Tuesday, January 27, 2026

विद्यापति की काव्य कला /vidyapti ki kavy kla

                                                           


                                                विद्यापति की काव्य कला

 

                महाकवि विद्यापति अपने काव्यकला के सौन्दर्य से ही अभिनय जयदेव, मैथिल-कोकिल, कंठहार कवि आदि के उपाधि से विभूषित हुये हैं | इनकी काव्य बिषय को  कला पछ सरिता की भांति सरस प्रवाहित होने में सहायक है | भावों व कलाओं की मिठास व रस  से  ही महाकवि रसराज की उपाधि पाई थी | ऐसे उपाधि से सम्मानित कवि की कलात्मकता को निम्न प्रकार से उपस्थित किया जा सकता है |

1.     काव्यरूप – विद्यापति प्रबन्ध व मुक्तक दोनों तरह की काव्य रचना की है | कीर्तिलता और कीर्तिपताका प्रबंधात्मक शौर्य गाथा है और पदावली गेय मुक्तक काव्य रचना है |

2.     गीतात्मकता – विद्यापति के काव्य भारतीय गीत परम्परा की महत्वपूर्ण कड़ी है | पदावली तो गेयपदों का समूह है | इनकी गीतों को तीन श्रेणियों में बाँटा जा सकता है, पहला शास्त्रीय संगीत के पद दुसरे देवस्तुति में गाये जाने वाले भजन तीसरे में लोक-जीवन में गाये जाने वाले गीत जिसमें कोहसार से लेकर जंनसार तक के गीत हैं  | ये गेय पद मिथिला के लोककंठों में हैं |

3.     ध्वन्यात्मकता – इनके पदों में ‘रे’ टेप की ध्वन्यात्मकता है | जैसे – ‘के पति आ लए जाए तरे’ या ‘सुतल छलहुँ हम घरवारे ‘ यहाँ “रे” ध्वन्यात्मकता को प्रकट कर रहा है | अत: इनके काव्य में संगीतात्मकता के साथ ही ध्वन्यात्मकता की सौन्दर्य विराजमान है |

4.     बिम्ब योजना – पदावली के पदों में नायक-नायिका के रूप सौन्दर्य वर्णन के समय रूपक या बिम्बों का प्रयोग धड़ल्ले से किया गया है | इनकी बिम्ब-योजना इतनी सटीक है कि कवि जो चित्र उपस्थित करना चाहता है वह उपस्थित हो जाता है | जैसे- कुच युग ऊपर चिकुर फुजी पसरल

                                   ता अरुझाएल हारा |

                                   जनु सुमेरु उपर मिलि ऊगल

                                    चान्द बिहुनि सबे तारा ||

                        यहाँ नायिका के ऊरोज के ऊपर फैले हुये  बाल जो हार के साथ उलझ गये हैं का विम्ब द्रष्टव्य है |  

5.     चित्रात्मकता – विद्यापति के पदों में चित्रात्मकता मुख्य कला है | पदों में जिस  बिषय की कथा कही जाती इसका स्वरूप उभरता जाता है पाठक को लगता है कि वही दृश्य सामने प्रकट होकर घटित हो रहा है | जैसे –

                      नव वृन्दावन नव नव तरूगण

                       आएल ऋतुपति राज बसंत | यहाँ बसंत ऋतु के समय की प्रकृति को चित्रित किया गया है |

6.     अलंकार योजना – विद्यापति के कलापछ में अलंकार-योजना भी महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है |अलंकार की छंटा ने विद्यापति को अलंकारवादी कवि के श्रेणी में ला खड़ा करता है | नायक-नायिका के सौन्दर्य वर्णन में वय:संधि, सद्यःस्नाता, रूप-चित्रण, रूप-लिप्सा और नख-शिख वर्णन के समय इन्होंने अनुप्रास, उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, रूपकातिश्योक्ति आदि अलंकारों की झड़ी लगा दी है | जैसे -

                             पल्लवराज चरन युग सोभित, गति गजराजक आगे |

                            कनक कदलि पर सिंह समारल,तापर मेरु सभागे ||

                             मेरु उपर दुई कमल फुलाएल,काल बिना रूचि पाई |

                             मनिमय हार धार बहु सुरसरि, तओ नहिं कमल सुखाई ||

7.     काव्य भाषा – पदावली की भाषा मैथली है | कीर्तिलता और कीर्तिपताका की भाषा अवहट्ट है | भू-परिक्रमा, शैवसर्वस्वसार, पुरुषपरीक्षा, दानवाक्यावली आदि ग्रन्थों की भाषा संस्कृत है |

                         इसप्रकार विद्यापति की काव्यकला निश्चय ही सरस, सहज और सुकोमल है | सच कहा जाय तो विद्यापति ही सर्वप्रथम हिन्दी साहित्य में भक्ति परम्परा के प्रथम गायक कवि हैं |   


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