Friday, January 21, 2022

रीतिकाल की प्रवृति / ritikaal ki prvriti

                    *   रीतिकाल की प्रवृति  *

     रीतिकाल का साहित्य सामंती वातावरण और संस्कृति का उद्धभावना है | राजदरबारों में आश्रय पानेवाले कवियों द्वारा कविता का मुख्य प्रवृति धनोपार्जन है | कविता में रीति और अलंकार का खुलकर प्रयोग है | भाव सौन्दर्य में नारी के सौन्दर्य चित्रण में ही सारी शक्ति लगा दी है | कविता में प्रेम की पुकार’ ‘रसिकता की अभिव्यक्तिमुख्य उदेश्य है | फिर भी इस काल  की मुख्य प्रवृति निम्न प्रकार है |

(1)   श्रृंगारिकता श्रृंगार वर्णन रीतिकाल के काव्य का मुख्य उदेश्य है | कवियों ने श्रृंगार को रसराज के रूप में प्रतिष्टित कर दिये | वर्ण्य विषय नायिकाभेद, नखशिख, अलंकार आदि का लक्षण प्रस्तुत करना है | श्रृंगार वर्णन दो रूप में प्राप्त है

संयोग और वियोग | संयोग वर्णन में छोम, भाव, अनुभाव, सुरतवर्णन, विपरीत रति वर्णन  को महत्व दी है |                                     

यहाँ बिहारी की कविता देखिए

          बतरस लालय लाल की, मुरली धरी लुकाय |

                                    सौह  करै, मौहनि हैसे, देने कहै, नटी जाय ||

                                                            वियोग वर्णन में पूर्वराग, मान, प्रवास, और करुणा का वर्णन किया है |

                                                                                                                           ( 2 ) अलंकार का प्राधान्य इस काल में अलंकारिकता भी मुख्य काव्य प्रवृति है | काव्य-प्रदर्शण, चमत्कार और रसिकता को प्राधान्य दिया गया था | अतिचमत्कार द्वारा पाठक या श्रोताओं पर अपना प्रभाव डालना कवियों का मुख्य लक्ष्य था | श्रृंगार के संयोग व वियोग दशाओं में भी आलंकारिता की ही प्रयोग होती थी | केशवदास ने कहा है अलंकार के बिना इस युग में कविता करना मुश्किल है | अत: कहा है –  

            जदपि सुजाति सुलच्छनी सुबरन सरस सुवृन्त |

                    भूषण बिनु न विराजई कविता बनिता मित ||

(3 ) भक्ति और नीति- रीतिकाल में भक्ति और नीति के कविता करते देखे गये है | कवि यौवनवस्था में श्रृंगारिक काव्य लिखें पर वृद्धावस्था में राधाकृष्ण के नाम लेकर भक्ति की कोटि में काव्य लिखे हैं | इस संदर्भ में भिखारीदास लिखते है – 

                   रीझि है सुकवि जौ तो जानौ कविताई,   

                 न तु राधिकाकन्हाई  सुमिरन को बहानों है |

(4) नारी का प्रेमिका स्वरूप इस काल में कवियों ने नारी को प्रेमिका के रूप में  देखा और उसे उसका सामाजिक दायित्व सौपा ही नहीं | नारी केवल पुरुष के रति भाव के आलंबन मात्र बन कर रह गई | घनानंद ने सुजान को और बोधा ने सुभानको सामाजिक रूप न देकर प्रेमिका का स्वरूप दिया | कवियों ने नारी के व्यापक दृष्टिकोण नहीं दी नारी के अंगप्रत्यंग की शोभा उनके बाहय चटक-मटक, हावभाव, विलास की चेष्टाओं को काव्य का विषय बनाया |

(5)वीररस की कविताएँ यह युग शाहजहाँ जैसे शांति और समृध्द् तथा औरगजेब जैसे कट्टर शासक का शासनावधि था | औरंगजेब ने धार्मिक नीति में कट्टरता का बीज बोया था इस एवज में शिवाजी, छत्रशाल, राजसिंह, गुरुगोविन्द सिंह इनके शत्रु हो गये थे | इन्होंने स्वदेश और धर्म की रक्षा को जीवन प्रर्यत औरंगजेब से लोहा लिया है | कवि लाल, सुदन, पधाकर ने वीररसात्मक काव्य लिखकर राष्ट्रीयता से ओत-प्रोत की कविता लिखी |

(6) लक्षण ग्रन्थों का प्राधान्य रीतिकाल में कवियों ने कविकर्म और आचार्य कर्म दोनों को एक साथ लेकर अवतरित हुए | रीतिकालीन कवियों ने लक्षण और उदाहरण दोनों प्रस्तुत किये पर रीतिसिद्ध कवियों ने केवल उदाहरण जुटाए | हमें मानना चाहिए कि इस समय के कवि सर्वप्रथम भावुक ह्रदय रखते हैं, अत: कविकर्म के निर्वाह करने के लिये आचार्य कर्म भी करते हैं, पर इन्हें आचार्य कर्म के निर्वाह के लिये उचित पांडित्य नहीं थी | अत: यही कारण है कि लक्षण ग्रन्थ में मौलिकता नहीं है | यह संस्कृत के काव्यशास्त्रीय लक्षण ग्रन्थों का अनुकरण मात्र है |

(7) जीवन दर्शन रीतिकाल में यथार्थ जीवन के मार्मिक चित्र का वर्णनं है | खासकर जीवन के यौवनावस्था का | ये कवि नैराश्य जीवन पर काव्य नहीं रचते, वैभव और विलासपूर्ण जीवन पर ही काव्य रचना करते थे |

 (8) उद्दीपन रूप में प्रकृति चित्रण काव्य में प्रकृति-चित्रण दो रूपों में होता है, आलम्बन और उद्दीपन रूप में | प्रकृति के बिंबग्रही स्वरूप के चित्रण में आलंबन रूप का चित्रण मिलता है | जैसा कि वाल्मीकि और कालिदास के काव्य में, प्रकृति का चित्रण जहाँ नायक और नायिका की मनोदशा के अनुकूल किया जाता है वहाँ  उद्दीपन रूप का चित्रण हुआ है |

(9) अभिव्यंजनापध्दति कवि जो अनुभव करता है उसे मूल रूप देने के लिए शब्दों, मुहावरों, विशेषनों और लोकोक्तियाँ का चयन अपनी रूचि के अनुसार करता है | इस काल में कवियों ने कन्हैया, साँवलिया और लला जैसे शब्दों का प्रयोग किया है | जनजीवन, कन्हैया,साँवलिया के रूप में उपस्थित हुई | नेत्र के नए विशेषण अनियारे नयन, उरोजनी, निपट कठोर उरोजनि आदि प्रयुक्त हुए | आँख, मन, चित, आदि पर महावरे रचे जाने लगे |

(10 ) विविधमुखी साहित्य का निर्माण   इस युग में ज्योतिष, सामुद्रिक शास्त्र, काव्यशास्त्र, राजनीति शास्त्र, संगीतशास्त्र आदि विषयों पर विविध पुस्तक लिखी गई | बिहारी सतसई  तो इस युग की पुरा ज्ञान का भंडार है |

(11) मुक्तकशैली  – इस काल में कवियों का मुख्य उदेश्य अपने आश्रयदाता को संतुष्ट करना का है | अत: कवियों ने मुक्तक छन्दों में काव्य रचना की | इस परम्परा के प्रवर्तक में हाल की गाहासतसई, अमरुक का अमरुकशतक, गोवर्दनाचार्य का आर्यसप्तशती प्रमुख है | अधिकांश रचनाओं में कवित, सवैया, दोहा जैसे छंद का प्रयोग किया जाने लगा |

(12) ब्रज भाषा का प्रयोग रीतिकाल ब्रज भाषा का स्वर्णकाल है | इस युग में बिहारी सतसई, ललितललाम, कविकुलकल्पतरु, आदि ग्रन्थ लिखे गए |

(13) कवियों की पराश्रय की भावना कवियों का मुख्य उदेश्य धनोपार्जन था | इन्हें इस उदेश्य से राजदरबार से उपयुक्त स्थान और कहीं नहीं था अत: कवि लोग राजाओं के पराश्रय में रहना ही अच्छा समझते थे |  


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