Thursday, January 20, 2022

भक्तिकाव्य का उदभव व विकास / bhktikavy ka udbhvv vikas / भक्तिकाव्य का वर्गीकरण / bhktikavy ka vrgikrn /सगुण काव्यधारा का वर्गीकरण / sgun kavydhara ka vrgikrn / निर्गुण भक्ति काव्य का वर्गीकरण / nirgun bhkti kavy ka vrgikrn

                             भक्तिकाव्य का उदभव व विकास / bhktikavy ka udbhvv vikas

 

                             आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने भक्तिकाल का समय संवत 1375 से संवत 1700  ( 1318 ई० से 1643 ई० ) तक माना है | इस कालखंड में भक्ति को केन्द्र में रखकर लोक- प्रचलित भाषाओं ( ब्रज व अवधि ) में जिस काव्य की रचना हुई, उसे ही हिन्दी साहित्य में ‘भक्तिकाव्य’ के नाम से जाना जाता है |

                            भक्तिकाव्य का प्रेरणा स्रोत मुख्यत: भागवत धर्म (श्रीमदभागवत) तथा उपनिषद्(श्वेताश्वेतर उपनिषद) है, जिसमें राम और कृष्ण को विष्णु का अवतार मानकर काव्य-रचना की गई है | भक्तिकाव्य यद्यपि दक्षिण भारत में उपजी भक्ति आन्दोलन का परिणाम था, किन्तु उसमें भक्ति की कई धाराएँ सम्मिलित थीं, इसलिए भक्तिकाव्य को मुख्यत: दो भागों में बांटा गया है –

 

                 भक्तिकाव्य का वर्गीकरण / bhktikavy ka vrgikrn

भक्तिकाव्य को मुख्यत: दो भागों में बांटा गया है –

               1 निर्गुण भक्तिकाव्य    2 सगुण भक्ति काव्य


निर्गुण भक्ति काव्य का वर्गीकरण / nirgun bhkti kavy ka vrgikrn

1.    निर्गुण भक्ति काव्य – इस काव्यधारा में नामदेव जैसे संत थे | इसमें निराकार ब्रह्म को आराध्य मान कर उससे सबंधित भक्ति के पद मिले हैं | निर्गुण भक्तिकाव्य को फिर दो शाखाओं में विभक्त किया जा सकता है | निर्गुण भक्तिकाव्य को फिर दो शाखाओं में विभक्त किया जा सकता है –

( क ) ज्ञानाश्रयी शाखा  (ख) प्रेमाश्रयी शाखा

d- ज्ञानाश्रयी शाखा – ज्ञानाश्रयी शाखा बौद्धधर्म से विकसित, वज्रयानी शाखा से अनुप्रेरित, सिद्ध साहित्य की प्रतिक्रिया में नाथ सम्प्रदाय एवं उनके साहित्य का आविभार्व हुआ | नाथपंथ का परवर्ती रूप ज्ञानाश्रयी शाखा या संतमत के साहित्य में अभिव्यक्त हुआ |इतना ही नहीं वैष्णव भक्ति के प्रवर्तक रामानुजाचार्य के शिष्य रामानन्द द्वारा निर्देशित राम के निर्गुण रूप और नामस्मरण का प्रचार भी संतों में हुआ | 12-13 विन शताब्दी के मध्य महाराष्ट्र के महानुभाव सम्प्रदाय और बारबरी-सम्प्रदाय के महाराष्ट्री संतों की मान्यताओं का प्रभाव भी निर्गुण संतों पर पड़ा | इसके अतिरिक्त निर्गुण संतों पर अदैतवाद एवं विशिष्टदैतवाद के सूफी साधना में प्राप्त रहस्यवाद का भी प्रभाव पड़ा |इस प्रकार कालान्तर में ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रतिनिधि भक्तकवि कबीरदास माने जाते हैं | ये परम तत्व ज्ञानी थे | इन्होंने ब्रह्म के स्वरूप व गुण को अपने साखी, रमैनी, शबद में लिखे हैं | काव्यधारा के अन्य कवियों में रैदास, नानकदेव, जम्भनाथ, हरिदास निरंजनी, झींगा, लालदास, दादूदयाल, मलूकदास, बाबालाल, सुन्दरदास आदि हैं | काव्य की भाषा मिश्रित पंचमेली है | अर्थात राजस्थानी, गुजराती, अवधी, ब्रज, खड़ी बोली हिन्दी ,पंजाबी आदि भाषाओं का समिश्रण है | 

[k- प्रेमाश्रयी शाखा – मध्यकालीन इतिहास में एक ओर जहाँ निर्गुण संत सर्वसाधारण जनता के लिए भक्ति का मार्ग प्रशस्त कर एहे थे, वहीं दूसरी ओर सूफी फकीर भी भक्ति को ज्ञानगम्य एवं प्रेमप्राप्य बताकर हिन्दुओं तथा मुसलमानों में सुद्दढ एकता की स्थापना कर रहे थे |निर्गुण संतों ने जनता को जिस तथ्य से परिचित कराने के लिए खंडन-मंडन पद्धति का प्राश्रय लिया, सूफी संतों ने उसी तथ्य का परिचय प्रेममयी भावनाओं से कराया | इन्होंने खंडन-मंडन के स्थान पर समन्वय पर अधिक जोर दिया है | यों तो सूफी मत विदेशी आधारभूमि में पनपा है | सूफी इस्लाम के प्रचार के फलस्वरूप आया है | इस्लाम धर्म में जो मसीहा पर विश्वास नहीं करते थे उन्हें नास्तिक कहा जाता है | नास्तिक मत साइमन नामक व्यक्ति द्वारा प्रवर्तित किया गया, जिनका आंशिक प्रभाव सूफी मत पर विद्यमान है | नास्तिक मत से ही मानी मत विकसित हुआ, जिसने सूफी मत को प्रभावित किया है | मानी मत बुद्ध से प्रभावित है | मसीहा मत के यूनान में पहुँचने पर वह अरस्तु के दर्शन से प्रभावित हुआ | इसके पश्चात प्लेटिनस ने इस पर भारतीय दर्शन की तुलिका फेर दी |इस विकास के बाद मुहम्मद साहब नबी अवतरित हुए | इसके बाद यूनान और भारत के साथ संपर्क बढ़ने पर मसीहा मत भारतीय आधात्मिककता से प्रभावित हुआ | इसके बाद 12 वीं शताव्दी में कादरी-सम्प्रदाय में अब्दुल कादिर, सुहरावर्दी-सम्प्रदाय में बहाउद्दीन जकरिया, नक्शाबर्दी-सम्प्रदाय में अहमद फारुकी तथा चिश्ती-सम्प्रदाय में कुतुबुद्दीन,काकी,फरीदुद्दीन,शकरगज और ख्वाजा मुईनुद्दीन खूब प्रचार प्रसार किया | कालान्तर में इस शाखा के प्रतिनिधि भक्तकवि मलिक मोहम्मद जायसी हैं | इनके मुख्य ग्रन्थ का नाम ‘पद्मावत’ है | अन्य प्रेमाश्रयी शाखा के भक्तकवि कुतुबन (‘मृगावत’1501 ई०) ईश्वर दास (सत्यवती कथा), मुल्ला दाउद (चंदायन,1679 ई०) असाइत (हंसावली,1370 ई०) आदि हैं |


                      सगुण काव्यधारा का वर्गीकरण / sgun kavydhara ka vrgikrn 

2, सगुण भक्तिकाव्य – इस काव्यधारा के प्रवर्तक रामानन्द आदि संत हैं | इनकी भक्तिकाव्य में भगवान के अवतारिक रूप को कृष्ण और राम के रूप में वर्णित किया है | सगुण काव्यधारा दो शाखाओं में विभक्त है | 

सगुण काव्यधारा दो शाखाओं में विभक्त है -

(क) कृष्णाश्रयी शाखा       (ख) रामाश्रयी शाखा

d] कृष्णाश्रयी शाखा –कृष्णभक्ति काव्य उत्तर भारत में क्षीण भाव में थी परन्तु दक्षिण भारत में व्यापक रूप से प्रचार रहा | दक्षिण भारत के आचार्य – रामानुजाचार्य, विष्णुस्वामी, निबकाच्रार्य और माधवाचार्य ने ही शंकराचार्य के मायावाद के खंडन करने के लिए स्थापित किया | वैष्णव भक्ति का उदगम वैदिक वाड् मय स्वीकार किया गया है | इसमें नवधा भक्ति की महत्ता स्वीकार है | ऋग्वेद में नवधा भक्ति का उल्लेख है | ऋग्वेद में इन्द्र को प्रधान्य माना गया है, पर बाद में विष्णु को प्राधान्य मिलने लगा |विष्णु के लिए नारायण का उल्लेख मिलता है, कहीं-कहीं वासुदेव का भी उल्लेख मिलता है |परन्तु कृष्ण भक्ति तथा नवधा भक्ति भावना का संबंध पुराण में वर्णित के आधार पर किया गया है | हरिवंशपुराण, वायुपुराण, भागवतपुराण आदि कृष्ण भक्ति आन्दोलन में सहायक हैं | कुछ विद्वान उपनिषद् से भी इस धारा को प्रभावित पते हैं | कालान्तर में कृष्णाश्रयी काव्यधारा के प्रतिनिधि कवि ‘सूरदास’ हैं | इन्होंने काव्य के नायक श्रीकृष्ण को बनाये हैं, साथ ही कृष्ण के वात्सल्य रूप के मनोहारी वर्णन किये हैं | इन्होंने बल्लभाचार्य के आचार्यत्व से भक्ति के आधार ग्रहण किये हैं, तथा अपने इष्टदेव कृष्ण के श्रृंगारिक रूप वर्णन राधा-बल्लभ सम्प्रदाय से ग्रहण किये हैं |इस शाखा के कवियों में बल्लभ सम्प्रदाय, निम्बार्क-सम्प्रदाय, राधाबल्लभ-सम्प्रदाय, हरिदासी सम्प्रदाय(सखी सम्प्रदाय) चैतन्य (गौडीय)सम्प्रदाय, सम्प्रदाय-निरपेछ कवियों आदि आते हैं |

[k] रामाश्रयी शाखा – वैदिक धर्म के जटिल कर्मकांड के परिणाम स्वरूप एक ही साथ वैष्णवधर्म एवं बौद्धधर्म प्रकाश में आए | बौद्धधर्म जहाँ आत्मशुद्धि के प्रचार में लीन रहा, वहीं वैष्णवधर्म भगवान की भक्ति का आश्रय पाकर विकशित हुआ | इसमें अवतारवाद की परिकल्पना के प्रवेश के कारण राम और कृष्ण के प्रति अवतारभाव का प्रादुर्भाव हुआ | हिन्दी में उपलब्ध रामभक्ति काव्य रामानुजाचार्य के श्री सम्प्रदाय से संबद्ध है आचार्य जी ने शन्कराचार्य के अदैतवाद में निरुपित मायावाद का खंडन किया है | इन्होंने सिद्धांत के रूप में विशिष्टाद्वैतवाद का प्रतिपादन किया | इन्हीं के शिष्य परम्परा में राघवानंद और राघवानंद के बाद रामानन्द हुए | इन्हीं के शिष्यों ने   चौदहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में रामभक्ति चलाया | इन्हीं से दीछित होकर तुलसी आदि ने राम भक्ति का आदर्श को प्रसारित करने लगे | तुलसी राम भक्ति के प्रतिनिधि कवि माने जाते हैं | राम भक्ति को प्ल्ववित करने में श्री-सम्प्रदाय, तत्सुखी-सम्प्रदाय, स्वसुखी सम्प्रदाय के भक्त कवियों का मुख्य योगदान है |

                        निष्कर्षत: भक्तिकाव्य के उदय में बिभिन्न सम्प्रदायों का अमुल्य योगदान रहा है |

अमीर खुसरो के दोहे, मुकरियाँ और गीत /amir khsro ke dohe mukriyan or geet

                                         अमीर खुसरो के दोहे, मुकरियाँ और गीत   1.      एक नार किया -----------------------------------...