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Tuesday, April 26, 2022

भाषा के अंग की जानकारी / bhasha ke aang ki jaankaari

   भाषा के अंग की जानकारी  / bhasha ke aang ki jaankaari

         

हिंदी भाषा के अंग के रूप में आधार हैं

1.   ध्वनि या वर्ण   2.  शब्द  3.  वाक्य  4.  पद

 

 

1.   ध्वनि या वर्ण  – नाद की दृष्टि से ध्वनि सबसे छोटी इकाई है | ध्वनि ही मिलकर वर्ण बनती है | हिंदी भाषा में वर्ण और ध्वनियां को विभिन्न भेदों में बाँटा गया है | खासकर वर्ण को निम्न प्रकार से बाँटा गया है | कुल 52 वर्ण हैं

1.    स्वर वर्ण   2.  व्यंजन वर्ण

1.   स्वर वर्ण – स्वर वर्ण के तीन भेद हैं जैसे – अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ | कुल 11 हैं |

क.    ह्रस्व स्वर- अ, इ, उ, ऋ

ख.   दीर्घ स्वर – आ, ई, ऊ

ग.    संयुक्त स्वर – ए, ऐ, ओ, औ

         मात्रा – मात्रा दस हैं – ा, ि,ी,ु,ू,ृ,ॅ,े,ै,,ो,ौ,

           इसे छ्न्द्शात्र में ह्रस्व को लघु तथा दीर्घ को गुरु कहते हैं

2.   व्यंजन वर्ण – व्यंजन के तीन कोटियाँ हैं | कुल 33 वर्ण हैं |

क.    स्पर्श व्यंजन- क. ख,ग,घ,ड (कवर्ग)

                  च,छ,ज,झ,ञ (चवर्ग)

                   ट,ठ,ड,ढ,ण,(टवर्ग)

                  त,थ,द,ध,,न,(तवर्ग)

                  प,फ,ब,भ,म,(पवर्ग)

ख.   अन्तस्थ व्यंजन – य,र,ल,व, इन्हें अर्द्धस्वर भी कहते हैं |

ग.    उष्म व्यंजन – श,ष,स,ह, हैं |

 

 

प्राण के अनुसार – दो भेद हैं 

क.   अल्पप्राण – प्रत्येक वर्ग का पहला, तीसरा,और पाँचवा वर्ण अल्पप्राण हैं, जैसे- क,ग,ङ,च,ज,ञ,ट,ड,ण,त,द,न,प,ब,म,|

ख.महाप्राण – प्रत्येक वर्ग का दूसरा, चौथा वर्ण महाप्राण हैं, जैसे – ख,घ,छ,झ,ठ,ढ,थ,ध,फ,भ,|

 

 

घोष और अघोष के अनुसार

१.    घोष – प्रत्येक वर्ग का तीसरा, चौथा, पांचवां वर्ण सारे स्वर वर्ण, य,र,ल,व,और ह |

२.    अघोष – प्रत्येक वर्ग का पहला, दूसरा यानी क, ग, च, छ, ट, ठ, त, थ, प, फ, श, ष, स |

हिंदी के नये वर्ण – क् + ष = ष,  त् + र = त्र    ज् + ञ = ज्ञ,  

 

 

2. शब्द – शब्द, भाषा के अंग की सार्थक इकाई का पहला पड़ाव है | इन्हें निम्न प्रकार से भेदों  को निर्धारित किया जाता है –

 

 

   व्युत्पति की दृष्टि से शब्दों का वर्गीकरण – शब्द के चार भेद  -

   १, तत्सम’ २. तद्भव  ३. देशज  ४. विदेशज

१.    तत्सम – किसी भाषा के मूल शब्द को तत्सम कहते हैं, जैसे –

       तत्सम       -     हिंदी

  आम्र             -    आम

  उष्ट्र             -    उँट

  पर्यक          -    पलंक

२.    तद्भव – जो शब्द संस्कृत और प्राकृत से विकृत होकर हिंदी में आये हैं, जैसे – संस्कृत      -   प्राकृत    -    हिंदी

            अग्नि        -   अग्गि      -     आग

          मया         -   मई            -  मैं

        पुष्प          -    पुषफ         - फूल

३.    देशज – जिन शब्दों की व्यत्पत्ति का पता नहीं चलता है, जैसे – खखरा, चसक, तेंदुआ, चिड़िया, खिचड़ी, पगड़ी आदि |

४.     विदेशज – जो शब्द विदेशी भाषा से आये हैं, जैसे –

फारसी से – अफसोस, आबदार, आबक, आतिशबाजी, आराम, आमदनी आदि |

अरबी से – अदा, अजब, इनाम, औक़ात, जिस्म आदि |

तुर्की से – आगा, जालिम, तलाश, बेगम आदि |

अंग्रेजी से – डाक्टर, वोटर, टिकट, आफिसर आदि |

 

 

 

जचना या बनावट की दृष्टि से शब्द के तीन भेद हैं

१.    रूढ़   २. यौगिक   ३. योगरूढ़

१.    रूढ़ – जिसका खंड सार्थक न हो, जैसे – नाक, कान, पीला आदि |

 

२.    यौगिक – जिसका खंड सार्थक हो, जैसे – दूधवाला, घुड़सवार आदि |

 

३.    योगरूढ़ – जो शब्द सामान्य अर्थ को छोडकर विशेष अर्थ की परिचायक हो, जैसे – पंकज, लम्बोदर, जलज, चक्रपाणी आदि |  

 

 

3. वाक्य – भाषा के अंगों की सबसे पूर्णत: सार्थक इकाई है | इसकी विवेचना निम्न प्रकार से की जा सकती है |

 

 

* रचना की दृष्टि से वाक्य के तीन भेद हैं

   १. सरल या साधारण वाक्य २. मिश्र वाक्य ३. संयुक्त वाक्य

 

१.    सरल या साधारण वाक्य – जिस वाक्य में एक कर्ता और क्रिया होती है उसे साधारण या सरल वाक्य कहते हैं | जैसे – पानी बरषा, बिजली चमकती है, हम खा चुके आदि |

 

२.    मिश्र वाक्य – एक साधारण वाक्य के साथ अधीन में कोई दूसरा वाक्य भी हो, जैसे – मैं खाना खा चूका तब, तब वह आया | मैं खाना नहीं खाया इसलिए मैंने फल नहीं खाया |

 

 

३. संयुक्त वाक्य – जिस वाक्य में साधारण या मिश्र वाक्य का मेल संयोजक अथवा अवयवों द्वारा होता है उसे संयुक्त वाक्य कहते हैं, जैसे– मैंने खाना खाया और मेरी भूख मिट गयी| मैंने भोजन नहीं किया और इसलिए मेरी भूख मिट गयी |

 

 

 

* अर्थ की दृष्टि से वाक्य के आठ भेद हैं

१. विधिवाचक – हम खा चुके |

 २. निषेधवाचक – हमने खाना नहीं खाया|

३. आज्ञावाचक – तुम खाओ |

४. प्रश्नवाचक – क्या तुम्म खा रहे हो |

५. विस्मयवाचक – ओह! मेरा सर फटा जा रहा है |

६. संदेहवाचक – उसने खा लिया होगा|

७. इच्छावाचक – तुम अपने कार्य में सफल रहो|

 ८. संकेतवाचक – पानी न बरषत तो धान सुख जाती |

 

 

4.पद – विभिन्न पद मिलकर वाक्य का निर्माण करते हैं, जैसे-  अभिहितान्वयवाद के अनुसार पदों के योग से वाक्य की निष्पति होती है, किन्तु इसके लिए तीन चीजों की आवश्यकता होती है- , आकांक्षा २. योग्यता ३. आसक्ति

 

१.   आकांक्षा आकांक्षा कहते हैं अर्थ की अपूर्णता को, जैसे केवल लड़कासुनने सेs श्रोता को संतोष नहीं होता | वः यह जानने के लिए उत्सुक रहता है की लडके के सम्बन्ध में क्या कहना अभीष्ट है| इसलिए आकांक्षा एक प्रकार की मानसिक स्थिति है, जिसका महत्व श्रोता की दृष्टि से है| दुसरे शब्दों में इसको ऐसे भी ख सकते हैं कि आकंक्षा का सम्बन्ध श्रोता की ग्रहणशीलता या उत्कंठा से है| बात यह है कि पदों का अन्योन्याश्रयत्व होता है|एक पद अर्थ देने में असमर्थ है,इसलिए वः दुसरे पदों की सहायता लेता है| जैसे- ‘लड़का पुस्तक पड़ता हैएस वाक्य में तीन पद हैं जो परस्पर एक-दुसरे के अर्थ के पूरक हैं और तीनों मिलकर ही एक समुदित और पूर्ण अर्थ की प्रतीति करते हैं|

 

२.   योग्यता योग्यता का अर्थ पदों के अन्वय में बाधा दो प्रकार से पढ़ सकती है . अर्थ या प्रतीति की दृष्टी से, और ख. पदों के अन्वय की दृष्टि से| एक का सम्बन्ध मन से है और दुसरे का व्याकरण से, जैसे- ‘किताब से पानी भरता हैइस वाक्य में प्रतीति मुल्क बाधा है| कारण की किताब को पानी भरना संभव नहीं हैं| व्याकरण की दृष्टि से भी संगत नहीं है|

         अन्वय की दृष्टि से बाधा वहाँ होती है जहाँ व्याकरण के अनुसार पदों का विन्यास नहीं होता है| जैसे- लड़का खेलती थी (लिंग विषयक अयोग्यता)|

लडके खेलता था (वचन विषयक योग्यता)|

हम जाता है (पुरुष विषयक योग्यता)|

राम ने पड़ता हैं (विभक्ति विषयक योग्यता)|

     इन वाक्यों में सार्थकता का आभाव नहीं पर हिंदी व्याकरण नियम का पूर्ण आभाव है|

 

३.    आसत्ति आसत्ति का अर्थ है समीपता| वाक्य में प्रयुक्त होने वाली पदों को देश और काल दोनों दृष्टि से परस्पर आसन्न रहना चाहिए| अगर वे दूर पड़े तो अर्थबोध में बाधा होगी, जैसे- आज कहे लड़काऔर कल कहे खेलता हैतो अर्थबोध नहीं होगा| ऐसे ही लड़का सूर्य दौड़ता है फूल पड़ता है चमकता है घोडा खिलता हैएसा सभी शब्द सार्थक हैं पर आसक्ति के क्रम बाधित के कारण अर्थबोध में बाधा है|

     सामान्य दृष्टि से वाक्य विन्यास के लिए आकंक्ष, योग्यता और आसक्ति तीनो आवश्यक हैं पर योग्यता सबसे अपेक्षित है, जैसे- बाघ ! साँप ! भागो ! बचाओ ! निष्कर्ष है आकांक्षा,आसक्ति के साथ अन्वय अति आवश्यक है, जैसे- तरुशिखा पर थी अब रजनी

              कमलिनीकुलवल्लभ की प्रभा| (प्रियप्रवास)

     यहाँ साफ दृष्टिगोचर है कि वाक्य विन्यास के लिए योग्यता सबसे आवश्यक है|

 

 

Tuesday, March 1, 2022

रीतिकाल का नामकरण और कालसीमा की लेख / ritikal ka naamkrn or kalsima

               रीतिकाल  का नामकरण  और कालसीमा 

       

नामकरण  हिन्दी-साहित्य का उतर-मध्यकाल (लगभग सन 1643 ई०से 1843 ई०तक) जिसमें सामान्य रूप से श्रृंगारपरक लक्षणग्रन्थों की रचना हुई | नामकरण की दृष्टि से विद्वानों में पर्याप्त मतभेद का विषय रहा है | मिश्रबन्धुओं ने इसे अलंकृत कालकहा है, जबकि आचार्य रामचन्द्र शुक्ल इसे रीतिकाल रमाशंकर शुक्लरसालने कलाकाल और पं. विश्वनाथप्रसाद मिश्र श्रृंगारकाल संज्ञा देते है | इन अभिधानो में से प्रथम दो के लिए जहाँ रचनापद्ति का आधार ग्रहण किया गया है, वहाँ अन्तिम उस युग की रचनाओं के आधार पर है, किन्तु, इस युग के लिए अलंकृतविशेषण अधिक समीचीन प्रतीत नहीं होता, कारण, मिश्र महोदयों ने इसके समर्थन में जो तर्क दिया है कि इस युग की कविता को अलंकृत करने की परिपाटी अधिक थी, वह इसलिए मान्य नहीं हो सकता क्योंकि यह कविता केवल अलंकृत ही नहीं है, इतर काव्यगों को भी इसमें यथोचित स्थान प्राप्त रहा है; कवियों की प्रवृति भी केवल अलंकारयुक्त रचनाये करना नहीं थी उन्होंने इसकी उपेच्छा रस पर अधिक बल दिया है |

                              ध्यान देने योग्य तथ्य यह है की चाहे श्रृंगार रस की प्रधानता का प्रश्न हो या अलंकरण की प्रवृति की प्रधानता दोनों में रीति निरूपण की प्रवृति मूल रूप से अंतनिर्हित है जो उस युग की मुख्य काव्य चेतना थी, और जो अपनी विशिष्ट पृष्ठभूमि तथा परम्परा में स्वाभाविक रूप में आई थी, अत: ‘रीतिकालनामकरण उचित है |

                                जहाँ तक रीतिकाल कोउतरमध्यकाल की संज्ञा देने का प्रश्न है; वहाँ डॉ बच्चन सिंह का यह कथन उसकी निरर्थकता के लिए पर्यप्त और तर्क सम्मत भी है

                                 रीतिकाल वस्तु, शैली, छंद, रूप-विधान में भक्तिकाव्य से भिन्न भूमिका पर खड़ा है | यह अपने आप में स्वंतत्र काल है, इसे उतर मध्यकाल कहना गणितीय प्रभावोत्पादक है |

                                     रीतिकाल की विविध काव्य धाराओं को मूलतः तीन वर्णों में विभक्त किया गया है |


1.रीतिबद्ध काव्य 2.रीतिसिद्ध  काव्य 3.रीतिमुक्त काव्य

                                  डॉ बच्चन सिंह ने रीतिबद्ध काव्य को रीति चेतसरितिसिध्द काव्य को काव्य चेतस करते हुए बिलकुल नवीन नामकरण किया है |रीतिमुक्त काव्य धारा को उन्होंने मुक्त रीति काव्य कहते हुए क्लासिकल या अभिजात तथा स्वच्छद धारा नाम से दो वर्ग किए है अभिजात वर्ग में डॉ बच्चन सिंह ने बिहारी को रखा है, जिन्हें अधिकांश इतिहासकारो ने रीतिसिद्ध काव्य के अन्तर्गत माना है | इस तरह रीतिकाल की विविध काव्य धराओं के नामकरण में पर्याप्त मतभेद दिखाई पड़ता है, किन्तु उतर मध्यकाल हिन्दी साहित्य के लिए रीतिकालनामकरण अब पूर्ण रूप से प्रचलित और सर्वमान्य हो चुका है |


कालसीमा -   आचर्य रामचन्द्र शुक्ल ने हिन्दीसाहित्य का इतिहासलिखते समय उसे प्रवृतियों के अनुसार चार भागों में विभाजित किया है तथा परवर्ती विद्वानों ने उनके इस विभाजन की कालसीमाओं को प्राय: ग्रहण भी कर लिया है, किन्तु उनका सबसे बड़ा दोष यही है कि वे इस सम्बन्ध में उदार नहीं हो पाये निशिचत संवत् से प्रवृतिविशेष का आरम्भ और निशिचत संवत् पर उसका अन्त निर्धारित कर बैठे हैं | जिस युग में रीतिनिरूपण अथवा रीतिप्रभावित ग्रंथों के निर्माण प्रचुर रहा, उसको रीतिकालसंज्ञा देते हुए उसका समय भी उन्होंने संवत् 1700 (1643 ई०) से 1900 वि० (1843 ई०) तक निश्चित किया है | पर इन निश्चित संवतों को स्वीकार करने में सबसे बड़ी आपति यह होती है कि उन रीतिकवियों के कतिपय ग्रन्थ इनसे आगेपीछे रचे जाने के कारण रीतिकालकी परिधि में नहीं आ पाते, जिन्हें वे स्वयं ही इस युग में परिगणित कर चुके है | उदाहरण के लिए चिन्तामणि कृत रसविलास तथा मतिराम कृत रसराज’ 1643 ई० से लगभग 10 वर्ष पूर्व की तथा ग्वाल कवि की रसरंगआदि रचनांए (1843ई०) लगभग 10 -15 वर्ष बाद की ही ठहरती है | इनके अतिरिक्त कतिपय कवि ऐसे भी है, जिनका जन्म भकितकाल में हुआ और उनकी रचनाएँ रीतिकालमें लिखी गयीं अथवा उनका जन्म रीतिकालमें हुआ और रचनाएँ वे इसकी समाप्ति के 10-20 वर्ष बाद तक करते रहे | अतएव रीतीकालकी  सीमाएं हमें सामान्य रूप से सत्रहवीं शती के मध्य से उन्नीसवीं शती के मध्य तक मान लेनी चाहिए | इस काल के आदि और अन्त के दोनों ओर लगभग 20-20 वर्ष का समय जो छोड़ा गया है, उसे यदि इसकी प्रस्तावना और उपसंहति के नामों से अभिहित किया जाये तो भी कोई आपति की बात न होगी; कारण, इससे कालविषयक सीमा बन्धन के  परिणामस्वरूप एक ही परम्परा के कतिपय ग्रन्थों को इस प्रकार की रचनाओं के वर्ग से निष्काषित न किया जा सकेगा |

 







अमीर खुसरो के दोहे, मुकरियाँ और गीत /amir khsro ke dohe mukriyan or geet

                                         अमीर खुसरो के दोहे, मुकरियाँ और गीत   1.      एक नार किया -----------------------------------...