Saturday, May 24, 2025

चंदबरदाई / chandbardaai



चंदबरदाई हिन्दी साहित्य के इतिहास में आदिकाल के प्रतिनिधि कवि हैं | आचार्य शुक्ल इन्हें हिन्दी का पहला महाकाव्य लिखने वाले महाकवि के रूप में स्वीकार किये हैं | इनकी रचना पृथ्वीराजरासो हिन्दी की पहला महा काव्य माना जाता है | इस महा काव्य में पृथ्वीराज चौहान के जीवन गाथा का मनोहारी बर्णन किया गया है | कवि चंदबरदाई पृथ्वीराज चौहान के समकालीन कवि थे | कहा जाता है कि दोनों का जन्म एक ही दिन हुआ और एक ही दिन मृत्यु को प्राप्त किये | चन्दवरदाई की कथा राजपूतों के बीच प्रचलित है कि भारतबर्ष के अंतिम हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान के राजकोषीय मंत्री,मित्र और सामन्त थे | ये राजा के साथ हमेशा रहते चाहे राजदरबार, युद्ध भूमि, शिकार आदि मनोरंजनात्मक खेल ही क्यों न हो | चंदबरदाई का जन्म लाहौर में हुआ था कहा जाता है की पृथ्वीराज का जन्म संवत् 1205 में और मृत्यु 1249 में हुई थी, अत: महाकवि चंदबरदाई का जन्म और मृत्यु भी यही होगा | इनके पिता का नाम ‘राववेन’ और विद्या गुरु का नाम ‘गुरु प्रसाद’ था | ये ‘भट्ट’ जाती के ‘जगात’ गोत्र के थे | चाँद ने दो विवाह किये थे, पहली पत्नी का नाम ‘कमला’, उपनाम ‘नेवा’ तथा दूसरी पत्नी का नाम ‘गौरी’ उपनाम ‘राजीरा’ था | इनके ग्यारह संतानें हुई, दस लड़के और एक लड़की | पृथ्वीराज और चंदबरदाई के बिषय में किवदंती है कि मुसलमान बादशाह मोहम्मद गौरी राजा पृथ्वीराज चौहान को बंदी बना कर गजनी ले जा रहा था | यह समाचार चंदबरदाई सुनते ही अपनी महाकाव्य की रचना छोड़ तथा रचना कार्य अपने छोटे पुत्र (जल्लन) को शौंप कर राजा के पीछे चल पड़ा जैसा की महा काव्य में उधृत है – ‘पुस्तक जल्ह दै चलि गज्जन नृप काज “ फिर गजनी में गौरी ने पृथ्वीराज के दोनों आँखों को कुचल कर कारागार में रख लिया | कवि चंद राजा व परम मित्र पृथ्वीराज को कारागार से निकाल ने की उपाय सोचने लगे | इन्होंने बादशाह के पास पृथ्वीराज के शब्दबेधी बाण चलाने की कौशलता को परखने के लिये सुचना दी, बादशाह भी राजी हो गया, बादशाह और चंदबरदाई एक उँचे आसन में बैठे पृथ्वीराज के इस कौसलता को देखते रोमांचित हो बादशाह जब वहा ! वहा ! की आवाज की और इधर से अपने राजकवि चंदबरदाई द्वारा इशारा प्राप्त करके राजा पृथ्वीराज ने इस ल्छयित बाण से बादशाह को मार डाला | अतंत: राजा और चंदबरदाई भी अपने-अपने वरछि से एक-दुसरे के प्राण हर कर आत्म हत्या कर लिये | इस प्रकार राजा और मंत्री अपने शत्रु गौरी को वध कर युद्ध हारने का बदला लिया | चंदबरदाई की रचना पृथ्वीराज रासो महाकाव्य है | यह 69 समयों में विभक्त है इसकी भाषा को भाषाशात्त्रियों ने पिंगल तथा डिंगल माना है जो राजस्थानी व ब्रजभाषा मिश्रित है |

 

  चंदबरदाई हिन्दी साहित्य के इतिहास में आदिकाल के प्रतिनिधि कवि हैं | आचार्य शुक्ल इन्हें हिन्दी का पहला महाकाव्य लिखने वाले महाकवि के रूप में स्वीकार किये हैं | इनकी रचना पृथ्वीराजरासो हिन्दी की पहला महा काव्य माना जाता है | इस महा काव्य में पृथ्वीराज चौहान के जीवन गाथा का मनोहारी बर्णन किया गया है | कवि चंदबरदाई पृथ्वीराज चौहान के समकालीन कवि थे | कहा जाता है कि दोनों का जन्म एक ही दिन हुआ और एक ही दिन मृत्यु को प्राप्त किये |

                        चन्दवरदाई की कथा राजपूतों के बीच प्रचलित है कि भारतबर्ष के अंतिम हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान के राजकोषीय मंत्री,मित्र और सामन्त थे | ये राजा के साथ हमेशा रहते चाहे राजदरबार, युद्ध भूमि, शिकार आदि मनोरंजनात्मक खेल ही क्यों न हो |

                 चंदबरदाई का जन्म लाहौर में हुआ था कहा जाता है की पृथ्वीराज का जन्म संवत् 1205 में और मृत्यु 1249 में हुई थी, अत: महाकवि चंदबरदाई का जन्म और मृत्यु भी यही होगा | इनके पिता का नाम ‘राववेन’ और विद्या गुरु का नाम ‘गुरु प्रसाद’ था | ये ‘भट्ट’ जाती के ‘जगात’ गोत्र के थे | चाँद ने दो विवाह किये थे, पहली पत्नी का नाम ‘कमला’, उपनाम ‘नेवा’ तथा दूसरी पत्नी का नाम ‘गौरी’ उपनाम ‘राजीरा’ था | इनके ग्यारह संतानें हुई, दस लड़के और एक लड़की |

                        पृथ्वीराज और चंदबरदाई के बिषय में किवदंती है कि मुसलमान बादशाह मोहम्मद गौरी राजा पृथ्वीराज चौहान को बंदी बना कर गजनी ले जा रहा था | यह समाचार चंदबरदाई सुनते ही  अपनी महाकाव्य की रचना छोड़ तथा रचना कार्य अपने छोटे पुत्र (जल्लन) को शौंप कर राजा के पीछे चल पड़ा जैसा की महा काव्य में उधृत है –

                       ‘पुस्तक जल्ह दै चलि गज्जन नृप काज “

                                   फिर गजनी में गौरी ने पृथ्वीराज के दोनों आँखों को कुचल कर कारागार में रख लिया | कवि चंद राजा व परम मित्र पृथ्वीराज को कारागार से निकाल ने की उपाय सोचने लगे | इन्होंने बादशाह के पास पृथ्वीराज के शब्दबेधी बाण चलाने की कौशलता को परखने के लिये सुचना दी, बादशाह भी राजी हो गया, बादशाह और चंदबरदाई एक उँचे आसन में बैठे पृथ्वीराज के इस कौसलता को देखते रोमांचित हो बादशाह जब वहा ! वहा ! की आवाज की और इधर से अपने राजकवि चंदबरदाई द्वारा इशारा प्राप्त करके राजा पृथ्वीराज ने  इस ल्छयित बाण से बादशाह को मार डाला | अतंत: राजा और चंदबरदाई भी अपने-अपने वरछि से एक-दुसरे के प्राण हर कर आत्म हत्या कर लिये | इस प्रकार राजा और मंत्री अपने शत्रु गौरी को वध कर युद्ध  हारने का बदला लिया |

                               चंदबरदाई की रचना पृथ्वीराज रासो महाकाव्य है | यह 69 समयों में विभक्त है इसकी भाषा को भाषाशात्त्रियों ने पिंगल तथा डिंगल माना है जो राजस्थानी व ब्रजभाषा मिश्रित है |
  

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