Monday, January 4, 2021

भक्तिकाव्य की प्रवृत्तियाँ/बिशेषताएं / bhktikavy ki prvritiyan / visheshtayan

 

                                          भक्तिकाव्य की प्रवृत्तियाँ/बिशेषताएं




                                  भक्तिकाव्य उदात्त एवं शांत मनोवृति का काव्य है |इसकी प्रतिबिम्ब भारतवर्ष की सामाजिक एवं धार्मिक परिस्थितियों में मिल जाता है |इस भक्तिकाव्य में महान साहित्य की सभी प्रवृतियाँ पाई जाती है, यों कहें कि भक्तिकाव्य ही महान साहित्य की निर्देशक है |भक्तिकाव्य की सामान्य प्रव्रत्तियां निम्नलिखित हैं –

1, नाम की महत्ता – भक्तिकाव्य के भक्तों ने नाम की महत्ता स्वीकार की है | जप, कीर्तन, भजन आदि सभी में समान रूप से दृष्टि गोचर होती है |तुलसी ने राम के नाम को राम से बड़ा माना है | नाम में निर्गुण एवं सगुण दोनों में सामंजस्य हो जाता है –

अगुन सगुण दुई ब्रह्म स्वरूपा | अकथ अगाध अनादि अनूपा ||

मोरे मत बड नाम दुई ते      | किए जेहि प्रभु निज बीएस बूते || - तुलसी

मेरा साहब एक है, दुजा कहा न जाय |

साहब दुजा जो कहूँ , साहब खरा रिसाय || - कबीर

2, गुरु महिमा – भक्तिकाव्य ने एक स्वर में गुरु की महत्ता स्वीकार की है | कबीर ने गुरु को भगवान् से भी श्रेष्ठ माना है | -

    गुरु गोबिंद दोऊ खड़े, काके लागो पायं |

     बलिहारी गुरु आपको, जिन गोविन्द दियो बताय ||

सूर, तुलसी और जायसी ने भी गुरु के प्रति अपार भक्ति प्रदर्शित की है |

3, भक्तिभावना का प्राधान्य – भक्तिकाल की चारों धाराओं (निर्गुण, सूफी, कृष्णभक्ति और रामभक्ति) में भक्तिभावना का प्राधान्य मिलता है |कबीर के बिचार के अनुसार –बिना भक्ति के ज्ञान की प्राप्ति असंभव है |

   भगति नारदी मगन सरीरा | इहि विधि भगतिहि कहै कबीरा ||

                 जायसी ने साधना के चारों सोपानों (शरीयत, तरीकत, हकीकत, और मारिफत) को भक्ति का साधन स्वीकार किया है |

3, अहंकार का त्याग – भक्ति का दूसरा रूप है – अहंकार का त्याग | सच्ची भक्ति अहंकार त्याग के बिना असंभव है | -

                         राम सो बड़ो है कौन, मो सो कौन छोटो |

                        राम सो खरो है कौन, मो सो कौन खोटो ||   - तुलसी

                     

                     प्रभु हौं सब पतितन को टीकौ |  - सूर

 

              जब मैं था तब हरी नहीं, अब हरी है मैं नाहिं |

              सब अँधियारा मिट गया, दीपक रेखा माहीं ||  - कबीर

4, समन्वय की भावना – भक्तिकाव्य की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण बिशेषता समन्वय की भावना है | यह समन्वय जीवन के सभी क्षेत्रों – सामाजिक, धार्मिक, तथा दार्शनिक मेंमिलता है | भक्तिकाल में सामाजिक अव्यवस्था फैली हुई थी भक्तकवियों ने सामाजिक  समन्वय इस तरह से किया –

                     अरे इन दोउन राह ण पाई |

                    हिन्दू अपनी करै बड़ाई, गागर छुवन न देई |

                    वेश्या के पावन तर सोवै , यह देखो हिन्दुवाई |

                   मुसलमान के पीर औलिया मुरगा – मुरगी खाई |

                   खाला केरी बेटी ब्याहे गरहीं में करहिं सगाई ||

                              धार्मिक समन्वय में ज्ञान, भक्ति तथा क्रम को समन्वय किया गया है | सम्प्रदायों के दार्शनिक सिद्धांतों का समन्वय दृष्टिगोचर होता है | -

                    ज्ञानहिं भगतिहिं नहिं कछु भेदा |

                   उभय हरहिं    भव  संभव   खेदा ||

                             दार्शनिक समन्वय, और भाषाओँ का समन्वय भक्तकवियों ने किये हैं –

                   ईश्वर   अंश  जीव  अविनासी |

                   चेतन,  अमल,  सहज सुखनासी ||

5] शील तथा सदाचार की प्रवृत्ति – शील-सदाचार की ओर भक्त कवियों की स्वाभाविक गत्यात्मकता रही है |भक्ति रूपी लक्ष्य तक पहुँचने के लिए साधना के इन सोपानों को माध्यम बनाया – अहंकार का त्याग, आडंबर का खंडन, जाती-पाँति के भेदभाव का विरोध, आत्मसंयम, अपरिग्रह, इंद्रियसंयम, मानसिक संयम आदि आदि |

6] लोकभाषाओं का प्राधान्य – भक्तिकाल में लोकभाषाओं को अत्यधिक प्रश्रय दिया गया | कवियों ने अपनी अनुभूतियों की सहज अभिव्यक्तियों के लिए प्रचलित लोकभाषा के विभिन्न रूपों का सफल प्रयोग किया है | तुलसी जैसे भक्तकवि नाना पुराण निगमाग्मों के पारंगत विद्वान् थे और उनका संस्कृत पर पूर्ण अधिकार था, फिर भी अवधि व ब्रजभाषा में काव्य रचना की | सूर, जायसी ने लोक भाषा में काव्य रचे | कबीर आदि संत कवियों ने सधुक्कड़ी भाषा में अपनी संदेश जन-जन तक पहंचाए |











अमीर खुसरो के दोहे, मुकरियाँ और गीत /amir khsro ke dohe mukriyan or geet

                                         अमीर खुसरो के दोहे, मुकरियाँ और गीत   1.      एक नार किया -----------------------------------...