अमीर खुसरो के दोहे, मुकरियाँ और गीत की व्याख्या
1.
एक नार किया
----------------------------------------------- हो जाबे ||
परिचय – व्याख्येय पंक्तियाँ
पाठ्य पुस्तक ‘काव्य कुंज’ से ली गई हैं | ये पंक्तियाँ हिन्दी साहित्येतिहास में आदिकाल के साहित्यकार अमीर खुसरो द्वारा रचित ‘पहेली ’ शीर्षक से गृहित है | इसमें
कवि दर्पण से सम्बद्ध पहेली के माध्यम से प्रियतम के प्रति प्रियतमा के श्रृंगार भावना को चित्रण किया गया है |
प्रसंग/प्रकरण – कवि खुसरो
प्रेमाश्रयी संत कवि निजामुद्दीन औलिया के शिष्य परम्परा में आते हैं | खुसरो और
औलिया के बीच गुरु-शिष्य के साथ ही ईश्वर-भक्त का सम्बन्ध है | अत: भक्त कवि खुसरो
प्रेमाश्रयी भक्ति धारा के आधार पर ईश्वर-भक्त के सम्बन्ध को दर्पण के माध्यम से
उपस्थित किये हैं |
व्याख्या – कवि कहते हैं कि
प्रियतम को प्रियतमा पसन्द करती है | क्योंकि पुरे शरीर में पानी है, पर वास्तविक
सच्चाई है कि तन में प्रफुलता है किन्तु इसमें पानी नहीं है | सच्चाई तो यह की
प्रियतमा अपने प्रियतम को ह्रदय में सहेजे रखती है और जब प्रियतम को अपना मुख
दिखलाती है तब वह पूरी तरह पी मय यानि प्रियमय हो उठती है | तात्पर्यत: आईना
प्रियतमा को प्रिय है जिससे अपने को देखती है, और खुद ही प्रियतम की ध्यान लगाकर
प्रियमय हो जाती है |
काव्य बिशेष – 1. आईना के
माध्यम से प्रियतमा द्वारा प्रियतम के प्रति होने वाले भावनाओं का चित्रण है |
2, कविता की भाषा प्रारंभिक खड़ी
बोली हिन्दी है
3, अन्योक्ति, मानवीय और
अनुप्रास अलंकार की छंटा है |
4, माधुर्य – गुण, श्रृंगार व
शांत रस, तथा व्यंजना शब्द शक्ति, प्रतीक योजना में वक्रता के साथ संगीतबद्ध है |
2.
चास मास
------------------------------------------------- कैसे ?
परिचय – ये पंक्तियाँ अमीर
खुसरो के पहेलियों से गृहित हैं | इसमें कवि पिंजड़े के माध्यम से मानव शरीर के
निर्माण की रहस्यात्मकता को उदघाटित किये हैं |
व्याख्या – कवि कहते हैं कि
मानव शरीर में चर्म और मांस के आलावे असंख्य रंध्र होते हैं | पर यह आकृति कैसी है
जिसमें हड्डियों के ढांचों के बीच-बीच में रंध्र तो हैं पर चर्म और मांस नहीं हैं
| यह देखकर कवि को आश्चर्य होता है कि इस आकृति में जीव आखिर कैसे बसती है अर्थात्
पछी जिस पिंजड़े में रहता है उसमें भी असंख्य रंध्र होता है और हाड़-मांस रूपी लोहे
के पतले-पतले पत्तर होते हैं |
काव्य बिशेष – 1. पिजड़े की पछी
के बहाने मानव शरीर में वास करने वाले जीव के प्रति कुतुहल की गई है |
2, कविता की भाषा प्रारम्भिक
खड़ी बोली हिन्दी है, जिससे हिन्दुवी कहा जाता है |
3, रूपक, मानवीकरण और
अनुप्रास अलंकार है |
4, माधुर्य काव्य गुण,
श्रृंगार व शांत रस के साथ-साथ व्यंजना शब्द शक्ति और प्रतिक योजना में
रहस्यात्मकता और संगीतात्मकता है |
5, पहेली पद छंद में है
|
3.
गौरी सोवे
....................................................देस |
परिचय – प्रस्तुत व्याख्या
पंक्तियाँ पाठ्य पुस्तक ‘काव्य कुंज’ से ली गई है | ये दोहे हिन्दी साहित्य के
इतिहास से आदिकाल के खड़ी बोली भाषा के प्रवर्तक कवि अमीर खुसरो के ‘दोहे’ से ली गई है | इसमें कवि
प्रेममार्गी धारा को अपनाते हुये नायिका
रूप से अपने भक्ति भाव को गुरु के प्रति दिखाई है | अर्थात् सामान्य मनुष्य को भी
नायिका रूप में तथा ईश्वर को पुरुष रूप में स्पष्ट किये हैं | यहाँ गुरु के मृत्यु
होने और मृत्यु शय्या में रहने की स्थिति को नायिका रूपी गुरु को ईश्वर रूपी नायक
के साथ मिलन की स्थिति को दिखाया है |
प्रकरण/प्रसंग – अमीर खुसरो के
गुरु संत निजामुद्दीन औलिया प्रेममार्गी शाखा के साधक थे | एक दिन अमीर खुसरो गुरु
से कहीं दूर चले गये थे, समाचार मिली की गुरुकी मृत्यु हो गई, सुनते ही अपने गुरु
के पास आ गये | गुरु को मृत्यु शय्या में देखकर प्रेमभाव से ये दोहे मुख से उधृत
हो जाते हैं |
व्याख्या - कवि कहते हैं कि गुरु मृत्यु शय्या में है
अर्थात् इन्हें ईश्वर रूपी पति से मिलन हो गया है | आगे कवि कहते कि अब गुरुदेव
अपने स्वामी को पाकर चारों दिशाओं से भयरहित होकर सो सकते हैं | अर्थात् गुरु को
अब सांसारिक दुःख तकलीफ नहीं होगी क्योंकी ईश्वर रूपी पति इन्हें मिल गया है |
अर्थात् इनके पति ईश्वर इन्हें चारों ओर से सुरक्षा देगें |
काव्यगत विशेषता –
1.प्रेममार्गी भक्तिभावना के आधार पर संसारिकता से मुक्ति के भाव को अभिव्यंजित
किया गयाहै
2, भाषा खड़ी बोली हिन्दी है जिसमें क्षेत्रीय भाषाएँ, ब्रज, अवधी, राजस्थानी आदि बोलियों का समिश्रण है |
3, ‘मुख पर
डारे केस’ में रूपक अलंकार तथा सम्पूर्ण कविता में अनुप्रास अलंकार की छंटा है |
4. संसारिकता
के अभिव्यक्ति को रहस्यात्मकता के साथ प्रतिक रूप से स्पष्ट किया है | यहाँ भक्ति
काल के
तथ्यों का भी उदभव है |
5. शब्द शक्ति
व्यंजना, प्रसाद व माधुर्य काव्य गुण, शांत रस के साथ संगीतात्मकता भी है |
6. यह कविता दोहे छंद
में लिखी गई है |
इस प्रकार भाव व कला पछ की
दृष्टि से प्रेममार्गी भक्तिभावना के आधार से ईश्वर के प्रति मिलन की रहस्यात्मक
तथ्यों को उजागर करने वाला आदिकाल की प्रमुख काव्यधारा है |
4.
सजन सकारे ----------------------------------------------------
होय ||
परिचय – व्याख्येय पंक्तियाँ
अमीर खुसरो के दोहे से उद्धरित हैं | कवि इन पंक्तियों में भक्त के विरह भाव की
अभिव्यक्ति दी है |
व्याख्या – कवि कहते हैं कि
प्रियतम को एक दिन बुलाया ही जाएगा और उसके नयन रोते हुये मरेंगे | विधाता से
प्रार्थना है कि रात को इतनी बड़ी कर दे की कभी भोर हो ही नहीं |
काव्य बिशेष – 1. कविता में
शाश्वत सत्य की अभिव्यक्ति हुई है जो रहस्यात्मक रूप में उपस्थित है |
2, भाषा प्रारम्भिक हिन्दी
है जिससे हिन्दुवी कहते हैं |
3, कविता में मानवीय,
अनुप्रास अलंकार की उपस्थिति है |
4, कविता दोहे छंद में है |
5, माधुर्य गुण, व्यंजना
शब्द शक्ति, शांत रस के साथ ही संगीतात्मकता विराजमान है |
5.
बाला था
---------------------------------------------------------------- गाँव ||
परिचय
– व्याख्येय पंक्तियाँ खड़ी बोली हिन्दी भाषा के प्रवर्तक अमीर खुसरो द्वारा रचित
हैं | ये पंक्तियाँ मुकरी में संकलित हैं | इसमें कवि यश की क्रामिक अभिवृद्धि से
उत्पन्न सांसारिक सत्य की अभिवृद्धि की गयी है |
व्याख्या - कवि कहते हैं कि जब यश मिलना आरम्भ हुआ तब
सबको अच्छा लगा, सबने प्रशंसा की, पर यह यश जब ज्यादा मिल गया तब वह यश किसी को
अच्छा नहीं लगा अर्थात् किसी के काम की नहीं हुई | खुसरो जब उस नाम को बुझाने के
लिए कह दिया तब नहीं बुझने पर गाँव छोड़ने के लिये कहा गया |
काव्य
बिशेष – 1. कविता में यश की क्रमिक अभिवृद्धि से उत्पन्न सांसारिक सत्य की
अभिवृद्धि की गई है यहाँ ‘बाला’ शब्द यश रूपी प्रकाश के बढ़ने के अर्थ में प्रयुक्त
हुआ है तथा यश के अधिक बढ़ जाने पर किसी के कुछ काम नहीं आने की बात कही गई है |
2, भाषा प्रारम्भिक खड़ी बोली
हिन्दी है जिससे यहाँ हिन्दुवी कहा जाता है |
3, अन्योक्ति एवं अनुप्रास
अलंकार है |
4, माधुर्य गुण, श्रृंगार व
शांत रस, व्यंजना शब्द शक्ति, पद छंद, तथा संगीतबद्धता है |
6.
मेरा जोबन नेवल
------------------------------------------------रूसा ही जाए ||
परिचय
– व्याख्येय पंक्तियाँ खड़ी बोली भाषा के प्रवर्तक अमीर खुसरो द्वारा रचित हैं | ये
पंक्तियाँ अमीर के रचित ‘गीत’ शीर्षक रचना से उद्धरित है | कवि द्वारा यहाँ भरे
यौवन में सर्वोच्य सत्ता द्वारा कवि के वैभव को बख्ये जाने की बात लेकर कवि के
आत्मव्यथा को अभिव्यक्ति की गई है |
व्याख्या
– कवि कहते हैं कि इसका यौवन नया और
जीवनोत्साह से भरा पूरा है फिर भी सर्वोच्य सत्ता ने इसके यौवन-वैभव को बख्श दिया
है | कवि पुन: कहते हैं कि कोई गुरु निजामुद्दीन औलिया को समझाये क्योंकि कवि
स्वयं गुरु को जितना समझाते हैं गुरु उतने ही रुठते जाते हैं |
काव्य
बिशेष – 1. इन पंक्तियों में खुसरो द्वारा गुरु के प्रति आत्माभिव्यक्ति हुई है |
2, कविता की भाषा हिन्दुवी
है |
7.
छापा तिलक
----------------------------------------------------------मिली
के ||
परिचय
– व्याख्येय पंक्तियाँ अमीर खुसरो रचित गीत है | ये हमारे पाठ्य पुस्तक
‘काव्य-कुंज’ से ली गई है | जो आदिकालीन खड़ी बोली भाषा के पवर्तक अमीर खुसरो के रचना
‘गीत’ में संकलित है | इसमें कवि अमीर के वैराग्य भावना को संकलित किया गया है |
प्रकरण/प्रसंग
– कवि अमीर खुसरो भारतीय इतिहास के मध्यकाल के राज्याश्रित कवि रहे हैं | इन्होंने
प्रसिद्ध सूफी संत निजामुद्दीन औलिया के अनन्य भक्त व शिष्य कवि का स्थान प्राप्त किया
है | निजामुद्दीन तथा अमीर खुसरो के आश्रयदाता राजा के बीच पटती नहीं थी | इस
द्वन्द्व के बावजूद भी इन पंक्तियों के द्वारा गुरु के प्रति वैराग्य और प्रेम को
सूफी-भक्ति भावना के अनुसार व्यक्त किया है |
व्याख्या
– कवि कहते हैं कि मैं जब से गुरु से संबंध जोड़ा है तब से छापा-तिलक का त्याग किया है | अर्थात् सदा अभिन्न व सुहागिन रहने
के लिये माथा में तिलक धारण नहीं किया है यानी मैं बादशाह गयासुद्दीन के बजाय
निजामुद्दीन औलिया को पाकर धन्य हो गया
हूँ | अत; मैं सदा सुहागिन ही रहना चाहता हूँ |
काव्यगत
बिशेषता – 1. खुसरो द्वारा अपने गुरु के
प्रति कृतज्ञता का भाव प्रकट हुआ है |
2, भाषा खड़ी बोली
हिन्दी का प्रारम्भिक रूप है, जिसमें राजस्थानी,हिन्दवी, ब्रज, अवधी, पंजाबी
आदि का समिश्रण
है |
3, रहस्यात्मक व प्रतीकात्मक की भाव है
|
4, रूपक,अनुप्रास और
मानवीय अलंकार है |
5, मधुर व प्रसाद
काव्य गुण, व्यंजना शब्द शक्ति, श्रृंगार व शांत रस, पद छंद में लिखित संगीतबद्ध
है |
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