Wednesday, May 14, 2025

पृथ्वीराज रासो की प्रामाणिकता व अप्रामाणिकता / prithviraj raaso ko pramanikta va aprmanikta

                               पृथ्वीराज रासो की प्रामाणिकता व अप्रामाणिकता

                ‘पृथ्वीराज रासो’ हिन्दी साहित्य का सर्वप्रथम महाकाव्य है | प्रारम्भ में यह ग्रन्थ प्रमाणिक माना जाता था, पर अब अधिकांश विद्वान् इसे अप्रामाणिक मानते हैं | इस प्रकार इस रासो काव्य के प्रामाणिकता के सम्बन्ध में चार रूप सामने आते हैं –
(1)   प्रमाणिक मानने वाले विद्वान – इसमें डा० श्याम सुन्दरदास , मोहनलाल विष्णुलाल पांड्या, मिश्रबंधु, और कर्नल टाड हैं |
(2)   पूर्णत: अप्रामाणिक मानने वाले विद्वानों में – रामचन्द्र शुक्ल, गौरीशंकर हीराचन्द ओझा, डा० बुलर, कविराज श्यामलालदान और मुंशी देवी प्रसाद |
(3)   पूर्णत: प्रामाणिक और न ही पूर्णत: अप्रामाणिक मानने वाले विद्वान – मुनिजिन विजय, डा० सुनीति कुमार चटर्जी, हजारी प्रसाद द्विवेदी हैं |
(4)   चौथा मत नरोत्तमदास स्वामी का है |
      वस्तुत: प्रारम्भ में यह ग्रन्थ विवादास्पद नहीं था | कर्नल टाड ने इसकी वर्णन शैली तथा काव्य सौन्दर्य पर रीझकर इसके लगभग 30 हजार छंदों का अंग्रेजी में अनुवाद भी किया था | तासी भी इसकी प्रामाणिकता में संदेश नहीं किया था | बंगाल की राँयल एशियाटिक सोसाईटी ने इस ग्रन्थ का मुद्रण भी आरम्भ कराया था | सन 1875 ई० में डा० बुलर ने ‘पृथ्वीराज विजय’ ग्रन्थ के आधार पर इसे अप्रामाणिक रचना घोषित किया है | फलत: राजस्थान के कुछ इतिवृत-खोजियों में कविराजा मुररिदन, श्यामलदान, गौरीशंकर हीराचन्द ओझा आदि ने इस काव्य को अप्रामाणिक सिद्ध करने के लिये सायास तर्क जुटाये | इनके तर्क को दशरथ ने निराधार किया | फिर आगे इतना यह विवादास्पद होने लगा की विद्वान् नये-नये तर्क प्रस्तुत करने लगे | जैसे –

अप्रामाणिकता के लिये तर्क  - ‘पृथ्वीराज रासो’ के अप्रमाणिकता के तर्क निम्नलिखित हैं –
(1)   इस ग्रन्थ में उल्लिखित घटनाये और नाम इतिहास  से मेल नहीं खाते हैं | इसमें परमार, चालुक्य और चौहान क्षत्रियों को अग्नि वंशी ममना गया है , जबकि ये सभी सूर्यवंशी प्रतीत हुये हैं |
(2)   पृथ्वीराज का दिल्ली लोट जाना, संयोगिता-स्वयंवर आदि घटनाये इतिहास से मेल नहीं खाते |
(3)   अनंगपाल, पृथ्वीराज तथा बीसलदेव के राज्यों के सन्दर्भ भी अशुद्ध हैं |
(4)   पृथ्वीराज की माँ का नाम कर्पूरी था, जबकि रासो में कमला बताया गया है |
(5)   पृथ्वीराज के बहन पृथा का विवाह मेवाड़ के राणा समरशिंह के साथ अशुद्ध है |
(6)   पृथ्वीराज द्वारा गुजरात के राजा भीमसिंह का वध भी इतिहास सम्मत नहीं है |
(7)   पृथ्वीराज के चौदह विवाह इतिहास  से मेल नहीं है |
(8)   पृथ्वीराज के हाथों गोरी की मृत्यु इतिहास सम्मत नहीं है |
(9)   पृथ्वीराज द्वारा सोमेश्वर की मृत्यु इतिहास सम्मत नहीं है |
(10)  तिथियाँ अशुद्ध हैं | सभी तिथियाँ 90-100 वर्ष पीछे ले जाती हैं |

     प्रामाणिकता के तर्क – प्रामाणिकता के तर्क निम्नलिखित हैं –
(1)   डा० दशरथ शर्मा का मत है की इसका मूल प्रक्षेपों में लिखा है इधर की लघुतम प्रतियों में इतिहास सम्बन्धी अशुद्धियाँ नहीं है |
(2)   घटनाओं में 90-100 वर्षों का अन्तर संवत् के कारण है |
(3)   डा० हजारी प्रसाद द्विवेदी ने पृथ्वीराज रासो की भाषा संयुक्ताक्षर अनुस्वारान्त पाया है जो 12 वी शताब्दी में  मान्य है |
(4)   ‘पृथ्वीराज रासो’ काव्य रचना है इससे ऐतिहासिक रचना न माने |
(5)   अरबी-फारसी शब्द का प्रयोग सही है क्योंकि चन्दवरदाई लाहौर के थे |
                इस प्रकार कहा जा सकता है की ऐसे अनेक तर्क हैं जो इस काव्य की प्रामाणिकता के लिये उचित तर्क नहीं बन पते हैं | यही नहीं यदि अप्रामाणिकता के ही तर्क दिये जाये तो ‘रामचरित मानस’ ‘सूरसागर’ ‘बीजक’ में भी प्रामाणिकता पर संदेह किया जा सकता है क्योंकि इनमें भी प्रक्षिप्त अंश अस्वीकार है | अत: पृथ्वीराजरासो प्रामाणिक है क्योंकि चन्दवरदाई इनके समकालीन कवि हैं |

                                                       
                                                           अन्य लेख - भाषा के विविध रूपों पर प्रकाश डालिए

















 

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