Monday, May 16, 2022

काव्य दोष की परिभाषा व् भेद / kavy dosh ki pribhasha v bhed

                      काव्य दोष की परिभाषा व् भेद

  काव्य का अर्थ होता है – जिसकी सहायता से मनुष्य अपने मनोभाव को कलात्मकता के साथ अभिव्यक्ति देता है | इसे हिंदी भाषा साहित्य में पद्य विधा के रूप में पहचानते हैं |

      दोष का अर्थ होता है – भूल, त्रुटी, रोग तथा हानि है |

            इस प्रकार साफ दृष्टिगोचर होता है कि किसी कविता या काव्य की अभिव्यक्ति की कलात्मकता को छति, हानि, त्रुटि और दोष पहुँचाने वाले कारक काव्य दोष कहलाते हैं |

        विभिन्न आचार्यों के अनुसार काव्य दोष की परिभाषा

         आद्याचार्य भरतमुनि के अनुसार – काव्य में गुण के अभाव को काव्य दोष कहते हैं |

दण्डी और विश्वनाथ के अनुसार – काव्य के मुख्यार्थ पर बाधा पहुँचाने वाले कारक को काव्य दोष कहते हैं |

भामह के अनुसार – काव्य में औचित्य का अभाव होना ही काव्य दोष कहलाता है |

वामन के अनुसार – “ गुण विषयोयात्मनो दोष:” अर्थात्  काव्य में गुण का अभाव होना काव्य दोष है |

मम्मट के अनुसार – “मुख्यार्थ हतिदोष:” अर्थात् काव्य में मुख्यार्थ को नष्ट करने वाले कारक हैं |

        उपर्युक्त आचार्यों की परिभाषा से निष्कर्ष निकलता है कि – ‘काव्य में रस को हानि पहुंचाने वाले तत्त्व काव्य दोष हैं | काव्य दोष रस को तीन प्रकार से हानि या छति पहुंचाते हैं –

१.   रस की प्रतीति को विलम्ब करके

२.   रस की प्रतीति में अवरोध (बाधा) द्वारा    

३.   रस की प्रतीति में पूर्ण विघात द्वारा

 

काव्य दोष के भेद

काव्य के दोषों की संख्या को लेकर आचार्यों में काफी मतभेद रहा है | मम्मट ने ‘काव्य प्रकाश’ में काव्य दोष को लेकर पर्याप्त विवेचना किया है | इनके अनुसार काव्य दोष के तीन भेद हैं –

१.   शब्द दोष २. अर्थ दोष  ३. रस दोष

१.   शब्द दोष – काव्य में भाव और रस के प्रतिकूल कठोर या कर्णकटु शब्दों का प्रयोग, व्याकरण विरुद्ध प्रयोग, अप्रचलित शब्दों का प्रयोग, ग्रामीण, अश्लील, अमंगल सूचक, घृणास्पद, लोक व्यव्हार में अशिष्ट, शव्दों का प्रयोग काव्य दोष कहलाता है | जैसे –

·        व्याकरण विरुद्ध शब्द प्रयोग – वैसी काव्य जिसमें व्याकरण विरुद्ध शव्द का प्रयोग किया गया हो, जैसे – ‘फूलों की लावण्यता देती है आनन्द’ यहाँ ‘लावण्य’ शब्द भाव वाचक संज्ञा है |

·       अश्लील शब्द प्रयोग – वैसी काव्य जिसमें अश्लील शब्दों का प्रयोग हो, जैसे – ‘रावण के दरबार में स्थिर अंगद का पाद’ | यहाँ ‘पाद’ के लिए ‘पैर’ नहीं बल्कि अपानवायु यानि ‘पादना’ की और संकेत करती है |

२.   अर्थ दोष – जिस काव्य में शब्दार्थ बाधित होता है, उस काव्य में अर्थ दोष होता है | काल दोष, पुनरुक्त, प्रसिद्धि, निहितार्थ आदि दोषों में अर्थ दोष उत्पन्न होती है |    

·       काल दोष – जैसे –

        पांडव की प्रतिमा सम लेखी |

         अर्जुन भीम महामति देखी || यहाँ ‘राम’ के मुख से ‘पांडव’ की उल्लेख होना काल दोष है |

·       पुनर्युक्त दोष – जैसे –

     मृदु वाणी मीठी लगे, बात कवि की उक्ति || यहाँ ‘मृदु’ और ‘मीठी’ तथा ‘वाणी’ और ‘बात’ में पुनरुक्ति दोष है |

·       प्रसिद्धि दोष – जैसे –

     ‘हरि दौड़े रण में लिए कर में धन्यवाण’ कृष्ण द्वारा हाथ में धनुष वाण लेकर युद्ध मैदान में दौड़ जाना में काव्य प्रसिद्धि दोष है |

·       निहितार्थ दोष – जैसे –

  विषमय यह गोदावरी, अमृतानी के फल देति | यहाँ वैद्यकशास्त्र में ‘विष’ का अर्थ ‘पानी’ होता है यहाँ विष का प्रयोग दोष पूर्ण है |  

३.   रस दोष – काव्य में जब रस की प्रतीति में बाधा या बिलम्ब आए तब रस दोष होता है | काव्य में जब स्व शब्द वाच्य, विभावनुभाव अस्पष्टता, प्रतिकूल रस मिश्रण आदी दोषों में रस दोष होता है |

·       स्व शब्द वाच्य दोष – जैसे –

     उमगत है चहुँ ओर छवि, मानहु रस श्रंगार | यहाँ ‘रस’ और श्रृंगार’ स्व शव्द दोष है | क्योंकि ‘रस’ तो स्वत: उत्पन्न होता है| इसका स्पष्ट कथन करना दोष है |

·        विभावनुभाव अस्पष्टता – जैसे –

‘सेवन जोग बन्याबों नितम्ब गिरिस के है अथवा तरुनिक के’ यहाँ वक्ता योगी है या भोगी पता नहीं चल रहा है | अत: यहाँ वक्ता का आता-पता न होने के कारण  विभावनुभाव अस्पष्टता एस दोष है |

·       प्रतिकूल रस मिश्रण दोष – जैसे –

  विरह सरासनी भूजुं माँसु| गिरि गिरि परे रकत के आंसू || यहाँ वियोग श्रृंगार के चित्रण में करुणा और वीभत्स रस का चित्रण में प्रतिकूल रस मिश्रण दोष है |

 

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