पद और वाक्य
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वाक्य – भाषा के अंगों की सबसे पूर्णत: सार्थक इकाई है | इसकी विवेचना निम्न
प्रकार से की जा सकती है |
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रचना की दृष्टि से वाक्य के तीन भेद हैं –
१. सरल या साधारण वाक्य २. मिश्र वाक्य ३.
संयुक्त वाक्य
१. सरल या साधारण वाक्य –
जिस वाक्य में एक कर्ता और क्रिया होती है उसे साधारण या
सरल वाक्य कहते हैं | जैसे – पानी बरषा, बिजली चमकती है, हम खा चुके आदि |
२. मिश्र वाक्य –
एक साधारण वाक्य के साथ अधीन में कोई दूसरा वाक्य भी हो, जैसे – मैं
खाना खा चूका तब, तब वह आया | मैं खाना नहीं खाया इसलिए मैंने फल नहीं खाया |
३. संयुक्त वाक्य –
जिस वाक्य में साधारण या मिश्र वाक्य का मेल संयोजक अथवा अवयवों
द्वारा होता है उसे संयुक्त वाक्य कहते हैं, जैसे– मैंने खाना खाया और मेरी भूख
मिट गयी| मैंने भोजन नहीं किया और इसलिए मेरी भूख मिट गयी |
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अर्थ की दृष्टि से वाक्य के आठ भेद हैं –
१.
विधिवाचक – हम खा चुके |
२. निषेधवाचक – हमने खाना नहीं खाया|
३.
आज्ञावाचक – तुम खाओ |
४.
प्रश्नवाचक – क्या तुम्म खा रहे हो |
५.
विस्मयवाचक – ओह! मेरा सर फटा जा रहा है |
६.
संदेहवाचक – उसने खा लिया होगा|
७.
इच्छावाचक – तुम अपने कार्य में सफल रहो|
८. संकेतवाचक – पानी न बरषत तो धान सुख जाती |
पद –
विभिन्न पद मिलकर वाक्य का निर्माण करते हैं, जैसे- अभिहितान्वयवाद के अनुसार पदों के योग से वाक्य
की निष्पति होती है, किन्तु इसके लिए तीन चीजों की आवश्यकता होती है- १, आकांक्षा
२. योग्यता
३. आसक्ति
१.
आकांक्षा –
आकांक्षा कहते हैं अर्थ की अपूर्णता को, जैसे – केवल
‘लड़का’ सुनने
सेs
श्रोता को संतोष नहीं होता | वः यह जानने के लिए उत्सुक रहता है की लडके के सम्बन्ध में क्या
कहना अभीष्ट है| इसलिए
आकांक्षा एक प्रकार की मानसिक स्थिति है, जिसका महत्व श्रोता की दृष्टि से है| दुसरे
शब्दों में इसको ऐसे भी ख सकते हैं कि आकंक्षा का सम्बन्ध श्रोता की ग्रहणशीलता या
उत्कंठा से है| बात
यह है कि पदों का अन्योन्याश्रयत्व होता है|एक पद
अर्थ देने में असमर्थ है,इसलिए वः दुसरे पदों की सहायता लेता है| जैसे- ‘लड़का
पुस्तक पड़ता है’ एस
वाक्य में तीन पद हैं जो परस्पर एक-दुसरे के अर्थ के पूरक हैं और तीनों मिलकर ही एक समुदित और पूर्ण
अर्थ की प्रतीति करते हैं|
२.
योग्यता –
योग्यता का अर्थ पदों के अन्वय में बाधा दो प्रकार से पढ़ सकती है – क. अर्थ
या प्रतीति की दृष्टी से, और ख. पदों के अन्वय की दृष्टि से| एक का
सम्बन्ध मन से है और दुसरे का व्याकरण से, जैसे- ‘किताब
से पानी भरता है’ इस
वाक्य में प्रतीति मुल्क बाधा है| कारण की किताब को पानी भरना संभव नहीं हैं| व्याकरण
की दृष्टि से भी संगत नहीं है|
अन्वय की दृष्टि से बाधा वहाँ होती है
जहाँ व्याकरण के अनुसार पदों का विन्यास नहीं होता है| जैसे- लड़का
खेलती थी (लिंग
विषयक अयोग्यता)|
लडके
खेलता था (वचन
विषयक योग्यता)|
हम
जाता है (पुरुष
विषयक योग्यता)|
राम
ने पड़ता हैं (विभक्ति
विषयक योग्यता)|
इन वाक्यों में सार्थकता का आभाव नहीं पर
हिंदी व्याकरण नियम का पूर्ण आभाव है|
३.
आसत्ति – आसत्ति का अर्थ है समीपता| वाक्य
में प्रयुक्त होने वाली पदों को देश और काल दोनों दृष्टि से परस्पर आसन्न रहना
चाहिए| अगर
वे दूर पड़े तो अर्थबोध में बाधा होगी, जैसे- आज कहे ‘लड़का’ और कल कहे ‘खेलता है’ तो अर्थबोध नहीं होगा| ऐसे ही ‘लड़का
सूर्य दौड़ता है फूल पड़ता है चमकता है घोडा खिलता है’ एसा
सभी शब्द सार्थक हैं पर आसक्ति के क्रम बाधित के कारण अर्थबोध में बाधा है|
सामान्य दृष्टि से वाक्य विन्यास के लिए आकंक्ष, योग्यता और आसक्ति तीनो आवश्यक हैं पर योग्यता सबसे अपेक्षित है, जैसे- बाघ ! साँप ! भागो ! बचाओ ! निष्कर्ष है आकांक्षा,आसक्ति के साथ अन्वय अति आवश्यक है, जैसे-
तरुशिखा पर थी अब रजनी
कमलिनीकुलवल्लभ की प्रभा| (प्रियप्रवास)
यहाँ साफ दृष्टिगोचर है कि वाक्य विन्यास के
लिए योग्यता सबसे आवश्यक है|

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