रीतिकाल का नामकरण और कालसीमा
नामकरण - हिन्दी-साहित्य
का उतर-मध्यकाल
(लगभग
सन 1643
ई०से
1843 ई०तक) जिसमें
सामान्य रूप से श्रृंगारपरक लक्षण–ग्रन्थों की रचना हुई |
नामकरण की दृष्टि से विद्वानों में पर्याप्त मतभेद का विषय रहा है | मिश्रबन्धुओं
ने इसे ‘अलंकृत काल’ कहा है, जबकि
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल इसे ‘रीतिकाल’
रमाशंकर शुक्ल ‘रसाल’ ने ‘कलाकाल’
और पं. विश्वनाथप्रसाद
मिश्र ‘श्रृंगारकाल’
संज्ञा देते है | इन अभिधानो में से प्रथम दो के लिए जहाँ रचना–पद्ति
का आधार ग्रहण किया गया है, वहाँ अन्तिम उस युग की रचनाओं के
आधार पर है, किन्तु, इस
युग के लिए ‘अलंकृत’ विशेषण अधिक समीचीन प्रतीत नहीं
होता,
कारण, मिश्र
महोदयों ने इसके समर्थन में जो तर्क दिया है कि इस युग की कविता को अलंकृत करने की
परिपाटी अधिक थी, वह इसलिए मान्य नहीं हो सकता क्योंकि यह कविता केवल
अलंकृत ही नहीं है, इतर काव्यगों को भी इसमें यथोचित स्थान प्राप्त रहा
है; कवियों
की प्रवृति भी केवल अलंकारयुक्त रचनाये करना नहीं थी –
उन्होंने इसकी उपेच्छा रस पर अधिक बल दिया है |
ध्यान देने योग्य
तथ्य यह है की चाहे श्रृंगार रस की प्रधानता का प्रश्न हो या अलंकरण की प्रवृति की
प्रधानता दोनों में रीति निरूपण की प्रवृति मूल रूप से अंतनिर्हित है जो उस युग की
मुख्य काव्य चेतना थी, और जो अपनी विशिष्ट पृष्ठभूमि तथा परम्परा में
स्वाभाविक रूप में आई थी, अत: ‘रीतिकाल’ नामकरण
उचित है |
जहाँ तक रीतिकाल को ‘उतरमध्यकाल’
की संज्ञा देने का प्रश्न है; वहाँ डॉ बच्चन सिंह का यह कथन
उसकी निरर्थकता के लिए पर्यप्त और तर्क सम्मत भी है –
रीतिकाल
वस्तु,
शैली,
छंद,
रूप-विधान
में भक्तिकाव्य से भिन्न भूमिका पर खड़ा है | यह अपने आप में स्वंतत्र काल है, इसे
उतर मध्यकाल कहना गणितीय प्रभावोत्पादक है |
रीतिकाल की
विविध काव्य धाराओं को मूलतः तीन वर्णों में विभक्त किया गया है |
1.रीतिबद्ध काव्य 2.रीतिसिद्ध काव्य 3.रीतिमुक्त काव्य
डॉ बच्चन सिंह
ने रीतिबद्ध काव्य को ‘रीति चेतस’ रितिसिध्द काव्य को काव्य चेतस
करते हुए बिलकुल नवीन नामकरण किया है |रीतिमुक्त काव्य धारा को उन्होंने
मुक्त रीति काव्य कहते हुए क्लासिकल या अभिजात तथा स्वच्छद धारा नाम से दो वर्ग
किए है अभिजात वर्ग में डॉ बच्चन सिंह ने बिहारी को रखा है,
जिन्हें अधिकांश इतिहासकारो ने रीतिसिद्ध काव्य के अन्तर्गत माना है | इस
तरह रीतिकाल की विविध काव्य धराओं के नामकरण में पर्याप्त मतभेद दिखाई पड़ता है, किन्तु
उतर मध्यकाल हिन्दी साहित्य के लिए ‘रीतिकाल’ नामकरण
अब पूर्ण रूप से प्रचलित और सर्वमान्य हो चुका है |
कालसीमा - आचर्य रामचन्द्र शुक्ल ने ‘हिन्दी–साहित्य
का इतिहास’ लिखते समय उसे प्रवृतियों के अनुसार चार भागों में
विभाजित किया है तथा परवर्ती विद्वानों ने उनके इस विभाजन की काल–सीमाओं को
प्राय: ग्रहण
भी कर लिया है, किन्तु उनका सबसे बड़ा दोष यही है कि वे इस सम्बन्ध
में उदार नहीं हो पाये – निशिचत संवत् से प्रवृति–विशेष
का आरम्भ और निशिचत संवत् पर उसका अन्त निर्धारित कर बैठे हैं |
जिस युग में रीति–निरूपण अथवा रीति–प्रभावित
ग्रंथों के निर्माण प्रचुर रहा, उसको ‘रीतिकाल’ संज्ञा
देते हुए उसका समय भी उन्होंने संवत् 1700 (1643 ई०) से
1900 वि०
(1843 ई०) तक
निश्चित किया है | पर इन निश्चित संवतों को स्वीकार
करने में सबसे बड़ी आपति यह होती है कि उन रीतिकवियों के कतिपय ग्रन्थ इनसे आगे–पीछे
रचे जाने के कारण ‘रीतिकाल’ की परिधि में नहीं आ पाते, जिन्हें
वे स्वयं ही इस युग में परिगणित कर चुके है | उदाहरण के लिए चिन्तामणि –
कृत ‘रसविलास’
तथा मतिराम कृत ‘रसराज’ 1643 ई० से लगभग 10 वर्ष
पूर्व की तथा ग्वाल कवि की ‘रसरंग’ आदि
रचनांए (1843ई०) लगभग 10 -15 वर्ष
बाद की ही ठहरती है | इनके अतिरिक्त कतिपय कवि ऐसे भी है,
जिनका जन्म भकितकाल में हुआ और उनकी रचनाएँ ‘रीतिकाल’ में
लिखी गयीं अथवा उनका जन्म ‘रीतिकाल’ में
हुआ और रचनाएँ वे इसकी समाप्ति के 10-20 वर्ष बाद तक करते रहे | अतएव
‘रीतीकाल’ की सीमाएं हमें सामान्य रूप से सत्रहवीं शती के
मध्य से उन्नीसवीं शती के मध्य तक मान लेनी चाहिए | इस
काल के आदि और अन्त के दोनों ओर लगभग 20-20 वर्ष का समय जो छोड़ा गया
है, उसे
यदि इसकी प्रस्तावना और उपसंहति के नामों से अभिहित किया जाये तो भी कोई आपति की
बात न होगी; कारण, इससे कालविषयक सीमा –बन्धन
के परिणामस्वरूप एक ही परम्परा के कतिपय
ग्रन्थों को इस प्रकार की रचनाओं के वर्ग से निष्काषित न किया जा सकेगा |
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