स्कंद गुप्त का चरित्र चित्रण
वीर पुरुष -
स्कंद गुप्त 'गुप्त वंश' के वीर और युवा राजकुमार हैं। इन्होंने शक और हूण आक्रमण से मालवा राज्य की रक्षा की है | मालवा में शक और हूण द्वारा हो रहे अत्याचार को सहन नहीं करता है | कष्ट सहकर भी आक्रमणकारियों से लोहा लेता है | प्रसाद जी नाटक में लिखते हैं - सिंहों के विहार स्थली (भारत) में श्रृंगाल वृन्द (आक्रमणकारी) सड़ा लोथ नोच रहे हैं | यह कथन स्कंदगुप्त गुप्त का है | इससे मालूम होता है कि स्कंदगुप्त वीर पुरुष हैं |
देशभक्त पुरुष -
स्कंद गुप्त देशभक्त राजकुमार हैं | इन्होंने मालवा राज की विदेशी आक्रमणकारियों से रक्षा की है | वह मालवा पर अधिकार नहीं चाहता और नहीं यश- प्रशंसा चाहता है, वह सिर्फ दुःख सहकर भी मालवा की रक्षा करना चाहता है | वह कहता है - "आर्य साम्राज्य का नाश इन्हीं आंखों को देखा है | हृदय काँप उठता है, देशाभिमान गरजने लगता है | मेरा स्थायित्व न हो, मुझे अधिकार की आवश्यकता नहीं | यह नीति और सरदारों का महान आश्रय वृक्ष गुप्त साम्राज्य हरा भरा रहे और कोई भी इसका उपयुक्त रक्षक हो | देश रक्षा के लिए ही वह सन्नवद्ध होता है, अनेक अंतर-बाह्य, प्रपंच-संघर्ष नहीं करता है | वह यही कहता है कि - भटार्क ! "यदि कोई साथी ना मिला तो साम्राज्य के लिए नहीं, जन्मभूमि के उद्धार के लिए मैं अकेला युद्ध करूंगा" तथा "देखना मेरे बाद जन्म भूमि की दुर्दशा न हो।"
संवेदित और मर्यादित प्रेमी पुरुष-
स्कंद गुप्त संवेदित और प्रेमी पुरुष है। मालवा को आक्रमणकारियों की अधीनता को सह नहीं सके। स्कंद गुप्त चिंतन प्रवृत्ति का है। जब भी वह किसी पर अत्याचार दिखता है, सह नहीं सकता और संघर्ष के लिए तैयार रहता है। इन्हीं सब गुण से नाटक में देवसेना, विजय आदि नारी पात्र प्रभावित होते हैं और स्कंद गुप्त से प्रेम करने लगते हैं। स्कंद गुप्त ने विजया और देवसेना के प्रेमी भाव को समझते हुए अपने को भी ब्रह्मचर्य जीवन जीने की शपथ लेता है।
आत्मविश्वासी, निस्वार्थ और मंगलमय पुरुष-
स्कन्दगुप्त आत्मविश्वासी, निस्वार्थ और मंगलमय पुरुष हैं। जिसके कारण इनका व्यक्तित्व बहुत सुंदर है। "जन्मभूमि सर्वदापी गरीयसी" का उपासक है, तथा "उसकी रक्षार्थ प्राणों की बाजी तक लगता रहता है बारंबार।"
साहसी, उत्साही और निर्भय पुरुष -
स्कंदगुप्त साहसी, उत्साही और निर्भय पुरुष हैं। मालवा-नरेश, बंधु वर्मा की सहायता, याचना पर उसका तुरंत मालवा पहुंचना हो, अथवा फिर माता देवकी की रक्षार्थ मगध जा पहुंचना। 'खिन्गल' जैसे आतातायी आक्रमणकारियों का सामना करना हो या 'कुमा के युद्ध' में असफल रह जाने पर भी पुन: सैन्य शक्ति एकत्रित करना। जन सामान्य तक को प्रेरित तथा जागृत करना उसके यह सभी कार्य उसकी वीरता का परिचायक है। स्कंद गुप्त का क्षत्रिय धर्म के प्रति कथन है- "शरणागत की रक्षा भी क्षत्रिय का धर्म है।"
स्कंदगुप्त के अन्य गुण चरित्र
स्कंद गुप्त धीरोधात वर्ग के नायक है। जैसे - राज कुल उत्पन्न, भव्य व्यक्ति का धनी, वीर कर्तव्य निभानेवाला, दृढ़ प्रतिज्ञा करने वाला, धार्मिक प्रवृत्ति संपन्न, सतत्कर्मनिष्ठ तथा प्रभावशाली व्यक्ति हैं ।
निष्कर्ष है कि 'स्कंदगुप्त' नाटक में 'स्कंदगुप्त' कर्मवीर और उदात्त व्यक्तित्व वाला महापुरुष है। इन्हीं सब गुण से इसके प्रति लोग श्रद्धा और भक्ति से आकर्षित होते हैं। स्कंदगुप्त उत्तम चरित्र का सृजक और उत्तम चरित्र का व्यक्तित्व वाला, हिंदी साहित्य का अनुपम इतिहासिक महापात्र हैं।
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