Wednesday, June 8, 2022

सूफी काव्य परम्परा और रचना पर लेख लिखिए /suphi kavy prmpra or rchna

                                    सूफी काव्य परम्परा

 

                     हिन्दी  सूफी काव्य धार , निर्गुण भक्ति , कृष्ण भक्ति काव्य की ही भांति हिंदी साहित्य की प्रमुख  काव्य धारा है | इन्हें प्रेममार्गी शाखा, प्रेमकाव्य, प्रेमाख्यान काव्य सूफी काव्य आदि विभिन्न नामों से जाना जाता है | मध्यकालीन इतिहास में एक ओर जहाँ निर्गुण संत सर्वसाधारण जनता के लिये भक्ति मार्ग प्रशस्त कर रहे थे वहीं दूसरी ओर सूफी फकीर भी भक्ति को ज्ञानगम्य एवं प्रेम प्राप्य बताकर हिन्दुओं तथा मुसलमानों में एकता मजबूत कर रहे थे |

              ‘सूफी’ शब्द के बिषय में भी विद्वानों में मतभेद है | कुछ विद्वान् ‘सूफी’ शब्द को ‘सफ’ से निर्मित बताते हैं | इसका शाब्दिक अर्थ – अग्रिम पंक्ति है | कयामत के दिन जो व्यक्ति अपने पवित्रता एवं सदाचार के कारण अगली पंक्ति में खड़े होने के अधिकारी होगें, वे ‘सूफी’ कहलाते हैं |

      ‘सूफी’ काव्यधारा भारतीय अदैतवाद एवं विशिष्टादैतवाद, इस्लाम की गुढ विद्या, नव अफलातूनीमत तथा कवियों के वैचारिक स्वतंत्रता से सूफी मत का विकास हुआ है |                                                                                       

                   हिन्दी में सूफी काव्य परम्परा का प्रवर्तन किस कवि द्वारा हुआ,इस प्रश्न का जवाब असंदिग्ध उत्तर उपलब्ध नहीं हैं | आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने मृगावती (1501) आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने ईश्वरदास कृत सत्यवती कथा (1500) डा० रामकुमार वर्मा ने मुल्ला दाउद कृत चंदायन (1379) तथा अन्य विद्वानों द्वारा असाइत कृत हंसावली (1370) को माना जाता है | परन्तु नगेन्द्र ने अपने इतिहास ग्रन्थ में निम्न प्रकार से सूफी काव्य परम्परा को विकसित करते हैं –

(1)   हंसावली – इसके रचियता ‘असाइत’ को मान्य है | इसमें पाटण की राजकुमारी हंसावली की कथा है | राजकुमारी अद्वितीय सुन्दरी है, किन्तु पूर्व जन्म के किसी संस्कार वश पखवाड़े में पांच पुरुषों की हत्या का भी नियम ले रखा है | नायक राजकुमार स्वप्न में राजकुमारी के दर्शन करके मुग्ध हो जाता है | प्रेम में विह्वल होकर मंत्री के साथ योगी वेश बदल कर खोज में निकल पड़ते हैं | भारी संकट के बाद राजकुमारी को प्राप्त करने में सफल होता है | नायक, राजकुमारी के पांच पुरुषों की हत्या के नियम से भी विरक्त कर लेता है | इस नियम के पीछे एक घटना थी – पूर्व जन्म में राजकुमारी एक पक्षिणी थी, जब उसने अंडे दे रखे थे तब एकाएक जंगल में आग लग जाने पर नर-पक्षी उसे बचाने के बजाय स्वयं जलते हुये छोडकर भाग गया था | इसी घटना से राजकुमारी पुरुष-द्रोहिणी हो गई थी | अब राजकुमारी पूर्व जन्म की सारी घटनाये स्मरण कर आयी है और स्वस्थ्य होकर आचरण करने लगी | इस घटना की सारी वृतान्त दोहे-चौपाई में उक्त ग्रन्थ में लिखी गई है |

(2)   चंदायन -  इसकी रचना मुल्ला दाउद ने सन 1379 ई० में की है | इसमें नायक लोर (लोरिक) एवं नायिका चंदायन का स्वच्छ्द प्रेम, प्रेम में बाधा, नायक के योगी वेश में घर से बाहर निकलना और अनेक बाधाओं को पारकर नायिका से मिलने का वर्णन है | इसकी भाषा अवधी तथा दोहे-चौपाई छन्द में लिखा गया है | इसका मूल नाम ‘लोर कहा’ है |

(3)   लखमसेन पद्मावती कथा – इसकी रचना दामोदर कवि ने 1459 ई० में की है | स्वयं कवि इसे ‘वीर कथा’ कहा है | इसमें राजा लक्ष्मण सेन एवं राजकुमारी पद्मावती के प्रथम दर्शन जन्य प्रेम का चित्रण रोमानी शैली में है | नायक द्वारा विभिन्न प्रकार के कष्ट से प्राप्त करने की कथा है |

(4)   सत्यवती कथा –  इसके रचियता ईश्वरदास सगुणोपासक भक्त हैं | इसकी रचना 1501 ई० में है | इसमें राजकुमारी सत्यवती एवं राजकुमार ऋतुपर्ण के प्रथम दृष्टिजन्य प्रेम-प्रसंग, नायिका द्वारा नायक को कोड़ होना, नायिका की विवाह तथा शाप से मुक्ति, तत्कालीन बादशाह का उल्लेख भी इस काव्यग्रन्थ में दोहे-चौपाई में किया गया है |

(5)   मृगावती – कुतुबन कृत मृगावती (1503) में नायक राजकुमार तथा नायिका मृगावती के प्रथम दृश्य  जन्य प्रेम का निरूपण अत्यन्त भावात्मक शैली में है | नायक का घर से योगी वेश में बाहर निकलना, मार्ग में राक्षस के चंगल से निकलकर विवाह, जैन काव्य परम्परा के आधार पर नायक की मृत्यु के बाद नायिका का सती होना दिखाया गया है | भाषा अवधी और दोहे-चौपाई में लिखा गया है |

(6)   माधवानल कामकंदला – रचना वर्ष 1527 ई० है | नायक माधव एवं नायिका विशारदा कामकंदला के प्रेम का निरूपण किया गया है | नायक, कामकंदला के नृत्य से मोहित होकर प्रेम करने लगता है | इसकी भाषा राजस्थानी तथा दोहे-चौपाई छंद में लिखी गई है |

(7)   पद्मावती – मलिक मोहम्मद जायसी कृत पद्मावत (1540) को इस परम्परा का प्रौढ़त्तम कृति माना जाता है |इसमें चितौड़ के राजा रत्नसेन एवं सिंहल की राजकुमारी पद्मावती के प्रेम विवाह एवं विवाहोत्तर जीवन के मार्मिक जीवन का उपस्थित  किया है | इसकी भाषा ठेठ-अवधी है | इसमें दोहे-चौपाई छंद का प्रयोग है |

(8)   मधुमालती – मंझन कृत मधुमालती (1545) में नायक-नायिका के प्रथम दर्शनजन्य प्रेम तथा पूर्व जन्म के संस्कारों की महत्ता को दिखाया गया है | इसकी भाषा अवधी तथा दोहे-चौपाई छंद में लिखा गया है |

(9)   ढोला मारुरा दूहा – कल्लोल कवि द्वारा रचित ढोला मारुरा दूहा (1473) राजस्थानी भाषा प्रेमाख्यानक है |इसमें नटवर देश के राजकुमार ढोला और पूंगल देश की राजकुमारी मारवणी के विवाहोत्तर प्रेम का मार्मिक वर्णन है | भाषा राजस्थानी तथा दोहे-चौपाई छंद है |

(10) माधवानल कामकंदला चौपाई – इसकी रचना 1556 ई० में कुशल लाभ द्वारा की गई है | इसमें नायक-नायिका के जन्मों की कथा का प्रतिपादन किया गया है | यह दोहा, चौपाई, सोरठा, गाथा छंद में लिखी गई है |भाषा राजस्थानी है |

(11) रूपमंजरी – अष्टछाप के प्रसिद्ध कवि नन्ददास रूपमंजरी (1568) की रचना की है | इसमें रूपमंजरी और कृष्ण के प्रेम को वर्णन किया गया है | इसकी भाषा ब्रज तथा दोहे-चौपाई शैली में लिखा गया है |

(12) प्रेमविलास प्रेमलता की कथा – इसकी रचना जैन श्रावक जटमल ने 1556 में लाहौर में की थी | कवि ने “जैनाय नम:’ से प्रारम्भ करते हुये तात्कालिक शासक का परिचय तथा नायक-नायिका के प्रेम का प्रत्यक्ष दर्शन सी वर्णन है |

(13) छिताईवार्ता – छिताईवार्ता (1590) के रचियता नारायण दास हैं |इसमें नायिका छिताई तथा देवगिरि के राजा रामदेव यादव की कन्या तथा ढोल समुद्र के राजकुमार से प्रेम जन्य कथा का वर्णन है | इसकी भाषा राजस्थानी-ब्रज मिश्रित है | दोहे तथा चौपाई छंद में लिखा गया है |


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