काव्य की परिभाषा / काव्य के भेद /शैली के अनुसार काव्य के भेद
काव्य की परिभाषा
काव्य, कविता या पद्य, साहित्य की वह विधा है जिसमें किसी कहानी या मनोभाव को कलात्मक रूप से किसी भाषा के द्वारा अभिव्यक्त किया जाता हैअर्थात् काव्य वह वाक्य रचना है जिससे चित्त किसी रस या मनोवेग से पूर्ण हो अर्थात् वह जिसमें चुने हुए शब्दों के द्वारा कल्पना और मनोवेगों का प्रभाव डाला जाता है।
आचार्यों के अनुसार काव्य की परिभाषा
कविता या काव्य क्या है ? इस विषय में भारतीय साहित्य में आचार्यीं आलोचकों की बड़ी समृद्ध परंपरा है— आचार्य भरत ,आचार्य जगन्नाथ, आचार्य विश्वनाथ, पंडित अंबिकादत्त व्यास, आचार्य श्रीपति, भामह आदि संस्कृत के विद्वानों से लेकर आधुनिक आचार्य रामचंद्र शुक्ल तथा जयशंकर प्रसाद जैसे प्रबुद्ध कवियों और आधुनिक युग की मीरा महादेवी वर्मा ने कविता का स्वरूप स्पष्ट करते हुए अपने अपने मत व्यक्त किए हैं।
भारत में कविता का
इतिहास और कविता का दर्शन बहुत पुराना है। इसका प्रारंभ भरतमुनि से समझा जा सकता
है। कविता का शाब्दिक अर्थ है काव्यात्मक रचना या कवि की कृति, जो छन्दों की शृंखलाओं में विधिवत बांधी जाती
है।
रसगंगाधर में 'रमणीय' अर्थ के प्रतिपादक शब्द को 'काव्य' कहा है। 'अर्थ की रमणीयता' के अंतर्गत शब्द की रमणीयता (शब्दलंकार) भी समझकर लोग इस लक्षण को स्वीकार करते हैं। पर 'अर्थ' की 'रमणीयता' कई प्रकार की हो सकती है। इससे यह लक्षण बहुत स्पष्ट नहीं है।
साहित्य दर्पणाकार विश्वनाथ का लक्षण ही सबसे ठीक जँचता है। उसके अनुसार 'रसात्मक
वाक्य ही काव्य है'। रस अर्थात् मनोवेगों का सुखद संचार की काव्य
की आत्मा है।
काव्यप्रकाश में काव्य तीन
प्रकार के कहे गए हैं, ध्वनि, गुणीभूत व्यंग्य
और चित्र। ध्वनि वह है जिस, में शब्दों से निकले हुए अर्थ (वाच्य) की
अपेक्षा छिपा हुआ अभिप्राय (व्यंग्य) प्रधान हो। गुणीभूत ब्यंग्य वह है जिसमें गौण
हो। चित्र या अलंकार वह है जिसमें बिना ब्यंग्य के चमत्कार हो। इन तीनों को क्रमशः
उत्तम, मध्यम और अधम भी कहते हैं। काव्यप्रकाशकार का
जोर छिपे हुए भाव पर अधिक जान पड़ता है, रस के उद्रेक पर
नहीं।
कविता क्या है ?
विद्वानों का विचार
है कि मानव हृदय अनन्त रूपतामक जगत के नाना रूपों, व्यापारों में भटकता रहता है, लेकिन जब मानव अहं की
भावना का परित्याग करके विशुद्ध अनुभूति मात्र रह जाता है, तब वह मुक्त हृदय हो
जाता है। हृदय की इस मुक्ति की साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द विधान करती आई
है उसे कविता कहते हैं। कविता मनुष्य को स्वार्थ सम्बन्धों के संकुचित घेरे से ऊपर
उठाती है और शेष सृष्टि से रागात्मक सम्बंध जोड़ने में सहायक होती है। काव्य की
अनेक परिभाषाएँ दी गई हैं। ये परिभाषाएं आधुनिक हिंदी काव्य के लिए भी सही सिद्ध
होती हैं। काव्य सिद्ध चित्त को अलौकिक आनंदानुभूति कराता है तो हृदय के तार झंकृत
हो उठते हैं। काव्य में सत्यं शिवं सुंदरम् की
भावना भी निहित होती है। जिस काव्य में यह सब कुछ पाया जाता है वह उत्तम काव्य माना
जाता है।
काव्य के भेद दो प्रकार से किए गए हैं–
·
स्वरूप के अनुसार काव्य के भेद और
·
शैली के अनुसार काव्य के भेद
स्वरूप के अनुसार
काव्य के भेद
-
स्वरूप के आधार पर काव्य के दो भेद हैं -
श्रव्यकाव्य एवं दृश्यकाव्य।
श्रव्य काव्य -
जिस काव्य का रसास्वादन दूसरे से सुनकर या
स्वयं पढ़ कर किया जाता है उसे श्रव्य काव्य कहते हैं। जैसे रामायण और महाभारत।
श्रव्य काव्य के भी दो भेद होते हैं - प्रबन्ध
काव्य तथा मुक्तक काव्य।
प्रबंध काव्य -
इसमें कोई प्रमुख कथा काव्य के आदि से अंत तक
क्रमबद्ध रूप में चलती है। कथा का क्रम बीच में कहीं नहीं टूटता और गौण कथाएँ
बीच-बीच में सहायक बन कर आती हैं। जैसे रामचरित मानस।
प्रबंध काव्य के दो भेद होते हैं - महाकाव्य
एवं खण्डकाव्य।
1- महाकाव्य इसमें किसी
ऐतिहासिक या पौराणिक महापुरुष की संपूर्ण जीवन कथा का आद्योपांत वर्णन होता है।
जैसे - पद्मावत, रामचरितमानस, कामायनी, साकेत आदि महाकव्य हैं।
महाकाव्य में ये बातें होना आवश्यक हैं-
·
महाकाव्य का नायक कोई पौराणिक या
ऐतिहासिक हो और उसका धीरोदात्त होना आवश्यक है।
·
जीवन की संपूर्ण कथा का सविस्तार वर्णन होना
चाहिए।
·
श्रृंगार, वीर
और शांत रस में से किसी एक की प्रधानता होनी चाहिए। यथास्थान अन्य रसों का भी
प्रयोग होना चाहिए।
·
उसमें सुबह शाम दिन रात नदी नाले वन
पर्वत समुद्र आदि प्राकृतिक दृश्यों का स्वाभाविक चित्रण होना चाहिए।
·
आठ या आठ से अधिक सर्ग होने चाहिए, प्रत्येक सर्ग के अंत में छंद परिवर्तन
होना चाहिए तथा सर्ग के अंत में अगले अंक की सूचना होनी चाहिए।
2- खंडकाव्य इसमें किसी की
संपूर्ण जीवनकथा का वर्णन न होकर केवल जीवन के किसी एक ही भाग का वर्णन होता है।
जैसे - पंचवटी, सुदामा चरित्र, हल्दीघाटी, पथिक आदि खंडकाव्य हैं।खंड काव्य में ये बातें होना
आवश्यक हैं-
·
कथावस्तु काल्पनिक हो।
·
उसमें सात या सात से कम सर्ग हों।
·
उसमें जीवन के जिस भाग का वर्णन किया गया
हो वह अपने लक्ष्य में पूर्ण हो।
·
प्राकृतिक दृश्य आदि का चित्रण देश काल
के अनुसार और संक्षिप्त हो।
मुक्तक -
इसमें केवल एक ही पद या छंद स्वतंत्र रूप से
किसी भाव या रस अथवा कथा को प्रकट करने में समर्थ होता है। गीत कवित्त दोहा आदि मुक्तक
होते हैं।
दृश्य काव्य -
जिस काव्य की आनंदानुभूति अभिनय को देखकर एवं
पात्रों से कथोपकथन को सुन कर होती है उसे दृश्य काव्य कहते हैं। जैसे नाटक में या चलचित्र में।
शैली के अनुसार
काव्य के भेद
-
1- पद्य काव्य - इसमें किसी कथा का वर्णन काव्य में किया जाता
है, जैसे गीतांजलि
2- गद्य काव्य - इसमें किसी कथा का वर्णन गद्य में किया जाता है, जैसे जयशंकर की कमायनी ।।। गद्य में काव्य रचना
करने के लिए कवि को छंद शास्त्र के नियमों से स्वच्छंदता प्राप्त होती है।
3- चंपू काव्य - इसमें गद्य और पद्य दोनों का समावेश होता है। मैथिलीशरण गुप्त की 'यशोधरा' चंपू काव्य है।
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