Tuesday, April 12, 2022

vidyapti ka jivn prichy / विद्यापति का जीवन परिचय

                                                        विद्यापति

                                             


          विद्यापति हिन्दी साहित्य के इतिहास के आदिकाल के कवि हैं | इन्हें साहित्य के दर्शन, ज्योतिष आदि में निपुणता प्राप्त थे | इनकी काव्य परम्परा जयदेव की पियुश्धरा से मिथिला की अमराई को खींचकर जीवन में सरल-प्रफुलता का भाव संचार किये, इससे हिन्दी साहित्य रसमय गीतमय और प्राणमय हो उठा |

                           विद्यापति का जन्म हिन्दी के कुछ इतिहासकारों ने 1350 ई० , तो कुछ इतिहासकार 1360 ई० मानते हैं | लेकिन अधिकांश विद्वान् 1350 ई० को ही स्वीकार किये हैं | इनका जन्म बिहार राज्य के मिथिला के विपसी ग्राम में हुआ है | इनके पिता का नाम गणपति ठाकुर और माता का नाम गंगा देवी या हंसिनी देवी था | विद्यापति सम्मानित और संस्कारित परिवार में पैदा हुये थे | इनके पिता भी राज्याश्रित कवि थे |

                              विद्यापति विभिन्न राज्यों के राज्याश्रित रहे | इन्होंने राजा शिव सिंह और राजा कीर्ति सिंह के दरबार में राजकवि रहे हैं | राजा कीर्ति सिंह के दरबार में कवि रहते हुये इन्होंने स्वयं को कीर्ति सिंह का ‘खेलन कवि’ कहा है | इन्हें  राजा शिव सिंह इनकी पत्नी लखिमा देवी के राज दरबार में ‘राजकवि’ का दर्जा मिला | शिव सिंह ने इन्हें ‘अभिनव जयदेव’ की उपाधि दी | राजा शिव सिंह ने इन्हें राजकवि के तौर पर विसपी ग्राम दान में दिया था | विद्यापति इनके कृपा से संतुष्ट होकर कविता में मुख्य पात्र घोषित किये और ‘रसिक शिरोमणि’ और राजनारायण के नाम का उपाधि प्रदान की | कविवर विद्यापति का निधन दरभंगा जिले के वाजिदपुर नामक ग्राम में 1449 ई० में हुआ था | यह गाँव आज ‘विद्यापति नगर’ के नाम से जाना जाता है |


 रचनाएँ – विद्यापति में काव्य प्रतिभा कूट –कूटकर भरी थी | इन्होंने संस्कृत, अवहट और मैथिलि भाषा में कविता की है | विद्यापति को ‘बंग-कवि’ भी कहा जाता है |

                                     संस्कृत में – भू-परिक्रमा, शैव सर्वस्वसार, पुरुष-परीक्षा, दान वाक्यावली, दुर्गा भक्ति तरंगिनी आदि हैं |

                                     अवहट – कीर्तिलता, कीर्तिपताका |

                                     मैथली  - पदावली

                         विद्यापति के कविता की विषय व कला विविध हैं | रचना पदावली में जयदेव की पीयुष धारा को मिथिला के अमराईयों में उतारे हैं | इसकी भाव व कला से संतुष्ट होकर आलोचकों ने इन्हें मैथिल कोकिल, खेलन कवि’ और रसराज की उपाधि दी है | इनके रचना की भाव व कला पछ में भक्ति व श्रंगार की प्रवृति विद्यमान हैं | इनकी भक्ति में बहुदेवोपासना की प्रवृति है | इन्होंने कृष्ण, गंगा, और दुर्गा से लेकर ग्राम देवों तक की वन्दना की है | इनकी श्रंगार भाव उन्मात है, मधुवन है और है यौवन | इन्होंने राधा और कृष्ण को आलम्बन बनाकर प्रेमी-प्रेमिका,के छेड़-छाड़, मान-मनोबल, को चित्रित किया है | नायक-नायिका के वय-संधि, सद्यः स्नाता तथा इति वचन को विद्यापति के पदों में उपस्थिति है | कीर्तिलता, कीर्तिपताका ग्रन्थ आश्रयदाता के शोर्य-वर्णन के काव्य हैं | विद्यापति के सम्पूर्ण काव्य भक्तिकाल और रीतिकाल के काव्यधाराऑ की स्रोत भी है |



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