'पथ की साथी' की भूमिका
पथ की साथी' महादेवी वर्मा द्वारा लिखित संस्मरण है | इसमें ग्यारह लेखक-लेखिकाओं के जीवन व् व्यक्तित्व पर लिखा गया है | ये सभी लेखक-लेखिका महादेवी वर्मा के सान्निध्य में रहे हैं, फलस्वरूप वर्माजी पर इन लेखकों-लेखिकाओं का प्रभाव पड़ा है |
' पथ के साथी' में कौन-कौन से साहित्यकारों का नाम है -
1. दद्दा (मैथिली शरण गुप्त)
2. निराला भाई
- 3. स्मरण प्रेमचंद
- 4. प्रसाद
- 5. सुमित्रानंदन पंत
- 6. सुभद्रा (कुमारी चौहान)
- 7. प्रणाम (रवींद्रनाथ ठाकुर)
- 8. पुण्य स्मरण (महात्मा गांधी)
- 9. राजेन्द्रबाबू (बाबू राजेन्द्र प्रसाद)
- 10. जवाहर भाई (जवाहरलाल नेहरू)
- 11. संत राजर्षि (पुरुषोत्तमदास टंडन)
मैथलीशरण गुप्त से महादेवी वर्मा की प्रेरणा
वर्मा जी ने गुप्तजी के काव्य को पढ़कर प्राचीन नारी की त्याग, तपस्या और श्रद्धा की भावना को आत्मसात करते हैं | स्वयं वर्माजी लिखते हैं - ''गुप्त जी की रचनाओं से मेरा जितना दीर्घकालीन परिचय है उतना उनसे नहीं। उनका एक चित्र, जिसमें दाढ़ी और पगड़ी साथ उत्पन्न हुई-सी जान पड़ती है, मैंने तब देखा जब मैं काफी समझदार हो गई थी। पर तब भी उनकी दाढ़ी देखकर मुझे अपने मौलवी साहब का स्मरण हो आता था। यदि पहले मैंने वह चित्र देखा होता तो, खड़ी बोली की काव्य-रचना का अंत उर्दू की पढ़ाई के समान होता या नहीं, यह कहना कठिन है।
गुप्त जी के बाह्य दर्शन में ऐसा कुछ नहीं है जो उन्हें असाधारण सिद्ध कर सके। साधारण मझोला कद, साधारण छरहरा गठन, साधारण गहरा गेहुआं या हल्का सांवला रंग, साधारण पगड़ी, अंगरखा, धोती, या उसकी आधुनिक सस्करण, गांधी टोपी, कुरता-धोती और इस व्यापक भारतीयता से सीमित सांप्रदायिकता का गठबंधन-सा करती हुई तुलसी कंठी।"
निराला से महादेवी की प्रेरणा
महादेवी जी ने निराला के जीवन और व्यक्तित्व से सरलता, सादगी, साहस, कष्ट निवारक, सहयोगिता, विश्वास, आत्मीयता, संघर्ष, कर्मठता की भावना को ग्रहण की है, लिखते हैं- "निराला जी अपने शरीर, जीवन, और साहित्य सभी में असाधारण हैं। उनमें विरोधी तत्वों की भी सामंजस्यपूर्ण संधि है। उनका विशाल डीलडौल देखने वाले के हृदय में जो आतंक उत्पन्न कर देता है उसे उनके मुख की सरल आत्मीयता दूर करती चलती है।
उनकी दृष्टि में दर्प और विश्वास की धूपछाँही द्वाभा है। इस दर्प का संबंध किसी हल्की मनोवृत्ति से नहीं और न उसे अहं का सस्ता प्रदर्शन ही कहा जा सकता है। अविराम संघर्ष और निरंतर विरोध का सामना करने से उनमें जो एक आत्मनिष्ठा उत्पन्न हो गई है उसी का परिचय हम उनकी दृप्त दृष्टि में पाते हैं। कभी-कभी यह गर्व व्यक्ति की सीमा पार कर इतना सामान्य हो जाता है कि हम उसे अपना, प्रत्येक साहित्यकार का या साहित्य का मान सकते हैं, इसी से वह दुर्वह कभी नहीं होता। जिस बड़प्पन में हमारा भी कुछ भाग है वह हममें छोटेपन की अनुभूति नहीं उत्पन्न करता और परिणामत: उससे हमारा कभी विरोध नहीं होता।
निराला जी की दृष्टि में संदेह का वह पैनापन नहीं जो दूसरे मनुष्य के व्यक्त परिचय का अविश्वास कर उसके मर्म को वेधना चाहता है। उनका दृष्टिपात उनके सहज विश्वास की वर्णमाला है। वे व्यक्ति के उसी परिचय को सत्य मान कर चलते हैं जिसे वह देना चाहता है और अंत में उस स्थिति तक पहुँच जाते हैं जहाँ वह सत्य के अतिरिक्त कुछ और नहीं देना चाहता।"
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