विद्यापति
की काव्यगत विशेषता
विद्यापति आदिकालीन हिन्दी भाषा
साहित्य के महाकवि हैं | महाकवि आदिकाल और भक्तिकाल के संक्रांति काल के कवि हैं |
अत: काव्य के बिषय व कला पछ में आदिकालीन और भक्तिकालीन प्रवृति की झलक है | सच
कहा जाय तो विद्यापति ही सर्वप्रथम ऐसे कवि हैं जिसने भाषा जननी संस्कृत से काव्य
के विषय को ग्रहण करते हुये लोक-कंठों के वाणी को काव्य भाषा के रूप में दर्जा
दिलायी | हम इनके काव्यगत विशेषता को निम्न प्रकार से उपस्थित कर सकते हैं |
1.
आश्रयदाताओं की यशोगान – अपने रचनाओं में
आश्रयदाता राजा की यशोगान किये हैं | जैसे – कीर्तिलता और कीर्तिपताका में कीर्ति
सिंह के वीरता और शौर्य का वर्णन है तथा पदावली में राजा शिवसिंह व महारानी लखिमा
देवी के रूप व सौन्दर्य को महिमान्वित किया गया है |
2.
श्रृंगार भावना –
महाकवि के रचनाओं को सह्रदय बिचार करने की आवश्यकता नहीं है, वांछित मन से भी कथा
की वाचना की जाय तो भी पाठक को प्रसंगानुरूप रस की भावना उमड़ आती है, इसका मूल
कारण श्रृंगार योजना है | इन्होंने श्रीकृष्ण और राधा की रूप में ऐसी श्रृंगार
डाली है की श्रोता राजा शिवसिंह और लखिमा देवी को अपने ही सौन्दर्य की भावना उमड़
आती है | महाकवि कृष्ण भक्त कवि हैं | अपने इष्टदेव राधा और कृष्ण के श्रृंगार
वर्णन किये हैं जो अनुपम है जिससे देखकर भक्त सदा अनन्य बने रहने की कामना करते
हैं |
3.
भक्ति भावना –
विद्यापति वैष्णव भक्त के साथ की बहुदेवोपासक भक्त महाकवि हैं | इन्होंने शिव
भक्ति के साथ ही कृष्ण, राधा, गंगा, दुर्गा के साथ-साथ ग्राम देवता की भी भक्ति
किये हैं | गंगा भक्ति का उदाहरण देखिये – की
करब जप-तप-योग-धियाने,
जनम कृतारथ एकहि सनाने |
कहा जाता है कि इनकी भक्ति
भावना बुढ़ापे का प्रतिफल है जो निराशा से उत्पन्न हुआ है | जैसे – माधव हम परिणाम निरासा |
तुहूँ जगतारण दीन दयामय अतए तोहर
विसवासा ||
आधा जनम हम नींद गमाओल
जरा-शिशु क्त दिन गेला |
निघुवने रमणी रस-रंग मातल तोहे
भजब कौन बेला ||
4.
प्रकृति चित्रण –
विद्यापति दरबारी कवि थे | इसलिए राजा के यशोगान भी किये, फिर इष्टदेवों के माध्यम
से अपने आश्रयदाता का ही सौन्दर्य वर्णन किये हैं | इसके साथ-साथ आवश्यकता पड़ी तो
भक्तिभावना के साथ ही प्रकृति चित्रण भी किये हैं | जैसे- आएल रितुपति वसंत |
हिमकर कीरनि भेल
पौगणड ||
5.
काव्यरूप –
विद्यापति महाकवि थे | अत: ये बहुमुखी प्रतिभा के धनी कलाकार थे | इन्होंने
कीर्तिलता और कीर्तिपताका को प्रबन्ध और पदावली को मुक्तक में लिखे हैं |
गोरक्षविजय नाट्य में है |
6.
गीतात्मकता –
सम्पूर्ण रचना गेय हैं | कविताएँ राग-रागिनियों के साथ-साथ लोक-धुनों में हैं |
देवी- देवता के भजन शास्त्रीय हैं तो भारतीय संस्कृति के संस्कारों जैसे – छठी
व्रत सोहर, मुंडन का सगुण, शादी-व्याह के सरस गीत, कोहवर के गीत आदि हैं | ये सभी
गीत आज भी मिथिला के लोक कंठों में गाये जाते हैं |
7.
अलंकार योजना –
विद्यापति के रचनाओं में अलंकारों की झड़ी है | उपमा, रूपक, अतिश्योक्ति और
अनुप्रास बिशेष अलंकारों में हैं | नायक-नायिका के सौन्दर्य व विम्ब विधान में
अलंकार सटीक आई है |
8.
भाषा – पदावली की
भाषा मैथली, कीर्तिलता व कीर्तिपताका की भाषा अवहट्ट तथा अन्य रचनाएँ जैसे –
दानवाक्यावली, शैवसर्वस्वसार, आदि की भाषा संस्कृत है |
इस प्रकार विद्यापति लोक
कंठहार कवि हैं | इनकी रचनाओं में श्रृंगार, भक्ति के साथ-साथ आश्रयदाताओं की
स्तुति और शौर्य वर्णन मिलता है |