Sunday, June 5, 2022

संत काव्य परम्परा और कवि / snt kavy prmpra or kvi

                                                 संत काव्य परम्परा

                                                                               


                                 संत काव्य बौद्ध धर्म से विकसित है |बौद्ध धर्म के व्रजयान शाखा से अनुप्रेरित है | आदिकालीन साहित्य सिद्ध-साहित्य की प्रतिक्रिया में नाथ-सम्प्रदाय एवं उनके साहित्य का आविभार्व हुआ | इसी नाथ पन्थ का परवर्ती रूप ज्ञानश्रयी शाखा या संत काव्य में अभिव्यक्त हुआ | इतना ही नहीं वैष्णव धर्म के प्रवर्तक रामानुजाचार्य के शिष्य रामानन्द द्वारा निर्देशित राम के निर्गुण रूप और नाम  स्मरण का प्रचार भी संतों में हुआ | 12-13 वी० शताब्दी के मध्य महाराष्ट्र के महानुभाव-सम्प्रदाय और बरबरी-सम्प्रदाय के महाराष्ट्री संतों की मान्यताओं का प्रभाव भी निर्गुण संत पर पड़ा | इसके अतिरिक्त निर्गुण संतों पर अद्वैतवाद एवं विशिष्टादैतवाद के साथ सूफी साधना में प्राप्त रहस्यवाद का भी प्रभाव पड़ा |

                       इस प्रकार संत काव्य में विभिन्न सम्प्रदाय के प्रभावों को ग्रहण करते हुये रामानन्द से परवर्ती निर्गुण संतों तक प्रवाहित होती रही है | आचार्य नगेन्द्र ने निम्न प्रकार से संत काव्य परम्परा को उपस्थित किये हैं -

(1)  रामानन्द – रामानन्द अपने गुरु के सबसे योग्य शिष्य थे |नाभादास के भक्तमाल के अनुसार – ये रामानुजाचार्य के शिष्य परम्परा के चतुर्थ शिष्य थे | इन्हीं के शिष्यों में कबीर, पीपा, घन्न आदि भी हैं | इनका आविभार्व चौदवीं शताब्दी को माना जाता है | इनके गुरु राघवानन्द की रचना सिद्धांतपंचमात्रा’ बताया गया है | इनकी साधना पद्धति में नाम-स्मरण का बहुत अधिक महत्त्व है |नाभादास के भक्ति में दशधा भक्ति के आगार रामानन्द ही हैं | अपने गुरु से दीक्षित होकर इन्होंने रामावत संप्रदाय का प्रवर्तन किया | इसके बाद 16 वी० शताब्दी में इस सम्प्रदाय का सम्पर्क ‘श्री-सम्प्रदाय’ से होने के कारण अपने मत को मंडन करते हुये एकामय हो गया और सम्प्रदाय का मूल मंत्र – ‘सीता राम’ हो गया |इस प्रकार ‘श्री-सम्प्रदाय’ के आराध्य नारायण तथा रामावत के राम अब आराध्य हो गये |

(2)  कबीरदास – रामानन्द के शिष्य परम्परा में प्रसिद्ध हैं | ये महान विचारक एवं प्रतिभाशाली महाकवि हैं | इन्होंने नाना पुराणादि की शात्रीय मान्यताओं का निषेधकर स्वानु भूति भक्ति पर बल दिया, निर्गुण-सगुण से प्रे ब्रह्म की योग भक्तिमयी उपासना का दर्शन प्रस्तुत किया | कबीर ने अद्वेत,बिशिष्टाद्वैत, नाथ, सूफी संतों को ब्रह्म, जीव, माया और साधना सम्बन्धी धारणाओं का समन्वय करते हुये उसे सभी वर्गों और जनसाधारण के लिये सुलभ किया |

(3)  नानक – सिक्ख धर्म का प्रवर्तक नानक देव को जाता है | नानक के काव्य में कबीर के समान ही गुरु-महिमा, जाती-पांति का विरोध, एकेश्वरवाद, सत्य अहिंसा और स्वानुभूति पर विशेष बल दिया गया है | असादीवार रहिरास सोहिला आदि इनके रचनाये हैं | ‘जंपुजी’ में नानक दर्शन के सारतत्व विद्यमान है | इनकी सभी रचनाये गुरु ग्रन्थ साहिब में संकलित है |

(4)  दादू – दादू के आदर्श कबीर हैं | इन्होंने ददुप्न्थ के प्रवर्तन किये | इनका वास्तविक नाम दादूदयाल है | इनका जन्म 1544 ई० में अहमदाबाद (गुजरात) में हुआ | इन्होंने निर्गुण भक्त होने पर भी सगुण भक्ति को भी महत्व दिया है | ‘हरदेवाणी’ इनकी रचना है | रज्जन और सुन्दरदास इनके ही शिष्य हैं | 1603 ई० में दादूदयाल की मृत्यु हुई |

5.    रैदास – रैदास को संतों में सम्मानित स्थान प्राप्त है | इनका जन्म काशी में हुआ है | कबीर में ओज,अकड़ता और प्रखरता थी तो रैदास में शांति, संयम और विनम्रता विद्यमान है |जैसे -

                  अब कैसे छूटे राम, नाम रट लागी |

                 प्रभु जी तुम चन्दन हम पानी, जाकी अंग अंग बास समानी |

                प्रभु जी तुम घन बन हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा ||                                                                                                                                                                                                           

                       रैदास का प्रभाव रमिला में अधिक है | कहा जाता है कि मेवाड़ की सालायनी इनकी शिष्या थीं, मीराबाई भी इन्हें गुरु रूप में स्वीकार किया है | इनकी काव्य भाषा ब्रज है | भाषा में अवधी, राजस्थानी, खड़ी-बोली और उर्दू-फारसी का समिश्रण है |

6.    जम्भनाथ – संत जम्भनाथ का जन्म 1541 ई० में जोधपुर राज्य के नागौर प्रदेश के पीपासर ग्राम में राजपूत परिवार में हुआ |जनश्रुति है कि चौंतीस वर्ष की अवस्था तक इन्होंने एक भी शब्द उच्चरित नहीं किये थे | इनके चमत्कारिक प्रदर्शन के कारण लोगों ने जम्भ नाथ कहना प्रारंभ किया | सिद्धि प्राप्त हो जाने के बाद अनंतर में ये मुनीन्द्र जम्भ ऋषि के नाम ससे विख्यात हुये | किवंदती है कि ये आजीवन ब्रह्मचारी रहे | इन्होंने बाबा गोरखनाथ से दीक्षा प्राप्त की थी | अपने आदर्श और मत के प्रचारार्थ ‘विश्नुई सम्प्रदाय’ की स्थापना की | इनके चार प्रमुख शिष्य हुये जिसमें – हावली पावजी, लोहा पागल, दन्तनाथ तथा मालदेव है | इनकी रचनाओं में देहभेद तथा योगाभ्यास जैसे विषय मिलते हैं | इनकी रचनाओं में ओंकार जप, निरंजन की उपासना, अजपा जप, गगन मण्डल, पंचपुरुष, सतगुरु महिमा, सोहमं जप , जरा-मरण से मुक्ति, अनन्य भक्ति आदि का बारम्बार उल्लेख है |

                          गगन हमरा बाजा बाजे, मतर फल हाथी |

                          संसै का बल गुरुमुख तोड़ा, पांच पुरुष मेरे साथी ||

                          जुगति हमारी छत्र सिंहासन, महासक्ति में बांसे |

                          जंभनाथ वह पुरुष विलच्छ्न, जिन मंदिर रचा अकासे ||

                                         प्रसिद्धि है कि 1523 ई० के लगभग बीकानेर के तालाब में समाधि लेकर अपनी जीवन लीला समाप्त की | इसकी समाधि स्थल को ‘सम्भरास्थल” के नाम से जाना जाता है कुछ शिष्य इस घटना को 1536 ई० में तालासर गाँव के निकट होना बतलाते हैं | 

7.    हरिदास निरंजनी – संत हरिदास निरंजनी सम्प्रदाय के कवि थे | जिनका मूल स्रोत नाथ-पंथ है | यह प्राचीन धर्म सम्प्रदाय है , कहा जाता है कि उड़ीसा में इनका प्रभाव अभी भी है | इसे आचार्य क्षितिज मोहन सेन ने अपनी ग्रन्थ मेडिवियल मिस्टिसिज्म में स्वीकार किया है | दादू पंथी राधोदास ने ‘भक्तमाल’ में लिखा है स्वामी निरंजन की जीवन शैली एवं सिद्धांतों को ‘जगन’ ने प्रवर्तन किया | राधोदास के अनुसार हरिदास डीडवाणा निवासी थे | पुरोहित हरिनारायण ने लिखा है – हरिदास पहले प्रागदास के शिष्य हुये, फिर दादू के, फिर कबीर पंथ और गोरख पंथ में दीक्षित हुये |

                                       इनके प्रमुख शिष्य में –नारायण दास, हरिदास, रूपदास, सीतलदास, गंगदास आदि हैं |इस सम्प्रदाय का मठ डीडवाणा में है | हरिदास की रचनाये हैं – अष्टपदी जोग ग्रन्थ, ब्रह्मस्तुति, हंस प्रबोध ग्रन्थ, निरपख मूल ग्रन्थ, पुजाजोग ग्रन्थ, समाधिजोग ग्रन्थ, संग्रामजोग ग्रन्थ आदि हैं |इन्होंने लिखा है – “गुणग्राही गोबिंद गुण गावा, भजी भजि राम परमपद पावा |”

                              हरिदास जी निर्गुण ब्रह्म के अलौकिकत्त्व पर अधिक बल दिया है | इनके अनुसार ब्रह्म कृपा से ही साधक को आनन्द की प्राप्ति होती है माया और लौकिक बन्धनों के प्रति अरुचि है, मोक्ष-लाभ भी है | इनकी काव्य भाषा ब्रज है, जिसमें अतीन्द्रिय अनुभूति है |

8.     झींगा – संत झींगा (1519 – 1659) का जन्म मध्य भारत की रियासत बडवानी के खजूर गाँव में एक ग्वाल परिवार में हुआ था | वाल्यवस्था से ही संसार से विरक्त रहा करते थे | एक बार हरसूद से भामगढ़ मार्ग पर जा रहे थे, मार्ग में महाराजब्रह्मगिर के शिष्य मनरंगीर भजन गा रहे थे, इस पंक्ति के नि:सारता को झींगा अपने ह्रदय में अंकित कर लिया | इसके बाद मनरंगीर को अपना पथ-प्रदर्शक स्वीकार किया | झींगा के अनुसार परमसत्य की खोज मन्दिर, मस्जिद और तीर्थ में जाने की आवश्यकता नहीं, गंगा, यमुना आदि में स्नान से नहीं वरन् ह्रदय में विद्यमान है | जैसे –

                     जल विच कमल, कमल विच कलियाँ, जहं  वासुदेव अविनाशी |

                     घर में गंगा, घर में जमुना, नहीं द्वारिका कासी ||

                     घर वस्तु बाहर क्यों ढूंढे, बन बन फिरा उदासी |

                     कहूँ जन सिंगा, सुनो भाई साधो, अमरपुर के वासी ||

                                      इनकी ब्रह्म सम्बन्धी मान्यता कबीर से साम्य करती है | इनकी काव्य भाषा ‘निमाडी’ है | इन्हें ग्यारह रचनाये किये हैं | जैसे- झींगा का दृढ उपदेश, झींगाजी का आत्माध्ययन, झिंगाजी का दोष-बोध, झींगाजी का शरद, झींगाजी की वाणी, झींगाजी का सातवार, झिंगाजी का पन्द्रह तिथि, झींगा जी की बारहमासी तथा झिंगाजी के भंजन |

8.    लाल दास – लालपंथ का प्रवर्तक संत लालदास (1540-1648) हैं | इनका आविर्भाव अलवर राज्य के ग्राम धौलीपुर में एक मुसलमान परिवार में हुआ | वैसा परिवार जिसमें खाने-पीने और विद्याध्ययन का प्रबन्ध न था | लालदास को भागवतभक्ति का अंकुल वाल्यावस्था से ही मिली थी | ये साधुओं की संतसग और नामजप में संलगन रहते थे |संत लालदास सिद्ध पुरुष हैं | इनके उपदेश ‘लालदास की चेतावनी’ में संकलित है | उपदेश कबीर से प्रभावित हैं –

           लालजी भगत भीख न  मांगिये, मांगत आये शरम |

           घर घर टांडत दु:ख है, क्या बादशाह, क्या हरम ||

          लालजी साधु ऐसा चाहिए, धन कमाकर खाय |

          हिरदे हर की चाकरी, पर घर कमुं न जाय ||

                            इसके पंथ में राम ही सर्वश्रेष्ठ शक्ति,आराध्य, ब्रह्म है |

10    मलूकदास – इनका आविभार्व (1574 -1682) को औरंगजेब के राज्यकाल में हुआ था | पिता का नाम सुन्दरदास खत्री है | दीक्षा गुरु देवनाथ के पुत्र पुरुषोत्तम हैं | इनके पमुख रचनाये हैं – ज्ञानबोध, रत्नखान, भक्तवच्छावली, भक्तिविवेक, ज्ञानपरोक्षी, बारहखड़ी, रामावतारलीला, ब्रजलीला, धुर्वचरित, विभवविभूति, सुखसागर, शब्द और स्फुट पद आदि हैं |

                                    ज्ञानबोध, ज्ञानपरोक्षी, विभवविभूति तथा रतनखान में योग,ज्ञान, निर्गुणभक्ति, वैराग्य भक्ति आदि बिषयों पर प्रकाश डाला गया है | भक्ति विवेक तथा सुखसागर में दार्शनिक बिचार अभिहित किया गया है | इनके अनुसार ब्रह्म निर्गुण और गुणातीत हैं | वह समस्त सृष्टि का पालक और संहारक है | ये भेदभाव आदि भावनाओं से परे हैं | ये संसार के अणु-अणु में विद्यमान हैं  जैसे-

                          कहत मलूक जो बिन सिर खेवै, सो यह रूप बखानै |

                          या नैया के अजब कथा, कोई बिरला केवट जानै ||   मलूकदास ब्रज तथा अवधि भाषा में रचना की है |इनकी काव्य में संस्कृत, फारसी के शब्द भी मिले-जुले हैं |

11.   बाबालाल – बाबालाल के चार साधकों का आविभार्व पंजाब प्रान्त में हुआ था| इनमें से एक पिण्ड-दादान के निवासी दुसरे पशिचमी प्रान्त के मेरा या तेरा नगर के निवासी तीसरे बाबालाल का मठ गुरुदासपुर में चौथे बाबालाल शहजादा द्वारा शिकोह के सम्पर्क में आये थे | आचार्य क्षितिज मोहन के अनुसार बाबालाल का आविभार्व 1590 ई में मालवा प्रदेश के एक खत्री परिवार में हुआ था | साम्प्रदायिक भक्तों के अनुसार इनका जन्म 1355 ई० में पंजाब के कसूर या कुशपुर गाँव में और देहावसान 1455 ई० में हुआ | पिता का नाम भोलानाथ तथा माता का नाम कृष्णादेवी है | बाबालाल आठ वर्ष की उम्र में ही धर्मों ग्रन्थों का अध्ययन कर लिया था | इस अवस्था में इनकी वैराग्य भी पैदा हुई थीं | इन्होंने चैतन्य स्वामी से दीक्षा ग्रहण की, इनके बारह शिष्य हुये | इन्होंने शिष्यों के साथ पंजाब काबुल, पेशावर, गजनी, कंधार, दिल्ली, सुरत, आदि में आज भी इनके शिष्य पाये जाते हैं | बडौदा में एक मठ है जिससे ‘बाबालाल का शैल’ कहते हैं | इस सम्प्रदाय का प्रमुख स्थान गुरुदास पुर का श्रीध्यानपुर गाँव है | बाबालाल तथा दारा का वार्तालाप ‘असरारे-मार्फत’ में संगृहित है | ‘नादिरून्निकात’ में भी इनके बिचारों का संग्रह है | इनकी विचारधारा में वेदांत तथा सूफी मत का प्रभाव है | जैसे-

                              आशा विषय विकार की, बध्या जा संसार |

                            लख चौरासी फेर में, भरमत बारंबार ||

                                          इनका मत है कि ब्रह्म एक अपूर्व आनन्द सागर है | जिसका प्रत्येक जीव एक विन्दु के समान है, अहं-भावना जीव और ब्रह्म के भेद अथवा वियोग का कारण है | यह अहं माया का प्रभाव है |

12    सुन्दरदास – संत दादू के प्रिय शिष्यों में हैं | इनका जन्म जयपुर राज्य की प्राचीन राजधानी धौंसा के परमानन्द खंडेलवाल के यहाँ हुआ है | छह वर्ष की अवस्था में दादू के शिष्य हुये तथा ग्यारह वर्ष की अवस्था में संत जगजीवन तथा संत रज्जब के साथ काशी की यात्रा की | काशी दीर्घकाल तक निवास किया | यहाँ इन्होंने संस्कृत- व्याकरण, साहित्य तथा दर्शन का गंभीर अध्ययन किया |सुन्दरदास बयालीस ग्रन्थों की रचना की, जिसमें ‘ज्ञानसमुद्र’ और सुन्दर विलास अधिक प्रसिद्ध हैं | पुरोहित हरिनारायण शर्मा द्वारा सम्पादित सुन्दर ग्रन्थावली (दो-भाग) इन सभी रचनाओं का संकलन है |

13    अन्य संत कवि – इस परम्परा के अन्य संत कवियों में धर्मदास, रज्जब, बावरी साहिबा, सदना, बेनिपिपा, सेन, घन्ना, अंगद, प्रभुति सिक्ख गुरु, शेख फरीद, भीषण, विमन, और निपट निरंजनी स्वामी उल्लेखनीय हैं |                                                                              

अमीर खुसरो के दोहे, मुकरियाँ और गीत /amir khsro ke dohe mukriyan or geet

                                         अमीर खुसरो के दोहे, मुकरियाँ और गीत   1.      एक नार किया -----------------------------------...