संस्कृति और सौंदर्य की समीक्षा
'दूसरी परंपरा की खोज' नामवरसिंह जी की प्रसिद्ध पुस्तक है। इस पुस्तक में नामवरसिंह जी ने द्विवेदी जी को दूसरी परंपरा का जनक मानते हुए उनके समस्त सैद्धांतिक और व्यावहारिक आलोचना का सरगंभित विवेचन प्रस्तुत करते हैं। इसी क्रम में उन्होंने संस्कृति और सौंदर्य नामक निबंध में द्विवेदी जी के संस्कृति एवं सौंदर्य संबंधित दृष्टिकोण की व्यापकता और प्रासंगिकता का उद्घाटन किया है। इस लेख में डॉक्टर नामवर सिंह ने दो बातें- 'संस्कृति' और 'सौंदर्य' पर गंभीरता पूर्वक विचार किया है । संदर्भ उन्होंने तो द्विवेदी का ही दिया है, मगर उसी बहाने इन विषयों पर नामवर सिंह ने अपना विचार भी रखा है जो इन विषयों को समझने की दिशा में महत्वपूर्ण है। यह अनायास नहीं है कि प्रत्येक प्रगतिशील विचारकों के लिए 'सौंदर्य' और 'संस्कृति' का प्रश्न प्रमुखता रूप से विचारणीय रहा है, क्योंकि उन पर संस्कृत विरोधी होने के साथ-साथ सौंदर्य विरोधी होने का भी आरोप लगाता रहा है। असल में ये न तो कभी संस्कृति विरोधी रहे और ना ही सौंदर्य विरोधी बल्कि यह इन दोनों में जो अभिजात्यापन का अतिरेक था या यूं कहे की संस्कृति और सौंदर्य को अभिजीत का हिस्सा मान लिया गया था उससे उनका विरोध था उनकी विवेचनाओं से संस्कृति और सौंदर्य का असली रूप सामने आया और पारंपरिक गलत व्याख्याओं और धारणाओं से मुक्ति मिली।
संस्कृति को लेकर समय-समय पर तरह -तरह से विचार विमर्श होता रहा है। कुछ राजनीतिक प्रेरित तो कुछ स्वार्थ प्रेरित। इस विमर्श में द्विवेदी जी ने संस्कृति के जिन बुनियादी गुणों की ओर इशारा किया था, उस पर पर्दा डालकर सभी विश्लेषक खुद को संस्कृति के नए विमर्श कार के रूप मे स्थापित करने लगे, एक राजनीति से प्रेरित होकर दिनकर जी ने 'संस्कृति के चार अध्याय' की रचना की और मिश्रा ,संस्कृति के स्वरूप' को स्थापित किया तो दूसरी राजनीति के तहत अज्ञेय ने संस्कार धर्मी संग्रह संस्कृति की वकालत की । नामवरजी लिखते हैं - "यदि दिनकर की "मिश्र संस्कृति" की एक राजनीति है तो अज्ञेय की संस्कार धर्मी संग्रहक संस्कृति भी किसी और राजनीति के अनुसंग से बच नहीं जाती ।" का इशारा साफ समझ जा सकता है।
द्विवेदी जी ने भारतीय संस्कृति का सच उजागर करते हुए कहा था कि गंधर्व यक्ष किन्नर आदि आर्य के बाद के समाज के जातियों के विश्वासों और सौन्दर्य कल्पना का सबसे अधिक ऋणी है। उनकी यह स्थापना किसी खास मकसद की उपज नहीं थी और ना ही किसी तरह की राजनीति से प्रेरित। वह तो उनके अतीत कालीन साहित्य के अध्ययन और चिंतन की स्वाभाविक अभिव्यक्ति थी। असल में संस्कृति को लेकर दक्षिणपंथी सोच हमेशा विशुद्धतावाद पर जोर देती रही है। इस विशुद्धता पर न केवल वह गर्व करती रही है बल्कि इस आर्य संस्कृति को वह सर्वश्रेष्ठ भी मानती रही है और इसके लिए वह तरह-तरह का तर्क भी गढ़ती रही है इसका विरोध करते हुए द्विवेदी जी लिखते हैं- " देश और जाति की विशुद्ध संस्कृति केवल बात की बात है सब कुछ में मिलावट है, सब कुछ अविशुद्ध है। द्विवेदी जी यह भली भांति समझते थे कि भारतीय संस्कृति का स्वरूप आर्यत्तर जातियों की देन स्वीकार किए बिन निर्मित नहीं होता। मगर आर्य संस्कृति के विशुद्धतावादी पत्थर इसे कतई स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। द्विवेदी जी इसी सोच पर हमला किया था। नामवर जी ने ठीक लिखा है-" और सच कहा जाए तो आर्य संस्कृति की शुद्धता के अहंकार पर चोट करने के लिए ही ' अशोक का फूल' लिखा गया है, प्रकृति वर्णन के लिए नहीं। यह निबंध द्विवेदी जी के शुद्ध पुष्प प्रेम का प्रमाण नहीं बल्कि संस्कृति दृष्टि का अनूठा दस्तावेज है।
दिनकर जी के सांस्कृतिक चिंतन "संस्कृति के चार अध्याय" को अज्ञेय जी ने "मिश्र संस्कृति" का आग्रह करार देते हुए उसे राजनीति प्रेम बताया था।
अज्ञेय जी का स्पष्ट मानना था की संस्कृतियों प्रभाव ग्रहण करती हैं, अपने अनुभव को समृद्धतर बनती हैं। लेकिन यह प्रक्रिया मिश्रण की नहीं है।अज्ञेय जी संस्कृति की संग्रह्ता पर जो देते हैं और उसके मूल रूप को शुद्ध मानते हैं। द्विवेदी जी का मत इन दोनों से भिन्न है। द्विवेदी जी संस्कृति के दोनों पक्ष "संग्रहकता" और "त्याग" दोनों पर जोर देते हैं..... " हमारे सामने समाज का आज जो रूप है वह न जाने कितने ग्रहण और त्याग का रूप है।'' द्विवेदी जी के चिंतन को आगे बढ़ते हुए नामवर जी समकालीन संदर्भ में संस्कृति के प्रति आसक्ति या मोह को जड़ता बताते हैं। वह इस संदर्भ में द्विवेदी जी को कोट करके दरअसल संस्कृति के विषय में अपने प्रगतिशील पक्ष को ही वाणी देते हैं।
....." आज हमारे भीतर जो मोह है संस्कृति और कला के नाम पर जो आसक्ति है, धर्मके आचरण और सत्य निष्ठा के नाम पर जो जड़ीमा है (द्विवेदी जी) उसे किस प्रकार ध्वस्त किया जाए (नामवर जी) द्विवेदी? जी ने संस्कृति के प्रति जिस "मोह और जड़ता" को बाधक तत्व के रूप में विश्लेषित किया था। उन बाधक तत्वों को धंसत करने की चिंता दरअसल समय की प्रगतिशील चिंता थी जो तब और प्रासंगिक हो उठी थी, जब दो ध्रुवीय राजनीति से प्रेरित मिश्र और शुद्ध संस्कृति को टकराहट आकार ग्रहण करने लगी थी। राजनीति की एक धारा से प्रेरित होकर दिनकर जी ने मिश्र संस्कृति का आग्रह प्रस्तुत किया तो दूसरी धारा से प्रेरित होकर अज्ञेय जी ने उसकी संग्राहकता पर जोर देते हुए कहीं ना कहीं उसके शुद्धता की वकालत की। शुद्धता वादी खेमे वालों का स्पष्ट मानना था कि अंतर भावों अनुभूतियां और आध्यात्मिक उपलब्धियां के स्तर पर संस्कृतियों का वास्तविक मिलन अत्यंत कठिन होता है।" उन लोगों का मानना था की संस्कृति की तथाकथित समासिकता वास्तव में सभ्यता के क्षेत्र में ही लागू होती है। संस्कृति के प्रति इस तरह के जड़ आग्रह से कोई भी प्रगतिशील खेमे का चिंतन सहमत नहीं हो सकता । नामवरजी ने मिश्र संस्कृति और विशुद्ध संस्कृति के राजनीति पर प्रहार करते हुए लिखा- " यदि दिनकर की समसामयिक संस्कृति का संबंध राजनीतिक के एक पछ से है तो स्वयं आगे और गोविंद चंद्र पांडे को शुद्ध संस्कृति का संबंध भी राजनीति के दूसरे पद से जोड़ा जा सकता है।