* बिहारी की जीवन और कवित्त्व परिचय *
बिहारी रीतिकाल के रीतिसिद्ध
धारा के प्रतिनिधि कवि माने जाते हैं | इनका
जन्म 1595
ई० में ग्वालियर मध्यप्रदेश में हुआ था | इनके पिता का नाम केशवराय था | राजा जयसिहं तथा शाहजहाँ के दरबारी कवि रहे | इनकी मृत्यु 1663 ई० में हुई | बिहारी रीतिकाल के रीतिसिद्ध काव्य धारा के कवि
हुए | बिहारी की एक मात्र रचना बिहारी सतसई है | इसमें दोहों की संख्या 713 है | इस
ग्रन्थ में भक्ति, नीति
और श्रृंगार की त्रिवेणी धारा बहती है | इस रचना की भाषा ब्रजभाषा है | ‘बिहारी सतसई’ का रचना वर्ष 1662 ई० है |
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काव्य की व्याख्या
मेरी भव बाधा हरो, राधा नगरी सोय | जा
तन की झाई परे, स्याम हरित दुति होय ||
परिचय – प्रस्तुत काव्य पंक्तियाँ रीतिकाल के
रीतिसिद्ध काव्यधारा के प्रतिनिधि कवि बिहारीलाल द्वारा रचित है | इस काव्य में कवि अपने आराध्य राधा के प्रति
श्रृंगारिकपूर्ण भक्ति याचना की है |
प्रसंग – कविता रीतिकालीन राजदरबारों में रह कर रची
गई है | कवियों का मुख्य उदेश्य दरबार में रहकर मान
सम्मान के साथ धनोंपार्जन था | अत: कवि द्वारा यहाँ राजा और दरबारियों को मन-भाने के उदेश्य से राधा का श्रृंगारिकता से
युक्त काव्य रचे हैं |
व्याख्या – राधा की वन्दना करते समय बिहारीलाल ने यह
दोहा कहा है | यह उनकी रचना ‘बिहारी सतसई’ का पहला दोहा है | उन्होंने राधा से प्रार्थना करते हुए यह कहा
है कि हे चतुर नगरी राधा, तुम मेरी सांसारिक बाधाओं का हरण कर लो | सांसारिक बाधाओं से बिहारी का तात्पर्य
दैहिक, दैविक और भौतिक तीनों तापों से है | उन्होंने इन्हीं तीनों तापों को हरण करने के
लिए कहा है | पुन: उन्होंने कहा है कि तुम्हारी कृपा से मन की
समस्त कालिमा मिट जाती है | ‘स्याम हरित दुति होय’ का दूसरा अर्थ यह है कि तुम्हारी एक झलक से
कृष्ण भी प्रसन्न हो उठते हैं | इसी तरह बिहारीलाल ने इन पंक्तियों में अपने
रंगमिश्रण-ज्ञान का भी परिचय दिया है | उनका कहना है कि राधा पीतवर्ण है और कृष्ण
श्यामले, इन दोनों रंगों को मिलाने पर हरा रंग बन जाता
है | अर्थात् राधा और कृष्ण के संयोग सम्पूर्ण
सृष्टि, जो हरी-भरी है, का निर्माण होता है |
काव्यगत
विशेषता – १. यहाँ भक्तिभावना की झलक है | २. रूपक, अनुप्रास आदि अलंकार, व्यंजना शब्द शक्ति, प्रसाद व् माधुर्य गुण विद्यमान है | |
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बिहारी के काव्य में भक्ति, नीति, और श्रृंगार की सारी विशेषता मौजूद है | जो निम्न प्रकार है –
(1)
भक्तिभावना – बिहारी की भक्तिभावना किसी पंथ की स्थापना
या सम्प्रदायवाद से जुड़ी नहीं है | इसकी भक्ति में राधा और कृष्ण की सौन्दर्य मूलक भाव है | इन्होंने राधा के प्रति भक्ति की है – मेरी भव बाधा हरौ राधा नागरी सोय | जा तन की झाई परे स्याम हरित दुति होय ||
अर्थात् यहाँ बिहारी ने राधा के भक्ति में
लीन होकर सांसारिक बाधाओं को दूर करने की निवेदन करती है | इसी प्रकार महाकवि बिहारी कृष्ण के प्रति भी
भक्तिभावना की है,
बिहारी अपने आराध्य के सौन्दर्य के प्रति
भक्तिभावना की है –
मोर मुकुट कटी कछनी कर मुरली उरमाल | यह बनिक मो मन बसौ सदा बिहारीलाल ||
अर्थात्
बिहारी यहाँ अपने आराध्य कृष्ण के सौन्दर्य में बसना चाहा है, जिसके माथे पर मोर मुकुट हो, कमर में कछनी, हाथ में मुरली और गले में वैजयंती की माला हो
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इन्होंने अपने भक्ति भावना की व्यापकता पर
तर्क दिये है –
जगत जनायो जेहि सकलु सोहरि जान्यो नाहीं || ज्यो आँखिन सब देखिए,आँखिन देखि जाहि ||
अर्थात् ईश्वर क्यों नही दिखाई देता यानि
भगवान स्वयं दृष्टि से परे है, वह सभी में विधमान होकर भी अलख है | फिर भी इनकी सता को झुठलाया नही जा सकता | जिस तरह आँख सबको देखती लेकिन स्वयं को देख
नही सकती है |
(2) नीति निपुणता – नीति भावना भक्ति भावना के साथ चलती है | अत: बिहारी की भक्ति में भी नीति-निपुणता की झलक मिलती है | यथा –
कनक
कनक ते सौ गुणी मादकता अधिकाय | वा
खाये बौरात नर या पाये बौराय ||
यहाँ धन-दौलत के वैभव के प्रभाव को व्यक्त करते हुए
कहा है – धन का नशा धतूरे के नशे से कही ऊपर है
क्योंकि धतूरे को खाने से नशा चढ़ता है, लेकिन धन की प्राप्ति से मादकता आती है | (3) श्रृंगार – बिहारीलाल के दोहे में मुलत: श्रृंगार के लिए ही अधिक चर्चित है | श्रृंगार का स्थायी भाव रति है इसमें नायक और
नायिका का प्रेम वर्णन किया जाता है | जिसके अन्तर्गत सौन्दर्य मिलन और विरह की
चर्चा की जाती है -
अंग
अंग नग जगमगत दीप शिखा –सी देह |
दिए बढाए हू रह्यो, बड़ो उजोरो गेह ||
इस प्रकार कवि यहाँ नायिका के सौन्दर्य चित्रण
में सिद्धहस्त का प्रयोग किया है | आगे कवि सौन्दर्य वर्णन में नायक-नायिका की मनोवृतियों और काम-चेष्टाओं का चित्रण किया है –
बतरस लालच लाल की मुरलीधरी लुकाय |
सौह
करै मोहनी हँसे, देन कहे नटी जाय ||
यहाँ कवि द्वारा नायिका के बात
करने की लालच को दिखाया है | नायिका मुरली चुरा लेती है फिर बतरस की आनन्द
लेने लगती है |
बिहारीलाल वियोग वर्णन में
सिद्धहस्त है जैसे कवि लिखते हैं -
औंधाई सीसी सुलखी, विरह वरनी विलगात | बीचहिं सुखी गुलाब गौ छीटो छुओ न गात || आड़े दै आली वसन जाड़े हुँ
की रात | साहस
के नेह बस सखी सके ढिग जाति ||
यहाँ कवि कहते हैं कि विरह की स्थिति में
नायिका का शरीर चिमनियों की तरह जल रही है, जब ऊपर में गुलाब का जल पड़ता है तो भाप बनकर
उड़ जाता है | कवि कहते है उनकी सखियाँ विरह की विदग्ध से
बचने के लिए मिलन के समय बीच में भींगा वस्त्र खड़ा करती है |
इस प्रकार बिहारी के काव्यों में भक्ति, रीति और श्रृगार की त्रिवेणी दिखाई पड़ती है |
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* बिहारी की काव्य ‘गागर में सागर’ है | सिद्ध करें ?*
हिंदी साहित्य के उत्तरमध्यकाल को ‘कलाकाल’ के नाम से जाना जाता है | इसकी सार्थकता बिहारीलाल के अभिव्यक्ति कौशल
से परिलक्षित होती है |
बिहारीलाल ने गागर में सागर भर दिया है | ऐसा इस लिए कहा गया है क्योंकि उनका काव्यरूप
मुक्तक है | इन्होंने अपनी अभिव्यक्ति के लिए दोहे को माध्यम बनाया | इसी मुक्तक के माध्यम से इन्होंने विविध भाव–भंगिमा और उन भंगिमा के लिए अलग–अलग गतिशीलता भरी चित्रों का समायोजन किया है
–
कहत नटत रीझत खिझत,मिलत खिलत लजियात| भरै मौन में करत है,नैननु ही सौ बात ||
इस
दोहे के प्रथम पंक्ति में जितने शब्द आये है उन सभी शब्दों में नायिका की
एक एक भंगिमा है |
खास विशेषता है कि एक ही दोहे में नायक और
नायिका के संकेत संवाद को मूर्तरूप दे दिया
गया है | नायक अपनी आँखो के संकेत से कुछ कहता है | इस पर नायक और भी मुग्ध हो उठता है जिसे लखकर
नायिका अपने हाव – भाव
से खीझ दिखलाती है |
इस तरह के हाव –भाव से दोनों में प्रफुल्लता जागती है और तब
आनन्दित होकर भी नायिका लजा जाती है | इस तरह नायक और नायिका स्वजनों से भरे भवन में
अपनी आँखों से सारी बातें कर लेते है | इस प्रकार बिहारी के इस दोहे में अनेक भावों
की अभिव्यक्ति हुई है |
इस प्रकार बिहारी के अन्य दोहे भी दिखिए जिसमे
भाव –भंगिमा के गतिशील चित्रों है |
नासा मोरि नचाइ दृग करि कका की सौंह | काँटे –सी कसकति हिये, गड़ी कंटीली भौह ||
यहाँ नायिका के प्रेम–निवेदन पर नायिका ने अपनी नाक चढ़ाकर और आँखे
नचाकर काका की कसम खाई अर्थात् उसने नकारात्मक उत्तर दिया | इसकी
इस भंगिमा पर नायक प्रेम विह्वल हो गया और उसके ह्रदय में नायिका की कंटीली
अर्थात् टेढ़ी भौहें करती रही | ऐसा लगता है मानो अवसर पाकर नायक ने छेड़खानी
की होगी | इस पर नायिका ‘काका की कसम’ यह भला नहीं लगता कही होगी | उस समय की सुख-मुद्रा और भाव-भंगिमा नायक से भुलाये नहीं भूलता है |
इस प्रकार बिहारी के दोहों द्वारा भाव
सौन्दर्य गड़ने की और उदाहरण देखिए –
मेरी
भव बाधा हरौ, राधा नागरी सोय |
जा
तन की झाई परे, स्याम हरित दुति होय ||
यहाँ कवि ने भक्ति और नीति के
वर्णन करने के वक्त भी उचित अभिव्यक्ति दी है | यह काव्य ‘गागर में सागर’ की कहावत को सार्थक सिद्ध करती है | आलोचकों ने इस दोहों के विभिन्न भावों को
प्रकट किये हैं | खासकर दूसरी पंक्ति का, इस पंक्ति में राधा और कृष्ण का प्रेम भी
व्यंजित हैं | राधा की झलक कृष्ण पाकर प्रसन्न हो जाते हैं | कवि ने उसी राधा से भव-बाधा दूर करने की बात कही है | पुन: रंग मिश्रण पर बिहारी के ज्ञान क्षमता को
देखा जा सकता है कि स्वर्ण-पीत को काले रंग के साथ मिला देने पर रंग हरा
हो जाता है अर्थात् राधा की पित वर्ण और
कृष्ण के श्यामल रंग के मेल से या राधा और कृष्ण की कृपा से साधक का जीवन हरा –भरा हो जाता है |
इस प्रकार बिहारी के काव्य में व्यापक भावों, विचारों, चित्रों अपने छोटे से कलेवर में समटने के लिए
प्रसिद्ध है |
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