भक्तिकाव्य
की प्रवृत्तियाँ/बिशेषताएं
भक्तिकाव्य उदात्त एवं शांत मनोवृति का
काव्य है |इसकी प्रतिबिम्ब भारतवर्ष की सामाजिक एवं धार्मिक परिस्थितियों में मिल
जाता है |इस भक्तिकाव्य में महान साहित्य की सभी प्रवृतियाँ पाई जाती है, यों कहें
कि भक्तिकाव्य ही महान साहित्य की निर्देशक है |भक्तिकाव्य की सामान्य
प्रव्रत्तियां निम्नलिखित हैं –
1, नाम
की महत्ता – भक्तिकाव्य के भक्तों ने नाम की महत्ता स्वीकार की है | जप, कीर्तन,
भजन आदि सभी में समान रूप से दृष्टि गोचर होती है |तुलसी ने राम के नाम को राम से
बड़ा माना है | नाम में निर्गुण एवं सगुण दोनों में सामंजस्य हो जाता है –
अगुन सगुण दुई ब्रह्म स्वरूपा
| अकथ अगाध अनादि अनूपा ||
मोरे मत बड नाम दुई ते | किए जेहि प्रभु निज बीएस बूते || - तुलसी
मेरा साहब एक है, दुजा कहा न
जाय |
साहब दुजा जो कहूँ , साहब खरा रिसाय
|| - कबीर
2, गुरु
महिमा – भक्तिकाव्य ने एक स्वर में गुरु की महत्ता स्वीकार की है | कबीर ने गुरु
को भगवान् से भी श्रेष्ठ माना है | -
गुरु गोबिंद दोऊ खड़े, काके लागो पायं |
बलिहारी गुरु आपको, जिन गोविन्द दियो बताय
||
सूर, तुलसी और जायसी ने भी गुरु के
प्रति अपार भक्ति प्रदर्शित की है |
3, भक्तिभावना
का प्राधान्य – भक्तिकाल की चारों धाराओं (निर्गुण, सूफी, कृष्णभक्ति और रामभक्ति)
में भक्तिभावना का प्राधान्य मिलता है |कबीर के बिचार के अनुसार –बिना भक्ति के
ज्ञान की प्राप्ति असंभव है |
भगति नारदी मगन सरीरा | इहि विधि भगतिहि कहै
कबीरा ||
जायसी ने साधना के चारों
सोपानों (शरीयत, तरीकत, हकीकत, और मारिफत) को भक्ति का साधन स्वीकार किया है |
3, अहंकार
का त्याग – भक्ति का दूसरा रूप है – अहंकार का त्याग | सच्ची भक्ति अहंकार त्याग
के बिना असंभव है | -
राम सो बड़ो है कौन, मो
सो कौन छोटो |
राम सो खरो है कौन, मो
सो कौन खोटो || - तुलसी
प्रभु हौं सब पतितन को टीकौ
| - सूर
जब मैं था तब हरी नहीं, अब हरी है
मैं नाहिं |
सब अँधियारा मिट गया, दीपक रेखा
माहीं || - कबीर
4, समन्वय
की भावना – भक्तिकाव्य की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण बिशेषता समन्वय की भावना है | यह समन्वय
जीवन के सभी क्षेत्रों – सामाजिक, धार्मिक, तथा दार्शनिक मेंमिलता है | भक्तिकाल
में सामाजिक अव्यवस्था फैली हुई थी भक्तकवियों ने सामाजिक समन्वय इस तरह से किया –
अरे इन दोउन राह ण पाई |
हिन्दू अपनी करै बड़ाई, गागर
छुवन न देई |
वेश्या के पावन तर सोवै , यह
देखो हिन्दुवाई |
मुसलमान के पीर औलिया मुरगा –
मुरगी खाई |
खाला केरी बेटी ब्याहे गरहीं
में करहिं सगाई ||
धार्मिक समन्वय
में ज्ञान, भक्ति तथा क्रम को समन्वय किया गया है | सम्प्रदायों के दार्शनिक
सिद्धांतों का समन्वय दृष्टिगोचर होता है | -
ज्ञानहिं भगतिहिं नहिं कछु
भेदा |
उभय हरहिं भव
संभव खेदा ||
दार्शनिक समन्वय,
और भाषाओँ का समन्वय भक्तकवियों ने किये हैं –
ईश्वर अंश
जीव अविनासी |
चेतन, अमल,
सहज सुखनासी ||
5] शील
तथा सदाचार की प्रवृत्ति – शील-सदाचार की ओर भक्त कवियों की स्वाभाविक गत्यात्मकता
रही है |भक्ति रूपी लक्ष्य तक पहुँचने के लिए साधना के इन सोपानों को माध्यम बनाया
– अहंकार का त्याग, आडंबर का खंडन, जाती-पाँति के भेदभाव का विरोध, आत्मसंयम,
अपरिग्रह, इंद्रियसंयम, मानसिक संयम आदि आदि |
6] लोकभाषाओं
का प्राधान्य – भक्तिकाल में लोकभाषाओं को अत्यधिक प्रश्रय दिया गया | कवियों ने
अपनी अनुभूतियों की सहज अभिव्यक्तियों के लिए प्रचलित लोकभाषा के विभिन्न रूपों का
सफल प्रयोग किया है | तुलसी जैसे भक्तकवि नाना पुराण निगमाग्मों के पारंगत
विद्वान् थे और उनका संस्कृत पर पूर्ण अधिकार था, फिर भी अवधि व ब्रजभाषा में
काव्य रचना की | सूर, जायसी ने लोक भाषा में काव्य रचे | कबीर आदि संत कवियों ने
सधुक्कड़ी भाषा में अपनी संदेश जन-जन तक पहंचाए |
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