* रीतिकाल की प्रवृति *
रीतिकाल का साहित्य सामंती वातावरण और
संस्कृति का उद्धभावना है | राजदरबारों में आश्रय पानेवाले
कवियों द्वारा कविता का मुख्य प्रवृति धनोपार्जन है | कविता
में रीति और अलंकार का खुलकर प्रयोग है | भाव सौन्दर्य में नारी के
सौन्दर्य चित्रण में ही सारी शक्ति लगा दी है | कविता
में ‘प्रेम
की पुकार’ ‘रसिकता की अभिव्यक्ति’ मुख्य
उदेश्य है | फिर भी इस काल
की मुख्य प्रवृति निम्न प्रकार है |
(1) श्रृंगारिकता – श्रृंगार
वर्णन रीतिकाल के काव्य का मुख्य उदेश्य है | कवियों ने श्रृंगार को रसराज के रूप
में प्रतिष्टित कर दिये | वर्ण्य विषय नायिकाभेद, नख–शिख, अलंकार
आदि का लक्षण प्रस्तुत करना है | श्रृंगार वर्णन दो रूप में
प्राप्त है –
संयोग और वियोग | संयोग
वर्णन में छोम, भाव, अनुभाव, सुरतवर्णन, विपरीत रति वर्णन को महत्व दी है |
यहाँ बिहारी
की कविता देखिए –
बतरस
लालय लाल की, मुरली धरी लुकाय |
सौह
करै, मौहनि
हैसे, देने
कहै, नटी
जाय ||
वियोग
वर्णन में पूर्वराग, मान, प्रवास, और
करुणा का वर्णन किया है |
( 2 ) अलंकार
का प्राधान्य - इस काल
में अलंकारिकता भी मुख्य काव्य प्रवृति है | काव्य-प्रदर्शण, चमत्कार
और रसिकता को प्राधान्य दिया गया था | अति–चमत्कार
द्वारा पाठक या श्रोताओं पर अपना प्रभाव डालना कवियों का मुख्य लक्ष्य था | श्रृंगार
के संयोग व वियोग दशाओं में भी आलंकारिता की ही प्रयोग होती थी | केशवदास
ने कहा है अलंकार के बिना इस युग में कविता करना मुश्किल है | अत: कहा
है –
जदपि सुजाति सुलच्छनी सुबरन सरस सुवृन्त |
भूषण बिनु न
विराजई कविता बनिता मित ||
(3 ) भक्ति और नीति- रीतिकाल
में भक्ति और नीति के कविता करते देखे गये है | कवि
यौवनवस्था में श्रृंगारिक काव्य लिखें पर वृद्धावस्था में राधा–कृष्ण
के नाम लेकर भक्ति की कोटि में काव्य लिखे हैं | इस
संदर्भ में भिखारीदास लिखते है –
रीझि है सुकवि
जौ तो जानौ कविताई,
न तु राधिका–कन्हाई सुमिरन को बहानों है |
(4) नारी का प्रेमिका स्वरूप –
इस काल में कवियों ने नारी को प्रेमिका के रूप में देखा और उसे उसका सामाजिक दायित्व सौपा ही नहीं | नारी
केवल पुरुष के रति भाव के आलंबन मात्र बन कर रह गई | घनानंद
ने ‘सुजान
को और बोधा ने ‘सुभान’ को सामाजिक रूप न देकर प्रेमिका
का स्वरूप दिया | कवियों ने नारी के व्यापक दृष्टिकोण नहीं दी नारी
के अंग–प्रत्यंग
की शोभा उनके बाहय चटक-मटक, हाव–भाव, विलास
की चेष्टाओं को काव्य का विषय बनाया |
(5)वीररस की कविताएँ – यह
युग शाहजहाँ जैसे शांति और समृध्द् तथा औरगजेब जैसे कट्टर शासक का शासनावधि था | औरंगजेब
ने धार्मिक नीति में कट्टरता का बीज बोया था इस एवज में शिवाजी, छत्रशाल,
राजसिंह, गुरुगोविन्द सिंह इनके शत्रु हो गये थे | इन्होंने
स्वदेश और धर्म की रक्षा को जीवन प्रर्यत औरंगजेब से लोहा लिया है | कवि
लाल,
सुदन, पधाकर
ने वीररसात्मक काव्य लिखकर राष्ट्रीयता से ओत-प्रोत
की कविता लिखी |
(6) लक्षण ग्रन्थों का प्राधान्य –
रीतिकाल में कवियों ने कविकर्म और आचार्य कर्म दोनों को एक साथ लेकर अवतरित हुए | रीतिकालीन
कवियों ने लक्षण और उदाहरण दोनों प्रस्तुत किये पर रीतिसिद्ध कवियों ने केवल
उदाहरण जुटाए | हमें मानना चाहिए कि इस समय के कवि सर्वप्रथम भावुक
ह्रदय रखते हैं, अत: कविकर्म के निर्वाह करने के लिये
आचार्य कर्म भी करते हैं, पर इन्हें आचार्य कर्म के निर्वाह के लिये उचित
पांडित्य नहीं थी | अत: यही कारण है कि लक्षण ग्रन्थ में
मौलिकता नहीं है | यह संस्कृत के काव्यशास्त्रीय लक्षण ग्रन्थों का
अनुकरण मात्र है |
(7) जीवन दर्शन –
रीतिकाल में यथार्थ जीवन के मार्मिक चित्र का वर्णनं है | खासकर
जीवन के यौवनावस्था का | ये कवि नैराश्य जीवन पर काव्य नहीं रचते,
वैभव और विलासपूर्ण जीवन पर ही काव्य रचना करते थे |
(8) उद्दीपन
रूप में प्रकृति चित्रण – काव्य में प्रकृति-चित्रण
दो रूपों में होता है, आलम्बन और उद्दीपन रूप में | प्रकृति
के बिंबग्रही स्वरूप के चित्रण में आलंबन रूप का चित्रण मिलता है | जैसा
कि वाल्मीकि और कालिदास के काव्य में, प्रकृति का चित्रण जहाँ नायक और
नायिका की मनोदशा के अनुकूल किया जाता है वहाँ
उद्दीपन रूप का चित्रण हुआ है |
(9) अभिव्यंजना–पध्दति
–
कवि जो अनुभव करता है उसे मूल रूप देने के लिए शब्दों, मुहावरों, विशेषनों
और लोकोक्तियाँ का चयन अपनी रूचि के अनुसार करता है | इस
काल में कवियों ने कन्हैया, साँवलिया और लला जैसे शब्दों का
प्रयोग किया है | जनजीवन, कन्हैया,साँवलिया
के रूप में उपस्थित हुई | नेत्र के नए विशेषण अनियारे नयन, उरोजनी, निपट
कठोर उरोजनि आदि प्रयुक्त हुए | आँख, मन, चित, आदि
पर महावरे रचे जाने लगे |
(10 ) विविधमुखी साहित्य का
निर्माण – इस युग में
ज्योतिष, सामुद्रिक शास्त्र, काव्यशास्त्र, राजनीति
शास्त्र, संगीतशास्त्र आदि विषयों पर विविध पुस्तक लिखी गई | बिहारी
सतसई तो इस युग की पुरा ज्ञान का भंडार है
|
(11) मुक्तकशैली – इस काल में कवियों का मुख्य
उदेश्य अपने आश्रयदाता को संतुष्ट करना का है | अत: कवियों
ने मुक्तक छन्दों में काव्य रचना की | इस परम्परा के प्रवर्तक में हाल
की गाहासतसई, अमरुक का अमरुकशतक,
गोवर्दनाचार्य का आर्यसप्तशती प्रमुख है | अधिकांश रचनाओं में कवित, सवैया,
दोहा जैसे छंद का प्रयोग किया जाने लगा |
(12) ब्रज भाषा का प्रयोग –
रीतिकाल ब्रज भाषा का स्वर्णकाल है | इस युग में बिहारी सतसई, ललितललाम, कविकुलकल्पतरु, आदि
ग्रन्थ लिखे गए |
(13) कवियों की पराश्रय की
भावना –
कवियों का मुख्य उदेश्य धनोपार्जन था | इन्हें इस उदेश्य से राजदरबार से
उपयुक्त स्थान और कहीं नहीं था अत: कवि लोग राजाओं के पराश्रय में
रहना ही अच्छा समझते थे |
हमारी अन्य लेख -हिंदी साहित्य का इतिहास लेखन की परम्परा
No comments:
Post a Comment