विद्यापति भक्त या श्रृंगारिक कवि
मैथिल कोकिल विद्यापति जी जयदेव के
उत्तराधिकारी कवि माने जाते हैं | इनके काव्य में बिषय की वैविध्य है, क्योंकि
इन्होंने एक तरफ राजभक्ति तो दूसरी तरफ देव भक्ति दिखाई है और इन दोनों तटों के बीच
में श्रृंगार की सरस धारा को प्रवाहित किया है | इसलिए हमेशा विवाद बना रहता है कि
विद्यापति श्रृंगारिक हैं या भक्त कवि |
काव्य की विषय व
कला पछ की दृष्टिपात से विद्यापति को मुलत: भक्त एवं श्रृंगारिक दोनों कवि माना जा
सकता है | क्योंकि महाकवि ने भक्ति के लिये यौवन के सौन्दर्य को उकरने में ही
सर्वाधिक काव्य रचे हैं |
विद्यापति बहुदेवोपासक
भक्त कवि हैं | इन्होंने कृष्ण, राधा, शिव, दुर्गा और गंगा सहित ग्राम-देवी
देवताओं के प्रति भक्ति आराधना करके लोक के लिये ग्राह्य बनाया है |
विद्यापति की भक्ति
संध्याबेला यानि वृद्धावस्था की भक्ति है | हिन्दी के आलोचक रामचन्द्र भी स्वीकार
करते हैं कि सूर की राधा की वियोग बैठे ठाले का वियोग है उसी प्रकार विद्यापति की
राधा की वियोग थके हारे की भक्ति है | स्वयं विद्यापति भी स्वीकार किये हैं –
माधव हम परिणाम निरासा
|
तुहूँ जगतारण दीन
दयामय अतए तोहर विसवासा ||
आध जनम हम नींद गमाओल
जरा-शिशु कत दिन गेला |
निघुवने रमणी रस-रंग
मातल तोहे भजब कौन बेला ||
इस प्रकार सचमुच
में कवि भक्ति के माध्यम से श्रृंगारिकता की स्थापना कर रहे थे | ‘निघुवने रमणी
रस-रंग मातल’ से स्पष्ट होता है कि विद्यापति काव्यों में रस तत्त्व की प्रतिष्ठा
कर रहे हैं |
इन्होंने बुढ़ापे में
अनुभव किया –
तातल सैकत वारि-विन्दु-सम सुत-मित-रमनि समाजे |
तोहे बिसरि मन ताहिं समर्पिलूं अब मझु
होत कोन काजे ||
इन पंक्ति के
आधार पर बहुत से आलोचकों ने इन्हें भक्त कवि के श्रृंखला में रखा है |
कहा जाता है कि इनकी
भक्तिभावना से संतुष्ट होकर स्वयं भगवान शंकर भी इनके घर में ‘उगना’ के नाम से
चाकरी किया करते थे | परन्तु रामचन्द्र शुक्ल इनके बारे कहते है कि – “ विद्यापति
ने पदों की रचना श्रृंगारिक काव्य की दृष्टि से की है, भक्ति के रूप में नहीं
|.............आध्यात्मिक रंग के चश्मे आजकल बहुत सस्ते हो गये हैं, उन्हें चढ़ाकर
जैसे कुछ लोगों ने ‘गीत गोविन्द’ के पदों को आध्यात्मिक संकेत बतलाया है, वैसे ही
विद्यापति के पदों को भी |”
आचार्य शुक्ल के कथन
सत्य है क्योंकि पदावली में राधा व कृष्ण के यौवन सौन्दर्य को तन्मयता, रमणीयता के
साथ समर्पित भाव से उन्मुक्तता पूर्वक गाये हैं |इन्होंने कभी भी कृष्ण और राधा को
मर्यादित रूप में नहीं रखे | नख-शिख वर्णन में तो राधा को सामान्य नायिका बना दिया
है | राधा के युवावस्था को अमरवेली कहा है | जिसके फल युगल ऊरोज और विद्यापति इन
फल की प्राप्ति के लिये आँखों के जल से सींचकर आशा की लता को हमेशा बढ़ाये रखते हैं
|
आसक लता लगाओल
सजनी
नयनक
नीर पटाय |
से फल अब तरुनत
भेल सजनी
आँचर तर न
समाय ||
अब माना कि विद्यापति शैव
भक्त कवि हैं, पर शिव के लिये कहीं भी मर्यादित रूप की स्थापना नहीं की है | शिवजी
को नायिका के उरोजों को उपमान के रूप में स्थापित किये हैं | कहते हैं कि नायिका
के ऊरोज यानी स्तन शिव के सामान हैं | गले की मोतियों की माला गंगाधार के सामान
हैं, जो शिव को जल चढ़ाती हैं | इतना ही नहीं ऊरोज या स्तन के ऊपरी काले भाग को
शिवजी के भस्म से उपमित किये हैं | -
गिरिवर गरुअ पयोधर परमित
गीय गज मौलिक हारा
|
काम कम्बु भरि कनक शम्भु परि
ढारत सुरसरि धारा
||
.......................................
चन्दन चरचु पयोधर रे
ग्रिम गज मुक्ताहार |
भष्म भरल जनु संकर रे
सुरसरि जलधार ||
विद्यापति को गंगा भक्त कवि भी
माना जाता है पर गंगा से भी मर्यादा का ख्याल नहीं रखा है | क्योंकि गंगा भक्ति के
सामने भी काम-वासना ही सक्रिय हुआ है | जैसे की गंगा को नायिका के मुक्ता माला से
उपमित किया गया है जो कामदेव के घोड़े रूपी लाल-लाल स्तनों पर जल चढ़ा रही है |
विद्यापति पार्वती भक्त भी हैं
परन्तु पार्वती के मर्यादा का ख्याल नहीं रखे हैं, और इनके सामने ही नाचरियों की
उल्लेख करते हैं |विद्यापति राजा शिवसिंह तथा रानी लखिमा देवी के दरबारी कवि हैं |
इन्हें दरबारों में सुखों से समय बिता रहे
थे अत: राजदरबारी संस्कृति के अनुरूप काम, नाम, और आराम के सारे सुख प्राप्त थे |
इसलिए राजा शिवसिंह और रानी लखिमा देवी के की संतुष्टि हेतु नायिका के वय:संधि के
चित्रण में भी मर्यादा को भूल गये हैं और लिखे हैं –
निरजने उरज हेरई कत
बेरि |
हंसइ से अपन पयोधर हेरि
||
पहिल बदरी सम पुन
नवरंग |
दिन-दिन अनंग अगोरल अंग
||
वय:संधि के वर्णन में
नायिका की चपलता और मुस्कान को हमेशा नव-उरोजों के सामने ही उपस्थित किये हैं तथा
काम को भूल नहीं पाये हैं | -
चउँकि चलए खने, खने चलु
मन्द |
मनमय पाठ पहिल
अनुबन्ध ||
हिरदय- मुकुट हेरि – हेरि थोर |
खने आँचर
दए खने भोर ||
महाकवि श्रृंगार वर्णन में
यौवन के वसंत में हमेशा डेरा जमाये हुये हैं |इसलिये सद्यःस्नाता नायिका के
अमर्यादित रूप की चित्र खींचे हैं | कहते हैं कि नायिका के ऊरोज चकवा पछी के समान
हैं और नायिका इसी डर से अपने भुजपास में बांध रखे हैं कि कहीं उड़ न जाय |
कुचयुग चारू चकेवा |
निजकुल मिलत आनि कने
देवा ||
ते शंकाए भुजपाशे |
बांधि धएल उड़ी जाएत
अकासे ||
इतना ही नहीं
विद्यापति ने सुहागारात के अनुभवों को अपने काव्य में बिषय बनाया है | और कहते हैं
– ‘तिल एक कठिन पहिल अपराधे |’
इस प्रकार विद्यापति के
भक्तिभावना में श्रृंगारिकता के भाव ही अत्याधिक प्रधान रूप में आ गये हैं | इनकी
श्रृंगारिकता के सामने भक्तिभावना सहमी-सहमी सी दिखाई पड़ती है अत: विद्यापति
बहुदेवपासक श्रंगारिक भक्त कवि हैं |