सुंदरकांड का प्रतिपाद्य\उदेश्य
तुलसीकृत 'रामचरितमानस' हिंदी साहित्य की सबसे
श्रेष्ठ महाकाव्य है | इसमें सात कांड है|, जिसे मानव जीवन के समस्त उद्धारक जीवन
उपयोगी तत्वों को संग्रहित किया गया है| रामचरितमानस में राम का चरित्र और गुणगान
है पर इसी की सुंदरकांड ऐसी भाग है जहां राम के भक्त हनुमान के चरित्र
को उपस्थित की गयी है | यहां तुलसी की भक्ति का दास्य भाव पूर्ण रूप से परिष्कृत हो उठी है| सुंदरकांड की समापन हनुमान जी द्वारा लंका प्रस्थान से
प्रारंभ होकर समुंद्र द्वारा श्री राम जी की गुणगान की महिमा तक है|
तुलसीदास कृत रामचरितमानस के
सुंदरकांड में- हनुमान जी का लंका प्रस्थान, सुरसा से भेंट, छाया पकड़ने वाली
राक्षस का वध, लंका वर्णन, लंकिनी पर प्रभाव, लंका में प्रवेश, हनुमान विभीषण
संवाद, हनुमान जी का अशोक वन में सीता को देखकर दुखी होना, रावण का सीता को भय
दिखाना, सीता त्रिजटा संवाद, सीता हनुमान संवाद, हनुमान जी द्वारा अशोक वाटिका
विध्वंस, अक्षय कुमार का वध और मेघनाथ का हनुमान जी को नागपाश में बांध कर सभा में
ले जाना, हनुमान रावण संवाद, लंका दहन, लंका जलाने के पश्चात हनुमान जी का सीता जी
से विदा मांगना और चूड़ामणि पाना, समुद्र के इस पार आना, सबका लौटना, मधुबन प्रवेश,
सुग्रीव मिलन, श्री राम हनुमान संवाद श्री, राम जी का बनार सेना के साथ चलकर
समुद्र तट पर पहुंचना, मंदोदरी रावण संवाद, रावण की विभीषण का समझाना और विभीषण का
अपमान उनका भगवान श्री राम जी के शरण के लिए प्रस्थान और स्वयं समुद्र पार करने के
लिए विचार, रावण दूत सुख सारण और लक्ष्मण
के पत्र को लेकर लौटना, दूत का रावण को समझाना और लक्ष्मण जी का पत्र देना, समुद्र
पर राम जी का क्रोध और समुंद्र की विनती श्रीराम गुणगान की महिमा आदि प्रसंग है |
इन प्रसंगों में मानवीय जीवन व समाज को निम्न प्रकार की दर्शन प्राप्त है -
१.
उदात मानवीय गुण का चित्रण –
इन प्रसंगों में मानव जीवन के अनगिनत ऐसे भाव हैं जिन्हें अपनाकर वर्तमान
जीवन को उज्जवल और साकार किया जा सकता है मानव के उदात गुणों, गुणों का फल प्रतिफल
यहां दिखाया गया है यहां रावण यानी राक्षस को और अवगुणों का प्रतीक बताया गया है
जिसमें मानव के अमानवीय गुण क्रोध, मोह, माया, काम आदि पर सचेत रहने की सीख दी गई है इधर राम यानी वानर दलों में सद्गुण, त्याग, तप, दया, प्रेम का प्रतीक मानते हुए जीवन के उद्धारक
प्रभाव को दिखाया गया है |
२.
उदात मानवीय सांस्कृतिक चेतना –
इस प्रसंग में
मानवीय चेतना, संस्कृति, दूत, भाई बंधु, माता-पिता, मित्र, सखा, पत्नी, नारी, आदि
के माध्यम से उदात जीवन और समाज की उपस्थिति दी है | हनुमानजी और सुरसा की भेंट
आदि प्रसंग में वीर पुरुष के बुद्धि और बल की महिमा गान किया गया है | हनुमान
विभीषण संवाद में संत व्यक्ति के मन वचन के रूप-स्वरूप की अभिव्यंजना की गई है | सीता
हनुमान संवाद में माता पुत्र के मूल कर्तव्य को दृष्टिपात किया गया है | अक्षय
कुमार मेघनाथ रावण आदि पात्रों के माध्यम से मानव के अहंकार, काम, क्रोध, मोह आदि अमानवीय
गुणों के प्रभाव को दिखाया गया है | लंका दहन ऐसा पड़ाव है जहां कुबुद्धि से
ग्रसित व्यक्ति दूसरों के विनाश को छोड़ अपना ही विनाश को प्राप्त करता है |
मंदोदरी रावण संवाद प्रसंग में पत्नी के कर्तव्य को दिखाया है | रावण और विभीषण के
प्रसंग में भाई-भाई के कर्तव्य पर विचार भाव दिखाया गया है | सुख, सारण और रावण के
प्रसंग में दूत के कर्तव्य पर विचार-विमर्श किया गया है | इसी प्रकार राम और समंदर
का प्रसंग में मानव को अपने कर्म पथ पर बाधा डालने वाले पर भी नीति से समझा-बुझाकर
सफलता प्राप्त करने की ओर बढ़ने की शिक्षा है |
३.
उदात मानवीय जीवन प्रयोजन –
इस प्रकार
सुंदरकांड में मानवता के समस्त उदात गुणों को विवश करता हुआ उपस्थित है जहां
तुलसीदास के काव्य प्रयोजन उद्देश्य भी दृष्टिपात होता है जिसमें तुलसीदास खास
हनुमान जी को प्रमुख नायक बनाकर मानव जीवन के उदात् गुणों को इस कारण उपस्थित किया
है जो मानव जीवन के लिए जहाज हैं जिन्हें अपनाकर मानव भवसागर को सहज ही पार कर सकता
है तभी तो हनुमान आदि अन्य वीर भी अपने कर्तव्य पथ के पक्ष को राम के समान ही अमूल्य रूप से जगत
कल्याण के लिए अपने जीवन को समर्पित करते हैं
इस सुंदरकांड में मानव जीवन के सहायक राजनीतितंत्र, मानव तंत्र और संस्कृति
तंत्र पर भी सावधान रहने विधि की निधि के रूप में प्रस्तुत किया गया है जिसमें मंत्री, वैद्य और गुरु यह
तीन यदि भय, आशा से प्रिय बोलते हैं तो राज्य, शरीर और धर्म इन तीनों को शीघ्र ही
नाश होने की ओर से सावधान किया गया है
यहां विभीषण अपने बड़े भाई के लिए हितकर बातें करते हैं और कहते हैं
हे नाथ ! काम,
क्रोध, मोह और लोभ यह सभी नरक के रास्ते हैं अर्थात कुविचार मार्ग के फलस्वरूप हैं
इन्हें छोड़िए और राम के समान कार्य को करिए जहां त्याग, वैराग्य, प्रेम, सद्भाव,
सेवा भाव, अनुशासन, गुण, भलाई के कार्य की जाती है उसे मार्ग को अपनाये | इस
प्रकार सामाजिक जीवन में भाई बंधुओं के हितकारी वचन की पराकाष्ठा यहां दिखाई दे रही
है |
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