आधुनिक काल की अवधारणा और पृष्ठभूमि
हिंदी साहित्य के इतिहास में रीतिकाल के बाद आधुनिककाल की अवधारणा और पृष्ठभूमि की समयावधि
निर्धारण होती है | सर्वमत
से हिंदी साहित्य का आधुनिक काल भारतेंदु के जन्मकाल, रचनावधि के प्रारम्भिक वर्ष से आज तक मानी जाती
है | रीतिकाल की अंतिम अवधि पोर्ट विलियम काँलेज के
स्थापना वर्ष के आस-पास
तक होती है | यानि
1800 ई० पोर्ट विलियम काँलेज की स्थापना वर्ष है तो (आधुनिक काल की पीठिका) 1800 ई० से भारतेंदु या इनके मंडल द्वारा होनेवाली साहित्यिक गतिविधियों
के समयावधि तक हिंदी साहित्य की आधुनिक काल की आधुनिक काल की
प्रवेश द्वार मानी जाती है , क्योंकि इस अवधि में हिंदी साहित्य की आधुनिक विधाएँ
नाटक, कहानी, उपन्यास, पत्र-पत्रिका, निबन्ध, आलोचना आदि विधाओं का लगभग पूर्ण
विकास हुआ हैं |
राजनीतिक पृष्ठभूमि -
हिंदी साहित्य इस अवधि में विविध रूपों में अपनी गतिविधियों को सुचारू रूप
से संवार रही थी |
भारतीय की राजनीतिक स्थिति इन दिनों अंग्रेजों के हाथों थी | अंग्रेज प्रशासन भारतीय जनताओं के प्रति उदारवादी
नीति अपनाई हुई थी, हिंदी
भाषा विकास के लिए भारतीय भाषा शास्त्री लल्लूलाल, सदासुखलाल आदि अध्यापक पोर्ट विलियम काँलेज में
रखे गये | अंग्रेज
शासन अंग्रेजी भाषा के तुल्य हिन्दी भाषा को भी विकसित करने की कोशिश की | इसी की परिणाम था कि इन्हीं समकालीन युग में
कोश, व्याकरण जैसे विषय पर काफी काम हुए | 1854 ई० में वुड घोषणा पत्र में विश्वविद्यालय
अधिनियम आए | अंग्रेज
सरकार व्यापारिक गतिविधियों को प्रोत्साहन के लिए रेल-लाइन, टेलीफोन सेवा को बढ़ावा दी, परिणाम स्वरूप देशवासियों को अपने बिचार आदान-प्रदान के लिए अनुकूल अवसर की प्राप्ति हुई | 1820 ई० में थामस मुनरो ने इस्तयारी बन्दोवस्ती लाई, जिससे जमीन को व्यक्तिगत सम्पति बना दिया | किसानों द्वारा उत्पादित फसल अब बाजार में आने
लगा | रूपये की प्रचलन में वृद्धि हुई | लोग ग्राम व्यवस्था के तहत आपसी झगड़ा की निपटरा
करते थे, अब
समाप्त हो गया | भारतीय इतिहास में सन 1857 क्रन्ति को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के नाम
जाना जाता है| इस
लड़ाई का मुख्य केन्द्र उत्तप्रदेश था, परन्तु इसकी व्यापक प्रतिक्रिया सम्पूर्ण उत्तर भारत में खासकर
हिन्दी भाषा –भाषी क्षेत्र में अधिक बदलती रही | इस क्रंति से पहले देश में सांस्कृतिक पुनर्जागरण क्रांति चली थी
जिसका मुख्य केंद्र बंगाल था |
आधुनिक काल की अवधारणा और पृष्ठभूमि को भारतवर्षों में संस्कृति पुर्नजागरण के समय
प्रेस की स्थापना, पत्रकरिता
का उदभव और विचार स्वतंत्रता को प्रोत्साहन मिला था | भारतीय अंग्रेजी शिक्षा से शिक्षित होकर नये–नये पाश्चात्य विचारों से परिचित हो गये थे | ब्रहम समाज, आर्य समाज तथा अन्य सामाजिक संस्थाएं, फोर्ट विलियम काँलेज की स्थापना आदि ने
सांस्कृतिक पुर्नजागरण की प्रक्रिया को आरभं कर चुक थी | 1857 के सशस्त्र क्रान्ति विद्रोह इस प्रकिया को
तीव्र कर दिया है |
सामाजिक व सांस्कृतिक पृष्टभूमि - इस अवधि में देश छुआछूत, जाति-प्रथा, बाल-विवाह, सती-प्रथा, जैसे सामाजिक कुरूतियों से कराह रहा था जोआधुनिक काल की अवधारणा और पृष्ठभूमि का स्वरूप है | इन सामाजिक प्रथाओं की सुधार के लिए ब्रह्म
समाज (1828
ई० राजाराम मोहन राय), आर्य समाज (1867 ई० स्वामी दयानन्द सरस्वती), प्रार्थना समाज (1867 ई० केशवचन्द्र सेन), थियो सोफिकल सोसाईटी (1875 ई० मदाम बलावस्तु) आदि ने सराहनीय कदम उठाए | स्वामी दयानन्द सरस्वती ने शिक्षा के विकास के
लिए अपनी पुस्तक ‘सत्यार्थ
प्रकाश’ को खड़ी बोली हिंदी जैसे आम जन की भाषा में लिखी
| नयी अर्थव्यवस्था और नवीन शिक्षा व्यवस्था से
भारतीय जनता में नई चेतना का संचार हुआ | लोग अपनी कठिनाईयों को दूर करने के कोशिश में प्रेस की स्थापना करने
लगे |1674
ई० में ईस्ट इंडिया कम्पनी ने मुम्बई में
मुद्रण की स्थापना की, इसी
विकास की परम्परा में राजा राममोहन राय ने 1821 ई० में ‘संवाद-कौमुदी’ नामक समाचार पत्र निकाले | इनके ही समकालीन में द्वारिका नाथ टैगोर, प्रसन्न कुमार टैगोर ने ‘बंगदूत’ नामक समाचार-पत्र निकाले | हिन्दी का पहला पत्रिका ‘उर्दन्त मार्तण्ड’ 1826 ई० में निकला | इसी के बाद 1934 ई० में ‘प्रजामित्र’ का प्रकाशन होने लगा | 1854 ई० में श्यामसुंदर सेन ने पहला दैनिक-पत्र ‘सुधावर्षण’ कलकता
से निकला | इसके
माध्यम से पुरे भारतवर्ष में शिक्षा का प्रचार-प्रसार होने से आम लोगों में वैज्ञानिक
दृष्टिकोण और राष्ट्रीयता की भावना जगी |
इसी समय की सदी में भारतेन्दु का पर्दापन
हिन्दी साहित्य में हुआ | इसने
हिन्दी पत्रकारिकता, के माध्यम
से हिन्दी जगत् में पुर्नजागरण का आन्दोलन ओर ही तेज कर दिया | प्रार्थना समाज, आर्य समाज, सनातन धर्म, आदि सामाजिक संस्थाओं का प्रभाव जन –जीवन पर पड़ा, जिससे नई सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना विकसित हुई , लोग मातृभूमि और स्वराज के प्रति जागरूक हुए, स्वदेशी भावना को बल मिला जिससे मातृभाषा के
प्रति प्रेम की भावना बढ़ी, खड़ी बोली पूरे उत्तर भारत में पुनर्जगरण की भाषा बन गई |
भारतेन्दु ने 1873 ई० में लिखा है– हिन्दी नए चाल में ढली, सांस्कृतिक पुनर्जगरण के अन्तर्गत सामाजिक
कुरीतियों के प्रति सुधार की भावना विकसित हुई | इस तरह राष्ट्रीयता, देशप्रेम, सामाजिक सुधार भावना, स्वराज पाने की लालसा आदि भावनाओं का विकास
हिन्दी साहित्य के माध्यम से खड़ी बोली भाषा ने
ही किया |
नवीन परिस्थितियों और परिवेश से साहित्यिक
प्रवृति में दरबारीपन, संगीत
और कला में काफी उलट-फेर
हुआ | बंगला का प्रभाव आया | आधुनिक ज्ञान-विज्ञानं ने लोगों को बुद्धि सम्मत बना दिया | लोग ठोस अनुभव और बुनियादी सवालों के साथ जुड़े |
इस प्रकार से हिदी
साहित्य के आधुनिक काल में आम-जनजीवन के लिए काफी उलट-फेर की गतिविधियाँ हो रही थीं | जिससे आधुनिक काल की अवधारणा और पृष्ठभूमि स्वीकार की जा सकती है |