजनी ले जा रहा था | यह समाचार चंदबरदाई सुनते ही अपनी महाकाव्य की रचना छोड़ तथा रचना कार्य अपने छोटे पुत्र (जल्लन) को शौंप कर राजा के पीछे चल पड़ा जैसा की महा काव्य में उधृत है – ‘पुस्तक जल्ह दै चलि गज्जन नृप काज “ फिर गजनी में गौरी ने पृथ्वीराज के दोनों आँखों को कुचल कर कारागार में रख लिया | कवि चंद राजा व परम मित्र पृथ्वीराज को कारागार से निकाल ने की उपाय सोचने लगे | इन्होंने बादशाह के पास पृथ्वीराज के शब्दबेधी बाण चलाने की कौशलता को परखने के लिये सुचना दी, बादशाह भी राजी हो गया, बादशाह और चंदबरदाई एक उँचे आसन में बैठे पृथ्वीराज के इस कौसलता को देखते रोमांचित हो बादशाह जब वहा ! वहा ! की आवाज की और इधर से अपने राजकवि चंदबरदाई द्वारा इशारा प्राप्त करके राजा पृथ्वीराज ने इस ल्छयित बाण से बादशाह को मार डाला | अतंत: राजा और चंदबरदाई भी अपने-अपने वरछि से एक-दुसरे के प्राण हर कर आत्म हत्या कर लिये | इस प्रकार राजा और मंत्री अपने शत्रु गौरी को वध कर युद्ध हारने का बदला लिया | चंदबरदाई की रचना पृथ्वीराज रासो महाकाव्य है | यह 69 समयों में विभक्त है इसकी भाषा को भाषाशात्त्रियों ने पिंगल तथा डिंगल माना है जो राजस्थानी व ब्रजभाषा मिश्रित है |

 

  चंदबरदाई हिन्दी साहित्य के इतिहास में आदिकाल के प्रतिनिधि कवि हैं | आचार्य शुक्ल इन्हें हिन्दी का पहला महाकाव्य लिखने वाले महाकवि के रूप में स्वीकार किये हैं | इनकी रचना पृथ्वीराजरासो हिन्दी की पहला महा काव्य माना जाता है | इस महा काव्य में पृथ्वीराज चौहान के जीवन गाथा का मनोहारी बर्णन किया गया है | कवि चंदबरदाई पृथ्वीराज चौहान के समकालीन कवि थे | कहा जाता है कि दोनों का जन्म एक ही दिन हुआ और एक ही दिन मृत्यु को प्राप्त किये |

                        चन्दवरदाई की कथा राजपूतों के बीच प्रचलित है कि भारतबर्ष के अंतिम हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान के राजकोषीय मंत्री,मित्र और सामन्त थे | ये राजा के साथ हमेशा रहते चाहे राजदरबार, युद्ध भूमि, शिकार आदि मनोरंजनात्मक खेल ही क्यों न हो |

                 चंदबरदाई का जन्म लाहौर में हुआ था कहा जाता है की पृथ्वीराज का जन्म संवत् 1205 में और मृत्यु 1249 में हुई थी, अत: महाकवि चंदबरदाई का जन्म और मृत्यु भी यही होगा | इनके पिता का नाम ‘राववेन’ और विद्या गुरु का नाम ‘गुरु प्रसाद’ था | ये ‘भट्ट’ जाती के ‘जगात’ गोत्र के थे | चाँद ने दो विवाह किये थे, पहली पत्नी का नाम ‘कमला’, उपनाम ‘नेवा’ तथा दूसरी पत्नी का नाम ‘गौरी’ उपनाम ‘राजीरा’ था | इनके ग्यारह संतानें हुई, दस लड़के और एक लड़की |

                        पृथ्वीराज और चंदबरदाई के बिषय में किवदंती है कि मुसलमान बादशाह मोहम्मद गौरी राजा पृथ्वीराज चौहान को बंदी बना कर गजनी ले जा रहा था | यह समाचार चंदबरदाई सुनते ही  अपनी महाकाव्य की रचना छोड़ तथा रचना कार्य अपने छोटे पुत्र (जल्लन) को शौंप कर राजा के पीछे चल पड़ा जैसा की महा काव्य में उधृत है –

                       ‘पुस्तक जल्ह दै चलि गज्जन नृप काज “

                                   फिर गजनी में गौरी ने पृथ्वीराज के दोनों आँखों को कुचल कर कारागार में रख लिया | कवि चंद राजा व परम मित्र पृथ्वीराज को कारागार से निकाल ने की उपाय सोचने लगे | इन्होंने बादशाह के पास पृथ्वीराज के शब्दबेधी बाण चलाने की कौशलता को परखने के लिये सुचना दी, बादशाह भी राजी हो गया, बादशाह और चंदबरदाई एक उँचे आसन में बैठे पृथ्वीराज के इस कौसलता को देखते रोमांचित हो बादशाह जब वहा ! वहा ! की आवाज की और इधर से अपने राजकवि चंदबरदाई द्वारा इशारा प्राप्त करके राजा पृथ्वीराज ने  इस ल्छयित बाण से बादशाह को मार डाला | अतंत: राजा और चंदबरदाई भी अपने-अपने वरछि से एक-दुसरे के प्राण हर कर आत्म हत्या कर लिये | इस प्रकार राजा और मंत्री अपने शत्रु गौरी को वध कर युद्ध  हारने का बदला लिया |

                               चंदबरदाई की रचना पृथ्वीराज रासो महाकाव्य है | यह 69 समयों में विभक्त है इसकी भाषा को भाषाशात्त्रियों ने पिंगल तथा डिंगल माना है जो राजस्थानी व ब्रजभाषा मिश्रित है |
  

                         अन्य लेख - भाषा के विविध रूपों पर प्रकाश डालिए  

Thursday, May 15, 2025

भाषा के विविध रूपों पर प्रकाश डालिए / bhasha ke vividh rupon pr prkas dalie

         भाषा के विविध रूपों पर प्रकाश डालिए
                Bhasha ke vividh rupon pr prkash dalie


       भाषा के विभिन्न आधारों पर विविध रूप दिखाई देता है, जिन्हें भौगोलिक, ऐतिहासिक, प्रयोगात्मक, प्रयोजनात्मक आदि के रूप में जाना जाता है |

(क)          व्यक्तिबोली – व्यक्ति की भाषा पर सामाजिक, क्षेत्रीय और पर्यावर्णीय सन्दर्भों का प्रत्यक्ष एवं दूरगामी प्रभाव पड़ता है | इसी कारण हर व्यक्ति की अपनी व्यक्ति बोली होती है | होकेट के शब्दों में – “किसी निश्चित समय पर व्यक्ति-विशेष का समूचा वाक्-व्यवहार उसकी व्यक्ति बोली हैं | शाब्दिक और व्याकरणिक व्यक्ति परकता के कारण ही यह व्यक्ति बोली संभव होती है |”

(ख) स्थानीय बोली – एक स्थानीय बोली भुत ही व्यक्ति-बोलियों से मिलकर बनती है जिनमें ध्वनी, रूप, वाक्य एवं अर्थ के आधार पर पारस्परिक बोधगम्यता होती है, यह किसी छोटे स्तर पर बोली जाती है, जिनमें व्यक्ति-बोलियों का समाशिष्ट रूप होता है |

(ग) उपबोली – एक उपबोली एकाधिक स्थानीय बोलियों से मिलकर बनती है, जैसे- भोजपुरी की ध्वनियों, खखार, शह्वारी, गोरखपुरी, नागपुरी हैं |

(घ) बोली – एक बोली एकाधिक उपबोलियों से मिलकर बनती है, जिसे विभाषा भी कहा जाता है | हालाँकि कुछ विद्वानों ने कुछ बोलियों के उपवर्ग को उपभाषा कहा है, जैसे- बिहारी उपभाषा में भोजपुरी, मैथिली और मगही बोलियों का वर्ग है |

(ड) उपभाषा – कुछ बोलियों के उपवर्ग को कुछ विद्वानों ने उपभाषा कहा है, जैसे- बिहारी भाषा में बोजपुरी, मैथिली और मगही बोलियों का एक वर्ग है | लेकिन यह वर्गीकरण भ्रामक और गलत है | इसमें व्याकरणिक समानता और परस्पर बोधगम्यता तो काफी हद तक मिल सकती है किन्तु जातीय अस्मिता के कारण इनमें भिन्नता है | अत: हिंदी को बिहारी,राजस्थानी आदि उपभाषाओं से अलग रखना सही नहीं है |

   प्रयोग के आधार पर – प्रयोग के आधार पर भाषा के विभिन्न रूप मिलते हैं, जो निम्नानुसार हैं-

(क)          सामान्य बोलचाल की भाषा – यह किसी भी समाज में रोजमर्रा के रूप में प्रयुक्त होने वाली सामान्य भाषा होती है तथा प्राय: संपर्क भाषा का काम करती है | यह अपनी विभिन्न भाषिक इकाइयों, शब्दावली और व्याकरणिता के आधार पर अपनी पहचान बनाती है |

(ख)         साहित्यिक भाषा – प्रयोग साहित्य-रचना, शिक्षा आदि में होता है, इसका तथा यह भाषा का आदर्श रूप है| यह प्राय: परिनिष्ठित होती है किन्तु साहित्यिक भाषा कभी-कभी सामान्य भाषा के नियमों को तोडती है |विशिष्ठ चयन-संयोजन से यह विशिष्ठ भाषा बन जाता है | विश्व में हिंदी, अंग्रेजी, फ्रेंच,रुसी,जर्मनी आदि भाषाएँ साहित्यिक भाषा के रूप में प्रयुक्त होती है |

(ग)           व्यावसायिक भाषा – व्यवसाय व्यापार में प्रयुक्त होने के लिए यह भाषा विशेष रूप धारण करती है | यह प्राय: औपचारिक एवं अनौपचारिक और तकनीकी या अर्द्धतकनीकी होती है | यह लिखित और मौखिक दोनों रूपों में प्रयुक्त होती है | इसकी व्यवसाय या व्यापार संबंधी अपनी विशिष्ट शब्दावली और संरचना होती है |

(घ)           कार्यालयी भाषा – कार्यालयों, निकायों, कंपनियों, प्रशासन आदि में इस भषा का प्रयोग होता है | यह सामान्य भाषा पर आधारित तो होती है लेकिन शब्दावली तथा संरचना में अंतर मिल सकता है | यह तकनीकी या अर्द्धतकनीकी होती है, इसीलिए यह प्राय: औपचारिक शैली में लिखी जाती है | इसके मौखिक रूप के स्थान पर लिखित रूप का अधिक प्रयोग होता है |

(ङ)            राजभाषा – इसका प्रयोग सरकारी कामकाज को संपन्न करने के लिए किया जाता है | यह प्राय: परिनिष्ठित और मानक होती है | यह देश में अधिक बोले जाने वाली भाषा होती है | इसमें विषयानुसार शब्दावली और संरचना का प्रयोग होता है | इसका प्रयोग प्राय: सरकारी मंत्रालयों, कार्यलयों, कंपनियों,नियमों, निकायों,संसद आदि में होता है ताकि जनता के साथ संबंध बनाया जा सके | इसे सर्वजन-सर्वकार्य सुलभ बनाने के लिए इसकी शब्दावली में उपयुक्त चयन करने की भी सुविधा रहती है | देश में प्रयुक्त अन्य भाषा की अपेच्छा इसका प्राय: प्रमुख स्थान रहता है | भारत की राजभाषा हिंदी है |

३. निर्माण के आधार पर

(क) सहज भाषा – जिनका उद्भव प्राकृतिक और सहज रूप में हुआ है, ऐसी सामान्य बोलचाल की भाषाएँ जैसे- हिन्दी, अंग्रेजी, जर्मन |

(ख) कृत्रिम भाषा – अंतराष्ट्रीय संप्रेषण की दृष्टि से विभिन्न भाषाओँ के बीच सर्वभौमिक रूपों लेकर कृत्रिम भाषा के निर्माण कार्य का प्रयास हुआ, जैसे- एस्पेरैतों, इंडो | इसका उदेश्य विभिन्न भाषा-भाषी लोगों को परस्पर लाकर भाषिक आदान-प्रदान की सुविधा देना था | कृत्रिम भाषा के दो भेद उपभेद हैं-

(अ) सामान्य कृत्रिम भाषा – सामान्य बोलचाल में प्रयुक्त करने के लिए बनाई गई भाषा, जैसे- एस्पेरैतो भाषा |

(आ) गुप्त कृत्रिम भाषा – किसी विशिष्ट प्रयोजन के लिए बनाई गई भाषा,जैसे- सेना, दलालों, डाकुओं आदि की भाषा |

४. मानकता के आधार पर

 (क) मानक या परिनिष्ठित भाषा – जो व्याकरण सम्मत तथा प्रयोग सम्मत हो, ध्वनी, शब्द, वाक्य आदि में व्याकरण सम्मत होने के साथ-साथ एकरूपता और लोक स्वीकृति हो, जैसे- मुझे घर जाना है |

(ख) मानकेत्तर भाषा – जो प्रयोग सम्मत हो, जिसमें लोक स्वीकृति हो किन्तु जो व्याकनिक दृष्टि से शुद्ध न हो, जैसे- मैंने घर जाना है |

(ग) अमानक भाषा – जो व्याकरण सम्मत और एकरूपी न हो तथा तथा जिसे लोक स्वीकृति भी प्राप्त न हो, जैसे – मेरे को जाना हैं |

(घ) उपभाषा – यह भाषा प्राय: अशिक्षित या अर्द्धशिक्षित वर्ग के लोगों में चलती है | व्यवहार में अनौपचारिकता का अतिशयवादी रूप है | इसमें तत्वों के साथ-साथ अशिष्ट एवं अग्राह्य रूपों तथा स्थानीय बोलचाल के ठेठ और अश्लील शब्दों का भी प्रयोग धडल्ले से होता है | 

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Wednesday, May 14, 2025

विद्यापति की काव्यगत विशेषता /vidyapti ki kavygt visheshta

                                              विद्यापति की काव्यगत विशेषता

              विद्यापति आदिकालीन हिन्दी भाषा साहित्य के महाकवि हैं | महाकवि आदिकाल और भक्तिकाल के संक्रांति काल के कवि हैं | अत: काव्य के बिषय व कला पछ में आदिकालीन और भक्तिकालीन प्रवृति की झलक है | सच कहा जाय तो विद्यापति ही सर्वप्रथम ऐसे कवि हैं जिसने भाषा जननी संस्कृत से काव्य के विषय को ग्रहण करते हुये लोक-कंठों के वाणी को काव्य भाषा के रूप में दर्जा दिलायी | हम इनके काव्यगत विशेषता को निम्न प्रकार से उपस्थित कर सकते हैं |

1.      आश्रयदाताओं की यशोगान – अपने रचनाओं में आश्रयदाता राजा की यशोगान किये हैं | जैसे – कीर्तिलता और कीर्तिपताका में कीर्ति सिंह के वीरता और शौर्य का वर्णन है तथा पदावली में राजा शिवसिंह व महारानी लखिमा देवी के रूप व सौन्दर्य को महिमान्वित किया गया है |


2.     श्रृंगार भावना – महाकवि के रचनाओं को सह्रदय बिचार करने की आवश्यकता नहीं है, वांछित मन से भी कथा की वाचना की जाय तो भी पाठक को प्रसंगानुरूप रस की भावना उमड़ आती है, इसका मूल कारण श्रृंगार योजना है | इन्होंने श्रीकृष्ण और राधा की रूप में ऐसी श्रृंगार डाली है की श्रोता राजा शिवसिंह और लखिमा देवी को अपने ही सौन्दर्य की भावना उमड़ आती है | महाकवि कृष्ण भक्त कवि हैं | अपने इष्टदेव राधा और कृष्ण के श्रृंगार वर्णन किये हैं जो अनुपम है जिससे देखकर भक्त सदा अनन्य बने रहने की कामना करते हैं |


3.     भक्ति भावना – विद्यापति वैष्णव भक्त के साथ की बहुदेवोपासक भक्त महाकवि हैं | इन्होंने शिव भक्ति के साथ ही कृष्ण, राधा, गंगा, दुर्गा के साथ-साथ ग्राम देवता की भी भक्ति किये हैं | गंगा भक्ति का उदाहरण देखिये – की  करब जप-तप-योग-धियाने,
           जनम कृतारथ एकहि सनाने |
                   कहा जाता है कि इनकी भक्ति भावना बुढ़ापे का प्रतिफल है जो निराशा से उत्पन्न हुआ है | जैसे –      माधव हम परिणाम निरासा |
              तुहूँ जगतारण दीन दयामय अतए तोहर विसवासा ||
                  आधा जनम हम नींद गमाओल जरा-शिशु क्त दिन गेला |
                  निघुवने रमणी रस-रंग मातल तोहे भजब कौन बेला ||  


4.     प्रकृति चित्रणविद्यापति दरबारी कवि थे | इसलिए राजा के यशोगान भी किये, फिर इष्टदेवों के माध्यम से अपने आश्रयदाता का ही सौन्दर्य वर्णन किये हैं | इसके साथ-साथ आवश्यकता पड़ी तो भक्तिभावना के साथ ही प्रकृति चित्रण भी किये हैं | जैसे- आएल रितुपति वसंत |
                                                   हिमकर कीरनि भेल पौगणड ||


5.    
काव्यरूप – विद्यापति महाकवि थे | अत: ये बहुमुखी प्रतिभा के धनी कलाकार थे | इन्होंने कीर्तिलता और कीर्तिपताका को प्रबन्ध और पदावली को मुक्तक में लिखे हैं | गोरक्षविजय नाट्य में है |


6.     गीतात्मकता – सम्पूर्ण रचना गेय हैं | कविताएँ राग-रागिनियों के साथ-साथ लोक-धुनों में हैं | देवी- देवता के भजन शास्त्रीय हैं तो भारतीय संस्कृति के संस्कारों जैसे – छठी व्रत सोहर, मुंडन का सगुण, शादी-व्याह के सरस गीत, कोहवर के गीत आदि हैं | ये सभी गीत आज भी मिथिला के लोक कंठों में गाये जाते हैं |


7.     अलंकार योजना विद्यापति के रचनाओं में अलंकारों की झड़ी है | उपमा, रूपक, अतिश्योक्ति और अनुप्रास बिशेष अलंकारों में हैं | नायक-नायिका के सौन्दर्य व विम्ब विधान में अलंकार सटीक आई है |


8.     भाषा – पदावली की भाषा मैथली, कीर्तिलता व कीर्तिपताका की भाषा अवहट्ट तथा अन्य रचनाएँ जैसे – दानवाक्यावली, शैवसर्वस्वसार, आदि की भाषा संस्कृत है |


                       इस प्रकार विद्यापति लोक कंठहार कवि हैं | इनकी रचनाओं में श्रृंगार, भक्ति के साथ-साथ आश्रयदाताओं की स्तुति और शौर्य वर्णन मिलता है |


हमारी अन्य लेख -   कवि और कविता निबन्ध की समीक्षा

                             
 
 

पृथ्वीराज रासो की प्रामाणिकता व अप्रामाणिकता / prithviraj raaso ko pramanikta va aprmanikta

                               पृथ्वीराज रासो की प्रामाणिकता व अप्रामाणिकता

                ‘पृथ्वीराज रासो’ हिन्दी साहित्य का सर्वप्रथम महाकाव्य है | प्रारम्भ में यह ग्रन्थ प्रमाणिक माना जाता था, पर अब अधिकांश विद्वान् इसे अप्रामाणिक मानते हैं | इस प्रकार इस रासो काव्य के प्रामाणिकता के सम्बन्ध में चार रूप सामने आते हैं –
(1)   प्रमाणिक मानने वाले विद्वान – इसमें डा० श्याम सुन्दरदास , मोहनलाल विष्णुलाल पांड्या, मिश्रबंधु, और कर्नल टाड हैं |
(2)   पूर्णत: अप्रामाणिक मानने वाले विद्वानों में – रामचन्द्र शुक्ल, गौरीशंकर हीराचन्द ओझा, डा० बुलर, कविराज श्यामलालदान और मुंशी देवी प्रसाद |
(3)   पूर्णत: प्रामाणिक और न ही पूर्णत: अप्रामाणिक मानने वाले विद्वान – मुनिजिन विजय, डा० सुनीति कुमार चटर्जी, हजारी प्रसाद द्विवेदी हैं |
(4)   चौथा मत नरोत्तमदास स्वामी का है |
      वस्तुत: प्रारम्भ में यह ग्रन्थ विवादास्पद नहीं था | कर्नल टाड ने इसकी वर्णन शैली तथा काव्य सौन्दर्य पर रीझकर इसके लगभग 30 हजार छंदों का अंग्रेजी में अनुवाद भी किया था | तासी भी इसकी प्रामाणिकता में संदेश नहीं किया था | बंगाल की राँयल एशियाटिक सोसाईटी ने इस ग्रन्थ का मुद्रण भी आरम्भ कराया था | सन 1875 ई० में डा० बुलर ने ‘पृथ्वीराज विजय’ ग्रन्थ के आधार पर इसे अप्रामाणिक रचना घोषित किया है | फलत: राजस्थान के कुछ इतिवृत-खोजियों में कविराजा मुररिदन, श्यामलदान, गौरीशंकर हीराचन्द ओझा आदि ने इस काव्य को अप्रामाणिक सिद्ध करने के लिये सायास तर्क जुटाये | इनके तर्क को दशरथ ने निराधार किया | फिर आगे इतना यह विवादास्पद होने लगा की विद्वान् नये-नये तर्क प्रस्तुत करने लगे | जैसे –

अप्रामाणिकता के लिये तर्क  - ‘पृथ्वीराज रासो’ के अप्रमाणिकता के तर्क निम्नलिखित हैं –
(1)   इस ग्रन्थ में उल्लिखित घटनाये और नाम इतिहास  से मेल नहीं खाते हैं | इसमें परमार, चालुक्य और चौहान क्षत्रियों को अग्नि वंशी ममना गया है , जबकि ये सभी सूर्यवंशी प्रतीत हुये हैं |
(2)   पृथ्वीराज का दिल्ली लोट जाना, संयोगिता-स्वयंवर आदि घटनाये इतिहास से मेल नहीं खाते |
(3)   अनंगपाल, पृथ्वीराज तथा बीसलदेव के राज्यों के सन्दर्भ भी अशुद्ध हैं |
(4)   पृथ्वीराज की माँ का नाम कर्पूरी था, जबकि रासो में कमला बताया गया है |
(5)   पृथ्वीराज के बहन पृथा का विवाह मेवाड़ के राणा समरशिंह के साथ अशुद्ध है |
(6)   पृथ्वीराज द्वारा गुजरात के राजा भीमसिंह का वध भी इतिहास सम्मत नहीं है |
(7)   पृथ्वीराज के चौदह विवाह इतिहास  से मेल नहीं है |
(8)   पृथ्वीराज के हाथों गोरी की मृत्यु इतिहास सम्मत नहीं है |
(9)   पृथ्वीराज द्वारा सोमेश्वर की मृत्यु इतिहास सम्मत नहीं है |
(10)  तिथियाँ अशुद्ध हैं | सभी तिथियाँ 90-100 वर्ष पीछे ले जाती हैं |

     प्रामाणिकता के तर्क – प्रामाणिकता के तर्क निम्नलिखित हैं –
(1)   डा० दशरथ शर्मा का मत है की इसका मूल प्रक्षेपों में लिखा है इधर की लघुतम प्रतियों में इतिहास सम्बन्धी अशुद्धियाँ नहीं है |
(2)   घटनाओं में 90-100 वर्षों का अन्तर संवत् के कारण है |
(3)   डा० हजारी प्रसाद द्विवेदी ने पृथ्वीराज रासो की भाषा संयुक्ताक्षर अनुस्वारान्त पाया है जो 12 वी शताब्दी में  मान्य है |
(4)   ‘पृथ्वीराज रासो’ काव्य रचना है इससे ऐतिहासिक रचना न माने |
(5)   अरबी-फारसी शब्द का प्रयोग सही है क्योंकि चन्दवरदाई लाहौर के थे |
                इस प्रकार कहा जा सकता है की ऐसे अनेक तर्क हैं जो इस काव्य की प्रामाणिकता के लिये उचित तर्क नहीं बन पते हैं | यही नहीं यदि अप्रामाणिकता के ही तर्क दिये जाये तो ‘रामचरित मानस’ ‘सूरसागर’ ‘बीजक’ में भी प्रामाणिकता पर संदेह किया जा सकता है क्योंकि इनमें भी प्रक्षिप्त अंश अस्वीकार है | अत: पृथ्वीराजरासो प्रामाणिक है क्योंकि चन्दवरदाई इनके समकालीन कवि हैं |

                                                       
                                                           अन्य लेख - भाषा के विविध रूपों पर प्रकाश डालिए

















 

अर्थ परिवर्तन की विविध दिशाओं को विश्लेषित कीजिए / arth privrtn ki vividh dishaon

               अर्थ परिवर्तन की विविध दिशाओं को विश्लेषित कीजिए |

     अर्थ-परिवर्तन जिसे शब्दार्थ परिवर्तन भी कहा जाता है, भाषा के विकास और परिवर्तन का एक महत्त्वपूर्ण पहलू है | यह प्रक्रिया तब होती है जब समय के साथ शब्दों के अर्थ बदलते हैं, उनके संयोग में विविधता आती है या वे इन सन्दर्भों में प्रयुक्त होने लगते हैं | जैसे –

१.    अर्थ-विस्तार   – जब कोई शब्द पहले सीमित अर्थ में प्रचलित रहता है और बाद में उसका अर्थ उसी क्षेत्र में विस्तृत या व्यापक हो जाता है, तब इस प्रक्रिया को अर्थ-परिवर्तन कहते हैं | यथा- ‘तेल’ शब्द का आशय था तिल का द्रवित सार पदार्थ या तिल से निकाला हुआ तेल | अर्थ-विस्तार के कारण अन्य पदार्थ के द्रवित सार को भी तेल कहने लगे, यथा सरसों का तेल, मुंगफली का तेल, अलसी का तेल, चमेली का तेल, नारियल का तेल, नीम का तेल, मछली का तेल और अंत में मिटटी का तेल भी इसी में आ मिला | ‘प्रवीण’ शब्द को आगे देखें | इस शब्द का अर्थ पहले ‘प्रकिस्तोवीणायाम’ अर्थात् जो अच्छी तरह वीणा बजाने वाला हो हुआ करता था | आज हर काम में दक्ष चतुर को ‘प्रवीण’ कहा जाता है | भले वह चोरी में ही क्यों न हो | जैसे- बांसुरी बजाने में प्रवीण है | भोजन बनाने वाले और बांसुरी बजाने वाले ने भले ही कभी भी वीणा छुई भी न हो फिर भी इनके लिए ‘प्रवीण’ शब्द का प्रयोग किया जाता है | यही स्थिति ‘कुशल’ ‘गवेषणा’ ‘गवाक्ष’ ‘निपुण’ तथा ‘स्याही’ आदि शब्दों की है | ‘कुश’ को उखाड़ते समय सामान्यतया सावधानी बरतते हैं | एक तो तृणों से कुश की पहचान करना फिर बिना खरोंच अथवा चीर लगे ‘कुश’ को उखाड़ लेना बहुत निपुणता और विवेचना का काम होता था, वही कुशल माना जाता था | आज लगभग प्रत्येक काम में ‘कुशल’ लोगों की भीड़ लगी हुई है, कुश का अर्थ उसमें गायब हो गया है | इसी तरह ‘गवेषणा’ क्रिया का प्रयोग गायों को ढूढने में हुआ करता था | आज किसी तरह खोज भले ही वह वैज्ञानिक ही क्यों न हो ‘गवेषणा’ कही जाती है | ‘गवाक्ष’ पहले गाय की आँखों के अर्थ में प्रयोग हुआ करता था | लेकिन आज इस का अर्थ खिड़की अथवा झरोखा हो गया है | ‘निपुण’ का अर्थ पहले ‘पुण्य’ कमाने वाले के लिए हुआ करता था | लेकिन आज तो किसी भी गलत-सही वस्तु का चतुराई से उपार्जन ‘निपुण’के भीतर ही आता है | ‘स्याही’ शब्द का अर्थ ‘स्याह’ अर्थात् ‘काला’ हुआ करता था | लेकिन आज हर प्रकार की रोशनाई या मसि ‘स्याही’ खी जाती है |यथा – नीलीस्याही, काली-स्याही’ लालस्याही, गायों के रहने के स्थान को पहले गोशाला या गोष्ठ ही कहते हैं | इसी तरह ‘महाराज’ शब्द पहले केवल महाराज के लिए प्रयुक्त होता था, किन्तु बाद में इसका अर्थ-विस्तार हुआ कि किसी भद्र पुरुष को महाराज कह सकते हैं | ‘महाराज’ शब्द रसोइया के लिए भी चलता है |

२.    अर्थ-संकोच – प्राय: देखा जाता है कि पहले कोई शब्द विस्तृत अर्थ का वाचक था, किन्तु बाद में वह सिमित अर्थ में प्रयुक्त होने लगता है | व्युत्पति के आधार पर उसे विस्तृत अर्थ का वाचक होना चाहिए किन्तु उसका प्रयोग सिमित अर्थ में होता है | अर्थ परिवर्तन की इस दिशा को अर्थ स्न्कोज कहते हैं | ‘मृग’ शब्द पहले सभी जंगली जानवरों के लिए प्रयुक्त होता था किन्तु अब यह शब्द एक पशु विशेष के लिए रूद हो गया है | ‘पंकज’ का शाब्दिक अर्थ है कीचड़ में उत्पन्न होने वाला किन्तु अब यह शब्द ‘कमल’ के अर्थ में रुढ हो गया है | ‘वेदना’ शब्द का अर्थ सुख और दुःख दोनों के अनुभव के लिए था | अब केवल ‘दुःख’ अर्थ रह गया है | अर्थ संकोच के कारण है – समास, उपसर्ग, विशेषण, पारिभाषिकता, नामकरण और प्रत्यय जैसे- नीलाम्बर, पीताम्बर, दशानन, गजबदन, पुरारी शब्द बहुब्रीहि समास के कारण संकुचित अर्थ के वाचक हो गये हैं | इसी तरह उपसर्ग भी अर्थ को सिमित कर देते हैं, जैसे- ‘हार’ शब्द विभिन्न उपसर्गों के सहयोग से विभिन्न अर्थो वाचक हो जाता है, जैसे- विहार, प्रहार, उपहार, संहार आदि | इसी प्रकार के अन्य उदाहरण देखिए- ‘योग’ उपसर्ग से संयोग’ वियोग, उपयोग, आयोग, प्रयोग | ‘कार’ उपसर्ग से आकार, प्रकार, विकार, संस्कार, प्रतिकार | प्रत्यय लगाने से भी अर्थ संकोच होता है, जैसे- ‘कृ’ धातु से कार, कारक, करण, कृति, कर्तव्य, कर्म आदि शब्द बनते हैं | विभिन्न प्रत्ययों के प्रयोग के कारण एक ही कृ धातु विभिन्न अर्थों के वाचक बन गये हैं | अर्थ परिवर्तन का सबसे बडा साधन है – विशेषण, जैसे ‘जन’ का अर्थ है ‘लोग’ लेकिन इस ‘जन’ शब्द में जब ‘दुर’ या ‘सत’ विशेषण लग जाता है तो वः ‘दुर्जन’ व् ‘सज्जन’ शब्द का वाचक हो जाता है | इसी तरह से ‘कमल’ शब्द में ‘नीलकमल’ ‘श्वेतकमल’ ‘रक्तकमल’ आदि विशेषण लगकर अर्थ का संकोच कर देते हैं | इसी तरह उपसर्ग भी अर्थ को सिमित कर देते हैं, जैसे- ‘हार’ शब्द विभिन्न उपसर्गों के सहयोग से विभिन्न अर्थों वाचक हो जाता है, जैसे- विहार, प्रहार, उपहार, संहार आदि | इसी तरह के अन्य उदाहरण देखिए – ‘योग’ उपसर्ग से संयोग, वियोग, उपयोग, आयोग, प्रयोग | ‘कार’ उपसर्ग से ‘आकार’ ‘प्रकार’ ‘विकार’ ‘संस्कार’ ‘प्रतिकार’ प्रत्यय लगाने से भी अर्थ-संकोच होता है, जैसे- कृ धातु से कार, कारक, करण, कृति, कर्तव्य, कर्म आदि शब्द बनते हैं | विभिन्न प्रत्ययों के प्रयोग के कारण एक ही कृ धातु विभिन्न अर्थों के वाचक बन गये हैं |   

३.    अर्थादेश – आदेश का अर्थ होता है, अर्थादेश में अर्थ का विस्तार या संकोच नहीं होता बिलकुल बदल जाता है अर्थात् पहले वह शब्द किसी दुसरे अर्थ का वाचक था किन्तु बाद में दूसरी अर्थ का वाचक बन गया, जैसे- ‘असुर’ शब्द वेद में ‘देवता’ के अर्थ का वाचक था, किन्तु बाद में यह ‘राक्षस’ या ‘दैन्य’ का वाचक बन गया है | ‘आकाशवाणी’ का अर्थ पहले ‘देववाणी’ था, अब उसका प्रयोग ‘अखिल भारतीय रेडियो’ के लिए होता है | ‘साहस’ शब्द पहले डकैती आदि बुरे कामों का बोधक रहा लेकिन आज अच्छे अर्थ के बोधक हो गया | अर्थ-परिवर्तन के इन उदाहरणों विचार करने से दो बातें सामने आती हैं | पहला कुछ शब्दों का अर्थ पहले बुरा रहता है और बाद में अच्छा हो जाता है, दूसरा कुछ का अर्थ पहले अच्छा रहता है और बाद में बुरा हो जाता है, इन्हीं को क्रमशः अर्थोत्कर्ष और अर्थोपकर्ष कहते हैं |

४.    अर्थोत्कर्ष – जब शब्दों में अर्थ परिवर्तन से अर्थ में उत्कर्ष आता है तो उन्हें अर्थोत्कर्ष की श्रेणी में रखा जाता है | जिन शब्दों के अर्थ में उत्कर्ष हुआ है | उनके उदाहरण निम्नवत हैं –

       ‘मुग्ध’ शव्द पहले ‘मुर्ख’ अर्थ में था अब अच्छे अर्थ में ‘मोहित होना’ के अर्थ प्रयुक्त होता है |

      ‘साहस’ शव्द पहले डाका डालना, चोरी करना, अभिचार करना आदि अर्थ में था, किन्तु अब ‘उत्साहयुक्त कार्य के अर्थ में प्रयुक्त होता हैं |

        ‘कर्पट’ शब्द पहले फटे-चिपड़े के लिए प्रयुक्त होता था किन्तु अब कर्पट अर्थात् कपड़ा अच्छे वस्त्र के रूप में प्रयुक्त होता है |

  ‘गोष्ठ-गोष्ठी’ गोष्ठ शब्द गौशाला के लिए प्रयुक्त होता था किन्तु अब गोष्ठ शब्द से बना गोष्ठी शब्द सभ्य समाज की सभा के लिए प्रयुक्त होता है |

५.    अर्थोपकर्ष- अथ परिवर्तन से कुछ शब्दों के अर्थ में हीनता निकृष्टता या अपकर्ष हो जाता है | इसी को अर्थापकर्ष के उदाहरण इस प्रकार है जैसे- ‘भद्दा’ शव्द भद्र धातु से बना है, जिसका अर्थ भला होना चाहिये किन्तु अब यह बुरे के अर्थ में प्रयोग होता है | ‘शौच’ शव्द ‘शुचि’ धातु से बना है | अत: पवित्र कार्य के लिए प्रयुक्त होता था किन्तु अब ‘मल त्याग’ के अर्थ में प्रयुक्त होता है| 


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अमीर खुसरो के दोहे, मुकरियाँ और गीत /amir khsro ke dohe mukriyan or geet

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