Friday, January 30, 2026

अमीर खुसरो के दोहे, मुकरियाँ और गीत /amir khsro ke dohe mukriyan or geet

  


                                    अमीर खुसरो के दोहे, मुकरियाँ और गीत

 

1.     एक नार किया ----------------------------------------------- हो जाबे ||

 

परिचय – व्याख्येय पंक्तियाँ पाठ्य पुस्तक ‘काव्य कुंज’ से ली गई हैं | ये पंक्तियाँ हिन्दी साहित्येतिहास में आदिकाल के साहित्यकार अमीर खुसरो द्वारा रचित ‘पहेली’ शीर्षक से गृहित है | इसमें कवि दर्पण से सम्बद्ध पहेली के माध्यम से प्रियतम के प्रति प्रियतमा के श्रृंगार भावना को चित्रण किया गया है |

प्रसंग/प्रकरण – कवि खुसरो प्रेमाश्रयी संत कवि निजामुद्दीन औलिया के शिष्य परम्परा में आते हैं | खुसरो और औलिया के बीच गुरु-शिष्य के साथ ही ईश्वर-भक्त का सम्बन्ध है | अत: भक्त कवि खुसरो प्रेमाश्रयी भक्ति धारा के आधार पर ईश्वर-भक्त के सम्बन्ध को दर्पण के माध्यम से उपस्थित किये हैं |

व्याख्या – कवि कहते हैं कि प्रियतम को प्रियतमा पसन्द करती है | क्योंकि पुरे शरीर में पानी है, पर वास्तविक सच्चाई है कि तन में प्रफुलता है किन्तु इसमें पानी नहीं है | सच्चाई तो यह की प्रियतमा अपने प्रियतम को ह्रदय में सहेजे रखती है और जब प्रियतम को अपना मुख दिखलाती है तब वह पूरी तरह पी मय यानि प्रियमय हो उठती है | तात्पर्यत: आईना प्रियतमा को प्रिय है जिससे अपने को देखती है, और खुद ही प्रियतम की ध्यान लगाकर प्रियमय हो जाती है |

काव्य बिशेष – 1. आईना के माध्यम से प्रियतमा द्वारा प्रियतम के प्रति होने वाले भावनाओं का चित्रण है |

                2, कविता की भाषा प्रारंभिक खड़ी बोली हिन्दी है

                3, अन्योक्ति, मानवीय और अनुप्रास अलंकार की छंटा है |

               4, माधुर्य – गुण, श्रृंगार व शांत रस, तथा व्यंजना शब्द शक्ति, प्रतीक योजना में वक्रता के साथ संगीतबद्ध है |

2.     चास मास ------------------------------------------------- कैसे ?

परिचय – ये पंक्तियाँ अमीर खुसरो के पहेलियों से गृहित हैं | इसमें कवि पिंजड़े के माध्यम से मानव शरीर के निर्माण की रहस्यात्मकता को उदघाटित किये हैं |

व्याख्या – कवि कहते हैं कि मानव शरीर में चर्म और मांस के आलावे असंख्य रंध्र होते हैं | पर यह आकृति कैसी है जिसमें हड्डियों के ढांचों के बीच-बीच में रंध्र तो हैं पर चर्म और मांस नहीं हैं | यह देखकर कवि को आश्चर्य होता है कि इस आकृति में जीव आखिर कैसे बसती है अर्थात् पछी जिस पिंजड़े में रहता है उसमें भी असंख्य रंध्र होता है और हाड़-मांस रूपी लोहे के पतले-पतले पत्तर होते हैं |

काव्य बिशेष – 1. पिजड़े की पछी के बहाने मानव शरीर में वास करने वाले जीव के प्रति कुतुहल की गई है |

                   2, कविता की भाषा प्रारम्भिक खड़ी बोली हिन्दी है, जिससे हिन्दुवी कहा जाता है |

                   3, रूपक, मानवीकरण और अनुप्रास अलंकार है |

                  4, माधुर्य काव्य गुण, श्रृंगार व शांत रस के साथ-साथ व्यंजना शब्द शक्ति और प्रतिक योजना में रहस्यात्मकता और संगीतात्मकता है |

                   5, पहेली पद छंद में है |  

3.                   गौरी सोवे ....................................................देस |

 

परिचय – प्रस्तुत व्याख्या पंक्तियाँ पाठ्य पुस्तक ‘काव्य कुंज’ से ली गई है | ये दोहे हिन्दी साहित्य के इतिहास से आदिकाल के खड़ी बोली भाषा के प्रवर्तक कवि  अमीर खुसरो के ‘दोहे’ से ली गई है | इसमें कवि प्रेममार्गी धारा को अपनाते हुये  नायिका रूप से अपने भक्ति भाव को गुरु के प्रति दिखाई है | अर्थात् सामान्य मनुष्य को भी नायिका रूप में तथा ईश्वर को पुरुष रूप में स्पष्ट किये हैं | यहाँ गुरु के मृत्यु होने और मृत्यु शय्या में रहने की स्थिति को नायिका रूपी गुरु को ईश्वर रूपी नायक के साथ मिलन की स्थिति को दिखाया है |

प्रकरण/प्रसंग – अमीर खुसरो के गुरु संत निजामुद्दीन औलिया प्रेममार्गी शाखा के साधक थे | एक दिन अमीर खुसरो गुरु से कहीं दूर चले गये थे, समाचार मिली की गुरुकी मृत्यु हो गई, सुनते ही अपने गुरु के पास आ गये | गुरु को मृत्यु शय्या में देखकर प्रेमभाव से ये दोहे मुख से उधृत हो जाते हैं |

व्याख्या -  कवि कहते हैं कि गुरु मृत्यु शय्या में है अर्थात् इन्हें ईश्वर रूपी पति से मिलन हो गया है | आगे कवि कहते कि अब गुरुदेव अपने स्वामी को पाकर चारों दिशाओं से भयरहित होकर सो सकते हैं | अर्थात् गुरु को अब सांसारिक दुःख तकलीफ नहीं होगी क्योंकी ईश्वर रूपी पति इन्हें मिल गया है | अर्थात् इनके पति ईश्वर इन्हें चारों ओर से सुरक्षा देगें |

काव्यगत विशेषता – 1.प्रेममार्गी भक्तिभावना के आधार पर संसारिकता से मुक्ति के भाव को अभिव्यंजित किया गयाहै 

                                 2, भाषा खड़ी बोली हिन्दी है जिसमें क्षेत्रीय भाषाएँ, ब्रज, अवधी, राजस्थानी आदि बोलियों का

                                      समिश्रण है |

                                  3, ‘मुख पर डारे केस’ में रूपक अलंकार तथा सम्पूर्ण कविता में अनुप्रास अलंकार की छंटा है |

                                 4. संसारिकता के अभिव्यक्ति को रहस्यात्मकता के साथ प्रतिक रूप से स्पष्ट किया है | यहाँ भक्ति

                                      काल के तथ्यों का भी उदभव है |

                              5. शब्द शक्ति व्यंजना, प्रसाद व माधुर्य काव्य गुण, शांत रस के साथ संगीतात्मकता भी है |

                              6. यह कविता दोहे छंद में लिखी गई है |

                 इस प्रकार भाव व कला पछ की दृष्टि से प्रेममार्गी भक्तिभावना के आधार से ईश्वर के प्रति मिलन की रहस्यात्मक तथ्यों को उजागर करने वाला आदिकाल की प्रमुख काव्यधारा है |

4.     सजन सकारे ---------------------------------------------------- होय ||

परिचय – व्याख्येय पंक्तियाँ अमीर खुसरो के दोहे से उद्धरित हैं | कवि इन पंक्तियों में भक्त के विरह भाव की अभिव्यक्ति दी है |

व्याख्या – कवि कहते हैं कि प्रियतम को एक दिन बुलाया ही जाएगा और उसके नयन रोते हुये मरेंगे | विधाता से प्रार्थना है कि रात को इतनी बड़ी कर दे की कभी भोर हो ही नहीं |

काव्य बिशेष – 1. कविता में शाश्वत सत्य की अभिव्यक्ति हुई है जो रहस्यात्मक रूप में उपस्थित है |

                    2, भाषा प्रारम्भिक हिन्दी है जिससे हिन्दुवी कहते हैं |

                     3, कविता में मानवीय, अनुप्रास अलंकार की उपस्थिति है |

                     4, कविता दोहे छंद में है |

                     5, माधुर्य गुण, व्यंजना शब्द शक्ति, शांत रस के साथ ही संगीतात्मकता विराजमान है |

 

5.     बाला था ---------------------------------------------------------------- गाँव ||

परिचय – व्याख्येय पंक्तियाँ खड़ी बोली हिन्दी भाषा के प्रवर्तक अमीर खुसरो द्वारा रचित हैं | ये पंक्तियाँ मुकरी में संकलित हैं | इसमें कवि यश की क्रामिक अभिवृद्धि से उत्पन्न सांसारिक सत्य की अभिवृद्धि की गयी है |

व्याख्या  - कवि कहते हैं कि जब यश मिलना आरम्भ हुआ तब सबको अच्छा लगा, सबने प्रशंसा की, पर यह यश जब ज्यादा मिल गया तब वह यश किसी को अच्छा नहीं लगा अर्थात् किसी के काम की नहीं हुई | खुसरो जब उस नाम को बुझाने के लिए कह दिया तब नहीं बुझने पर गाँव छोड़ने के लिये कहा गया |

काव्य बिशेष – 1. कविता में यश की क्रमिक अभिवृद्धि से उत्पन्न सांसारिक सत्य की अभिवृद्धि की गई है यहाँ ‘बाला’ शब्द यश रूपी प्रकाश के बढ़ने के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है तथा यश के अधिक बढ़ जाने पर किसी के कुछ काम नहीं आने की बात कही गई है |

                 2, भाषा प्रारम्भिक खड़ी बोली हिन्दी है जिससे यहाँ हिन्दुवी कहा जाता है |

                   3, अन्योक्ति एवं अनुप्रास अलंकार है |

                    4, माधुर्य गुण, श्रृंगार व शांत रस, व्यंजना शब्द शक्ति, पद छंद, तथा संगीतबद्धता है |

6.     मेरा जोबन नेवल ------------------------------------------------रूसा ही जाए ||

परिचय – व्याख्येय पंक्तियाँ खड़ी बोली भाषा के प्रवर्तक अमीर खुसरो द्वारा रचित हैं | ये पंक्तियाँ अमीर के रचित ‘गीत’ शीर्षक रचना से उद्धरित है | कवि द्वारा यहाँ भरे यौवन में सर्वोच्य सत्ता द्वारा कवि के वैभव को बख्ये जाने की बात लेकर कवि के आत्मव्यथा को अभिव्यक्ति की गई है |

व्याख्या –  कवि कहते हैं कि इसका यौवन नया और जीवनोत्साह से भरा पूरा है फिर भी सर्वोच्य सत्ता ने इसके यौवन-वैभव को बख्श दिया है | कवि पुन: कहते हैं कि कोई गुरु निजामुद्दीन औलिया को समझाये क्योंकि कवि स्वयं गुरु को जितना समझाते हैं गुरु उतने ही रुठते जाते हैं |

काव्य बिशेष – 1. इन पंक्तियों में खुसरो द्वारा गुरु के प्रति आत्माभिव्यक्ति हुई है |

                    2, कविता की भाषा हिन्दुवी है |

                       

7.     छापा तिलक ----------------------------------------------------------------------------------मिली के ||

 

परिचय – व्याख्येय पंक्तियाँ अमीर खुसरो रचित गीत है | ये हमारे पाठ्य पुस्तक ‘काव्य-कुंज’ से ली गई है | जो आदिकालीन खड़ी बोली भाषा के पवर्तक अमीर खुसरो के रचना ‘गीत’ में संकलित है | इसमें कवि अमीर के वैराग्य भावना को संकलित किया गया है |

प्रकरण/प्रसंग – कवि अमीर खुसरो भारतीय इतिहास के मध्यकाल के राज्याश्रित कवि रहे हैं | इन्होंने प्रसिद्ध सूफी संत निजामुद्दीन औलिया के अनन्य भक्त व शिष्य कवि का स्थान प्राप्त किया है | निजामुद्दीन तथा अमीर खुसरो के आश्रयदाता राजा के बीच पटती नहीं थी | इस द्वन्द्व के बावजूद भी इन पंक्तियों के द्वारा गुरु के प्रति वैराग्य और प्रेम को सूफी-भक्ति भावना के अनुसार व्यक्त किया है |

व्याख्या – कवि कहते हैं कि मैं जब से गुरु से संबंध जोड़ा है तब से छापा-तिलक का त्याग  किया है | अर्थात् सदा अभिन्न व सुहागिन रहने के लिये माथा में तिलक धारण नहीं किया है यानी मैं बादशाह गयासुद्दीन के बजाय निजामुद्दीन औलिया को पाकर धन्य  हो गया हूँ | अत; मैं सदा सुहागिन ही रहना चाहता हूँ |  

काव्यगत बिशेषता – 1.  खुसरो द्वारा अपने गुरु के प्रति कृतज्ञता का भाव प्रकट हुआ है |

                           2, भाषा खड़ी बोली हिन्दी का प्रारम्भिक रूप है, जिसमें राजस्थानी,हिन्दवी, ब्रज, अवधी, पंजाबी

                               आदि का समिश्रण है |

                           3, रहस्यात्मक व प्रतीकात्मक की भाव है |

                            4, रूपक,अनुप्रास और मानवीय अलंकार है |

                          5, मधुर व प्रसाद काव्य गुण, व्यंजना शब्द शक्ति, श्रृंगार व शांत रस, पद छंद में लिखित संगीतबद्ध है |




हमारी  अन्य लेख -  विद्यापति की काव्य कला








Tuesday, January 27, 2026

विद्यापति की काव्य कला /vidyapti ki kavy kla

                                                           


                                                विद्यापति की काव्य कला

 

                महाकवि विद्यापति अपने काव्यकला के सौन्दर्य से ही अभिनय जयदेव, मैथिल-कोकिल, कंठहार कवि आदि के उपाधि से विभूषित हुये हैं | इनकी काव्य बिषय को  कला पछ सरिता की भांति सरस प्रवाहित होने में सहायक है | भावों व कलाओं की मिठास व रस  से  ही महाकवि रसराज की उपाधि पाई थी | ऐसे उपाधि से सम्मानित कवि की कलात्मकता को निम्न प्रकार से उपस्थित किया जा सकता है |

1.     काव्यरूप – विद्यापति प्रबन्ध व मुक्तक दोनों तरह की काव्य रचना की है | कीर्तिलता और कीर्तिपताका प्रबंधात्मक शौर्य गाथा है और पदावली गेय मुक्तक काव्य रचना है |

2.     गीतात्मकता – विद्यापति के काव्य भारतीय गीत परम्परा की महत्वपूर्ण कड़ी है | पदावली तो गेयपदों का समूह है | इनकी गीतों को तीन श्रेणियों में बाँटा जा सकता है, पहला शास्त्रीय संगीत के पद दुसरे देवस्तुति में गाये जाने वाले भजन तीसरे में लोक-जीवन में गाये जाने वाले गीत जिसमें कोहसार से लेकर जंनसार तक के गीत हैं  | ये गेय पद मिथिला के लोककंठों में हैं |

3.     ध्वन्यात्मकता – इनके पदों में ‘रे’ टेप की ध्वन्यात्मकता है | जैसे – ‘के पति आ लए जाए तरे’ या ‘सुतल छलहुँ हम घरवारे ‘ यहाँ “रे” ध्वन्यात्मकता को प्रकट कर रहा है | अत: इनके काव्य में संगीतात्मकता के साथ ही ध्वन्यात्मकता की सौन्दर्य विराजमान है |

4.     बिम्ब योजना – पदावली के पदों में नायक-नायिका के रूप सौन्दर्य वर्णन के समय रूपक या बिम्बों का प्रयोग धड़ल्ले से किया गया है | इनकी बिम्ब-योजना इतनी सटीक है कि कवि जो चित्र उपस्थित करना चाहता है वह उपस्थित हो जाता है | जैसे- कुच युग ऊपर चिकुर फुजी पसरल

                                   ता अरुझाएल हारा |

                                   जनु सुमेरु उपर मिलि ऊगल

                                    चान्द बिहुनि सबे तारा ||

                        यहाँ नायिका के ऊरोज के ऊपर फैले हुये  बाल जो हार के साथ उलझ गये हैं का विम्ब द्रष्टव्य है |  

5.     चित्रात्मकता – विद्यापति के पदों में चित्रात्मकता मुख्य कला है | पदों में जिस  बिषय की कथा कही जाती इसका स्वरूप उभरता जाता है पाठक को लगता है कि वही दृश्य सामने प्रकट होकर घटित हो रहा है | जैसे –

                      नव वृन्दावन नव नव तरूगण

                       आएल ऋतुपति राज बसंत | यहाँ बसंत ऋतु के समय की प्रकृति को चित्रित किया गया है |

6.     अलंकार योजना – विद्यापति के कलापछ में अलंकार-योजना भी महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है |अलंकार की छंटा ने विद्यापति को अलंकारवादी कवि के श्रेणी में ला खड़ा करता है | नायक-नायिका के सौन्दर्य वर्णन में वय:संधि, सद्यःस्नाता, रूप-चित्रण, रूप-लिप्सा और नख-शिख वर्णन के समय इन्होंने अनुप्रास, उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, रूपकातिश्योक्ति आदि अलंकारों की झड़ी लगा दी है | जैसे -

                             पल्लवराज चरन युग सोभित, गति गजराजक आगे |

                            कनक कदलि पर सिंह समारल,तापर मेरु सभागे ||

                             मेरु उपर दुई कमल फुलाएल,काल बिना रूचि पाई |

                             मनिमय हार धार बहु सुरसरि, तओ नहिं कमल सुखाई ||

7.     काव्य भाषा – पदावली की भाषा मैथली है | कीर्तिलता और कीर्तिपताका की भाषा अवहट्ट है | भू-परिक्रमा, शैवसर्वस्वसार, पुरुषपरीक्षा, दानवाक्यावली आदि ग्रन्थों की भाषा संस्कृत है |

                         इसप्रकार विद्यापति की काव्यकला निश्चय ही सरस, सहज और सुकोमल है | सच कहा जाय तो विद्यापति ही सर्वप्रथम हिन्दी साहित्य में भक्ति परम्परा के प्रथम गायक कवि हैं |   


hमारी अन्य लेख -          अमीर खुसरो की काव्यगत विशेषता  

 

Monday, January 26, 2026

                     


                                                      अमीर खुसरो के काव्य/रचनाओं की विशेषता

           अमीर खुसरो आदिकालीन खड़ी बोली हिन्दी भाषा साहित्य के प्रवर्तक साहित्यकार हैं | इन्होंने काव्य भाषा में आम –जनों के भाषा के साथ उर्दू-फारसी शब्दों को मिलाकर खड़ी बोली हिन्दी के रूप में प्रतिष्ठित किया | इस प्रकार काव्य भाषा में परम्परा से संस्कृत, पालि, प्राकृत, अपभ्रंश, अवहट्ट के बाद खड़ी बोली हिन्दी के रूप में आने लगी | साथ ही काव्य के विषय पछ में दरबारी काव्यों के साथ सम्प्रदाय निरपेक्ष लौकिक साहित्य दृष्टिगोचर हुई |आधुनिक हिन्दी भाषा साहित्यकारों ने निम्न प्रकार के विशेषताओं को पाया है –

1.                                                                                                आम-जन के विषयक काव्य

 अमीर के पूर्व या समकाल में साहित्यकार दरवारी, धार्मिक, सम्प्रदायों से सम्बन्धित विषयक रचनाएँ होते थे | अमीर ने काव्य के विषय पछ को साधारण जन से सम्बन्धित तत्व जैसे – दर्पण, पान, बादल, आकाश, आदि को स्थान दिया | यथा –

                                         अरथ तो इसका बुझेगा | मूँह देखो तो सूझेगा ||    -दर्पण

2.                                                                                                                     उक्ति-वैचित्रता 

         – अमीर के काव्य में उक्ति –वैचित्रता की प्रधान्य है | अपनी विषय को कुतुहुलता के साथ लेट हैं , जिससे उक्ति वैचित्रता की कला और ही गहराई के साथ पाठक के मानस ह्रदय में उभर आती है | विषय में उक्ति-वैचित्रता इतनी है कि कविता पाठक से कोई उत्तर की प्राप्ति के लिये ललायित रहता है | जैसे –

                        एक थाल मोटी से भरा | सबके सिर पर औंधा धरा ||

                     चारों ओर वह थाली फिरे | मोती उससे एक न गिरे ||    -आकाश

3.                                                                                                                मसनवी पद्धति का विकास 

– मसनवी पद्धति उर्दू साहित्य की प्रधान विधा है पर हिन्दी साहित्य में उर्दू से ही आयी है | माना जाय तो अमीर खुसरो ने ही इसे हिन्दी में प्रवर्तन किया | मसनवी यानि नायिका द्वारा प्रेम की चाहत में नायक के प्रति सदैव चिन्तामग्न होकर अकेली सोचते रहना है| आधुनिक साहित्यकारों ने हिन्दी साहित्य में मसनवी को मनोवैज्ञानिकता का सबसे अच्छा उदाहरण प्रस्तुत किया|

4.                                                                                                                                         रहस्यात्मकता 

-                  अमीर खुसरो के काव्य काव्य रहस्य भावना के पहले द्रष्टा हैं | इनके काव्य वैचित्रता व कुतुहुलता से रहस्यवाद को पैदा करते हैं | रहस्यता की झाँकी अमीर ने गुरु निजामुद्दीन के बीच प्रेम की अभिव्यक्ति में सटीक रूप से उपस्थित किया है | सच कहा जाय तो हिन्दी साहित्येतिहास में आध्यात्मिकता के कविता में रहस्य भावना का सर्वप्रथम प्रवर्तन किया है |इसमें आदिकालीन नाथ, सिद्ध कवि के साथ-साथ सम्प्रदाय निरपेच्छ धारा के कवियों का भी योगदान रहा है |

5.                                                                                        खड़ी बोली हिन्दी को प्रतिष्ठित साहित्य भाषा की दर्जा

          – अमीर खुसरो के पहले प्रतिष्ठित साहित्य की भाषा संस्कृत, पालि, प्राकृत. अपभ्रंश तथा अवहट्ट था | पर अमीर ऐसे साहित्यकार निकले जिन्होंने आमजनताओं के बीच के भाषा को काव्य का दर्जा दिया इसलिए अमीर को खड़ी बोली हिन्दी भाषा के प्रवर्तक के रूप में माना जाता है |

6.                                                                                                                                                     तुकबन्दियां

– अमीर खड़ी बोली हिन्दी भाषा काव्य के जनक हैं | इन्होंने इस भाषा को काव्य के भाषा के तौर पर इतनी प्रतिष्ठित किया कि काव्य में तुकबंदियों का एक विशेष कला उभर आयी | इस कला को भक्तिकालीन, रीतिकालीन कवियों ने प्रधान कला के रूप में स्वीकार किया |

7.                                                                                                                                      रसीले गीत और दोहे 

–अमीर खुसरो संगीतज्ञ भी थे | प्रसिद्ध वादक तबले का विकास सर्वप्रथम किया था | अत: संगीत के इस ज्ञाता ने नाथ और सिद्ध सम्प्रदाय के अरसीले तत्वों से मुक्त करके लौकिकता में भी अलौकिकता के विषय को रसीले दंढंग से प्रस्तुति दी |

8.                                                                                                                                             मनोरंजनात्मक काव्य 

–                         हिन्दी साहित्य में आदिकालीन हिन्दी साहित्य दरवारों के लिये ही लिखे जाते थे | राज्य के आम-जनताओं या साधारण लोगों के लिये नहीं होते थे | इस पृष्ठिभूमि में अमीर खुसरो ही सर्वप्रथम ऐसे कवि साहित्यकार हैं जिसने साधारण जनों के लिये लिखा जिससे आम-आदमी भी साहित्य के रस को पान करने लगे | खुसरो के काव्य के प्रधान तत्व वैचित्र्यता, कुतुहल, रहस्यात्मकता, मसनवी आदि तत्वों को समझ-समझकर मनोरंजन करने लगे |

9.                                                                                                                           भाषा कोशीय ग्रन्थ के संथापक 

                               – अमीर खुसरो साहित्य में कुतुहल, विचित्र्यता,रहस्य. मसनवी आदि भावों की स्थापना ही नहीं किया बल्कि खलिकबारी जैसे कोशीय ग्रन्थ की रचना करके हिन्दी भाषा में उर्दू-फारसी के शब्दों को समिश्रण करने में सहुलियत प्रदान की है |

10.                                                                  नवीन छंदों के संस्थापक

                       – अमीर ने गजल, मुकरी, गीत आदि नवीन छंदों की स्थापना दी है | आधुनिक काल में ये छंद सबसे प्रचलित और लोकप्रिय छंद में हैं |


             अन्य लेख -- पश्चायत काव्यशास्त्र का वस्तुनिष्ठप्रश्नोत्तर



                                    

 

 

 

 

Monday, September 29, 2025

पाश्चात्य काव्यशास्त्र का वस्तुनिष्ट प्रश्नोत्तर/ pashchaaty kavyashaastr ka vstunisht prshonttor

    पाश्चात्य काव्यशास्त्र का वस्तुनिष्ट प्रश्नोत्तर



         

प्रमुख आलोचक और समयावधि

                 

प्लेटो = 427 इस्वी० पू० – 347 इस्वी०पू०  

 अरस्तू = 384इस्वी०प - 322इस्वी०पू० 

 लोंगिनुस = प्रथम या तृतीय शताब्दी ई०

 विलियम वर्ड्सवर्थ = 1770 -1850 ई० 

 सौमुअल टेलर कोलरेज = 1772 – 1834 ई० 

 बेनेदेत्तो क्रोचे = 1866-1952 ई०

 टामस स्टनर्स इलियट = 1888 – 1965 ई० 

 ईवर आर्मस्ट्रोग रिचर्ड्स = 1893 -1979 ई०

 

@ प्रमुख आलोचक एवं रचनाएँ -

            आलोचक                       - रचना

प्लेटो                               -  इओन, सिंपोसियोन, पोलितेइया, फएदरस, नोमोई, लाँज, रिपब्लिक, 

अरस्तू                              -  तेखनेस रितोरिकेस, (भाषाशास्त्र)

                                                  परिपोइतिकेस (काव्यशास्त्र)

            लोंगिनुस                        -  पेरिइप्सुस

वर्ड्सवर्थ                          - ‘लिरिकल बैलड्स’ की भूमिका

कोलरिज                          - बायोग्राफिया लिटरेरिया (1817) द फ्रैंड,एड्स टू      रिफ्लेक्शन,चर्च एण्ड   स्टेट, कंफेशंज आफ इनक्वायरिंग स्पिरिट

क्रोचे                               - एस्थेटिक (न्यू एसेज आन एस्थेटिक)

रिचर्ड्स                                    - दि  फाउंडेशन्स आँफ ईस्थेटिक्स (1922) दि मीनिग आँफ मीनिग (1923),   दि प्रिंसिपुल्स आँफ लिटररी क्रिटिसिज्म (1924)प्रैक्टिकल क्रिटिसिज्म

               (1929) साइंस एंड पोएट्री, दि फिलोसोफी आँफ रेटारिक (1936),

                                              कालरिज आँफ एमेजिनेशन,वियोड,एक्सपेरिमेंट्स इन मल्तिपिल

                                                डेफिनिशन, बेसिक रुल्ज ऑफ रीजन, इंटरप्रटेशन इन टीचिंग,

टी.एस.एलियट                        -   दि सेक्रेड वुड (1920), सिलेक्टेड एसेज, एसेज एन्शेंट एंड माँडन, होमेज

                                               टू जाँन डाइडन, एलिजाबेथन एसेज, द यूज आफ पोएट्री एंड द यूज आफ

                                               क्रिटिसिज्म !

प्रमुख सिद्धांत और प्रवर्तक -            

                        प्रमुख/सिध्दांत                                  -  प्रवर्तक

                        प्रत्ययवाद                                   -  प्लेटो

                        अनुकृति एवं विरेचन, त्रासदी       -   अरस्तू

                        उदात्त                                        - लोंगिनुस

                        संप्रेषण एवं मूल्य                         -  रिचर्ड्स       

                        वस्तुनिष्ट समीकरण                     -  इलियट

                             निवैयक्तिकता का सिध्दांत       -  इलियट

                            संवेदनशीलता का असाहचर्य     - इलियट   

                        परम्परा की परिकल्पना एवं

                             व्यैक्तिकता का सिध्दांत             -  इलियट

                             अभिव्यंजनावाद                        -  क्रोचे

                             कल्पना सिध्दांत                        -   कोलरिज

                               द्वन्द्ववाद                                   -   हीगेल

                                द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद              -  कार्लमार्क्स

                               महान यथार्थवाद                       -  जार्ज लूकाच

                             मिथकीय समीक्षा                         -   नार्थप फ्राई

                              स्वच्छंदतावाद                             -  बर्डसवर्थ

                              अन्तर्विरोध                                  -  क्लींच ब्रुक्स

                              विखंडन वाद                               -  जाक देरिदा

                             विडम्बना और विसंगति                 -  क्लींथ ब्रुक्स

                             विरोधाभास (आईरनी)                    -  रार्बट पेन वारेन

                             साहित्य का समाजशात्र                   -  ईपालित तेन

                                          अजनबीपन                       -   मार्क्स

         पाश्चात्य आलोचकों के अनुसार कविता की परिभाषा

·         ड्राइडन कविता रागात्मक और छन्दोबद्ध भाषा के माध्यम से प्रकृति का अनुकरण है।

·         ड्राइडन ’’स्पष्ट संगीत कविता है।’’

·         वर्ड्सवर्थ कविता हमारे प्रबल भावों का सहज उच्छलन है।

·         जान्सन ’’छन्दमयी वाणी कविता है।’’

·         मैथ्यू आरनोल्ड ’’सत्य तथा काव्य सौंदर्य के सिद्धान्तों द्वारा निर्धारित उपबंधों के अधीन जीवन की समीक्षा का नाम काव्य है।’’

·         जान मिल्टन ’’सरल, प्रत्यक्ष तथा रागात्मक अभिव्यक्ति काव्य है।’’

·         वर्डसवर्थ ’’शान्ति के क्षणों में स्मरण किये हुए प्रबल मनोवेगों का सहज उच्छलन कविता है।’’

·         पी.बी. शैली कविता सुखद और उत्कृष्ट मस्तिष्क द्वारा सुखद और उत्कृष्ट क्षणों का संग्रह है।

·         एडगरे एलन ’’काव्य सौन्दर्य की लयपूर्ण सृष्टि है।’’

·         मैथ्यू आर्नल्ड ’’कविता मूल रूप से जीवन की आलोचना है।’’

·         कालरिज ’’सर्वाेत्तम् व्यवस्था में सर्वोत्तम शब्द ही कविता है।’’

·         हडसन ’’कविता कल्पना और संवेग के द्वारा जीवन की व्याख्या है।

·         पी. बी. शैली हमारे सबसे मधुर गीत वही हैं जो हमारे सर्वाधिक विषादपूर्ण विचारों की अभिव्यक्ति है।


हमारी अन्य लेखभारतीय कव्यशात्र प्रश्नोत्तर


       इस लेख को पढ़ने के पश्चात कृपया blog के comment box में comment जरुर करेंगें ताकी हमें अगला blog post लिखने में हिम्मत मिले | thanks 








अमीर खुसरो के दोहे, मुकरियाँ और गीत /amir khsro ke dohe mukriyan or geet

                                         अमीर खुसरो के दोहे, मुकरियाँ और गीत   1.      एक नार किया -----------------------------------...