Tuesday, May 31, 2022

घनानन्द का जीवन और कवि परिचय /ghnannd ka jivn kvi prichy

                                           * घनानन्द का जीवन और कवि परिचय *

                                                    


                   घनानन्द  रीतिकाल के रीतिमुक्त काव्य के प्रतिनिधि कवि है | ये आनंद घन के नाम से भी प्रसिद्ध है | आचार्य रामचंद शुक्ल ने घनानन्द का जन्म सं० 1746 माना है | इनकी जन्म तथा मृत्यु पर संदिग्धता है, आरंभिक जीवन दिल्ली तथा वृन्दावन में बीता | जाति से कायस्थ है |

                                                                                    घनानन्द शाहंशाह मुहम्मदशाह रँगीले के दरबारी में मीर मुंशी थे | ‘सुजाननामक नर्तकी पर आसक्त थे | ये निम्बार्क सम्प्रदाय से दीक्षित कृष्ण भक्त थे | इनकी रचना में सुजानहित, वियोग बेलि, इश्कलता, कृपाकंद निबन्ध प्रमुख है | घनानन्द की काव्य भाषा ब्रज है | विरोधाभास अलंकार घनानन्द की प्रिय अलंकार है | इनकी मृत्यु अहमदशाह अब्दाली के द्वितीय आक्रमण के समय हुआ |


               घनानंद के काव्य के विशेषता

हिंदी साहित्य की मध्कालीन युग में स्वछन्द प्रवाह के रीति मुक्त धारा के  प्रधान कवि घनानन्द हैं | रीतिसिद्ध धारा के अन्य कवि आलम, ठाकुर, बौधा, द्विजदेव आदि हैं | इन सभी कवियों के काव्यों के सम्पूर्ण आकलन से रीतिमुक्त काव्य धारा का स्वरूप निम्न प्रकार से स्थिर होता हैं –

१.    स्वछन्द काव्य धारा – रीतिमुक्त काव्य धारा में स्वछंदता के भावावेग प्रवाह हुई है | इसमें आत्मा विभोर हैं | आत्मा बौद्विकता का प्रयोग नही है | भाव के परतें, भेद-प्रभेद एक के बाद एक साथ उमड़ते आते हैं | यह भाव अपनी एक भंगिमा के साथ एक आकर्षक बिम्ब में उपस्थित होते हैं, जैसे-

    रावरे रूप की रीति अनुप, नयों-नयों लागत ज्यों-ज्यों निहारिये |

   त्यों इन आख्निन बानी अनोखी, अघानी कहूँ नहिं आन तिहारिये ||

२.   लौकिक प्रेम की अभिव्यक्ति – रीतिमुक्त काव्यधारा में नायक-नायिका, प्रेमी-प्रेमिका, की योजना पर आधारित लौकिक प्रेम की उदघाटित करती है | जिसमें काव्यलय व्यक्ति प्रधान है | व्यक्तिगत जीवन में प्रेमाहत को उपस्तित किया गया है | यहाँ फारसी की प्रेम अभिव्यंजना हुई है | यदि कर्ता उतम पुरुष में है |

३.   व्यथा भरी प्रेम कथा – रीतिमुक्त काव्य में प्रेमी-प्रेमिका, नायक-नायिका कविता के कर्ता हैं | परन्तु यहाँ दृष्टव्य है प्रेमी-प्रेनिका, नायक-नायिका संयोग के पल को कभी प्राप्त नहीं क्र पते हैं | अत सम्पूर्ण प्रेमाव्यजना एसा पीड़ा की अनुभूती लगातार बी हुई है –

यह कैसो संयोग न सुझी परे, जो वियोग न्हुँ क्यों विघुवतु है

४.   प्रेम का उदात स्वरूप – रितिमुत काव्य की अभिव्यंजना उदात्तता से युक्त है | यहाँ इन्द्रिय वासना नही है | प्रेमी-प्रेमिका वियोग की व्यथा सह-सहकर भी प्रिय की कुशल कामना करते हैं | यही नहीं अंतिम स्वांस तक उसी का स्मरण करते हैं | यदि प्रिय प्राप्त नहीं होते तो घर से बाहर ठौर-ठिकानों पर खोजने निकल जाते हैं |

    “यह प्रेम की पतवार महादरबारी की धार पे धावना है |”

५.   रहस्यात्मकता से युक्त – रीतिमुक्त काव्य स्थूल शारीरिकी है फिर भी उध्दर्गामी है | इसमें पीडक सकाम से आतुर संचित है | अत: ये सरे अभिव्यक्ति प्रेमी-प्रेमिका, नायक-नायिका के कर्म के रहस्य को उत्पन्न क्र देती है –

“अति दिन मृणाल के तारहू ते तेही ऊपर पाँव दे आवनों है |

सुई बेह तेद्वार स्किन वहाँ प्रतीति को तादौ लदावनौ है ||”

६.   परिष्कृत भाषा – घनानन्द ब्रज भाषा के निपुण कवि हैं भाषा में इन्होंने नूतन वाक्य योजना संगोठित किये हैं, जिसमें प्रेम की अभिव्यक्ति अत्यंत गंभीर, निर्मल, आवेगमय और व्याकुल क्र देने वाला उदात रूप व्यक्त हुआ है | इसलिए घनानंद को साक्षात रस मूर्ति भी खा गया है | इसकी भाषा की रूप देखिए –

“अति सुधौ स्नेह के मारन है, जहाँ नेक स्पानक बांक नहीं |”

७.   काव्य कला की श्रृजनात्मक प्रेणता – घनानंद की कविता में लाक्षणिकता, वक्रोक्ति आदि लक्षण साफ-साफ देखा जा सकता है | यह लक्षण प्रेम की अभिव्यक्ति, प्रिया की अत्याधिक चतुराई आदि भावनाओं देखी जा सकती है _

“नहि आवनि अवधी न रावरी आस, इते पैर एक ही बात हों |”

.   चित्रात्मकता - घनानंद भावाभिव्यक्ति में साहित्यिक कला के पूर्णत: प्रयोग किया है | जिसमें विषय और भाव चित्र के समान उपस्थित हो गये हैं | इन कवित्त में सावरी साड़ी ले सुसज्जित सुजान के शरीर का क्रांतिमान उपस्थित किया गया है –

“श्याम घटा लिपटी धीर विध की सोहे अमावस्या अंक कुंजियारी |”

९. छंद विधान की व्यापकता – घनानंद रीतिकाल के प्रतिनिधि कवि हैं | इन्होंने कवित्व, सवैया, दोहा, चोपाई आदि छन्दों में काव्य रचना की है |जो हिंदी साहित्य के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है | आधुनिक आलोचना घनानंद को हिंदी साहित्य में सवैया, छंद की बादशाह भी खा गया है | 


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