पृथ्वीराज रासो की प्रामाणिकता व अप्रामाणिकता
‘पृथ्वीराज रासो’ हिन्दी साहित्य का सर्वप्रथम महाकाव्य है | प्रारम्भ में
यह ग्रन्थ प्रमाणिक माना जाता था, पर अब अधिकांश विद्वान् इसे अप्रामाणिक मानते
हैं | इस प्रकार इस रासो काव्य के प्रामाणिकता के सम्बन्ध में चार रूप सामने आते
हैं –
(1)
प्रमाणिक मानने
वाले विद्वान – इसमें डा० श्याम सुन्दरदास , मोहनलाल विष्णुलाल पांड्या,
मिश्रबंधु, और कर्नल टाड हैं |
(2)
पूर्णत:
अप्रामाणिक मानने वाले विद्वानों में – रामचन्द्र शुक्ल, गौरीशंकर हीराचन्द ओझा,
डा० बुलर, कविराज श्यामलालदान और मुंशी देवी प्रसाद |
(3)
पूर्णत: प्रामाणिक
और न ही पूर्णत: अप्रामाणिक मानने वाले विद्वान – मुनिजिन विजय, डा० सुनीति कुमार
चटर्जी, हजारी प्रसाद द्विवेदी हैं |
(4)
चौथा मत
नरोत्तमदास स्वामी का है |
वस्तुत: प्रारम्भ में यह
ग्रन्थ विवादास्पद नहीं था | कर्नल टाड ने इसकी वर्णन शैली तथा काव्य सौन्दर्य पर
रीझकर इसके लगभग 30 हजार छंदों का अंग्रेजी में अनुवाद भी किया था | तासी भी इसकी
प्रामाणिकता में संदेश नहीं किया था | बंगाल की राँयल एशियाटिक सोसाईटी ने इस
ग्रन्थ का मुद्रण भी आरम्भ कराया था | सन 1875 ई० में डा० बुलर ने ‘पृथ्वीराज
विजय’ ग्रन्थ के आधार पर इसे अप्रामाणिक रचना घोषित किया है | फलत: राजस्थान के
कुछ इतिवृत-खोजियों में कविराजा मुररिदन, श्यामलदान, गौरीशंकर हीराचन्द ओझा आदि ने
इस काव्य को अप्रामाणिक सिद्ध करने के लिये सायास तर्क जुटाये | इनके तर्क को दशरथ
ने निराधार किया | फिर आगे इतना यह विवादास्पद होने लगा की विद्वान् नये-नये तर्क
प्रस्तुत करने लगे | जैसे –
अप्रामाणिकता
के लिये तर्क - ‘पृथ्वीराज रासो’ के अप्रमाणिकता के तर्क
निम्नलिखित हैं –
(1)
इस ग्रन्थ में
उल्लिखित घटनाये और नाम इतिहास से मेल नहीं
खाते हैं | इसमें परमार, चालुक्य और चौहान क्षत्रियों को अग्नि वंशी ममना गया है ,
जबकि ये सभी सूर्यवंशी प्रतीत हुये हैं |
(2)
पृथ्वीराज का
दिल्ली लोट जाना, संयोगिता-स्वयंवर आदि घटनाये इतिहास से मेल नहीं खाते |
(3)
अनंगपाल,
पृथ्वीराज तथा बीसलदेव के राज्यों के सन्दर्भ भी अशुद्ध हैं |
(4)
पृथ्वीराज की माँ
का नाम कर्पूरी था, जबकि रासो में कमला बताया गया है |
(5)
पृथ्वीराज के बहन
पृथा का विवाह मेवाड़ के राणा समरशिंह के साथ अशुद्ध है |
(6)
पृथ्वीराज द्वारा
गुजरात के राजा भीमसिंह का वध भी इतिहास सम्मत नहीं है |
(7)
पृथ्वीराज के चौदह
विवाह इतिहास से मेल नहीं है |
(8)
पृथ्वीराज के
हाथों गोरी की मृत्यु इतिहास सम्मत नहीं है |
(9)
पृथ्वीराज द्वारा
सोमेश्वर की मृत्यु इतिहास सम्मत नहीं है |
(10) तिथियाँ अशुद्ध हैं | सभी तिथियाँ 90-100 वर्ष
पीछे ले जाती हैं |
प्रामाणिकता
के तर्क – प्रामाणिकता के तर्क निम्नलिखित हैं
–
(1) डा०
दशरथ शर्मा का मत है की इसका मूल प्रक्षेपों में लिखा है इधर की लघुतम प्रतियों
में इतिहास सम्बन्धी अशुद्धियाँ नहीं है |
(2) घटनाओं
में 90-100 वर्षों का अन्तर संवत् के कारण है |
(3) डा०
हजारी प्रसाद द्विवेदी ने पृथ्वीराज रासो की भाषा संयुक्ताक्षर अनुस्वारान्त पाया
है जो 12 वी शताब्दी में मान्य है |
(4) ‘पृथ्वीराज
रासो’ काव्य रचना है इससे ऐतिहासिक रचना न माने |
(5) अरबी-फारसी
शब्द का प्रयोग सही है क्योंकि चन्दवरदाई लाहौर के थे |
इस प्रकार कहा जा सकता है की
ऐसे अनेक तर्क हैं जो इस काव्य की प्रामाणिकता के लिये उचित तर्क नहीं बन पते हैं
| यही नहीं यदि अप्रामाणिकता के ही तर्क दिये जाये तो ‘रामचरित मानस’ ‘सूरसागर’
‘बीजक’ में भी प्रामाणिकता पर संदेह किया जा सकता है क्योंकि इनमें भी प्रक्षिप्त
अंश अस्वीकार है | अत: पृथ्वीराजरासो प्रामाणिक है क्योंकि चन्दवरदाई इनके समकालीन
कवि हैं |
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