Wednesday, July 3, 2024

'कोशी का घटवार' कहानी की समीक्षा (शरद जोशी)

 'कोशी का घटवार' कहानी की समीक्षा

कौशिकी घटवार कहानी नई कहानी युग के प्रतिनिधि कहानीकार शरद जोशी द्वारा लिखी गई है। यह यथार्थवादी कहानी है । इस कहानी में लेखक ने पहाड़ी जनजीवन को और परिवेश को चित्रित किया है। कहानी के मुख्य पात्र में गोसाई और लक्षमा हैं । इनकी अलावे और दस गौण पात्र हैं। कुल पात्रो को देखा जाए तो संख्या के आधार पर बारह हैं । विजय मोहन सिंह ने इस कहानी को पहाड़ी आंचलिकता की कहानी कहा है।

कहानी की कथावस्तु- 

        'कोशी की घटवार' कहानी में गोसाई और लक्षमा  के उद्धत प्रेम की कथा को प्रस्तुत किया गया है । गोसाई और लक्ष्मा दोनों एक दूसरे से प्रेम करते हैं। गोसाई अनाथ है और फौज में नौकरी करता है । लक्षमा का पिता यह सोचकर कि उसके आगे पीछे भाई-बहन नहीं, माई-बाप नहीं, परदेस में बंदूक की नोंक पर जान रखने वालों को छोकरी कैसे दे दें हम। वह लक्षमा की शादी अन्य लड़के के साथ कर देता है। एक बच्चा होने के बाद लक्ष्मण विधवा हो जाती है। और उससे मै के आकर रहना पड़ता है । पिता का निधन होने के बाद चाचा-भतीजे समझते हैं कि लक्षमा अपने पिता का हक मांगेगा लेकिन लक्ष्रमा कहती है कि मुझे पिताजी के हिस्से का कुछ नहीं चाहिए। उधर पंद्रह साल फौज में नौकरी करने के पश्चात गोसाई गांव में आकर अपने अकेलापन को दूर करने के लिए गेहूं पीसने का घट 'पनचक्की' लगता है। एक दिन चक्की पीसने आई हुई लक्षमा के साथ गोसाई की मुलाकात होती है दोनों में वार-तलाप होता है । गुसाई भी अविवाहित है, अकेलेपन से पीड़ित है। वह चाह कर भी विधवा लक्षमा के साथ विवाह नहीं कर पाता क्योंकि समाज की मान्यता उसे ऐसा करने नहीं देती । कहानी में दोनों के अकेलेपन की पीड़ा को व्यक्त किया गया है। कुल मिलाकर कहें तो यह स्वतंत्र उत्तर भारत की प्रतिनिधि कहानी है। इसमें भारतीय मध्यम वर्गीय और निम्न वर्गीय सामाजिक जनजीवन को चित्रित किया गया है।

देशकाल और वातावरण -
            शरद जोशी द्वारा लिखी गई कहानी 'कोशी  की घटवार' स्वतंत्रयोत्तर काल के नई कहानी युग की रचना है। कहानीकार ने इस कहानी के माध्यम से मध्यवर्गीय और निम्न वर्गीय सामाजिक जीवन के परिवेश और वातावरण को दिखाया है। इसके अंतर्गत इन्होंने एक पहाड़ी समाज और परिवेश के जीवन को लिया है, इनके माध्यम से जीवन में प्रेम की असफलता, अकेलेपन की पीड़ा, निश्छल प्रेम की  अभिव्यक्ति, मानसिक अन्तर्द्वन्द, गरीबी एवं दरिद्रता का चित्रण, विधवा विवाह की समस्या को चित्रित की है। कुल मिला कर शरद जोशी ने आजादी के बाद की सामाजिक मुलहीनता एवं वर्ग विषमता की परिवेश को इस कहानी के केंद्र में रखा है।

पात्र योजना- 
        इस कहानी में कुल 12 पात्र हैं किंतु मुख्य दो पात्र हैं इसमें लक्षमा और गोसाई । गौण पात्रों में नरसिंह (बूढ़ा प्रधान), धरम सिंह (हवलदार), रमुआ/राम सिंह (लक्षमा के पति), किशन सिंह (गोसाई के युनिट का सिपाही), लक्षमा का लड़का, लक्षमा के जेठ-जेठानी, लक्षमा के काका-काकी आदि हैं। पात्र भारत के पारंपरिक सामाजिक और नैतिक हैं जो पूरी नैतिकता के साथ समाज में जीवन जीते हैं। पात्र पूरी तौर से समाज में पारदर्शी जीवन जीते हैं। पात्र में सामाजिक रूढ़िवादी इतनी हावी है कि प्रेम हार जाता है।

संवाद योजना-
  कोसी के घटवार कहानी की संवाद योजना पात्र अनुकूल और कहानी के परिवेश के अनुकूल है। कहानी में ग्रामीण पहाड़ी जनजीवन है। पात्र भी पहाड़ी जनजीवन की गवार, ठेठ सामाजिक परिवेश के लोग हैं। उनकी संवाद योजना परिस्थिति के अनुकूल है। जैसे लक्षमा और गोसाई के संवाद में- गोसाई ने बच्चों की ओर देखा । वह दोनों हाथों में चाय का मग थामें हमें टकटकी लगाकर गुसाई को देखे जा रहा था । लक्षमा ने आग्रह के स्वर में कहा, "चाय के साथ खानी हो, तो खा लो । फिर ठंडी हो जाएगी।"
" मैं तो अपने टेम से ही खाऊंगा। यह तो बच्चे के लिए ... "   स्पष्ट कहने में उसे झिझक महसूस हो रही थी, जैसे बच्चों के संबंध में चिंतित होने की उसकी चेष्टा अनाधिकार हो।
 'बा - बा जी ! वह तो अपने घर से खाकर ही आ रहा है । मैं रोटियां बना कर रख आई थी ।" अत्यंत संकोच के साथ लक्षमा ने आपत्ति प्रकट कर दी। कहानी की संवाद योजना कहानीकार के लक्ष्य को पूरी तरह से संवहन किया है। इसके माध्यम से कहानीकार की विषय और पत्रों की मनोदशा पूर्ण रूप से स्पष्ट हो जा रही है।


शैली- 
       कहानी फ्लैशबैक शैली पर आधारित है। कहानी में पीछे के पुराने कथा को भी चित्रित किया गया है ।जिससे फ्लैशबैक शैली उपस्थित हो गई है, यथा- सामने पहाड़ी के बीच की पगडंडी से सर पर बोझ लिए एक नई आकृति इस और चली आ रही थी, गोसाई ने सोचा वही से आवाज देकर उसे लौटा दें। कोसी ने चिकने, काई लगे पत्थरों पर कठिनाई से चलकर उसे वहां तक जाकर केवल निराशा लौट जाने को क्यों वह बाध्य करें। यहां पर भूतकाल में बात हो रही है जो फ्लैशबैक शैली का स्पष्ट उदाहरण है।

कहानी की भाषा -
    कहानी की भाषा पूरी तरह से पात्रोनुकूल और विषय के अनुकूल है । पात्रों में सिर्फ संवाद ही नहीं है बल्कि इसकी अभिव्यक्ति में कहानी की उद्देश्य पूरी समर्थकता के साथ स्पष्ट हो जाती है। कहानी की भाषा में आम भारतीय जन जीवन की तरह सहज, सरल और बोधगम्य है। भाषा कोसी नदी की तरह सहज और सरल है। भाषा में किसी भी तरह का आडंबर नहीं है।

कहानी का उद्देश्य-
     कहानीकार इस कहानी के माध्यम से स्वतंत्रयोत्तर भारत के जनजीवन को उजागर करने का प्रयास किया है खासकर ग्रामीण मध्यम वर्गीय और निम्न वर्गीय के जीवन को। जिनके माध्यम से ग्रामीण जीवन की सामाजिक, आर्थिक दशा को दिखाया गया है। कहानी में चित्रित है कि सामाजिक रीति परंपरा की दुर्दशा के चलते ही पात्रों की जीवन लक्ष्य लाचारी और कठिनाई से भरी हुई है।

        निष्कर्ष है कि शरद जोशी द्वारा लिखी गई कहानी 'कोशी की घटवार' यथार्थवादी सामाजिक कहानी है ।इसके माध्यम से कहानीकार ने भारत की पारंपरिक रीति रिवाज से ग्रस्त मानव जीवन को कठिनाई की लाचारी भरी जीवन से जीने की व्यवस्था को दिखाया है।


       

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