इस blog में हिन्दी, व्याकरण, इतिहास, राजनितिक, सामाजिक, देवी-दर्शन, समाचार, संस्कृत, भूगोल, विज्ञानं, वाणिज्य, सांस्कृतिक, पर्यावरण, परिवेश , की जानकारी दी जाएगी
हिंदी साहित्य के इतिहास में रीतिकाल के बाद आधुनिककाल की अवधारणा और पृष्ठभूमि की समयावधि
निर्धारण होती है | सर्वमत
से हिंदी साहित्य का आधुनिक काल भारतेंदु के जन्मकाल, रचनावधि के प्रारम्भिक वर्ष से आज तक मानी जाती
है | रीतिकाल की अंतिम अवधि पोर्ट विलियम काँलेज के
स्थापना वर्ष के आस-पास
तक होती है | यानि
1800 ई० पोर्ट विलियम काँलेज की स्थापना वर्ष है तो (आधुनिक काल की पीठिका)1800 ई० से भारतेंदु या इनके मंडल द्वारा होनेवाली साहित्यिक गतिविधियों
के समयावधि तकहिंदी साहित्य की आधुनिक काल की आधुनिक काल की
प्रवेश द्वार मानी जाती है , क्योंकि इस अवधि में हिंदी साहित्य की आधुनिक विधाएँ
नाटक, कहानी, उपन्यास, पत्र-पत्रिका, निबन्ध, आलोचना आदि विधाओं का लगभग पूर्ण
विकास हुआ हैं |
राजनीतिक पृष्ठभूमि-
हिंदी साहित्य इस अवधि में विविध रूपों में अपनी गतिविधियों को सुचारू रूप
से संवार रही थी |
भारतीय की राजनीतिक स्थिति इन दिनों अंग्रेजों के हाथों थी | अंग्रेज प्रशासन भारतीय जनताओं के प्रति उदारवादी
नीति अपनाई हुई थी, हिंदी
भाषा विकास के लिए भारतीय भाषा शास्त्री लल्लूलाल, सदासुखलाल आदि अध्यापक पोर्ट विलियम काँलेज में
रखे गये | अंग्रेज
शासन अंग्रेजी भाषा के तुल्य हिन्दी भाषा को भी विकसित करने की कोशिश की | इसी की परिणाम था कि इन्हीं समकालीन युग में
कोश, व्याकरण जैसे विषय पर काफी काम हुए | 1854 ई० में वुड घोषणा पत्र में विश्वविद्यालय
अधिनियम आए | अंग्रेज
सरकार व्यापारिक गतिविधियों को प्रोत्साहन के लिए रेल-लाइन, टेलीफोन सेवा को बढ़ावा दी, परिणाम स्वरूप देशवासियों को अपने बिचार आदान-प्रदान के लिए अनुकूल अवसर की प्राप्ति हुई | 1820 ई० में थामस मुनरो ने इस्तयारी बन्दोवस्ती लाई, जिससे जमीन को व्यक्तिगत सम्पति बना दिया | किसानों द्वारा उत्पादित फसल अब बाजार में आने
लगा | रूपये की प्रचलन में वृद्धि हुई | लोग ग्राम व्यवस्था के तहत आपसी झगड़ा की निपटरा
करते थे, अब
समाप्त हो गया | भारतीय इतिहास में सन 1857 क्रन्ति को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के नाम
जाना जाता है| इस
लड़ाई का मुख्य केन्द्र उत्तप्रदेश था, परन्तु इसकी व्यापक प्रतिक्रिया सम्पूर्ण उत्तर भारत में खासकर
हिन्दी भाषा –भाषीक्षेत्र में अधिक बदलती रही | इस क्रंति से पहले देश में सांस्कृतिक पुनर्जागरण क्रांति चली थी
जिसका मुख्य केंद्र बंगाल था |
आधुनिक काल की अवधारणा और पृष्ठभूमि को भारतवर्षों में संस्कृति पुर्नजागरण के समय
प्रेस की स्थापना, पत्रकरिता
का उदभव और विचार स्वतंत्रता को प्रोत्साहन मिला था | भारतीय अंग्रेजी शिक्षा से शिक्षित होकर नये–नये पाश्चात्य विचारों से परिचित हो गये थे | ब्रहम समाज, आर्य समाज तथा अन्य सामाजिक संस्थाएं, फोर्ट विलियम काँलेज की स्थापना आदि ने
सांस्कृतिक पुर्नजागरण की प्रक्रिया को आरभं कर चुक थी | 1857 के सशस्त्र क्रान्ति विद्रोह इस प्रकिया को
तीव्र कर दिया है |
सामाजिक व सांस्कृतिक पृष्टभूमि- इस अवधि में देश छुआछूत, जाति-प्रथा, बाल-विवाह, सती-प्रथा, जैसे सामाजिक कुरूतियों से कराह रहा था जोआधुनिक काल की अवधारणा और पृष्ठभूमि का स्वरूप है | इन सामाजिक प्रथाओं की सुधार के लिए ब्रह्म
समाज (1828
ई० राजाराम मोहन राय), आर्य समाज (1867 ई० स्वामी दयानन्द सरस्वती), प्रार्थना समाज (1867 ई० केशवचन्द्र सेन), थियो सोफिकल सोसाईटी (1875 ई० मदाम बलावस्तु) आदि ने सराहनीय कदम उठाए | स्वामी दयानन्द सरस्वती ने शिक्षा के विकास के
लिए अपनी पुस्तक ‘सत्यार्थ
प्रकाश’ को खड़ी बोली हिंदी जैसे आम जन की भाषा में लिखी
| नयी अर्थव्यवस्था और नवीन शिक्षा व्यवस्था से
भारतीय जनता में नई चेतना का संचार हुआ | लोग अपनी कठिनाईयों को दूर करने के कोशिश में प्रेस की स्थापना करने
लगे |1674
ई० में ईस्ट इंडिया कम्पनी ने मुम्बई में
मुद्रण की स्थापना की, इसी
विकास की परम्परा में राजा राममोहन राय ने 1821 ई० में ‘संवाद-कौमुदी’ नामक समाचार पत्र निकाले | इनके ही समकालीन में द्वारिका नाथ टैगोर, प्रसन्न कुमार टैगोर ने ‘बंगदूत’ नामक समाचार-पत्र निकाले | हिन्दी का पहला पत्रिका ‘उर्दन्त मार्तण्ड’ 1826 ई० में निकला | इसी के बाद 1934 ई० में ‘प्रजामित्र’ का प्रकाशन होने लगा | 1854 ई० में श्यामसुंदर सेन ने पहला दैनिक-पत्र ‘सुधावर्षण’ कलकता
से निकला | इसके
माध्यम से पुरे भारतवर्ष में शिक्षा का प्रचार-प्रसार होने से आम लोगों में वैज्ञानिक
दृष्टिकोण और राष्ट्रीयता की भावना जगी |
इसी समय की सदी में भारतेन्दु का पर्दापन
हिन्दी साहित्य में हुआ | इसने
हिन्दी पत्रकारिकता, के माध्यम
से हिन्दी जगत् में पुर्नजागरण का आन्दोलन ओर ही तेज कर दिया | प्रार्थना समाज, आर्य समाज, सनातन धर्म, आदि सामाजिक संस्थाओं का प्रभाव जन –जीवन पर पड़ा, जिससे नई सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना विकसित हुई , लोग मातृभूमि और स्वराज के प्रति जागरूक हुए, स्वदेशी भावना को बल मिला जिससे मातृभाषा के
प्रति प्रेम की भावना बढ़ी, खड़ी बोली पूरे उत्तर भारत में पुनर्जगरण की भाषा बन गई |
भारतेन्दु ने 1873 ई० में लिखा है– हिन्दी नए चाल में ढली, सांस्कृतिक पुनर्जगरण के अन्तर्गत सामाजिक
कुरीतियों के प्रति सुधार की भावना विकसित हुई | इस तरह राष्ट्रीयता, देशप्रेम, सामाजिक सुधार भावना, स्वराज पाने की लालसा आदि भावनाओं का विकास
हिन्दी साहित्य के माध्यम से खड़ी बोली भाषा ने
ही किया |
नवीन परिस्थितियों और परिवेश से साहित्यिक
प्रवृति में दरबारीपन, संगीत
और कला में काफी उलट-फेर
हुआ | बंगला का प्रभाव आया | आधुनिक ज्ञान-विज्ञानं ने लोगों को बुद्धि सम्मत बना दिया | लोग ठोस अनुभव और बुनियादी सवालों के साथ जुड़े |
इस प्रकार से हिदी
साहित्य के आधुनिक काल में आम-जनजीवन के लिए काफी उलट-फेर की गतिविधियाँ हो रही थीं | जिससे आधुनिक काल की अवधारणा और पृष्ठभूमि स्वीकार की जा सकती है |
हिन्दी सूफी काव्य धार , निर्गुण भक्ति , कृष्ण भक्ति काव्य की ही भांति हिंदी साहित्य की प्रमुख काव्य धारा है | इन्हें प्रेममार्गी शाखा, प्रेमकाव्य,
प्रेमाख्यान काव्य सूफी काव्य आदि विभिन्न नामों से जाना जाता है | मध्यकालीन
इतिहास में एक ओर जहाँ निर्गुण संत सर्वसाधारण जनता के लिये भक्ति मार्ग प्रशस्त
कर रहे थे वहीं दूसरी ओर सूफी फकीर भी भक्ति को ज्ञानगम्य एवं प्रेम प्राप्य बताकर
हिन्दुओं तथा मुसलमानों में एकता मजबूत कर रहे थे |
‘सूफी’ शब्द के बिषय
में भी विद्वानों में मतभेद है | कुछ विद्वान् ‘सूफी’ शब्द को ‘सफ’ से निर्मित
बताते हैं | इसका शाब्दिक अर्थ – अग्रिम पंक्ति है | कयामत के दिन जो व्यक्ति अपने
पवित्रता एवं सदाचार के कारण अगली पंक्ति में खड़े होने के अधिकारी होगें, वे
‘सूफी’ कहलाते हैं |
‘सूफी’ काव्यधारा भारतीय
अदैतवाद एवं विशिष्टादैतवाद, इस्लाम की गुढ विद्या, नव अफलातूनीमत तथा कवियों के
वैचारिक स्वतंत्रता से सूफी मत का विकास हुआ है |
हिन्दी में सूफी काव्य
परम्परा का प्रवर्तन किस कवि द्वारा हुआ,इस प्रश्न का जवाब असंदिग्ध उत्तर उपलब्ध
नहीं हैं | आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने मृगावती (1501) आचार्य हजारी प्रसाद
द्विवेदी ने ईश्वरदास कृत सत्यवती कथा (1500) डा० रामकुमार वर्मा ने मुल्ला दाउद
कृत चंदायन (1379) तथा अन्य विद्वानों द्वारा असाइत कृत हंसावली (1370) को माना
जाता है | परन्तु नगेन्द्र ने अपने इतिहास ग्रन्थ में निम्न प्रकार से सूफी काव्य
परम्परा को विकसित करते हैं –
(1)हंसावली – इसके रचियता ‘असाइत’ को
मान्य है | इसमें पाटण की राजकुमारी हंसावली की कथा है | राजकुमारी अद्वितीय
सुन्दरी है, किन्तु पूर्व जन्म के किसी संस्कार वश पखवाड़े में पांच पुरुषों की
हत्या का भी नियम ले रखा है | नायक राजकुमार स्वप्न में राजकुमारी के दर्शन करके
मुग्ध हो जाता है | प्रेम में विह्वल होकर मंत्री के साथ योगी वेश बदल कर खोज में
निकल पड़ते हैं | भारी संकट के बाद राजकुमारी को प्राप्त करने में सफल होता है |
नायक, राजकुमारी के पांच पुरुषों की हत्या के नियम से भी विरक्त कर लेता है | इस
नियम के पीछे एक घटना थी – पूर्व जन्म में राजकुमारी एक पक्षिणी थी, जब उसने अंडे
दे रखे थे तब एकाएक जंगल में आग लग जाने पर नर-पक्षी उसे बचाने के बजाय स्वयं जलते
हुये छोडकर भाग गया था | इसी घटना से राजकुमारी पुरुष-द्रोहिणी हो गई थी | अब
राजकुमारी पूर्व जन्म की सारी घटनाये स्मरण कर आयी है और स्वस्थ्य होकर आचरण करने
लगी | इस घटना की सारी वृतान्त दोहे-चौपाई में उक्त ग्रन्थ में लिखी गई है |
(2)चंदायन - इसकी रचना मुल्ला दाउद ने सन 1379 ई० में की है
| इसमें नायक लोर (लोरिक) एवं नायिका चंदायन का स्वच्छ्द प्रेम, प्रेम में बाधा,
नायक के योगी वेश में घर से बाहर निकलना और अनेक बाधाओं को पारकर नायिका से मिलने
का वर्णन है | इसकी भाषा अवधी तथा दोहे-चौपाई छन्द में लिखा गया है | इसका मूल नाम
‘लोर कहा’ है |
(3)लखमसेन पद्मावती कथा – इसकी रचना
दामोदर कवि ने 1459 ई० में की है | स्वयं कवि इसे ‘वीर कथा’ कहा है | इसमें राजा
लक्ष्मण सेन एवं राजकुमारी पद्मावती के प्रथम दर्शन जन्य प्रेम का चित्रण रोमानी
शैली में है | नायक द्वारा विभिन्न प्रकार के कष्ट से प्राप्त करने की कथा है |
(4)सत्यवती कथा – इसके रचियता ईश्वरदास सगुणोपासक भक्त हैं |
इसकी रचना 1501 ई० में है | इसमें राजकुमारी सत्यवती एवं राजकुमार ऋतुपर्ण के
प्रथम दृष्टिजन्य प्रेम-प्रसंग, नायिका द्वारा नायक को कोड़ होना, नायिका की विवाह
तथा शाप से मुक्ति, तत्कालीन बादशाह का उल्लेख भी इस काव्यग्रन्थ में दोहे-चौपाई
में किया गया है |
(5)मृगावती – कुतुबन कृत मृगावती
(1503) में नायक राजकुमार तथा नायिका मृगावती के प्रथम दृश्य जन्य प्रेम का
निरूपण अत्यन्त भावात्मक शैली में है | नायक का घर से योगी वेश में बाहर निकलना,
मार्ग में राक्षस के चंगल से निकलकर विवाह, जैन काव्य परम्परा के आधार पर नायक की
मृत्यु के बाद नायिका का सती होना दिखाया गया है | भाषा अवधी और दोहे-चौपाई में
लिखा गया है |
(6)माधवानल कामकंदला – रचना वर्ष 1527
ई० है | नायक माधव एवं नायिका विशारदा कामकंदला के प्रेम का निरूपण किया गया है |
नायक, कामकंदला के नृत्य से मोहित होकर प्रेम करने लगता है | इसकी भाषा राजस्थानी
तथा दोहे-चौपाई छंद में लिखी गई है |
(7)पद्मावती – मलिक मोहम्मद जायसी कृत
पद्मावत (1540) को इस परम्परा का प्रौढ़त्तम कृति माना जाता है |इसमें चितौड़ के
राजा रत्नसेन एवं सिंहल की राजकुमारी पद्मावती के प्रेम विवाह एवं विवाहोत्तर जीवन
के मार्मिक जीवन का उपस्थित किया है | इसकी भाषा ठेठ-अवधी है | इसमें दोहे-चौपाई
छंद का प्रयोग है |
(8)मधुमालती – मंझन कृत मधुमालती
(1545) में नायक-नायिका के प्रथम दर्शनजन्य प्रेम तथा पूर्व जन्म के संस्कारों की
महत्ता को दिखाया गया है | इसकी भाषा अवधी तथा दोहे-चौपाई छंद में लिखा गया है |
(9)ढोला मारुरा दूहा – कल्लोल कवि
द्वारा रचित ढोला मारुरा दूहा (1473) राजस्थानी भाषा प्रेमाख्यानक है |इसमें नटवर
देश के राजकुमार ढोला और पूंगल देश की राजकुमारी मारवणी के विवाहोत्तर प्रेम का
मार्मिक वर्णन है | भाषा राजस्थानी तथा दोहे-चौपाई छंद है |
(10)माधवानल कामकंदला चौपाई – इसकी रचना
1556 ई० में कुशल लाभ द्वारा की गई है | इसमें नायक-नायिका के जन्मों की कथा का
प्रतिपादन किया गया है | यह दोहा, चौपाई, सोरठा, गाथा छंद में लिखी गई है |भाषा
राजस्थानी है |
(11)रूपमंजरी – अष्टछाप के प्रसिद्ध कवि
नन्ददास रूपमंजरी (1568) की रचना की है | इसमें रूपमंजरी और कृष्ण के प्रेम को
वर्णन किया गया है | इसकी भाषा ब्रज तथा दोहे-चौपाई शैली में लिखा गया है |
(12)प्रेमविलास प्रेमलता की कथा – इसकी
रचना जैन श्रावक जटमल ने 1556 में लाहौर में की थी | कवि ने “जैनाय नम:’ से
प्रारम्भ करते हुये तात्कालिक शासक का परिचय तथा नायक-नायिका के प्रेम का
प्रत्यक्ष दर्शन सी वर्णन है |
(13)छिताईवार्ता – छिताईवार्ता (1590)
के रचियता नारायण दास हैं |इसमें नायिका छिताई तथा देवगिरि के राजा रामदेव यादव की
कन्या तथा ढोल समुद्र के राजकुमार से प्रेम जन्य कथा का वर्णन है | इसकी भाषा
राजस्थानी-ब्रज मिश्रित है | दोहे तथा चौपाई छंद में लिखा गया है |
संत काव्य बौद्ध धर्म से विकसित है |बौद्ध धर्म के व्रजयान शाखा से अनुप्रेरित है | आदिकालीन साहित्य सिद्ध-साहित्य की प्रतिक्रिया में नाथ-सम्प्रदाय एवं उनके साहित्य का
आविभार्व हुआ | इसी नाथ पन्थ का परवर्ती रूप ज्ञानश्रयी शाखा या संत काव्य में
अभिव्यक्त हुआ | इतना ही नहीं वैष्णव धर्म के प्रवर्तक रामानुजाचार्य के शिष्य रामानन्द द्वारा निर्देशित राम के निर्गुण रूप और नाम स्मरण का प्रचार भी संतों में हुआ | 12-13 वी०
शताब्दी के मध्य महाराष्ट्र के महानुभाव-सम्प्रदाय और बरबरी-सम्प्रदाय के
महाराष्ट्री संतों की मान्यताओं का प्रभाव भी निर्गुण संत पर पड़ा | इसके अतिरिक्त
निर्गुण संतों पर अद्वैतवाद एवं विशिष्टादैतवाद के साथ सूफी साधना में प्राप्त
रहस्यवाद का भी प्रभाव पड़ा |
इस प्रकार संत काव्य में
विभिन्न सम्प्रदाय के प्रभावों को ग्रहण करते हुये रामानन्द से परवर्ती निर्गुण
संतों तक प्रवाहित होती रही है | आचार्य नगेन्द्र ने निम्न प्रकार से संत काव्य
परम्परा को उपस्थित किये हैं -
(1)रामानन्द – रामानन्द अपने गुरु के
सबसे योग्य शिष्य थे |नाभादास के भक्तमाल के अनुसार – ये रामानुजाचार्य के शिष्य
परम्परा के चतुर्थ शिष्य थे | इन्हीं के शिष्यों में कबीर, पीपा, घन्न आदि भी हैं
| इनका आविभार्व चौदवीं शताब्दी को माना जाता है | इनके गुरु राघवानन्द की रचना ‘सिद्धांतपंचमात्रा’ बताया गया है | इनकी साधना
पद्धति में नाम-स्मरण का बहुत अधिक महत्त्व है |नाभादास के भक्ति में दशधा भक्ति
के आगार रामानन्द ही हैं | अपने गुरु से दीक्षित होकर इन्होंने रामावत संप्रदाय का
प्रवर्तन किया | इसके बाद 16 वी० शताब्दी में इस सम्प्रदाय का सम्पर्क
‘श्री-सम्प्रदाय’ से होने के कारण अपने मत को मंडन करते हुये एकामय हो गया और
सम्प्रदाय का मूल मंत्र – ‘सीता राम’ हो गया |इस प्रकार ‘श्री-सम्प्रदाय’ के
आराध्य नारायण तथा रामावत के राम अब आराध्य हो गये |
(2)कबीरदास – रामानन्द के शिष्य
परम्परा में प्रसिद्ध हैं | ये महान विचारक एवं प्रतिभाशाली महाकवि हैं | इन्होंने
नाना पुराणादि की शात्रीय मान्यताओं का निषेधकर स्वानु भूति भक्ति पर बल दिया,
निर्गुण-सगुण से प्रे ब्रह्म की योग भक्तिमयी उपासना का दर्शन प्रस्तुत किया |
कबीर ने अद्वेत,बिशिष्टाद्वैत, नाथ, सूफी संतों को ब्रह्म, जीव, माया और साधना सम्बन्धी
धारणाओं का समन्वय करते हुये उसे सभी वर्गों और जनसाधारण के लिये सुलभ किया |
(3)नानक – सिक्ख धर्म का प्रवर्तकनानक देव को जाता है | नानक के
काव्य में कबीर के समान ही गुरु-महिमा, जाती-पांति का विरोध, एकेश्वरवाद, सत्य
अहिंसा और स्वानुभूति पर विशेष बल दिया गया है | असादीवार रहिरास सोहिला आदि इनके
रचनाये हैं | ‘जंपुजी’ में नानक दर्शन के सारतत्व विद्यमान है | इनकी सभी रचनाये
गुरु ग्रन्थ साहिब में संकलित है |
(4)दादू – दादू के आदर्श कबीर हैं |
इन्होंने ददुप्न्थ के प्रवर्तन किये | इनका वास्तविक नाम दादूदयाल है | इनका जन्म
1544 ई० में अहमदाबाद (गुजरात) में हुआ | इन्होंने निर्गुण भक्त होने पर भी सगुण
भक्ति को भी महत्व दिया है | ‘हरदेवाणी’ इनकी रचना है | रज्जन और सुन्दरदास इनके
ही शिष्य हैं | 1603 ई० में दादूदयाल की मृत्यु हुई |
5.रैदास
– रैदास को संतों में सम्मानित स्थान प्राप्त है | इनका जन्म काशी में हुआ है |
कबीर में ओज,अकड़ता और प्रखरता थी तो रैदास में शांति, संयम और विनम्रता विद्यमान
है |जैसे -
अब कैसे छूटे राम, नाम रट लागी
|
प्रभु जी तुम चन्दन हम पानी,
जाकी अंग अंग बास समानी |
प्रभु जी तुम घन बन हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा ||
रैदास का प्रभाव रमिला में अधिक है
| कहा जाता है कि मेवाड़ की सालायनी इनकी शिष्या थीं, मीराबाई भी इन्हें गुरु रूप
में स्वीकार किया है | इनकी काव्य भाषा ब्रज है | भाषा में अवधी, राजस्थानी,
खड़ी-बोली और उर्दू-फारसी का समिश्रण है |
6.जम्भनाथ
– संत जम्भनाथ का जन्म 1541 ई० में जोधपुर राज्य के नागौर प्रदेश के पीपासर ग्राम
में राजपूत परिवार में हुआ |जनश्रुति है कि चौंतीस वर्ष की अवस्था तक इन्होंने एक
भी शब्द उच्चरित नहीं किये थे | इनके चमत्कारिक प्रदर्शन के कारण लोगों ने जम्भ
नाथ कहना प्रारंभ किया | सिद्धि प्राप्त हो जाने के बाद अनंतर में ये मुनीन्द्र
जम्भ ऋषि के नाम ससे विख्यात हुये | किवंदती है कि ये आजीवन ब्रह्मचारी रहे |
इन्होंने बाबा गोरखनाथ से दीक्षा प्राप्त की थी | अपने आदर्श और मत के प्रचारार्थ
‘विश्नुई सम्प्रदाय’ की स्थापना की | इनके चार प्रमुख शिष्य हुये जिसमें – हावली
पावजी, लोहा पागल, दन्तनाथ तथा मालदेव है | इनकी रचनाओं में देहभेद तथा योगाभ्यास
जैसे विषय मिलते हैं | इनकी रचनाओं में ओंकार जप, निरंजन की उपासना, अजपा जप, गगन
मण्डल, पंचपुरुष, सतगुरु महिमा, सोहमं जप , जरा-मरण से मुक्ति, अनन्य भक्ति आदि का
बारम्बार उल्लेख है |
गगन हमरा बाजा बाजे,
मतर फल हाथी |
संसै का बल गुरुमुख
तोड़ा, पांच पुरुष मेरे साथी ||
जुगति हमारी छत्र
सिंहासन, महासक्ति में बांसे |
जंभनाथ वह पुरुष
विलच्छ्न, जिन मंदिर रचा अकासे ||
प्रसिद्धि है कि 1523 ई० के लगभग बीकानेर के तालाब में समाधि लेकर अपनी
जीवन लीला समाप्त की | इसकी समाधि स्थल को ‘सम्भरास्थल” के नाम से जाना जाता है
कुछ शिष्य इस घटना को 1536 ई० में तालासर गाँव के निकट होना बतलाते हैं |
7.हरिदास
निरंजनी – संत हरिदास निरंजनी सम्प्रदाय के कवि थे | जिनका मूल स्रोत नाथ-पंथ है |
यह प्राचीन धर्म सम्प्रदाय है , कहा जाता है कि उड़ीसा में इनका प्रभाव अभी भी है |
इसे आचार्य क्षितिज मोहन सेन ने अपनी ग्रन्थ मेडिवियल मिस्टिसिज्म में स्वीकार
किया है | दादू पंथी राधोदास ने ‘भक्तमाल’ में लिखा है स्वामी निरंजन की जीवन शैली
एवं सिद्धांतों को ‘जगन’ ने प्रवर्तन किया | राधोदास के अनुसार हरिदास डीडवाणा
निवासी थे | पुरोहित हरिनारायण ने लिखा है – हरिदास पहले प्रागदास के शिष्य हुये,
फिर दादू के, फिर कबीर पंथ और गोरख पंथ में दीक्षित हुये |
इनके प्रमुख शिष्य में –नारायण दास, हरिदास,
रूपदास, सीतलदास, गंगदास आदि हैं |इस सम्प्रदाय का मठ डीडवाणा में है | हरिदास की
रचनाये हैं – अष्टपदी जोग ग्रन्थ, ब्रह्मस्तुति, हंस प्रबोध ग्रन्थ, निरपख मूल
ग्रन्थ, पुजाजोग ग्रन्थ, समाधिजोग ग्रन्थ, संग्रामजोग ग्रन्थ आदि हैं |इन्होंने
लिखा है – “गुणग्राही गोबिंद गुण गावा, भजी भजि राम परमपद पावा |”
हरिदास जी निर्गुण
ब्रह्म के अलौकिकत्त्व पर अधिक बल दिया है | इनके अनुसार ब्रह्म कृपा से ही साधक को
आनन्द की प्राप्ति होती है माया और लौकिक बन्धनों के प्रति अरुचि है, मोक्ष-लाभ भी
है | इनकी काव्य भाषा ब्रज है, जिसमें अतीन्द्रिय अनुभूति है |
8.झींगा
– संत झींगा (1519 – 1659) का जन्म मध्य भारत की रियासत बडवानी के खजूर गाँव में
एक ग्वाल परिवार में हुआ था | वाल्यवस्था से ही संसार से विरक्त रहा करते थे | एक
बार हरसूद से भामगढ़ मार्ग पर जा रहे थे, मार्ग में महाराजब्रह्मगिर के शिष्य
मनरंगीर भजन गा रहे थे, इस पंक्ति के नि:सारता को झींगा अपने ह्रदय में अंकित कर
लिया | इसके बाद मनरंगीर को अपना पथ-प्रदर्शक स्वीकार किया | झींगा के अनुसार
परमसत्य की खोज मन्दिर, मस्जिद और तीर्थ में जाने की आवश्यकता नहीं, गंगा, यमुना
आदि में स्नान से नहीं वरन् ह्रदय में विद्यमान है | जैसे –
जल विच कमल, कमल विच
कलियाँ, जहं वासुदेव अविनाशी |
घर में गंगा, घर में जमुना,
नहीं द्वारिका कासी ||
घर वस्तु बाहर क्यों ढूंढे,
बन बन फिरा उदासी |
कहूँ जन सिंगा, सुनो भाई
साधो, अमरपुर के वासी ||
इनकी
ब्रह्म सम्बन्धी मान्यता कबीर से साम्य करती है | इनकी काव्य भाषा ‘निमाडी’ है |
इन्हें ग्यारह रचनाये किये हैं | जैसे- झींगा का दृढ उपदेश, झींगाजी का
आत्माध्ययन, झिंगाजी का दोष-बोध, झींगाजी का शरद, झींगाजी की वाणी, झींगाजी का
सातवार, झिंगाजी का पन्द्रह तिथि, झींगा जी की बारहमासी तथा झिंगाजी के भंजन |
8.लाल
दास – लालपंथ का प्रवर्तक संत लालदास (1540-1648) हैं | इनका आविर्भाव अलवर राज्य
के ग्राम धौलीपुर में एक मुसलमान परिवार में हुआ | वैसा परिवार जिसमें खाने-पीने
और विद्याध्ययन का प्रबन्ध न था | लालदास को भागवतभक्ति का अंकुल वाल्यावस्था से
ही मिली थी | ये साधुओं की संतसग और नामजप में संलगन रहते थे |संत लालदास सिद्ध
पुरुष हैं | इनके उपदेश ‘लालदास की चेतावनी’ में संकलित है | उपदेश कबीर से
प्रभावित हैं –
लालजी भगत भीख न मांगिये, मांगत
आये शरम |
घर घर टांडत दु:ख है, क्या बादशाह, क्या हरम ||
लालजी साधु ऐसा चाहिए, धन कमाकर खाय |
हिरदे हर की चाकरी, पर घर कमुं न जाय ||
इसके पंथ में राम ही
सर्वश्रेष्ठ शक्ति,आराध्य, ब्रह्म है |
10मलूकदास – इनका आविभार्व (1574
-1682) को औरंगजेब के राज्यकाल में हुआ था | पिता का नाम सुन्दरदास खत्री है |
दीक्षा गुरु देवनाथ के पुत्र पुरुषोत्तम हैं | इनके पमुख रचनाये हैं – ज्ञानबोध,
रत्नखान, भक्तवच्छावली, भक्तिविवेक,
ज्ञानपरोक्षी, बारहखड़ी, रामावतारलीला, ब्रजलीला, धुर्वचरित, विभवविभूति, सुखसागर,
शब्द और स्फुट पद आदि हैं |
ज्ञानबोध, ज्ञानपरोक्षी, विभवविभूति
तथा रतनखान में योग,ज्ञान, निर्गुणभक्ति, वैराग्य भक्ति आदि बिषयों पर प्रकाश डाला
गया है | भक्ति विवेक तथा सुखसागर में दार्शनिक बिचार अभिहित किया गया है | इनके
अनुसार ब्रह्म निर्गुण और गुणातीत हैं | वह समस्त सृष्टि का पालक और संहारक है |
ये भेदभाव आदि भावनाओं से परे हैं | ये संसार के अणु-अणु में विद्यमान हैं जैसे-
कहत मलूक जो बिन सिर
खेवै, सो यह रूप बखानै |
या नैया के अजब कथा,
कोई बिरला केवट जानै || मलूकदास ब्रज तथा
अवधि भाषा में रचना की है |इनकी काव्य में संस्कृत, फारसी के शब्द भी मिले-जुले
हैं |
11. बाबालाल – बाबालाल के चार साधकों का आविभार्व
पंजाब प्रान्त में हुआ था| इनमें से एक पिण्ड-दादान के निवासी दुसरे पशिचमी
प्रान्त के मेरा या तेरा नगर के निवासी तीसरे बाबालाल का मठ गुरुदासपुर में चौथे
बाबालाल शहजादा द्वारा शिकोह के सम्पर्क में आये थे | आचार्य क्षितिज मोहन के
अनुसार बाबालाल का आविभार्व 1590 ई में मालवा प्रदेश के एक खत्री परिवार में हुआ
था | साम्प्रदायिक भक्तों के अनुसार इनका जन्म 1355 ई० में पंजाब के कसूर या
कुशपुर गाँव में और देहावसान 1455 ई० में हुआ | पिता का नाम भोलानाथ तथा माता का
नाम कृष्णादेवी है | बाबालाल आठ वर्ष की उम्र में ही धर्मों ग्रन्थों का अध्ययन कर
लिया था | इस अवस्था में इनकी वैराग्य भी पैदा हुई थीं | इन्होंने चैतन्य स्वामी
से दीक्षा ग्रहण की, इनके बारह शिष्य हुये | इन्होंने शिष्यों के साथ पंजाब काबुल,
पेशावर, गजनी, कंधार, दिल्ली, सुरत, आदि में आज भी इनके शिष्य पाये जाते हैं |
बडौदा में एक मठ है जिससे ‘बाबालाल का शैल’ कहते हैं | इस सम्प्रदाय का प्रमुख
स्थान गुरुदास पुर का श्रीध्यानपुर गाँव है | बाबालाल तथा दारा का वार्तालाप
‘असरारे-मार्फत’ में संगृहित है | ‘नादिरून्निकात’ में भी इनके बिचारों का संग्रह
है | इनकी विचारधारा में वेदांत तथा सूफी मत का प्रभाव है | जैसे-
आशा विषय विकार
की, बध्या जा संसार |
लख चौरासी फेर में,
भरमत बारंबार ||
इनका
मत है कि ब्रह्म एक अपूर्व आनन्द सागर है | जिसका प्रत्येक जीव एक विन्दु के समान
है, अहं-भावना जीव और ब्रह्म के भेद अथवा वियोग का कारण है | यह अहं माया का
प्रभाव है |
12सुन्दरदास – संत दादू के प्रिय
शिष्यों में हैं | इनका जन्म जयपुर राज्य की प्राचीन राजधानी धौंसा के परमानन्द
खंडेलवाल के यहाँ हुआ है | छह वर्ष की अवस्था में दादू के शिष्य हुये तथा ग्यारह
वर्ष की अवस्था में संत जगजीवन तथा संत रज्जब के साथ काशी की यात्रा की | काशी
दीर्घकाल तक निवास किया | यहाँ इन्होंने संस्कृत- व्याकरण, साहित्य तथा दर्शन का
गंभीर अध्ययन किया |सुन्दरदास बयालीस ग्रन्थों की रचना की, जिसमें ‘ज्ञानसमुद्र’
और सुन्दर विलास अधिक प्रसिद्ध हैं | पुरोहित हरिनारायण शर्मा द्वारा सम्पादित
सुन्दर ग्रन्थावली (दो-भाग) इन सभी रचनाओं का संकलन है |
13अन्य संत कवि – इस परम्परा के अन्य
संत कवियों में धर्मदास, रज्जब, बावरी साहिबा, सदना, बेनिपिपा, सेन, घन्ना, अंगद,
प्रभुति सिक्ख गुरु, शेख फरीद, भीषण, विमन, और निपट निरंजनी स्वामी उल्लेखनीय हैं
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