Monday, May 10, 2021

सूरदास का जीवन परिचय और रचनाएं / surdas / surdas ki mrityu

 

सूरदास का जीवन परिचय और रचनाएं




                                                                                                                                   

                         भक्तिकाल के कवियों में सूरदास कृष्णाश्रयी शाखा के प्रतिनिधि कवि हैं | इनका जन्म दिल्ली के निकट ब्रज की ओर स्थित सीही ग्राम माना जाता है | इनका जन्म वैशाख शुक्ल 5 संवत 1515 वि० यानि 1478 ई० माना जाता है | इनकी मृत्यु 105 वर्ष की लम्बी आयु भोगने के पश्चात् सन 1620 ई० को मृत्यु हुई | ‘खंजन नैन रूप रस गाते’ पद गाते हुये पारसौली में मृत्यु हुई | इनके पिता का नाम रामदास था | सूरदास के गुरु अष्टछाप के संस्थापक बल्लभाचार्य थे | शिष्य सूरदास भी अष्टछाप के जहाज और मूर्धन्य कवि थे | अष्टछाप के कवि हैं- कुंभनदास, सूरदास, कृष्णदास, परमानन्ददास, गोविन्दस्वामी, छीतस्वामी, नन्ददास चतुर्भुजदास |

प्रमुख रचनाये – 

सूरसागर, सुरसारावली, साहित्य लहरी, नल दमयन्ती, ब्याहले, नागलीला आदि ग्रन्थ हैं |

सूरसागर – श्रीमद भागवत पर आधृत है, इसमें दशम स्कन्ध में वर्णित कृष्ण की बाललीलाओं और यौवन क्रीड़ाओं की प्रमुख विवेचना किया गया है | सूरसागर में विनय,बालबर्णन एवं भ्रमरगीत इन तीन विभागी में चित्रित है |

साहित्य लहरी – सूरदास के प्रसिद्ध दृष्टकूट पदों का संग्रह है | इसमें अर्थगोपन शैली में राधा-कृष्ण के लीलाओं का वर्णन है |

सूरसारावली – इसे विद्वान लोग अप्रामाणिक ग्रन्थ मानते हैं |

                                                सूर की भक्ति पद्धति का मेरुदण्ड पुष्टिमार्गीय भक्ति है | भगवान की भावना पर कृपा का नाम पोषण है | भागवत प्राप्ति के लिये सूर की भक्ति पद्धति में अनुग्रह का प्राधान्य है | ज्ञान, योग, कर्म यहाँ तक की उपासना भी निरर्थक समझी जाती है | नारद भक्ति सूत्र के एकादश रूप – गुणामहात्म्यासक्ति, संख्यासक्ति, कान्तासक्ति, स्मरणासक्ति, दास्यासक्ति, रूपासक्ति, पूजासक्ति, वात्सल्यासक्ति, आत्मनिवेदनासक्ति, तन्मयासक्ति और परमविरहासक्ति का वर्णन किया है | परन्तु इनमें से इनका मन अधिकतर सख्य, वात्सल्य, रूप, कान्त और तन्मयासक्ति पर रमा है |

                                                     सूर के काव्य ह्रदय के गहराईयों को नि:सृत करती है | इनके काव्य में भक्तिभावना, वात्सल्य के वियोग और संयोग रूपों में उकेरा गया है | काव्य का कला पछ ब्रजभाषा में रचित शब्द और अर्थालंकार से सुशोभित है | जिसमें कोमलकांत पदावली, माधुर्य एवं प्रसाद गुण, अलंकारों का भावानुरूप प्रयोग आदि बिशेषता है |





Friday, May 7, 2021

पद और वाक्य / vakky or pd

                                               पद और वाक्य

. वाक्य – भाषा के अंगों की सबसे पूर्णत: सार्थक इकाई है | इसकी विवेचना निम्न प्रकार से की जा सकती है |

* रचना की दृष्टि से वाक्य के तीन भेद हैं –

   १. सरल या साधारण वाक्य २. मिश्र वाक्य ३. संयुक्त वाक्य

१. सरल या साधारण वाक्य

 जिस वाक्य में एक कर्ता और क्रिया होती है उसे साधारण या सरल वाक्य कहते हैं | जैसे – पानी बरषा, बिजली चमकती है, हम खा चुके आदि |

२. मिश्र वाक्य – 

एक साधारण वाक्य के साथ अधीन में कोई दूसरा वाक्य भी हो, जैसे – मैं खाना खा चूका तब, तब वह आया | मैं खाना नहीं खाया इसलिए मैंने फल नहीं खाया |

३. संयुक्त वाक्य

 जिस वाक्य में साधारण या मिश्र वाक्य का मेल संयोजक अथवा अवयवों द्वारा होता है उसे संयुक्त वाक्य कहते हैं, जैसे– मैंने खाना खाया और मेरी भूख मिट गयी| मैंने भोजन नहीं किया और इसलिए मेरी भूख मिट गयी |

* अर्थ की दृष्टि से वाक्य के आठ भेद हैं –

१. विधिवाचक – हम खा चुके |

 २. निषेधवाचक – हमने खाना नहीं खाया|

३. आज्ञावाचक – तुम खाओ |

४. प्रश्नवाचक – क्या तुम्म खा रहे हो |

५. विस्मयवाचक – ओह! मेरा सर फटा जा रहा है |

६. संदेहवाचक – उसने खा लिया होगा|

७. इच्छावाचक – तुम अपने कार्य में सफल रहो|

 ८. संकेतवाचक – पानी न बरषत तो धान सुख जाती |


 पद – विभिन्न पद मिलकर वाक्य का निर्माण करते हैं, जैसे-  अभिहितान्वयवाद के अनुसार पदों के योग से वाक्य की निष्पति होती है, किन्तु इसके लिए तीन चीजों की आवश्यकता होती है- , आकांक्षा २. योग्यता ३. आसक्ति


१.   आकांक्षा आकांक्षा कहते हैं अर्थ की अपूर्णता को, जैसे केवल लड़कासुनने सेs श्रोता को संतोष नहीं होता | वः यह जानने के लिए उत्सुक रहता है की लडके के सम्बन्ध में क्या कहना अभीष्ट है| इसलिए आकांक्षा एक प्रकार की मानसिक स्थिति है, जिसका महत्व श्रोता की दृष्टि से है| दुसरे शब्दों में इसको ऐसे भी ख सकते हैं कि आकंक्षा का सम्बन्ध श्रोता की ग्रहणशीलता या उत्कंठा से है| बात यह है कि पदों का अन्योन्याश्रयत्व होता है|एक पद अर्थ देने में असमर्थ है,इसलिए वः दुसरे पदों की सहायता लेता है| जैसे- ‘लड़का पुस्तक पड़ता हैएस वाक्य में तीन पद हैं जो परस्पर एक-दुसरे के अर्थ के पूरक हैं और तीनों मिलकर ही एक समुदित और पूर्ण अर्थ की प्रतीति करते हैं|


२.   योग्यता योग्यता का अर्थ पदों के अन्वय में बाधा दो प्रकार से पढ़ सकती है . अर्थ या प्रतीति की दृष्टी से, और ख. पदों के अन्वय की दृष्टि से| एक का सम्बन्ध मन से है और दुसरे का व्याकरण से, जैसे- ‘किताब से पानी भरता हैइस वाक्य में प्रतीति मुल्क बाधा है| कारण की किताब को पानी भरना संभव नहीं हैं| व्याकरण की दृष्टि से भी संगत नहीं है|

         अन्वय की दृष्टि से बाधा वहाँ होती है जहाँ व्याकरण के अनुसार पदों का विन्यास नहीं होता है| जैसे- लड़का खेलती थी (लिंग विषयक अयोग्यता)|

लडके खेलता था (वचन विषयक योग्यता)|

हम जाता है (पुरुष विषयक योग्यता)|

राम ने पड़ता हैं (विभक्ति विषयक योग्यता)|

     इन वाक्यों में सार्थकता का आभाव नहीं पर हिंदी व्याकरण नियम का पूर्ण आभाव है|


३.    आसत्ति आसत्ति का अर्थ है समीपता| वाक्य में प्रयुक्त होने वाली पदों को देश और काल दोनों दृष्टि से परस्पर आसन्न रहना चाहिए| अगर वे दूर पड़े तो अर्थबोध में बाधा होगी, जैसे- आज कहे लड़काऔर कल कहे खेलता हैतो अर्थबोध नहीं होगा| ऐसे ही लड़का सूर्य दौड़ता है फूल पड़ता है चमकता है घोडा खिलता हैएसा सभी शब्द सार्थक हैं पर आसक्ति के क्रम बाधित के कारण अर्थबोध में बाधा है|

     सामान्य दृष्टि से वाक्य विन्यास के लिए आकंक्ष, योग्यता और आसक्ति तीनो आवश्यक हैं पर योग्यता सबसे अपेक्षित है, जैसे- बाघ ! साँप ! भागो ! बचाओ ! निष्कर्ष है आकांक्षा,आसक्ति के साथ अन्वय अति आवश्यक है, जैसे

              तरुशिखा पर थी अब रजनी

              कमलिनीकुलवल्लभ की प्रभा| (प्रियप्रवास)

     यहाँ साफ दृष्टिगोचर है कि वाक्य विन्यास के लिए योग्यता सबसे आवश्यक है|

         

Wednesday, April 14, 2021

चैत महीना का महत्व चैत महीना की फलाफल चैत महीना भारतीय वर्ष का पहला कैलेंडर महीना

 

 चैत चैत महीना की पूजा में भक्तों द्वारा नृत्य करते हुए


चैत महीना  कि प्रारंभ

 चैत महिना मार्च फरवरी 9 अप्रैल को प्रारंभ होती है एवं माने तो इससे सरस्वती पूजा के 25 में 3 से प्रारंभ होती हुई यह महीना चित्रा नक्षत्र में पड़ने के कारण चैत कहा जाता है इस चैत महीना को बसंत ऋतु का अंत और ग्रीष्म ऋतु की प्रारंभ मानी जाती है इस महीना प्रकृति हरा भरा और सुख भाई ने मालूम पड़ती है

चैत महीना को भक्तों को प्राप्त फलाफल 

इसी महीना प्रकृति अपने हरी भरी गोद के लिए अग्रसर होती है अतः भक्त भी प्रकृति की पूजा सीप के माध्यम से करते हुए अपने जीवन को हरा भरा रानी खुशहाली जीवन की कामना करते हैं 


चैत महीना में भक्तों द्वारा अन्य भक्तोंं के भक्ति की  धाराप्रवाह करते हुए 

चैत महीना पुरुष और स्त्री के लिए फल देने हमें मालूम है कई कई संस्कृतिक धाराएं पुरुष और स्त्री के लिए  समान रुप की पर्व और त्योहार हैं सांस्कृतिक पर्व और त्योहारों में चैत महीना का पर्व भी स्त्री और पुरुष के भक्तों के लिए समान फल देनी है अतः स्त्री और पुरुष समान रूप से इस पर्व की आराध्य करते हैं

पुरुष भक्तों द्वारा चैत महीना में शिव भक्तों की आराध्य करते हुए





Tuesday, April 13, 2021

दिनकर की जीवन परिचय /dinkr ki jivn prichy

 

                                       दिनकर की जीवन परिचय /dinkr ki jivn prichy 


 दिनकर हिंदी साहित्य के इतिहास में आधुनिक काल के प्रगतिवादी काव्य धारा के प्रतिनिधि कवि हैं इन्हें धारा निरपेक्ष राष्ट्रीय काव्य धारा के कवि के रूप में भी पहचान ली जाती है अतः इन्हें राष्ट्रकवि भी कहा जाता है 

जन्म 

दिनकर का जन्म 8 सितंबर उन्नीस सौ आठ श्री को बिहार के मुंगेर जिला अंतर्गत बेगूसराय में हुआ था इनके पिता का नाम रवि सिंह तथा माता का नाम है 

शिक्षा -

दिनकर की शिक्षा गांव के मिशन स्कूल से हुई जो सरकारी स्कूल के विरोध में कार्य करती थी प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद दिनकर उच्च शिक्षा के लिए पटना विश्वविद्यालय में दाखिला लिया जहां इन्होंने इतिहास विषय पर बीए की डिग्री हासिल की 

कार्यक्षेत्र  -

तत्पश्चात् 1934 ईस्वी में बिहार प्रांत में सब रजिस्ट्रार के पद पर आसीन हुए सब रजिस्ट्रार की पद में ने संतुष्टि नहीं थी जिससे कार्यालय के उच्च पदाधिकारी हुई इन्हें पसंद नहीं करते और आपको मालूम होगा कि दिनकर को 2 साल के अंतर्गत 22 बार ट्रांसपोर्ट किया गया था 

इसके पश्चात दिनकर भागलपुर विश्वविद्यालय में कुलपति के रूप में कार्य किया

भारत आजाद होने के बाद जब 1952  ईस्वी में प्रथम आम चुनाव हुई तो दिनकर को राज्यसभा के लिए मनोनीत किया गया इन्हें 

राज्यसभा सदस्य के लि,,ए तीन बार मनोनीत किया । इसके पश्चात 1965 से 71 ईसवी तक हिंदी भाषा सलाहकार के रूप में भारत सरकार के अधीन कार्य किया

रचनाएं दिनकर हिंदी साहित्य के इतिहास में साहित्य की प्राया सभी विधाओं में रचनाएं लिखी हैं जैसे उपन्यास, कहानी, काव्य, निबंध आदि आदि इन विधाओं की रचनाओं में काव्य के लिए उर्वशी, कुरुछेत्र, रश्मिरथी, हुंकार, रेणुका आदि मुख्य मानी जाती है

पुरस्कार -

राष्ट्रकवि दिनकर को उर्वशी रचना के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार 1972 में प्राप्त हुई पद्मा विभूषण 1958 ईस्वी  में मिला

मृत्यू -

दिनकर की मृत्यु 1974 ईस्वी में मद्रास में हुई

Monday, January 4, 2021

भक्तिकाव्य की प्रवृत्तियाँ/बिशेषताएं / bhktikavy ki prvritiyan / visheshtayan

 

                                          भक्तिकाव्य की प्रवृत्तियाँ/बिशेषताएं




                                  भक्तिकाव्य उदात्त एवं शांत मनोवृति का काव्य है |इसकी प्रतिबिम्ब भारतवर्ष की सामाजिक एवं धार्मिक परिस्थितियों में मिल जाता है |इस भक्तिकाव्य में महान साहित्य की सभी प्रवृतियाँ पाई जाती है, यों कहें कि भक्तिकाव्य ही महान साहित्य की निर्देशक है |भक्तिकाव्य की सामान्य प्रव्रत्तियां निम्नलिखित हैं –

1, नाम की महत्ता – भक्तिकाव्य के भक्तों ने नाम की महत्ता स्वीकार की है | जप, कीर्तन, भजन आदि सभी में समान रूप से दृष्टि गोचर होती है |तुलसी ने राम के नाम को राम से बड़ा माना है | नाम में निर्गुण एवं सगुण दोनों में सामंजस्य हो जाता है –

अगुन सगुण दुई ब्रह्म स्वरूपा | अकथ अगाध अनादि अनूपा ||

मोरे मत बड नाम दुई ते      | किए जेहि प्रभु निज बीएस बूते || - तुलसी

मेरा साहब एक है, दुजा कहा न जाय |

साहब दुजा जो कहूँ , साहब खरा रिसाय || - कबीर

2, गुरु महिमा – भक्तिकाव्य ने एक स्वर में गुरु की महत्ता स्वीकार की है | कबीर ने गुरु को भगवान् से भी श्रेष्ठ माना है | -

    गुरु गोबिंद दोऊ खड़े, काके लागो पायं |

     बलिहारी गुरु आपको, जिन गोविन्द दियो बताय ||

सूर, तुलसी और जायसी ने भी गुरु के प्रति अपार भक्ति प्रदर्शित की है |

3, भक्तिभावना का प्राधान्य – भक्तिकाल की चारों धाराओं (निर्गुण, सूफी, कृष्णभक्ति और रामभक्ति) में भक्तिभावना का प्राधान्य मिलता है |कबीर के बिचार के अनुसार –बिना भक्ति के ज्ञान की प्राप्ति असंभव है |

   भगति नारदी मगन सरीरा | इहि विधि भगतिहि कहै कबीरा ||

                 जायसी ने साधना के चारों सोपानों (शरीयत, तरीकत, हकीकत, और मारिफत) को भक्ति का साधन स्वीकार किया है |

3, अहंकार का त्याग – भक्ति का दूसरा रूप है – अहंकार का त्याग | सच्ची भक्ति अहंकार त्याग के बिना असंभव है | -

                         राम सो बड़ो है कौन, मो सो कौन छोटो |

                        राम सो खरो है कौन, मो सो कौन खोटो ||   - तुलसी

                     

                     प्रभु हौं सब पतितन को टीकौ |  - सूर

 

              जब मैं था तब हरी नहीं, अब हरी है मैं नाहिं |

              सब अँधियारा मिट गया, दीपक रेखा माहीं ||  - कबीर

4, समन्वय की भावना – भक्तिकाव्य की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण बिशेषता समन्वय की भावना है | यह समन्वय जीवन के सभी क्षेत्रों – सामाजिक, धार्मिक, तथा दार्शनिक मेंमिलता है | भक्तिकाल में सामाजिक अव्यवस्था फैली हुई थी भक्तकवियों ने सामाजिक  समन्वय इस तरह से किया –

                     अरे इन दोउन राह ण पाई |

                    हिन्दू अपनी करै बड़ाई, गागर छुवन न देई |

                    वेश्या के पावन तर सोवै , यह देखो हिन्दुवाई |

                   मुसलमान के पीर औलिया मुरगा – मुरगी खाई |

                   खाला केरी बेटी ब्याहे गरहीं में करहिं सगाई ||

                              धार्मिक समन्वय में ज्ञान, भक्ति तथा क्रम को समन्वय किया गया है | सम्प्रदायों के दार्शनिक सिद्धांतों का समन्वय दृष्टिगोचर होता है | -

                    ज्ञानहिं भगतिहिं नहिं कछु भेदा |

                   उभय हरहिं    भव  संभव   खेदा ||

                             दार्शनिक समन्वय, और भाषाओँ का समन्वय भक्तकवियों ने किये हैं –

                   ईश्वर   अंश  जीव  अविनासी |

                   चेतन,  अमल,  सहज सुखनासी ||

5] शील तथा सदाचार की प्रवृत्ति – शील-सदाचार की ओर भक्त कवियों की स्वाभाविक गत्यात्मकता रही है |भक्ति रूपी लक्ष्य तक पहुँचने के लिए साधना के इन सोपानों को माध्यम बनाया – अहंकार का त्याग, आडंबर का खंडन, जाती-पाँति के भेदभाव का विरोध, आत्मसंयम, अपरिग्रह, इंद्रियसंयम, मानसिक संयम आदि आदि |

6] लोकभाषाओं का प्राधान्य – भक्तिकाल में लोकभाषाओं को अत्यधिक प्रश्रय दिया गया | कवियों ने अपनी अनुभूतियों की सहज अभिव्यक्तियों के लिए प्रचलित लोकभाषा के विभिन्न रूपों का सफल प्रयोग किया है | तुलसी जैसे भक्तकवि नाना पुराण निगमाग्मों के पारंगत विद्वान् थे और उनका संस्कृत पर पूर्ण अधिकार था, फिर भी अवधि व ब्रजभाषा में काव्य रचना की | सूर, जायसी ने लोक भाषा में काव्य रचे | कबीर आदि संत कवियों ने सधुक्कड़ी भाषा में अपनी संदेश जन-जन तक पहंचाए |











अमीर खुसरो के दोहे, मुकरियाँ और गीत /amir khsro ke dohe mukriyan or geet

                                         अमीर खुसरो के दोहे, मुकरियाँ और गीत   1.      एक नार किया -----------------------------------...