Saturday, January 22, 2022

सम्प्रेषण की अवधारणा / smpreshn ki avdharna / smpreshn ki महत्त्वपूर्ण abjective question

          सम्प्रेषण की अवधारणा / smpreshn ki avdharna


       मनुष्य सामाजिक प्राणी है | समाज में रहकर परिवेश का निर्माण करता है | परिवेश ही विश्व परिवेश बनती है और परिवेशीय विश्व के साथ लोगों की अन्योन्यक्रिया उन वस्तुपरक संबंधों के दायरे में विकसित होती है जो लोगों के बीच उनके सामाजिक जीवन में और मुख्यत: उनकी उत्पादन सक्रियता यानि जीवन-यापन के दौरान चलते हैं | उत्पादन सक्रियता में लोगों के किसी भी यथार्थ समूह में वस्तुपरक संबंधों, जैसे - निर्भरता, अधीनता, सहकार, परस्पर सहायता,आदि के संबंधों का पैदा होना अनिवार्य हो जाता है | अन्योन्यक्रिया से समाज के सदस्यों के अन्तवैयक्तिक संबंधों व सहकार होते हैं |अन्तवैयक्तिक संबंधों  के अध्ययन  का मुख्य उदेश्य  विभिन्न सामाजिक कारकों और दत्त समूहों के सदस्यों की अन्योन्यक्रिया का गहराई में विश्लेषण करना है | लोगों के वास्तविक इरादों और भावनाओं का अनुमान उनके अन्योन्यक्रिया और उन वस्तुपरकअन्तवैयक्तिक संबंधों के कार्यों से ही लगाया जा सकता है |

                                  किसी भी तरह के उत्पादन के लिये संयुक्त प्रयासों की आवश्यकता होती है | उत्पादन करने के लिये लोगों का एकजुट होना आवश्यक है | फिर भी कोई भी समुदाय तब तक सफल संयुक्त कार्य नहीं कर सकता जब तक इस कार्य में भाग लेनेवाले के बीच संपर्क न हो | जब तक उनके बीच पर्याप्त समझ न हो संयुक्त संक्रियता के लिए आपस में संप्रेषण के संबंध कायम करना आवश्यक है | संप्रेषण को यों परिभाषित किया जा सकता है | जैसे- संप्रेषण लोगों के बीच संपर्क स्थापित व विकसित करने की एक जटिल प्रक्रिया है | जिसकी जड़ें संयुक्त रूप से काम करने की आवश्यकता में होती है |

                     संप्रेषण में संयुक्त संक्रिया में भाग लेनेवाले के बीच जानकारी का आदान-प्रदान शामिल रहता है |अपने परस्पर संपर्क में लोग संप्रेषण के एक प्रमुख साधन के तौर पर भाषा का सहारा लेते हैं | सम्प्रेषण का दूसरा पहलू संयुक्त कार्य कलाप में भाग लेनेवालों को अन्योन्यक्रिया यानी शब्दों ही नहीं अपितु क्रियाओं का भी आदान-प्रदान है | जब आदमी कोई चीज खरीदता है तो वह (ग्राहक) और विक्रेता दोनों आपस में कोई शब्द कहें बिना भी संप्रेषण करते हैं | ग्राहक पैसा देता है और विक्रेता उसे माल थमाता है और यदि कुछ पैसे वापस करते हैं तो उन्हें वापस करता है |

                               संप्रेषण का तीसरा पहलू अन्तवैयत्तिक समझ है | उदाहरण के लिए बहुत कुछ इस प्रकार निर्भर करता है कि संप्रेषण में भाग लेने वाला कोई पछ दुसरे पछ को भरोसेमंद चतुर और जानकार व्यक्ति मानता है या उसके बारे में बुरी राय रखता है तथा उसे भोंदू व बेवकूफ समझता है, इस तरह संप्रेषण की एक ही प्राक्रिया में हम जैसाकि तीन पहलू पाते हैं – 1. संसूचनात्मक यानी जानकारी का विनिमय 2. अन्योन्यक्रियात्मक यानी प्राक्रिया में भाग लेने की संयुक्त संक्रियता और 3. प्रत्यक्षात्मक यानी एक-दुसरे के बारे में धारणा |

  निष्कर्षत: सम्प्रेषण मानव के परिवेशीय अन्योन्यक्रिया है | जो मानवीय समूहों में सम्बन्ध हैं जिसमें  निर्भरता, अधीनता, सहकार,परस्पर सहायता,आदि संक्रिया होती है |संक्रिया इरादे पर निर्भर है | लोगों के वास्तविक इरादों और भावनाओं का अनुमान उनके कार्यों से ही लगाया जा सकता है | उत्पादन संक्रिया पर निर्भर है यानि सम्प्रेषण अन्तवैतिक क्रिया है | यह संक्रिया एक – दुसरे के साथ प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष सम्पन्न होता है |


 महत्त्वपूर्ण abjective question –

(1)        सम्प्रेषण की क्रिया मानव के इन संक्रिया पर निर्भर है – अन्योन्यक्रिया / अन्तवैयतिक |

ans – दोनों

(2)        सम्प्रेषण की क्रिया किस मानवीय क्रिया पर निर्भर है ? – निर्भरता/ अधीनता/ सहकार/परस्पर सहायता  |

ans – सभी

(3)        आपस में कोई शब्द कहें बिना भी संप्रेषण सम्पन्न करते हैं – सही /गलत

ans – सही

(4)        सम्प्रेषण की  संक्रिया एक – दुसरे के साथ प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष सम्पन्न होता है | - सही /गलत

ans – सही

  

      हमारी लेख - सम्प्रेष्ण के भेद व प्रकार













 

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